अंग
628
राग सोरठ
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸੰਤਹੁ ਸੁਖੁ ਹੋਆ ਸਭ ਥਾਈ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪੂਰਨ ਪਰਮੇਸਰੁ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਸਭਨੀ ਜਾਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਧੁਰ ਕੀ ਬਾਣੀ ਆਈ ॥
ਤਿਨਿ ਸਗਲੀ ਚਿੰਤ ਮਿਟਾਈ ॥
ਦਇਆਲ ਪੁਰਖ ਮਿਹਰਵਾਨਾ ॥
ਹਰਿ ਨਾਨਕ ਸਾਚੁ ਵਖਾਨਾ ॥੨॥੧੩॥੭੭॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪੂਰਨ ਪਰਮੇਸਰੁ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਸਭਨੀ ਜਾਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਧੁਰ ਕੀ ਬਾਣੀ ਆਈ ॥
ਤਿਨਿ ਸਗਲੀ ਚਿੰਤ ਮਿਟਾਈ ॥
ਦਇਆਲ ਪੁਰਖ ਮਿਹਰਵਾਨਾ ॥
ਹਰਿ ਨਾਨਕ ਸਾਚੁ ਵਖਾਨਾ ॥੨॥੧੩॥੭੭॥
संतहु सुखु होआ सभ थाई ॥
पारब्रहमु पूरन परमेसरु रवि रहिआ सभनी जाई ॥ रहाउ ॥
धुर की बाणी आई ॥
तिनि सगली चिंत मिटाई ॥
दइआल पुरख मिहरवाना ॥
हरि नानक साचु वखाना ॥२॥१३॥७७॥
पारब्रहमु पूरन परमेसरु रवि रहिआ सभनी जाई ॥ रहाउ ॥
धुर की बाणी आई ॥
तिनि सगली चिंत मिटाई ॥
दइआल पुरख मिहरवाना ॥
हरि नानक साचु वखाना ॥२॥१३॥७७॥
हिन्दी अर्थ: हे संत जनो ! (उस मनुष्य को) सब जगहों में सुख ही प्रतीत होता है। (जिस मनुष्य को ये यकीन हो जाता है कि) पारब्रहम पूरन परमेश्वर हर जगह पर मौजूद हैरहाउ। हे संत जनो ! परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी जिस मनुष्य के अंदर आ बसी। उसने अपनी सारी चिंता दूर कर ली। हे नानक ! दया का श्रोत प्रभू उस मनुष्य पर मेहरवान हुआ रहता है। वह मनुष्य उस सदा कायम रहने वाले प्रभू का नाम (हमेशा) उचारता है। 2। 13। 77।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਐਥੈ ਓਥੈ ਰਖਵਾਲਾ ॥
ਪ੍ਰਭ ਸਤਿਗੁਰ ਦੀਨ ਦਇਆਲਾ ॥
ਦਾਸ ਅਪਨੇ ਆਪਿ ਰਾਖੇ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਸਬਦੁ ਸੁਭਾਖੇ ॥੧॥
ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਣ ਊਪਰਿ ਬਲਿ ਜਾਈ ॥
ਦਿਨਸੁ ਰੈਨਿ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਮਾਲੀ ਪੂਰਨੁ ਸਭਨੀ ਥਾਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਪਿ ਸਹਾਈ ਹੋਆ ॥
ਸਚੇ ਦਾ ਸਚਾ ਢੋਆ ॥
ਤੇਰੀ ਭਗਤਿ ਵਡਿਆਈ ॥
ਪਾਈ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾਈ ॥੨॥੧੪॥੭੮॥
ਐਥੈ ਓਥੈ ਰਖਵਾਲਾ ॥
ਪ੍ਰਭ ਸਤਿਗੁਰ ਦੀਨ ਦਇਆਲਾ ॥
ਦਾਸ ਅਪਨੇ ਆਪਿ ਰਾਖੇ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਸਬਦੁ ਸੁਭਾਖੇ ॥੧॥
ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਣ ਊਪਰਿ ਬਲਿ ਜਾਈ ॥
ਦਿਨਸੁ ਰੈਨਿ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਮਾਲੀ ਪੂਰਨੁ ਸਭਨੀ ਥਾਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਪਿ ਸਹਾਈ ਹੋਆ ॥
ਸਚੇ ਦਾ ਸਚਾ ਢੋਆ ॥
ਤੇਰੀ ਭਗਤਿ ਵਡਿਆਈ ॥
ਪਾਈ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾਈ ॥੨॥੧੪॥੭੮॥
सोरठि महला ५ ॥
ऐथै ओथै रखवाला ॥
प्रभ सतिगुर दीन दइआला ॥
दास अपने आपि राखे ॥
घटि घटि सबदु सुभाखे ॥१॥
