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अंग 654

अंग
654
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तुधु आपे सिसटि सिरजीआ आपे फुनि गोई ॥
सभु इको सबदु वरतदा जो करे सु होई ॥
वडिआई गुरमुखि देइ प्रभु हरि पावै सोई ॥
गुरमुखि नानक आराधिआ सभि आखहु धंनु धंनु धंनु गुरु सोई ॥29॥1॥ सुधु
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: आप खुद ही सृष्टि को पैदा करता है और खुद ही फिर नाश करता है। हर जगह (हरी का) ही हुकम बरत रहा है; जो वह करता है वही होता है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है उसे प्रभू महिमा बख्शता है।वह उस हरी को मिल लेता है। हे नानक ! गुरू के सन्मुख (होने वाले) मनुष्य हरी को सिमरते हैं।(हे भाई !) सभी कहो।कि वह सतिगुरू धन्य है।धन्य है।धन्य है। 29। 1।सुधु।
रागु सोरठि बाणी भगत कबीर जी की घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बुत पूजि पूजि हिंदू मूए तुरक मूए सिरु नाई ॥
ओइ ले जारे ओइ ले गाडे तेरी गति दुहू न पाई ॥1॥
मन रे संसारु अंध गहेरा ॥
चहु दिस पसरिओ है जम जेवरा ॥1॥ रहाउ ॥
कबित पड़े पड़ि कबिता मूए कपड़ केदारै जाई ॥
जटा धारि धारि जोगी मूए तेरी गति इनहि न पाई ॥2॥
दरबु संचि संचि राजे मूए गडि ले कंचन भारी ॥
बेद पड़े पड़ि पंडित मूए रूपु देखि देखि नारी ॥3॥
राम नाम बिनु सभै बिगूते देखहु निरखि सरीरा ॥
हरि के नाम बिनु किनि गति पाई कहि उपदेसु कबीरा ॥4॥1॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: रागु सोरठि बाणी भगत कबीर जी की घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हिन्दू लोग मूर्तियों की पूजा कर करके दुखी हो रहे हैं।मुसलमान (ख़ुदा को मक्के में समझ के उधर) सजदे किए जा रहे हैं। हिन्दुओं ने अपने मुर्दे जला दिए और मुसलमानों ने दबा दिए (इसी बात पर झगड़ते रहे कि सच्चा कौन है)।(हे प्रभू !) आप कैसा है। – ये बात दोनों पक्षों के समझ में ना आई। 1। हे मेरे मन ! (अज्ञानता के कारण) सिमरन से टूट के जगत एक गहरा अंधकार बना हुआ है। और चारों तरफ जमों की जंजीरें बिखरी हुई हैं (भाव।लोग बार बार वही काम कर रहे हैं जिनसे और ज्यादा अज्ञानता में फसते जाएं)। 1।रहाउ। (विद्वान) कवि जन अपनी-अपनी कविता रचना पढ़ने (अर्थात।विद्या के गुमान) में ही मस्त हैं।कापड़ी (आदि) साधू केदार नाथ (आदि) तीर्थों पर जा जा के जीवन व्यर्थ गवाते हैं; योगी जटा रख रख के यही समझते रहे कि यही रास्ता ठीक है।पर।(हे प्रभू !) आपके बारे में इन लोगों को भी कोई समझ नहीं पड़ी। 2। राजे धन संचित कर कर के उम्र गवा गए।उन्होंने सोने (आदि) के ढेर (भाव।खजाने) धरती में दबा दिए। पण्डित लोग वेद-पाठी होने के अहंकार में खपते हैं।और सि्त्रयां (शीशें में) अपना रूप देखने में ही जिंदगी व्यर्थ गवा रही हैं। 3। अपने-अपने अंदर झाँक के देख लो।परमात्मा के नाम का सिमरन किए बिना सब जीव दुखी हो रहे हैं। कबीर शिक्षाप्रद बात कहता है कि परमात्मा के नाम के बिना किसी को (जीवन की) सही समझ नहीं पड़ती। 4। 1।
जब जरीऐ तब होइ भसम तनु रहै किरम दल खाई ॥
काची गागरि नीरु परतु है इआ तन की इहै बडाई ॥1॥
काहे भईआ फिरतौ फूलिआ फूलिआ ॥
जब दस मास उरध मुख रहता सो दिनु कैसे भूलिआ ॥1॥ रहाउ ॥
जिउ मधु माखी तिउ सठोरि रसु जोरि जोरि धनु कीआ ॥
मरती बार लेहु लेहु करीऐ भूतु रहन किउ दीआ ॥2॥
