पराशरजी बोले, हे मैत्रेय! कल्पके आरम्भमें जब ब्रह्माजीने सृष्टि रचनेका विचार किया, तो पहले-पहल बिना किसी सावधानीके एक अन्धकारमयी सृष्टि उठ खड़ी हुई। उसमें तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्धतामिस्र, ये पाँच प्रकारकी अविद्या प्रकट हुई। इसीपर ध्यान देनेसे वृक्ष, गुल्म, लता, बेल और घास, ये पाँच प्रकारके जड़ स्थावर उत्पन्न हुए। ये सृष्टिमें सबसे पहले स्थापित हुए, इसलिए इसे मुख्य सर्ग कहते हैं।
यह सृष्टि पुरुषार्थके योग्य न जान पड़ी, तो ब्रह्माजीने फिर ध्यान किया, और तिरछे चलनेवाली तिर्यक्-स्रोत सृष्टि प्रकट हुई, अर्थात् पशु और पक्षी। ये प्रायः अज्ञानी, विवेकरहित और अपनेको ही ज्ञानी माननेवाले होते हैं। यह भी पर्याप्त न लगी, तो तीसरा सात्त्विक ऊर्ध्व-स्रोत सर्ग हुआ, जो ऊपरके लोकोंमें रहनेवाले देवताओंका है; इससे ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए। फिर भी पुरुषार्थका पूरा साधक कोई न दीखा, तब अव्यक्तसे अर्वाक्-स्रोत नामक सर्ग प्रकट हुआ, जो नीचे पृथ्वीपर रहता है। इसमें सत्त्व, रज और तम तीनों भरे हैं, इसीलिए यह दुःखबहुल भी है और अत्यन्त क्रियाशील भी; यही मनुष्य है। इनके ऊपर आठवाँ अनुग्रह सर्ग है, जो सात्त्विक भी है और तामसिक भी, और नवाँ कौमार सर्ग, जो प्राकृत भी है और वैकृत भी। इस प्रकार महत्तत्त्व, तन्मात्रा और इन्द्रियोंका सर्ग, ये तीन प्राकृत सर्ग, तथा स्थावर, तिर्यक्, देव और मनुष्यका सर्ग, ये वैकृत सर्ग, मिलाकर नौ प्रकारकी सृष्टि क्रमसे रची गई, और यही सारे जगत्का मूल कारण बनी।
ब्रह्माके शरीरसे उपजे प्राणी
हे मैत्रेय! जब यह मनोमयी सृष्टि पर्याप्त न हुई, तब देव, असुर, पितर और मनुष्य रचनेकी इच्छासे ब्रह्माजीने अपने शरीरका उपयोग किया। पहले उनके शरीरमें तमोगुण बढ़ा और जंघासे असुर उत्पन्न हुए। उन्होंने वह तमोमय शरीर छोड़ दिया, और छोड़ा हुआ शरीर रात बन गया। फिर दूसरे शरीरमें प्रसन्न होकर मुखसे सत्त्वप्रधान देवता उपजे, और वह त्यागा हुआ शरीर दिन हुआ। इसीसे असुर रातमें और देवता दिनमें बलवान् होते हैं। फिर पितृवत् भावसे उन्होंने पार्श्वभागसे पितरोंको रचा, और वह शरीर सन्ध्या हुआ; फिर रजोमय शरीरसे मनुष्य उपजे, और वह शरीर प्रातःकालकी ज्योत्स्ना बन गया। इसीसे मनुष्य प्रातःकालमें और पितर सायंकालमें बलवान् होते हैं।
तदनन्तर एक और रजोमय शरीरसे भूख उठी, और भूखसे कामना जागी। अन्धकारमें रचे गए वे भूखसे व्याकुल जीव कुरूप और दाढ़ी-मूँछवाले थे, और स्वयं ब्रह्माजीकी ओर ही दौड़े। जिन्होंने कहा, ऐसा मत कीजिए, इनकी रक्षा कीजिए, वे राक्षस कहलाए; और जिन्होंने कहा, हम इन्हें खाएँगे, वे यक्ष कहलाए। इस अनिष्टको देख ब्रह्माजीके केश सिरसे गिरकर फिर ऊपर चढ़ गए; ऊपर चढ़नेसे वे सर्प और नीचे गिरनेसे अहि कहलाए। फिर क्रोधसे भरकर उन्होंने पीले रंगके, उग्र स्वभाववाले और मांसाहारी जीव रचे, और गाते समय उनके शरीरसे बोलते हुए गन्धर्व उपजे।
