Lulla Family

स्यमन्तक मणि की कथा

पढ़ने में लगभग 10 मिनट · 1,599 शब्द

समुद्र के तट पर बैठकर सत्राजित् प्रतिदिन सूर्य की स्तुति किया करते थे। एक दिन उनकी तन्मय आराधना से प्रसन्न होकर भगवान् भास्कर सम्मुख प्रकट हुए, पर अस्पष्ट-सी देदीप्यमान मूर्ति देखकर सत्राजित् बोले, “आकाश में तो मैंने आपको अग्नि के पिण्ड-सा देखा था, अब भी वैसा ही; इस प्रसाद-रूप में कोई विशेषता नहीं जान पड़ती।” तब सूर्य ने अपने गले से स्यमन्तक नामक महामणि उतारकर एक ओर रख दी, और अब सत्राजित् ने उन्हें भली-भाँति देखा; उनका शरीर ताम्रवर्ण, अत्यन्त उज्ज्वल और लघु दिखा। प्रणाम और स्तुति कर उन्होंने वही मणि माँग ली, और सूर्य उसे देकर अपने धाम लौट गए।

वह मणि प्रतिदिन आठ भार सोना देती थी, और जिस राष्ट्र में रहती वहाँ रोग, अनावृष्टि, सर्प, अग्नि, चोर और दुर्भिक्ष का भय न रहता। उसे गले में धारण किए सत्राजित् ने द्वारका में प्रवेश किया। श्रीकृष्ण के मन में आया कि यह दिव्य रत्न तो राजा उग्रसेन के योग्य है, किन्तु जातीय विरोध के भय से उन्होंने माँगा नहीं। यह जानकर, लोभवश, सत्राजित् ने वह मणि अपने भाई प्रसेन को दे दी।

कृष्ण पर लगा चोरी का लांछन

यह न जानते हुए कि पवित्रतापूर्वक धारण करने पर ही यह मणि सुवर्ण आदि गुण देती है और अशुद्ध धारण करने पर घातक हो जाती है, प्रसेन उसे गले में बाँधे घोड़े पर चढ़कर मृगया के लिये वन गया। वहाँ एक सिंह ने उसे घोड़े सहित मार डाला और मणि मुँह में लेकर चला; तभी ऋक्षराज जाम्बवान् ने उस सिंह को मारकर वह निर्मल मणि ले ली, और अपनी गुफा में जाकर उसे सुकुमारक नामक अपने बालक का खिलौना बना दिया।

प्रसेन के न लौटने पर यादवों में कानाफूसी होने लगी कि श्रीकृष्ण ही यह मणि चाहते थे, अवश्य उन्होंने ही ले ली है। इस लोकापवाद का पता लगते ही भगवान् यादव-सेना के साथ प्रसेन के घोड़े के चरण-चिह्नों का अनुसरण करते वन गए, और देखा कि उसे घोड़े सहित सिंह ने मारा है। फिर सिंह के चिह्न देखते हुए ऋक्षराज के मारे सिंह को पाया, और उन्हीं चिह्नों पर चलते-चलते जाम्बवान् की गुफा तक जा पहुँचे। सेना को पर्वत के पास छोड़कर वे स्वयं भीतर घुस गए।

जाम्बवान् की गुफा में इक्कीस दिन

भीतर उन्होंने धात्री की वह वाणी सुनी, जो सुकुमारक को बहलाती हुई गा रही थी, “सिंह ने प्रसेन को मारा, और सिंह को जाम्बवान् ने; रोइए मत, हे सुकुमारक, यह स्यमन्तक मणि तो आपकी ही है।” इस प्रकार मणि का पता लग गया। उस विलक्षण पुरुष को अभिलाषा-भरी दृष्टि से मणि की ओर देखते पाकर धात्री “त्राहि-त्राहि” पुकार उठी। उसकी आर्त पुकार सुनकर जाम्बवान् क्रोध से भरे आए, और दोनों में इक्कीस दिन तक घोर युद्ध हुआ।