देहुरी लउ बरी नारि संगि भई आगै सजन सुहेला ॥
मरघट लउ सभु लोगु कुटंबु भइओ आगै हंसु अकेला ॥3॥
कहतु कबीर सुनहु रे प्रानी परे काल ग्रस कूआ ॥
झूठी माइआ आपु बंधाइआ जिउ नलनी भ्रमि सूआ ॥4॥2॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: (मरने के बाद) अगर शरीर (चिखा में) जला दिया जाए तो ये राख हो जाता है।अगर (कब्र में) टिका रहे तो कीड़ियों का दल इसे खा जाता है। (जैसे) कच्चे घड़े में पानी डाला जाता है (तो घड़ा गल जाता है और पानी बाहर निकल जाता है वैसे ही सांसें समाप्त हो जाने पर शरीर में से जीवात्मा निकल जाती है।सो।) इस शरीर का इतना सा ही माण है (जितना कि कच्चे घड़े का)। 1। हे भाई ! आप किस बात पे अहंकार में अफरा फिरता है। तूझे वह समय क्यों भूल गया जब आप (माँ के पेट में) दस महीने उल्टा लटका हुआ था। 1।रहाउ। जैसे मक्खी (फूलों का) रस जोड़ जोड़ के शहद इकट्ठा करती है।वैसे ही मूर्ख बँदे ने कंजूसी कर करके धन जोड़ा (पर। आखिर वह बेगाना ही हो गया)।मौत आई।तो सब यही कहते हैं, ले चलो।ले चलो।अब ये बीत चुका है।ज्यादा समय घर रखने का कोई लाभ नहीं। 2। घर की (बाहरी) दहलीज तक पत्नी (उस मुर्दे के) साथ जाती है।आगे सज्जन-मित्र उठा लेते हैं। मसाणों तक परिवार के व अन्य लोग जाते हैं।पर परलोक में तो जीवात्मा अकेली ही जाती है। 3। कबीर कहता है,हे बँदे ! सुन।आप उस कूएं में गिरा पड़ा है जिसे मौत ने घेरा डाल रखा है (भाव।मौत अवश्य आती है)।पर। तूने अपने आप को इस माया से बाँध रखा है जिसने साथ नहीं निभाना।जैसे तोता मौत के डर से अपने आप को नलिनी से चिपकाए रखता है । 4। 2।
बेद पुरान सभै मत सुनि कै करी करम की आसा ॥
काल ग्रसत सभ लोग सिआने उठि पंडित पै चले निरासा ॥1॥
मन रे सरिओ न एकै काजा ॥
भजिओ न रघुपति राजा ॥1॥ रहाउ ॥
बन खंड जाइ जोगु तपु कीनो कंद मूलु चुनि खाइआ ॥
नादी बेदी सबदी मोनी जम के पटै लिखाइआ ॥2॥
भगति नारदी रिदै न आई काछि कूछि तनु दीना ॥
राग रागनी डिंभ होइ बैठा उनि हरि पहि किआ लीना ॥3॥
परिओ कालु सभै जग ऊपर माहि लिखे भ्रम गिआनी ॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: जिन समझदार लोगों ने वेद-पुराण आदि के सारे मत सुन-सुन के कर्म-काण्ड की आस रखी। (ये आशा रखी कि कर्म काण्ड से जीवन सँवरेगा)।वे सारे (आत्मिक) मौत में ग्रसे ही रहे।पंडित लोग भी आशा पूरी हुए बिना ही उठ के चले गए (जगत त्याग गए)। 1। हे मन !आपसे ये एक काम भी (जो करने वाला था) नहीं हैं सकता। तूने प्रकाश-स्वरूप परमात्मा का भजन नहीं किया। 1।रहाउ। कई लोगों ने जंगलों में जा के योग साधना की।तप किए।गाजर-मूली आदि चुन-खा के गुजारा किया; जोगी।कर्म काण्डी।‘अलख’ कहने वाले जोगी।मोनधारी- ये सारे जम के लेखे में ही लिखे गए (भाव।इनके साधन मौत के डर से बचा नहीं सकते)। 2। जिन मनुष्यों ने शरीर पर तो (धार्मिक चिन्ह) चक्र आदि लगा लिए हैं।पर प्रेमा-भक्ति उसके हृदय में पैदा नहीं हुई। राग-रागनियां तो गाता है पर निरी पाखण्ड की मूर्ति ही बना बैठा है।ऐसे मनुष्य को परमात्मा से कुछ नहीं मिलता। 3। सारे जगत पर काल का सहम पड़ा हुआ है।भरमी-ज्ञानी भी उसी ही लेखे में लिखे गए हैं (वे भी मौत के सहम में ही हैं)।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “आप खुद ही सृष्टि को पैदा करता है और खुद ही फिर नाश करता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।