गुर के चरण ऊपरि बलि जाई ॥
दिनसु रैनि सासि सासि समाली पूरनु सभनी थाई ॥ रहाउ ॥
आपि सहाई होआ ॥
सचे दा सचा ढोआ ॥
तेरी भगति वडिआई ॥
पाई नानक प्रभ सरणाई ॥२॥१४॥७८॥
ऐथै ओथै रखवाला ॥
प्रभ सतिगुर दीन दइआला ॥
दास अपने आपि राखे ॥
घटि घटि सबदु सुभाखे ॥१॥
गुर के चरण ऊपरि बलि जाई ॥
दिनसु रैनि सासि सासि समाली पूरनु सभनी थाई ॥ रहाउ ॥
आपि सहाई होआ ॥
सचे दा सचा ढोआ ॥
तेरी भगति वडिआई ॥
पाई नानक प्रभ सरणाई ॥२॥१४॥७८॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे भाई !(शरण आए की) इस लोक और परलोक में रक्षा करने वाला है। गुरू प्रभू गरीबों पर दया करने वाला है। (हे भाई ! प्रभू) अपने सेवकों की स्वयं रक्षा करता है (सेवकों को ये भरोसा रहता है कि) प्रभू हरेक शरीर में (स्वयं ही) बचन बिलास कर रहा है। 1। हे भाई ! मैं (अपने) गुरू के चरणों से सदके जाता हूँ। (गुरू की कृपा से ही) मैं (अपने) हरेक सांस के साथ दिन रात (उस परमात्मा को) याद करता रहता हूँ जो सब जगहों में भरपूर है।रहाउ। (हे भाई ! गुरू की कृपा से) परमात्मा स्वयं मददगार बनता है (गुरू की मेहर से) सदा स्थिर रहने वाले प्रभू की सदा स्थिर रहने वाली सिफत सालाह की दाति मिलती है। तब ही तेरी भक्ति तेरी सिफत सालाह प्राप्त होती है हे नानक ! (कह,) जब हे प्रभू ! (गुरू की कृपा से) तेरी शरण में आते है2। 14। 78।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਪੂਰੇ ਭਾਣਾ ॥
ਤਾ ਜਪਿਆ ਨਾਮੁ ਰਮਾਣਾ ॥
ਗੋਬਿੰਦ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥
ਪ੍ਰਭਿ ਰਾਖੀ ਪੈਜ ਹਮਾਰੀ ॥੧॥
ਹਰਿ ਕੇ ਚਰਨ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਈ ॥
ਜੋ ਇਛਹਿ ਸੋਈ ਫਲੁ ਪਾਵਹਿ ਬਿਰਥੀ ਆਸ ਨ ਜਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਜਿਸੁ ਪ੍ਰਾਨਪਤਿ ਦਾਤਾ ਸੋਈ ਸੰਤੁ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਤਾ ਕਾ ਮਨੁ ਲੀਣਾ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਮਨਿ ਭਾਵੈ ॥੨॥
ਆਠ ਪਹਰ ਹਰਿ ਕਾ ਜਸੁ ਰਵਣਾ ਬਿਖੈ ਠਗਉਰੀ ਲਾਥੀ ॥
ਸੰਗਿ ਮਿਲਾਇ ਲੀਆ ਮੇਰੈ ਕਰਤੈ ਸੰਤ ਸਾਧ ਭਏ ਸਾਥੀ ॥੩॥
ਕਰੁ ਗਹਿ ਲੀਨੇ ਸਰਬਸੁ ਦੀਨੇ ਆਪਹਿ ਆਪੁ ਮਿਲਾਇਆ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸਰਬ ਥੋਕ ਪੂਰਨ ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ॥੪॥੧੫॥੭੯॥
ਸਤਿਗੁਰ ਪੂਰੇ ਭਾਣਾ ॥
ਤਾ ਜਪਿਆ ਨਾਮੁ ਰਮਾਣਾ ॥
ਗੋਬਿੰਦ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥
ਪ੍ਰਭਿ ਰਾਖੀ ਪੈਜ ਹਮਾਰੀ ॥੧॥
ਹਰਿ ਕੇ ਚਰਨ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਈ ॥
ਜੋ ਇਛਹਿ ਸੋਈ ਫਲੁ ਪਾਵਹਿ ਬਿਰਥੀ ਆਸ ਨ ਜਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਜਿਸੁ ਪ੍ਰਾਨਪਤਿ ਦਾਤਾ ਸੋਈ ਸੰਤੁ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਤਾ ਕਾ ਮਨੁ ਲੀਣਾ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਮਨਿ ਭਾਵੈ ॥੨॥
ਆਠ ਪਹਰ ਹਰਿ ਕਾ ਜਸੁ ਰਵਣਾ ਬਿਖੈ ਠਗਉਰੀ ਲਾਥੀ ॥
ਸੰਗਿ ਮਿਲਾਇ ਲੀਆ ਮੇਰੈ ਕਰਤੈ ਸੰਤ ਸਾਧ ਭਏ ਸਾਥੀ ॥੩॥
