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मायामोह और राजा शतधनु

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नग्न कौन है

मैत्रेय जी ने पराशर जी से कहा, “हे भगवन्! नपुंसक, अपविद्ध और रजस्वला आदि को तो मैं भली भाँति जानता हूँ, किन्तु यह नहीं जानता कि ‘नग्न’ किसे कहते हैं। कृपया बताइए, नग्न कौन है और किस आचरण से मनुष्य यह संज्ञा पाता है?”

पराशर जी बोले, “हे द्विज! ऋक्, साम और यजु, यह वेदत्रयी ही समस्त वर्णों का आवरण, उनका वस्त्र है। जो पुरुष मोह से इसका त्याग कर देता है, वही पापी ‘नग्न’ कहलाता है। यह बात हमारे पितामह धर्मज्ञ वसिष्ठ जी ने कही थी, वही सुनिए। पूर्वकाल में एक बार सौ दिव्य वर्षों तक देवताओं और असुरों का घोर युद्ध हुआ। उसमें ह्राद आदि दैत्यों के हाथों देवगण पराजित हो गये। तब वे क्षीरसागर के उत्तर तट पर जाकर तपस्या करने लगे और भगवान् विष्णु की आराधना के लिए स्तवन करने लगे।”

देवताओं की पुकार

देवगण बोले, “हे नाथ! प्रसन्न होइए। हे सर्वभूतात्मन्! ब्रह्मा से लेकर स्तम्भपर्यन्त यह सम्पूर्ण मूर्त-अमूर्त प्रपंच आपका ही शरीर है। इन्द्र, सूर्य, रुद्र, वसु, अश्विनीकुमार और मरुद्गण भी आपके ही रूप हैं। जो धर्म धार्मिक जनों को यागादि का फल देता है, वह भी आप ही हैं; और जो कल्पान्त में समस्त भूतों का भक्षण कर जाता है, वह कालरूप भी आप ही हैं। हे पुण्डरीकाक्ष! जो अजन्मा, सर्वमय और अविनाशी परमेश्वर सबका आदिकारण है, आपके उस स्वरूप को हम नमस्कार करते हैं।”

स्तोत्र समाप्त होने पर देवताओं ने देखा कि शंख, चक्र और गदा लिये, गरुड़ पर आरूढ़, स्वयं परमेश्वर श्रीहरि उनके सम्मुख विराजमान हैं। उन्होंने प्रणाम कर कहा, “हे नाथ! शरणागतों की दैत्यों से रक्षा कीजिए। ह्राद आदि दैत्यगण ब्रह्मा की आज्ञा तक का उल्लंघन कर हमारे और तीनों लोकों के यज्ञभागों का अपहरण कर बैठे हैं। यद्यपि हम और वे सब आपके ही अंश हैं, तथापि अविद्यावश जगत् को परस्पर भिन्न देखते हैं। हमारे शत्रु अपने वर्णधर्म का पालन करनेवाले, वेदमार्ग के अनुयायी और तपोनिष्ठ हैं, इसीलिए हमसे मारे नहीं जा सकते। हे सर्वात्मन्! कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे हम उन असुरों का वध कर सकें।”

मायामोह का प्रकट होना

पराशर जी बोले, “हे मैत्रेय! देवताओं के इस प्रकार कहने पर भगवान् विष्णु ने अपने शरीर से मायामोह को उत्पन्न किया और उसे देवताओं को सौंपकर कहा, ‘यह मायामोह उन सम्पूर्ण दैत्यगणों को मोहित कर देगा। तब वे वेदमार्ग का उल्लंघन करने के कारण आप लोगों के वध्य हो जायँगे। अब आप जाइए, डरिए मत; यह मायामोह आगे आपका उपकार करेगा।’ भगवान् की आज्ञा पाकर देवगण उन्हें प्रणाम कर लौट गये, और मायामोह भी उनके साथ वहाँ गया जहाँ महासुर तप कर रहे थे।”