इसके पीछे उन्होंने पक्षियोंको रचा, वक्षःस्थलसे भेड़, मुखसे बकरी, उदरसे गौ और पैरोंसे घोड़े, हाथी, गधे, ऊँट और मृग आदि पशु बनाए, तथा अपने रोमोंसे फल-मूलवाली ओषधियाँ प्रकट कीं। कल्पके आरम्भमें ही उन्होंने पशु और ओषधि रचकर आगे त्रेतायुगके आरम्भमें उन्हें यज्ञादि कर्मोंमें लगाया। फिर पूर्व मुखसे गायत्री और ऋक्, दक्षिण मुखसे यजु, पश्चिम मुखसे साम, और उत्तर मुखसे अथर्ववेद रचे। जिसका जैसा कर्म बीते कल्पमें था, बार-बार सृष्टि होनेपर उसे वैसा ही रूप और स्वभाव फिर मिल जाता है; जैसे ऋतुएँ लौटकर अपने चिह्न फिर ले आती हैं।
चार वर्ण और उनके लोक
सत्यसंकल्प ब्रह्माजीने अपने मुखसे सत्त्वप्रधान ब्राह्मण, वक्षःस्थलसे रजप्रधान क्षत्रिय, जंघासे रज-तमवाले वैश्य और चरणोंसे तमःप्रधान शूद्र उत्पन्न किए। यह सारी चातुर्वर्ण्य-रचना यज्ञके उत्तम साधनके लिए हुई, क्योंकि यज्ञसे तृप्त होकर देवता जल बरसाते हैं और प्रजाका पालन होता है। आरम्भमें प्रजा श्रद्धावाली, शुद्ध और सुखी थी; उनके शुद्ध चित्तमें श्रीहरि विराजते थे, और वे विष्णु नामक परम पदको देख पाते थे। पर आगे कालके अंशसे उनमें रागादि अधर्मका बीज उपजा, सुख घटा और दुःख बढ़ा। तब उन्होंने दुर्ग और नगर बसाए, शीत और घामसे बचनेको घर बनाए, और जीविकाके लिए कृषि तथा कला-कौशल रचे। धान, जौ, गेहूँ, तिल और चना आदि सत्रह ग्राम्य ओषधियाँ तथा कुछ वन्य ओषधियाँ इसी समय यज्ञके काम आईं।
ब्रह्माजीने वर्ण और आश्रमके धर्म बाँधे, और सबके लोक भी नियत किए। कर्मनिष्ठ ब्राह्मणोंका स्थान पितृलोक कहा, रणसे न हटनेवाले क्षत्रियोंका इन्द्रलोक, अपने धर्ममें लगे वैश्योंका वायुलोक, और सेवापरायण शूद्रोंका गन्धर्वलोक। वानप्रस्थोंका सप्तर्षिलोक, गृहस्थोंका पितृलोक और सन्न्यासियोंका ब्रह्मलोक हुआ। जो निरन्तर एकान्तमें ब्रह्मका ध्यान करते हैं, उनका परम स्थान वह मोक्षपद है, जिसे पण्डितजन ही देख पाते हैं। चन्द्र और सूर्य आदि ग्रह अपने लोकोंमें जाकर लौट आते हैं, पर जो नमो भगवते वासुदेवाय, इस मन्त्रका ध्यान करते हैं, वे फिर नहीं लौटते।
प्रजापति और स्वायम्भुव मनु
जब यह प्रजा सन्तानके क्रमसे न बढ़ी, तब ब्रह्माजीने अपने ही समान नौ मानस-पुत्र रचे, भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अङ्गिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि और वसिष्ठ; पुराणोंमें ये नौ ब्रह्मा माने गए हैं। फिर ख्याति, भूति, सम्भूति, क्षमा, प्रीति, सन्नति, ऊर्जा, अनसूया और प्रसूति, ये नौ कन्याएँ उत्पन्न करके उन्हें इन महात्माओंकी पत्नी बना दिया। ब्रह्माजीने पहले जिन सनन्दन आदिको रचा था, वे विरक्त थे और सृष्टिमें प्रवृत्त ही न हुए।