पर्वत के पास सात-आठ दिन बाट देखकर, जब भगवान् न निकले, तो यादव-सैनिक उन्हें मरा समझकर द्वारका लौट गए और वैसा ही कह दिया। बन्धुओं ने यह सुनकर सम्पूर्ण और्ध्वदैहिक कर्म कर दिए; किन्तु अति श्रद्धा से दिए उन पिण्ड-जल से भगवान् के बल और प्राण की पुष्टि होती गई, जबकि निराहार जाम्बवान् प्रहारों से मर्दित होकर क्षीण होते गए। अन्त में परास्त होकर उन्होंने प्रणाम कर कहा, “देवता, असुर, गन्धर्व और यक्ष भी आपको नहीं जीत सकते, फिर मनुष्य की क्या बात? अवश्य ही आप श्रीरामचन्द्र के समान लोक-प्रतिपालक नारायण के अंश से प्रकट हुए हैं।” तब भगवान् ने पृथ्वी का भार उतारने के लिये अवतार लेने का सारा वृत्तान्त उन्हें सुनाया, और अपने हाथ से छूकर उन्हें युद्ध के श्रम से रहित कर दिया। जाम्बवान् ने पुनः प्रणाम कर अपनी कन्या जाम्बवती अर्घ्य-रूप में और वह मणि भगवान् को दे दी। अच्युत को उस विनीत के हाथ से मणि लेना उचित न था, पर अपने कलंक के शोधन के लिये वह मणि लेकर वे जाम्बवती सहित द्वारका लौटे।

सत्यभामा का विवाह और शतधन्वा का षड्यन्त्र

भगवान् के आगमन से समस्त यादव और उनकी स्त्रियाँ हर्ष से भर उठे। भगवान् ने जो-जो घटना जैसी हुई थी, ज्यों-की-त्यों कह सुनाई और सत्राजित् को मणि लौटाकर मिथ्या कलंक से छुटकारा पाया। सत्राजित् मन-ही-मन डरा और लज्जित हुआ कि मैंने ही यह मिथ्या कलंक लगाया; अतः प्रायश्चित्त-स्वरूप उसने अपनी कन्या सत्यभामा भगवान् को ब्याह दी। उस कन्या को पहले अक्रूर, कृतवर्मा और शतधन्वा ने वरण किया था; अतः श्रीकृष्ण से उसका विवाह हो जाने पर उन्होंने अपमान मानकर सत्राजित् से वैर बाँध लिया। अक्रूर और कृतवर्मा ने शतधन्वा को उकसाया, “इस दुष्ट सत्राजित् ने हमारे माँगने पर भी कन्या श्रीकृष्ण को दे दी। इसे मारकर मणि क्यों नहीं ले लेते? अच्युत विरोध करें तो हम साथ देंगे।” शतधन्वा ने कहा, “बहुत अच्छा।”

इसी समय भगवान्, पाण्डवों के लाक्षागृह में जलने का यथार्थ जानते हुए भी, दुर्योधन के प्रयत्न को शिथिल करने के लिये वारणावत चले गए। उनके जाते ही शतधन्वा ने सोते हुए सत्राजित् को मारकर मणि ले ली। पिता के वध से क्रोधित सत्यभामा रथ पर चढ़कर वारणावत पहुँचीं और सारा वृत्तान्त सुनाया। भगवान् उन्हें धैर्य बँधाकर द्वारका लौटे और बलदेव से बोले, “प्रसेन को वन में सिंह ने मारा, अब शतधन्वा ने सत्राजित् को; उस मणि पर हम दोनों का समान अधिकार है। रथ पर चढ़िए, हम शतधन्वा को दण्ड दें।”

मणि किसके पास रहे

शतधन्वा ने सहायता के लिये पहले कृतवर्मा से प्रार्थना की, पर वह बोला, “मैं बलदेव और वासुदेव से विरोध में समर्थ नहीं।” फिर अक्रूर के पास गया, किन्तु उन्होंने भी भगवान् की महिमा गिनाकर उसे किसी और की शरण लेने को कहा। तब शतधन्वा ने वह मणि अक्रूर के पास रख दी। अक्रूर ने कहा, “इसे तभी लूँगा जब अन्तकाल आने पर भी आप किसी से यह बात न कहें।” शतधन्वा के स्वीकार करने पर अक्रूर ने मणि रख ली।