ਕਰੁ ਗਹਿ ਲੀਨੇ ਸਰਬਸੁ ਦੀਨੇ ਆਪਹਿ ਆਪੁ ਮਿਲਾਇਆ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸਰਬ ਥੋਕ ਪੂਰਨ ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ॥੪॥੧੫॥੭੯॥
सोरठि महला ५ ॥
सतिगुर पूरे भाणा ॥
ता जपिआ नामु रमाणा ॥
गोबिंद किरपा धारी ॥
प्रभि राखी पैज हमारी ॥१॥
हरि के चरन सदा सुखदाई ॥
जो इछहि सोई फलु पावहि बिरथी आस न जाई ॥१॥ रहाउ ॥
क्रिपा करे जिसु प्रानपति दाता सोई संतु गुण गावै ॥
प्रेम भगति ता का मनु लीणा पारब्रहम मनि भावै ॥२॥
आठ पहर हरि का जसु रवणा बिखै ठगउरी लाथी ॥
संगि मिलाइ लीआ मेरै करतै संत साध भए साथी ॥३॥
करु गहि लीने सरबसु दीने आपहि आपु मिलाइआ ॥
कहु नानक सरब थोक पूरन पूरा सतिगुरु पाइआ ॥४॥१५॥७९॥
सतिगुर पूरे भाणा ॥
ता जपिआ नामु रमाणा ॥
गोबिंद किरपा धारी ॥
प्रभि राखी पैज हमारी ॥१॥
हरि के चरन सदा सुखदाई ॥
जो इछहि सोई फलु पावहि बिरथी आस न जाई ॥१॥ रहाउ ॥
क्रिपा करे जिसु प्रानपति दाता सोई संतु गुण गावै ॥
प्रेम भगति ता का मनु लीणा पारब्रहम मनि भावै ॥२॥
आठ पहर हरि का जसु रवणा बिखै ठगउरी लाथी ॥
संगि मिलाइ लीआ मेरै करतै संत साध भए साथी ॥३॥
करु गहि लीने सरबसु दीने आपहि आपु मिलाइआ ॥
कहु नानक सरब थोक पूरन पूरा सतिगुरु पाइआ ॥४॥१५॥७९॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे भाई !) जब गुरू को अच्छा लगता है (जब गुरू प्रसन्न होता है) तब ही परमात्मा का नाम जपा जा सकता है। परमात्मा ने मेहर की (गुरू मिलाया ! गुरू की कृपा से हमने नाम जपा। तो) परमात्मा ने हमारी लाज रख ली (विष ठॅग बूटी से बचा लिया)। 1। हे भाई ! परमात्मा के चरण सदा सुख देने वाले हैं। (जो मनुष्य हरी के चरणों का आसरा लेते हैं।वह) जो कुछ (परमात्मा से) मांगते हैं वही फल प्राप्त कर लेते हैं।(परमात्मा की सहायत पर रखी हुई कोई भी) आस ख़ाली नहीं जाती। 1।रहाउ। (पर। हे भाई ! जीवन का मालिक दातार प्रभू जिस मनुष्य पर मेहर करता है वह संत (स्वभाव बन जाता है।और) परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाता है। उस मनुष्य का मन परमात्मा की प्यार भरी भक्ति में मस्त हो जाता है।वह मनुष्य परमात्मा को (भी) प्यारा लगने लगता है। 2। हे भाई ! आठों पहर (हर समय) परमात्मा की सिफत सालाह करने से विकारों की ठॅगबूटी का असर खत्म हो जाता है (जिस मनुष्य ने सिफत सालाह में मन जोड़ा) ईश्वर ने (उसको) अपने साथ मिला लिया। संत जन उसके संगी-साथी बन गए। 3। (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर जिस भी मनुष्य ने प्रभू-चरणों की आराधना की) प्रभू ने उसका हाथ पकड़ के उसको सब कुछ बख्श दिया।प्रभू ने उसको अपना आप ही मिला दिया। हे नानक ! कह,जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल गया।उसके सारे काम सफल हो गए। 4। 15। 79।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗਰੀਬੀ ਗਦਾ ਹਮਾਰੀ ॥
ਖੰਨਾ ਸਗਲ ਰੇਨੁ ਛਾਰੀ ॥