उनकी उदासीनता देख ब्रह्माजीमें ऐसा क्रोध उठा कि तीनों लोक ज्वालाओंसे दमक उठे। उनकी टेढ़ी भृकुटी और तप्त ललाटसे रुद्र प्रकट हुए, जिनका आधा शरीर नर और आधा नारीका था, और जो दोपहरके सूर्यके समान प्रकाशमान थे। ब्रह्माजीने कहा कि वे अपने शरीरका विभाग कर लें, और स्वयं अन्तर्धान हो गए। तब रुद्रने अपने पुरुष और स्त्री भागोंको अलग किया, पुरुष-भागको ग्यारह रूपोंमें और स्त्री-भागको सौम्य-असौम्य तथा शान्त-अशान्त अनेक रूपोंमें बाँट दिया।
तदनन्तर ब्रह्माजीने प्रजाके पालनके लिए अपनेहीमेंसे पहले मनु, स्वायम्भुवको प्रकट किया, और तपसे निर्मल शतरूपा नामक स्त्रीको उनकी पत्नी बनाया। स्वायम्भुव मनु और शतरूपासे प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो पुत्र तथा प्रसूति और आकूति नामकी दो कन्याएँ हुईं। प्रसूति दक्षको ब्याही गई और आकूति रुचि प्रजापतिको। रुचि और आकूतिसे यज्ञ तथा दक्षिणा नामक जुड़वाँ सन्तान हुई, और यज्ञके दक्षिणासे बारह पुत्र हुए, जो स्वायम्भुव मन्वन्तरमें याम नामक देवता कहलाए। दक्ष और प्रसूतिसे चौबीस कन्याएँ जन्मीं, जिनमें श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि और मेधा आदि तेरह धर्मको ब्याही गईं, और शेष ख्याति, सती, सम्भूति आदि ग्यारह भृगु, शिव, मरीचि, अंगिरा आदि मुनियोंको दी गईं।
इस प्रकार दक्ष, मरीचि, अत्रि और भृगु आदि प्रजापति इस जगत्के नित्य-सर्गके कारण बने, और मनु तथा उनके पराक्रमी, सन्मार्गपरायण एवं शूर पुत्र राजागण इस संसारकी नित्य-स्थितिके कारण हुए। जिनकी गति कहीं नहीं रुकती, वे सर्वव्यापक भगवान् मधुसूदन ही इन मनु आदि रूपोंसे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और नाश निरन्तर करते रहते हैं।
समस्त भूतोंके प्रलय भी चार प्रकारके कहे गए हैं, हे मैत्रेय। कल्पके अन्तमें जब ब्रह्माजी शयन करते हैं, वह नैमित्तिक प्रलय है। जब ब्रह्माण्ड प्रकृतिमें लीन हो जाता है, वह प्राकृतिक प्रलय है। ज्ञानके द्वारा योगीका परमात्मामें लीन हो जाना आत्यन्तिक प्रलय है, और रात-दिन जो प्राणियोंका क्षय होता रहता है, वही नित्य प्रलय है। इस प्रकार सम्पूर्ण शरीरोंमें स्थित होकर भगवान् विष्णु ही जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करते रहते हैं। सृष्टि, स्थिति और नाशकी ये तीनों वैष्णवी शक्तियाँ त्रिगुणमयी हैं; जो इन तीनों गुणोंको लाँघ जाता है, वही परम पदको पाकर फिर जन्म-मरणके चक्रमें नहीं पड़ता।
आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)