तुझ ही मन राते अहिनिसि परभाते हरि रसना जपि मन रे ॥2॥ तुम साचे हम तुम ही राचे सबदि भेदि फुनि साचे ॥ अहिनिसि नामि रते से सूचे मरि जनमे से काचे ॥3॥ अवरु न दीसै किसु सालाही तिसहि सरीकु न कोई ॥ प्रणवति नानकु दासनि दासा गुरमति जानिआ सोई ॥4॥5॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: (हे प्रभू !) जिनके मन दिन-रात हर वक्त आपके प्यार में रंगे रहते हैं (उन्हें आप अपने चरणों में जोड़ के संपूर्ण और गंभीर बना लेता है)।हे मेरे मन ! आप भी जीभ से परमात्मा का नाम जप (आपके अंदर भी उसकी मेहर से गुण पैदा हैं जाएंगे)। 2। हे प्रभू ! आप सदा-स्थिर रहने वाला है।अगर हम जीव आपकी याद में ही टिके रहें।अगर हम सिफत सालाह के शबदों में भेदे रहें।तो हम भी (आपकी मेहर से) अडोल-चित्त हैं सकते हैं। जो मनुष्य दिन-रात आपके नाम में रंगे रहते हैं वे पवित्र-आत्मा हैं।(पर नाम विसार के) जो जनम-मरण के चक्कर में पड़े हुए हैं उनके मन की घाड़त अभी कोझी है। 3। परमात्मा के बराबर का कोई नहीं।कोई और मुझे उस जैसा दिखता ही नहीं जिसकी मैं सिफत सालाह कर सकूँ। नानक विनती करता हॅ मैं उनके दासों का दास हूँ जिन्होंने गुरू की मति ले के उस (जिसका कोई शरीक नहीं है) परमात्मा से गहरी सांझ डाल ली है। 4। 5।
सोरठि महला 1 ॥ अलख अपार अगंम अगोचर ना तिसु कालु न करमा ॥ जाति अजाति अजोनी संभउ ना तिसु भाउ न भरमा ॥1॥ साचे सचिआर विटहु कुरबाणु ॥ ना तिसु रूप वरनु नही रेखिआ साचै सबदि नीसाणु ॥ रहाउ ॥ ना तिसु मात पिता सुत बंधप ना तिसु कामु न नारी ॥ अकुल निरंजन अपर परंपरु सगली जोति तुमारी ॥2॥ घट घट अंतरि ब्रहमु लुकाइआ घटि घटि जोति सबाई ॥ बजर कपाट मुकते गुरमती निरभै ताड़ी लाई ॥3॥ जंत उपाइ कालु सिरि जंता वसगति जुगति सबाई ॥ सतिगुरु सेवि पदारथु पावहि छूटहि सबदु कमाई ॥4॥ सूचै भाडै साचु समावै विरले सूचाचारी ॥ तंतै कउ परम तंतु मिलाइआ नानक सरणि तुमारी ॥5॥6॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 1 ॥ वह परमात्मा अदृश्य है।बेअंत है।अपहुँच है।मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियां उसे समझ नहीं सकतीं।मौत उसे छू नहीं सकती।कर्मों का उस पर कोई दबाव नहीं (जैसे जीव कर्म अधीन हैं वह नहीं)। उस प्रभू की कोई जाति नहीं।वह जूनियों में नहीं पड़ता।उसका प्रकाश अपने आप से है।ना उसे कोई मोह व्याप्तता है।ना ही उसे कोई भटकना है। 1। मैं सदा कुर्बान हूँ उस परमात्मा से जो सदा कायम रहने वाला है और जो सच्चाई का श्रोत है। उस परमात्मा का ना कोई रूप है ना कोई रंग है ना ही कोई चक्र चिन्ह ही है।सच्चे शबद में जुड़ने से उसके घर घाट का ठिकाना पता चलता है।रहाउ। उस प्रभू के ना माँ ना पिता ना उसका कोई पुत्र ना ही रिश्तेदार।ना उसे काम वासना सताती है ना ही उसकी कोई पत्नी है। उस का कोई खास कुल नहीं।वह माया के प्रभाव से परे है।बेअंत है।परे से परे है।हे प्रभू ! हर जगह आपकी ही ज्योति प्रकाशमान है। 2। हरेक शरीर के अंदर परमात्मा गुप्त हैं के बैठा हुआ है।हरेक घट में हर जगह पर उसी की ही ज्योति है (पर माया के मोह के कठोर किवाड़ लगे होने के कारण जीव को ये हकीकत समझ नहीं आती)। गुरू की मति पर चल के जिस मनुष्य के ये कठोर किवाड़ खुल जाते हैं उसे ये समझ आ जाता है कि (वह) हरेक जीव में व्यापक होता हुआ भी प्रभू निडर अवस्था में टिका बैठा है। 3। सब जीवों को पैदा करके सबके सिर पर परमात्मा ने मौत (भी) टिकाई हुई है।सब जीवों की जीवन-जुगति प्रभू ने अपने वश में रखी हुई है। जो मनुष्य गुरू के बताए हुए रास्ते पर चल कर नाम-पदार्थ हासिल करते हैं।वे गुरू शबद को कमा के (गुरू के शबद अनुसार जीवन ढाल के माया के बँधनों से) आजाद हो जाते हैं। 4। पवित्र हृदय में ही सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा टिक सकता है।पर स्वच्छ आचरण वाले (पवित्र दिल वाले) कोई विरले ही होते हैं। (गुरू अपने शबद के द्वारा हृदय पवित्र करके) जीव को परमात्मा से मिलाता है। हे नानक ! अरदास कर- हे प्रभू ! मैं आपकी शरण में हूँ (मुझे अपने चरणों में जोड़े रख)। 5। 6।
