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बीते कल्प की वह लम्बी रात जब पूरी हुई और ब्रह्माजी नींद से जागे, तो सत्त्वगुण के उद्रेक से युक्त उन्होंने देखा कि सारे लोक सूने पड़े हैं और चारों ओर जल ही जल फैला है। वे तो नारायण ही हैं, अचिन्त्य हैं, ब्रह्मा और शिव आदि ईश्वरों के भी ईश्वर हैं, अनादि हैं और सबके उत्पत्ति-स्थान हैं। पुरुष अर्थात् पुरुषोत्तम ही कारण होने से जल को नार कहते हैं, और वही जल उनका पहला अयन अर्थात् निवास-स्थान है; इसी से उन्हें नारायण कहते हैं।
सम्पूर्ण जगत् जलमय हो रहा था। ब्रह्माजी ने मन में जान लिया कि पृथ्वी जल के भीतर डूबी पड़ी है। उसे बाहर निकालने की इच्छा से उन्होंने एक दूसरा शरीर धारण किया। जैसे पहले कल्पों में उन्होंने मत्स्य और कूर्म आदि रूप लिए थे, वैसे ही इस वराहकल्प के आरम्भ में उन्होंने वेदमय और यज्ञमय वराह का शरीर ग्रहण किया। सम्पूर्ण जगत् की स्थिति के लिए तत्पर होकर, सबके अन्तरात्मा वे अचल परमेश्वर, जो पृथ्वी को धारण करते और अपने ही आश्रय में स्थित हैं, जनलोक के सनकादि सिद्धेश्वरों से स्तुति किए जाते हुए, जल में प्रवेश कर गए। उन्हें पातालतल में आया देख देवी वसुन्धरा अत्यन्त भक्ति से नम्र होकर उनकी स्तुति करने लगीं।
पृथ्वी की पुकार
पृथ्वी बोलीं, “हे शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण करनेवाले कमलनयन! आपको नमस्कार है। आज मुझे इस पातालतल से उठा लीजिए। पूर्वकाल में भी मैं आप ही से उपजी थी और आप ही ने मेरा उद्धार किया था। हे जनार्दन! आप ही मेरे तथा आकाश आदि सब भूतों के उपादान-कारण हैं। हे परमात्मस्वरूप! आपको नमस्कार है। हे पुरुषात्मन्! आपको नमस्कार है। हे प्रधान और व्यक्त रूप! हे कालस्वरूप! आपको बार-बार नमस्कार है। सम्पूर्ण भूतों के कर्ता, पालक और संहारकर्ता आप ही हैं।”
“हे प्रभो! जगत् की सृष्टि आदि के लिए ब्रह्मा, विष्णु और रुद्ररूप धारण करनेवाले आप ही सम्पूर्ण भूतों की उत्पत्ति, पालन और नाश करते हैं। और जगत् के एकार्णवरूप हो जाने पर, हे गोविन्द! सबको समेटकर अन्त में आप ही मनीषियों से चिन्तित होते हुए जल में शयन करते हैं। आपके परतत्त्व को तो कोई नहीं जानता; इसीलिए अवतारों में आप जो रूप प्रकट करते हैं, देवगण उसी की पूजा करते हैं। आपकी आराधना किए बिना भला कौन मोक्ष पा सकता है?”
“मन से जो कुछ ग्रहण किया जाता है, नेत्र आदि इन्द्रियों से जो कुछ ग्रहण करने योग्य है, बुद्धि से जो कुछ विचारा जाता है, वह सब आप ही का रूप है। मैं भी आप ही का रूप हूँ, आप ही के आश्रित, आप ही से रची गई; इसी से लोक मुझे माधवी कहते हैं। हे सम्पूर्ण ज्ञानमय! हे स्थूलमय! हे अव्यय! हे अनन्त! हे अव्यक्त! हे व्यक्तमय! हे परापर-स्वरूप! हे विश्वात्मन्! हे यज्ञपते! आपकी जय हो। हे प्रभो! आप ही यज्ञ हैं, आप ही वषट्कार, आप ही ओंकार, और आप ही आहवनीय आदि अग्नियाँ हैं। आप ही वेद, वेदाङ्ग और यज्ञपुरुष हैं, तथा सूर्य आदि ग्रह, तारे, नक्षत्र और सम्पूर्ण जगत् भी आप ही हैं। हे पुरुषोत्तम! मूर्त और अमूर्त, दृश्य और अदृश्य, जो मैंने कहा और जो नहीं कहा, वह सब आप ही हैं। आपको बारम्बार नमस्कार है।”
दाढ़ों पर उठी हुई पृथ्वी
इस प्रकार स्तुति किए जाने पर वे धरणीधर भगवान् सामगान के समान गम्भीर घर्घर शब्द से गरजे। फिर खिले हुए कमल के समान नेत्रोंवाले उन महावराह ने अपनी दाढ़ों पर पृथ्वी को उठा लिया, और नील पर्वत के समान विशालकाय, कमलदल के समान श्याम शरीर लिए वे रसातल से बाहर निकले। निकलते समय उनके मुख से उछलता हुआ श्वास जनलोक में रहनेवाले सनन्दन आदि निष्पाप मुनियों को भिगो गया।