ਇਸੁ ਆਗੈ ਕੋ ਨ ਟਿਕੈ ਵੇਕਾਰੀ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਏਹ ਗਲ ਸਾਰੀ ॥੧॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸੰਤਨ ਕੀ ਓਟਾ ॥
ਜੋ ਸਿਮਰੈ ਤਿਸ ਕੀ ਗਤਿ ਹੋਵੈ ਉਧਰਹਿ ਸਗਲੇ ਕੋਟਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੰਤ ਸੰਗਿ ਜਸੁ ਗਾਇਆ ॥
ਇਹੁ ਪੂਰਨ ਹਰਿ ਧਨੁ ਪਾਇਆ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਆਪੁ ਮਿਟਾਇਆ ॥
ਸਭੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਨਦਰੀ ਆਇਆ ॥੨॥੧੬॥੮੦॥
ਗਰੀਬੀ ਗਦਾ ਹਮਾਰੀ ॥
ਖੰਨਾ ਸਗਲ ਰੇਨੁ ਛਾਰੀ ॥
ਇਸੁ ਆਗੈ ਕੋ ਨ ਟਿਕੈ ਵੇਕਾਰੀ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਏਹ ਗਲ ਸਾਰੀ ॥੧॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸੰਤਨ ਕੀ ਓਟਾ ॥
ਜੋ ਸਿਮਰੈ ਤਿਸ ਕੀ ਗਤਿ ਹੋਵੈ ਉਧਰਹਿ ਸਗਲੇ ਕੋਟਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੰਤ ਸੰਗਿ ਜਸੁ ਗਾਇਆ ॥
ਇਹੁ ਪੂਰਨ ਹਰਿ ਧਨੁ ਪਾਇਆ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਆਪੁ ਮਿਟਾਇਆ ॥
ਸਭੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਨਦਰੀ ਆਇਆ ॥੨॥੧੬॥੮੦॥
सोरठि महला ५ ॥
गरीबी गदा हमारी ॥
खंना सगल रेनु छारी ॥
इसु आगै को न टिकै वेकारी ॥
गुर पूरे एह गल सारी ॥१॥
हरि हरि नामु संतन की ओटा ॥
जो सिमरै तिस की गति होवै उधरहि सगले कोटा ॥१॥ रहाउ ॥
संत संगि जसु गाइआ ॥
इहु पूरन हरि धनु पाइआ ॥
कहु नानक आपु मिटाइआ ॥
सभु पारब्रहमु नदरी आइआ ॥२॥१६॥८०॥
गरीबी गदा हमारी ॥
खंना सगल रेनु छारी ॥
इसु आगै को न टिकै वेकारी ॥
गुर पूरे एह गल सारी ॥१॥
हरि हरि नामु संतन की ओटा ॥
जो सिमरै तिस की गति होवै उधरहि सगले कोटा ॥१॥ रहाउ ॥
संत संगि जसु गाइआ ॥
इहु पूरन हरि धनु पाइआ ॥
कहु नानक आपु मिटाइआ ॥
सभु पारब्रहमु नदरी आइआ ॥२॥१६॥८०॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे भाई ! विनम्रता भरा स्वभाव हमारी गदा है। सबकी चरण-धूड़ बने रहना हमारे पास खंडा हैं इ स (गदा) के आगे इस (खंडे) के आगे कोई भी कुकर्मी टिक नहीं सकता। (हमें) पूरे गुरू ने ये बात समझा दी है। 1। हे भाई ! परमात्मा का नाम संत जनों का आसरा है। जो भी मनुष्य (परमात्मा का नाम) सिमरता है।उसकी उच्च आत्मिक अवस्था बन जाती है।(नाम की बरकति से) सारे करोड़ों ही जीव (विकारों से) बच जाते हैं। 1।रहाउ। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य ने संत जनों की संगति में (बैठ के) परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाए हैं। उसने ये हरी-नाम धन प्राप्त कर लिया है जो कभी खत्म नहीं होता। उस मनुष्य ने (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर कर लिया है उसे हर जगह परमात्मा ही (बसता) दिख गया है। 2। 16। 80।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਪੂਰੀ ਕੀਨੀ ॥
ਬਖਸ ਅਪੁਨੀ ਕਰਿ ਦੀਨੀ ॥
ਨਿਤ ਅਨੰਦ ਸੁਖ ਪਾਇਆ ॥
ਥਾਵ ਸਗਲੇ ਸੁਖੀ ਵਸਾਇਆ ॥੧॥