सोरठि महला 1 ॥ जिउ मीना बिनु पाणीऐ तिउ साकतु मरै पिआस ॥ तिउ हरि बिनु मरीऐ रे मना जो बिरथा जावै सासु ॥1॥ मन रे राम नाम जसु लेइ ॥ बिनु गुर इहु रसु किउ लहउ गुरु मेलै हरि देइ ॥ रहाउ ॥ संत जना मिलु संगती गुरमुखि तीरथु होइ ॥ अठसठि तीरथ मजना गुर दरसु परापति होइ ॥2॥ जिउ जोगी जत बाहरा तपु नाही सतु संतोखु ॥ तिउ नामै बिनु देहुरी जमु मारै अंतरि दोखु ॥3॥ साकत प्रेमु न पाईऐ हरि पाईऐ सतिगुर भाइ ॥ सुख दुख दाता गुरु मिलै कहु नानक सिफति समाइ ॥4॥7॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 1 ॥ जैसे पानी के बिना मछली (तड़फती) है वैसे ही माया-ग्रसित जीव तृष्णा के अधीन रह के दुखी रहता है।इसी तरह। हे मन ! हरी-सिमरन के बिना जो भी स्वाश खाली जाता है (उसमें दुखी हो हो के) आत्मिक मौत मरना पड़ता है। 1। हे मेरे मन ! परमात्मा के नाम की सिफत सालाह किया कर। (पर) गुरू की शरण पड़े बिना ये आनंद नहीं मिल सकता।प्रभू (मेहर करके) जिसे गुरू मिलवाता है उसे ही (ये रस) देता है।रहाउ। (हे मन !) संत जनों की संगति में मिल (सत्संग में रह के) गुरू के सन्मुख रहना ही (असल) तीर्थ (स्नान) है। जिस मनुष्य को गुरू के दर्शन हो जाते हैं उसे अढ़सठ तीर्थों के स्नान प्राप्त हो जाते हैं। 2। जिसने अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं किया वह जोगी (निष्फल) है।अगर अंदर संतोष नहीं।उच्च जीवन नहीं।तो (किया हुआ) तप व्यर्थ है। इसी तरह अगर प्रभू का नाम नहीं सिमरा।तो ये मनुष्य शरीर व्यर्थ है।नाम-हीन मनुष्य के अंदर विकार ही विकार हैं।उसे जमराज सजा देता है। 3। (प्रभू के चरनों का) प्यार माया-ग्रसित लोगों से नहीं मिलता।गुरू से प्यार डालने पर ही परमात्मा मिलता है। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य को गुरू मिल जाता है।उसे सुख-दुख देने वाला रॅब मिल जाता है।वह सदा प्रभू की सिफत सालाह में लीन रहता है। 4। 7।
सोरठि महला 1 ॥ तू प्रभ दाता दानि मति पूरा हम थारे भेखारी जीउ ॥ मै किआ मागउ किछु थिरु न रहाई हरि दीजै नामु पिआरी जीउ ॥1॥ घटि घटि रवि रहिआ बनवारी ॥ जलि थलि महीअलि गुपतो वरतै गुर सबदी देखि निहारी जीउ ॥ रहाउ ॥ मरत पइआल अकासु दिखाइओ गुरि सतिगुरि किरपा धारी जीउ ॥ सो ब्रहमु अजोनी है भी होनी घट भीतरि देखु मुरारी जीउ ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 1 ॥ हे प्रभू जी ! आप हमें सब पदार्थ देने वाला है।दातें देने में आप कभी चूकता नहीं।हम आपके (दर के) मंगते हैं। मैं आप से कौन सी चीज माँगू।कोई भी चीज सदा टिकी नहीं रहने वाली।(हाँ।आपका नाम ही है जो सदा स्थिर रहने वाला है।इसलिए) हे हरी ! मुझे अपना नाम दे।मैं आपके नाम को प्यार करूँ। 1। परमात्मा हरेक शरीर में व्यापक है। पानी में।धरती में।धरती पर।आकाश में हर जगह मौजूद है पर छुपा हुआ है।(हे मन !) गुरू के शबद के माध्यम से उसे देख।रहाउ। (हे भाई ! जिस मनुष्य पर) गुरू ने सतिगुरू ने कृपा की उसको उसने धरती आकाश पाताल (सारा जगत ही परमात्मा के अस्तित्व से भरपूर) दिखा दिया। वह परमात्मा जूनियों में नहीं आता।अब भी मौजूद है।आगे भी मौजूद रहेगा।(हे भाई !) उस प्रभू को आप अपने दिल में बसता देख। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे प्रभू !) जिनके मन दिन-रात हर वक्त आपके प्यार में रंगे रहते हैं (उन्हें आप अपने चरणों में जोड़ के संपूर्ण और गंभीर बना लेता है)।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।