गुर परसादी भउ पइआ वडभागि वसिआ मनि आइ ॥
भै पइऐ मनु वसि होआ हउमै सबदि जलाइ ॥
सचि रते से निरमले जोती जोति मिलाइ ॥
सतिगुरि मिलिऐ नाउ पाइआ नानक सुखि समाइ ॥2॥
एह भूपति राणे रंग दिन चारि सुहावणा ॥
एहु माइआ रंगु कसुंभ खिन महि लहि जावणा ॥
चलदिआ नालि न चलै सिरि पाप लै जावणा ॥
जां पकड़ि चलाइआ कालि तां खरा डरावणा ॥
ओह वेला हथि न आवै फिरि पछुतावणा ॥6॥
सतिगुर ते जो मुह फिरे से बधे दुख सहाहि ॥
फिरि फिरि मिलणु न पाइनी जंमहि तै मरि जाहि ॥
सहसा रोगु न छोडई दुख ही महि दुख पाहि ॥
नानक नदरी बखसि लेहि सबदे मेलि मिलाहि ॥1॥
जो सतिगुर ते मुह फिरे तिना ठउर न ठाउ ॥
जिउ छुटड़ि घरि घरि फिरै दुहचारणि बदनाउ ॥
नानक गुरमुखि बखसीअहि से सतिगुर मेलि मिलाउ ॥2॥
जो सेवहि सति मुरारि से भवजल तरि गइआ ॥
जो बोलहि हरि हरि नाउ तिन जमु छडि गइआ ॥
से दरगह पैधे जाहि जिना हरि जपि लइआ ॥
हरि सेवहि सेई पुरख जिना हरि तुधु मइआ ॥
गुण गावा पिआरे नित गुरमुखि भ्रम भउ गइआ ॥7॥
थालै विचि तै वसतू पईओ हरि भोजनु अंम्रितु सारु ॥
जितु खाधै मनु त्रिपतीऐ पाईऐ मोख दुआरु ॥
इहु भोजनु अलभु है संतहु लभै गुर वीचारि ॥
एह मुदावणी किउ विचहु कढीऐ सदा रखीऐ उरि धारि ॥
एह मुदावणी सतिगुरू पाई गुरसिखा लधी भालि ॥
नानक जिसु बुझाए सु बुझसी हरि पाइआ गुरमुखि घालि ॥1॥
जो धुरि मेले से मिलि रहे सतिगुर सिउ चितु लाइ ॥
आपि विछोड़ेनु से विछुड़े दूजै भाइ खुआइ ॥
नानक विणु करमा किआ पाईऐ पूरबि लिखिआ कमाइ ॥2॥
बहि सखीआ जसु गावहि गावणहारीआ ॥
हरि नामु सलाहिहु नित हरि कउ बलिहारीआ ॥
जिनी सुणि मंनिआ हरि नाउ तिना हउ वारीआ ॥
गुरमुखीआ हरि मेलु मिलावणहारीआ ॥
हउ बलि जावा दिनु राति गुर देखणहारीआ ॥8॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अहंकार व भ्रम में भूले हुओं को मन की सार नहीं आई।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।