उनके खुरों से विदीर्ण हुआ जल बड़ा शब्द करता हुआ रसातल की ओर नीचे लौटने लगा, और जनलोक में बसे सिद्धगण उनकी श्वास-वायु से विक्षिप्त होकर इधर-उधर भागने लगे। जिनकी कुक्षि जल में भीगी हुई थी, वे महावराह अपने वेदमय शरीर को कँपाते हुए जब बाहर निकले, तब उनकी रोमावली में बसे मुनि प्रसन्नचित्त से स्तुति करने लगे, और जनलोक के निःशंक तथा उन्नत दृष्टिवाले योगीश्वर सिर झुकाकर इस प्रकार बोले।
“हे ब्रह्मा आदि ईश्वरों के भी परम ईश्वर! हे केशव! हे शङ्ख, गदा, खड्ग और चक्र धारण करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। आप ही संसार की उत्पत्ति, स्थिति और नाश के कारण हैं, और जिसे परम पद कहते हैं वह भी आपसे भिन्न कुछ नहीं। हे यूपरूपी दाढ़ोंवाले प्रभो! आप ही यज्ञपुरुष हैं। आपके चरणों में चारों वेद हैं, दाँतों में यज्ञ, और मुख में चितियाँ। यज्ञ की अग्नि आपकी जिह्वा है और कुश आपकी रोमावली। रात और दिन आपके नेत्र हैं, और सबका आधार परब्रह्म आपका मस्तक। हे देव! सम्पूर्ण वैष्णव सूक्त आपके कन्धे के रोम-गुच्छ हैं और समग्र हवि आपके प्राण हैं। आपका थूथन स्रुक्, गम्भीर स्वर सामगान, शरीर यजमान का मण्डप और सन्धियाँ सत्र-याग हैं; इष्ट और पूर्त धर्म आपके कान हैं। हे नित्यस्वरूप! प्रसन्न होइए।”
“हे अक्षर! हे विश्वमूर्ते! अपने पद-प्रहार से भूमण्डल को व्यापनेवाले आपको हम विश्व का आदिकारण मानते हैं। आपकी दाढ़ों पर रखा यह भूमण्डल ऐसा जान पड़ता है, मानो कमलवन को रौंदते हुए किसी गजराज के दाँतों में कीचड़-सना कमल का पत्ता अटक गया हो। पृथ्वी और आकाश के बीच जितना अन्तर है, वह सब आप ही के शरीर से व्याप्त है। परमार्थ तो एकमात्र आप ही हैं, आपके अतिरिक्त कुछ नहीं; यह सारा चराचर जगत् आप ही की महिमा से व्याप्त है। जो अजितेन्द्रिय हैं वे भ्रम से इसे केवल जगत् देखते हैं, और बुद्धिहीन इस ज्ञानमय जगत् को अर्थरूप देखकर मोह के सागर में भटकते हैं; पर जो शुद्धचित्त और विज्ञानी हैं, वे इस सारे जगत् को आप ही का ज्ञानमय स्वरूप देखते हैं। हे सर्व! हे सर्वात्मन्! हे अप्रमेयात्मन्! प्रसन्न होइए। आपके द्वारा यह सृष्टि की जो प्रवृत्ति हो, वह संसार का उपकार करनेवाली हो। हे गोविन्द! इस समय आप सत्त्वप्रधान हैं; अतः जगत् के उद्धार के लिए इस पृथ्वी को उठाइए, और हे कमलनयन, हमें शान्ति दीजिए।”
जल पर टिकी हुई धरती
इस प्रकार स्तुति किए जाने पर वराहरूपधारी परमेश्वर ने पृथ्वी को शीघ्र ही उठाकर जल के ऊपर स्थापित कर दिया। उस विशाल जलराशि पर वह एक बड़ी नाव के समान टिकी रही, और अपने विस्तार के कारण उसमें डूबती नहीं। फिर उन्होंने पृथ्वी को समतल करके जहाँ-तहाँ पर्वतों की स्थापना की; बीते कल्प के अन्त में जो पर्वत जल गए थे, उन्हें सत्यसंकल्प भगवान् ने अपने अमोघ प्रभाव से यथास्थान रच दिया, और सात द्वीपों तथा भूः आदि चारों लोकों की पहले के समान रचना कर दी।
तदनन्तर रजोगुण से युक्त होकर चतुर्मुख ब्रह्मा का रूप धारण करके उन्होंने सृष्टि रची। इस रचना में भगवान् तो केवल निमित्तमात्र हैं; असली कारण तो रचे जानेवाले पदार्थों की अपनी शक्तियाँ ही हैं। वस्तुओं की रचना में निमित्त से अधिक और किसी बात की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि हर वस्तु अपनी ही परिणाम-शक्ति से अपने स्थूल रूप को पा लेती है।
आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)