ਹਰਿ ਕੀ ਭਗਤਿ ਫਲ ਦਾਤੀ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਕਿਰਪਾ ਕਰਿ ਦੀਨੀ ਵਿਰਲੈ ਕਿਨ ਹੀ ਜਾਤੀ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰਬਾਣੀ ਗਾਵਹ ਭਾਈ ॥
ਓਹ ਸਫਲ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥
ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਪਾਇਆ ॥੨॥੧੭॥੮੧॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਪੂਰੀ ਕੀਨੀ ॥
ਬਖਸ ਅਪੁਨੀ ਕਰਿ ਦੀਨੀ ॥
ਨਿਤ ਅਨੰਦ ਸੁਖ ਪਾਇਆ ॥
ਥਾਵ ਸਗਲੇ ਸੁਖੀ ਵਸਾਇਆ ॥੧॥
ਹਰਿ ਕੀ ਭਗਤਿ ਫਲ ਦਾਤੀ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਕਿਰਪਾ ਕਰਿ ਦੀਨੀ ਵਿਰਲੈ ਕਿਨ ਹੀ ਜਾਤੀ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰਬਾਣੀ ਗਾਵਹ ਭਾਈ ॥
ਓਹ ਸਫਲ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥
ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਪਾਇਆ ॥੨॥੧੭॥੮੧॥
सोरठि महला ५ ॥
गुरि पूरै पूरी कीनी ॥
बखस अपुनी करि दीनी ॥
नित अनंद सुख पाइआ ॥
थाव सगले सुखी वसाइआ ॥१॥
हरि की भगति फल दाती ॥
गुरि पूरै किरपा करि दीनी विरलै किन ही जाती ॥ रहाउ ॥
गुरबाणी गावह भाई ॥
ओह सफल सदा सुखदाई ॥
नानक नामु धिआइआ ॥
पूरबि लिखिआ पाइआ ॥२॥१७॥८१॥
गुरि पूरै पूरी कीनी ॥
बखस अपुनी करि दीनी ॥
नित अनंद सुख पाइआ ॥
थाव सगले सुखी वसाइआ ॥१॥
हरि की भगति फल दाती ॥
गुरि पूरै किरपा करि दीनी विरलै किन ही जाती ॥ रहाउ ॥
गुरबाणी गावह भाई ॥
ओह सफल सदा सुखदाई ॥
नानक नामु धिआइआ ॥
पूरबि लिखिआ पाइआ ॥२॥१७॥८१॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य पर पूरे गुरू ने पूरी कृपा की। उसको गुरू ने अपने दर से प्रभू की भक्ति की दाति दे दी। वह मनुष्य सदा आत्मिक आनंद लेने लग पड़ा। गुरू ने उसकी सारी ज्ञानेन्द्रियों को (विकारों से बचा के) शांति में टिका दिया। 1। हे भाई ! परमात्मा की भक्ति सारे फल देने वाली है। पूरे गुरू ने (जिस मनुष्य पर) मेहर कर दी (उसने प्रभू की भक्ति करनी आरम्भ कर दी।पर।हे भाई !) किसी दुर्लभ मनुष्य ने ही परमात्मा की भक्ति की कद्र समझी है।रहाउ। हे भाई ! आओ हम भी गुरू की बाणी गाया करें। गुरू की बाणी सदा ही सारे फल देने वाली सुख देने वाली है। हे नानक ! (कह,) (उसी मनुष्य ने गुरबाणी के द्वारा परमात्मा का) नाम सिमरा है जिसने पूर्बले जनम में लिखा भक्ति का लेख प्राप्त किया है। 2। 17। 81।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
सोरठि महला ५ ॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 628 है, राग सोरठ का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Sangam Vihar में सुबह 4 बजे जब रसोई शुरू होती है।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 53 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 628” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: सोरठ राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 629 →, पीछे का: ← अंग 627।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।