नर्मदा-तट का उपदेशक

तदनन्तर मयूरपिच्छधारी, दिगम्बर और मुण्डितकेश मायामोह ने नर्मदा के तट पर तपस्या में लगे असुरों से अति मधुर वाणी में पूछा, “हे दैत्यपतिगण! आप किस उद्देश्य से तपस्या कर रहे हैं, लौकिक फल की इच्छा से या पारलौकिक की?” असुरों ने कहा, “पारलौकिक फल की कामना से।” मायामोह बोला, “यदि मुक्ति चाहते हैं तो जैसा मैं कहूँ वैसा कीजिए। यह धर्म मुक्ति का खुला द्वार है, इससे श्रेष्ठ और कोई धर्म नहीं। इसका अनुष्ठान करने से आप स्वर्ग अथवा मुक्ति, जिसकी कामना करेंगे, वही पा लेंगे।”

इस प्रकार ‘यह धर्म है और यह अधर्म, यह सत् है और यह असत्, यह दिगम्बरों का धर्म है और यह साम्बरों का’ ऐसे नाना अनन्त वादों से मायामोह ने उन दैत्यों को अपने स्वधर्म से च्युत कर दिया। उसने कहा था कि इस महाधर्म का अर्हण अर्थात् आदर कीजिए, अतः उसका अवलम्बन करने से वे ‘आर्हत’ कहलाये। फिर जितेन्द्रिय मायामोह ने रक्तवस्त्र धारण कर अन्य असुरों से कहा, “यदि स्वर्ग अथवा मोक्ष चाहते हैं तो पशुहिंसा आदि दुष्कर्मों को त्यागकर बोध प्राप्त कीजिए। यह सम्पूर्ण जगत् विज्ञानमय है, ऐसा जानिए। बुधजनों का मत है कि यह संसार अनाधार है, भ्रम से उत्पन्न पदार्थों की प्रतीति पर टिका है और राग आदि दोषों से दूषित है।” ‘बुध्यत, बुध्यध्वम्’ जैसे शब्दों से उसने उन्हें अपने धर्म से छुड़ा दिया।

अब कोई वेदों की, कोई देवताओं की और कोई ब्राह्मणों की निन्दा करने लगा। वे कहते, “अग्नि में हवि जलाने से फल होगा, यह तो बच्चों की सी बात है। यदि यज्ञ में बलि दिया गया पशु स्वर्ग पाता है, तो यजमान अपने पिता को ही क्यों नहीं मार डालता? यदि किसी के भोजन करने से दूसरे की तृप्ति हो सकती है, तो प्रवास में जाते समय भोजन ढोने का क्या प्रयोजन; पुत्रगण घर पर ही श्राद्ध कर दिया करें।” इस प्रकार थोड़े ही समय में मायामोह से मोहित होकर असुरगण वैदिक धर्म की बात करना भी छोड़ बैठे। जिन्होंने वेदत्रयीरूप वस्त्र का त्याग कर दिया, वे ही ‘नग्न’ कहलाये। तब देवगण भली भाँति तैयारी कर उनसे युद्ध को आये, और स्वधर्मरूप कवच के नष्ट हो जाने से वे सन्मार्गविरोधी दैत्य देवताओं के हाथों मारे गये।

राजा शतधनु और शैव्या

सुना जाता है, पूर्वकाल में पृथ्वी पर शतधनु नाम का एक राजा था। उसकी पत्नी शैव्या अत्यन्त धर्मपरायणा, सत्य, शौच और दया से युक्त, विनय और नीति आदि समस्त सुलक्षणों से सम्पन्न महाभागा पतिव्रता थी। वे दोनों परम समाधि से देवदेव श्रीजनार्दन की आराधना करते, प्रतिदिन तन्मय होकर होम, जप, दान, उपवास और पूजन द्वारा भगवान् की भक्ति में लीन रहते।

एक दिन कार्तिकी पूर्णिमा का उपवास कर वे दोनों पति-पत्नी भागीरथी में स्नान कर बाहर आ रहे थे कि एक पाखण्डी उनके सामने आ पड़ा। वह राजा के धनुर्वेदाचार्य का मित्र था, अतः आचार्य के गौरववश राजा ने भी उससे मित्रवत् व्यवहार किया। किन्तु पतिव्रता शैव्या ने उसका कुछ भी आदर नहीं किया; यह सोचकर कि मैं उपवास किये हुए हूँ, वह मौन रहकर सूर्य की ओर देखती रही। फिर घर आकर दोनों ने विधिपूर्वक भगवान् विष्णु की पूजा सम्पन्न की। कालान्तर में वह शत्रुजित् राजा मर गया, और देवी शैव्या ने भी चितारूढ़ महाराज का अनुगमन किया।

एक भूल के अनेक जन्म

उपवास की अवस्था में पाखण्डी से वार्तालाप करने के दोष से राजा शतधनु ने विदिशा नगर में कुत्ते का जन्म लिया। किन्तु जातिस्मरा शैव्या काशिराज की सर्वलक्षणसम्पन्ना कन्या हुई, जिसे अपने पूर्वजन्म का स्मरण था। उसने विवाह से विरत रहकर दिव्य दृष्टि से अपने पति को कुत्ता हुआ जान विदिशा में जा उसे उत्तम भोजन कराया। भोजन पाकर कुत्ता पूँछ हिलाकर चाटुता करने लगा, तब अत्यन्त संकुचित होकर उस बालिका ने अपने पति को प्रणाम कर कहा, “हे महाराज! स्मरण कीजिए, तीर्थस्नान के अनन्तर पाखण्डी से वार्तालाप करने के कारण ही आपको यह कुत्सित योनि मिली है।”

यह सुनकर उसने चिरकाल तक ध्यान कर दुर्लभ निर्वेद प्राप्त किया और निराहार रहकर कुत्ते का शरीर छोड़ दिया। फिर वह कोलाहल पर्वत पर शृगाल हुआ; वहाँ भी उस निष्पाप पत्नी ने उसे स्मरण कराया। इसी प्रकार भेड़िया, गीध और कौआ, जिस-जिस योनि में वह गया, वह दिव्य दृष्टि से खोजकर उसे बोध कराती रही, “जिनके वश में सम्पूर्ण सामन्तगण भेंट लाया करते थे, वही आप आज कौआ होकर उच्छिष्ट खा रहे हैं।” अन्ततः वह मयूर हुआ। उसी समय राजा जनक ने अश्वमेध यज्ञ किया; उस यज्ञ के अवभृथ-स्नान के अवसर पर काशिराज-कन्या ने उस मयूर को भी स्नान कराया और उसकी जन्म-परम्परा का स्मरण कराया। तब उसने शरीर त्याग कर राजा जनक के ही पुत्र के रूप में जन्म लिया।

निष्ठा का पुरस्कार

तब उस कन्या ने अपने पिता को प्रेरित कर अपना स्वयंवर रचवाया, और स्वयंवर में आये अपने उसी पति को फिर पतिभाव से वरण किया। पिता के परलोकवासी होने पर उसने विदेह नगर का राज्य किया, अनेक यज्ञ किये, याचकों को दान दिया, और अन्त में धर्मयुद्ध में अपने प्रिय प्राणों को त्याग दिया। तब भी उस सुलोचना ने प्रसन्न मन से अपने चितारूढ़ पति का अनुगमन किया। इस प्रकार शुद्ध हो जाने पर वह राजा उस राजकन्या के सहित इन्द्रलोक से भी उत्कृष्ट अक्षय लोकों को, अति दुर्लभ दाम्पत्य को और अपने पूर्वार्जित पुण्य के फल को प्राप्त हुआ।

पराशर जी बोले, “हे द्विज! इस प्रकार मैंने पाखण्डी से सम्भाषण करने का दोष और अश्वमेध-यज्ञ के स्नान का माहात्म्य आपको सुना दिया। इसीलिए पाखण्डी और पापाचारियों से कभी वार्तालाप और स्पर्श न कीजिए; विशेषतः जो नित्य-नैमित्तिक कर्मों अथवा यज्ञादि क्रियाओं के लिए दीक्षित हो, उसे उनका संसर्ग सर्वथा त्याग देना चाहिए। इन दुराचारियों की संगति दूर ही से त्यागने योग्य है।”

आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)