तदनन्तर शतधन्वा सौ योजन तक जानेवाली एक वेगवती घोड़ी पर चढ़कर भागा; शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामक चार घोड़ोंवाले रथ पर बलदेव और वासुदेव भी पीछे लगे। सौ योजन पार करते ही वह घोड़ी मिथिला के समीप प्राण छोड़ बैठी, और शतधन्वा पैदल भागा। भगवान् ने बलभद्र से कहा कि यहाँ घोड़े भयभीत हैं, आप रथ में ही रहिए; और स्वयं पैदल दो कोस पीछा कर, दूर से ही चक्र फेंककर शतधन्वा का सिर काट डाला। किन्तु उसके शरीर और वस्त्रों में मणि न मिली, तो बोले, “हमने इसे व्यर्थ मारा, मणि तो इसके पास थी ही नहीं।”

यह सुनकर बलभद्र को लगा कि श्रीकृष्ण मणि छिपाने के लिये बहाना बना रहे हैं। रोष में उन्होंने कहा, “आप बड़े अर्थलोभी हैं; भाई होने से ही क्षमा किए देता हूँ। अब मुझे द्वारका से और आपसे कोई काम नहीं।” इतना कहकर वे विदेहनगर चले गए, जहाँ राजा जनक ने आदरपूर्वक उन्हें रखा; इन्हीं दिनों दुर्योधन उनसे गदायुद्ध सीखता रहा। तीन वर्ष बाद बभ्रु और उग्रसेन आदि यादव, जो जानते थे कि श्रीकृष्ण ने मणि नहीं ली, वहाँ जाकर शपथपूर्वक बलदेव को द्वारका लौटा लाए।

उधर अक्रूर उस मणि के सुवर्ण से बासठ वर्ष तक निरन्तर यज्ञ करते रहे। पर आगे उनके पक्ष के भोजवंशियों द्वारा सात्वत के प्रपौत्र शत्रुघ्न के मारे जाने पर, अक्रूर भोजों सहित द्वारका छोड़ गए, और उनके जाते ही नगर में रोग, दुर्भिक्ष, सर्प, अनावृष्टि और महामारी उठ खड़ी हुई। तब अन्धक नामक वृद्ध यादव ने कहा, “अक्रूर के पिता श्वफल्क जहाँ रहते, वहाँ दुर्भिक्ष और अनावृष्टि कभी न होती। एक बार काशिराज के देश में अनावृष्टि हुई तो श्वफल्क को वहाँ ले जाते ही वर्षा होने लगी। उस समय काशिराज की गर्भस्थ कन्या बारह वर्ष तक बाहर न आई; फिर उसने कहा कि प्रतिदिन एक गौ ब्राह्मण को दान देने पर तीन वर्ष बाद वह उत्पन्न होगी, और वैसा ही हुआ। राजा ने उसका नाम गान्दिनी रखा और उपकारी श्वफल्क को अर्घ्य-रूप में दे दिया, जिससे अक्रूर का जन्म हुआ। ऐसे गुणवान् माता-पिता के पुत्र के रहते भला उपद्रव कैसे टिकेंगे? इन्हें लौटा लाना चाहिए।”

यह सुनकर श्रीकृष्ण, उग्रसेन और बलभद्र आदि अक्रूर का अपराध भुलाकर अभयदान देकर उन्हें नगर में ले आए, और उनके आते ही सब उपद्रव शान्त हो गए। तब भगवान् ने विचार किया कि गान्दिनी और श्वफल्क से जन्म तो सामान्य कारण है; उपद्रवों को शान्त करनेवाला यह प्रभाव तो अवश्य स्यमन्तक मणि का है, जो अक्रूर के पास है। ऐसा सोचकर उन्होंने किसी बहाने समस्त यादवों को महल में एकत्र किया और परिहास करते हुए अक्रूर से कहा, “हे दानपते! शतधन्वा की सौंपी वह मणि आपके पास रहे, इसमें राष्ट्र का उपकार ही है; किन्तु बलभद्र सन्देह करते हैं, अतः एक बार उसे दिखला दीजिए।”

अक्रूर ने सोचा कि अब छिपाना व्यर्थ है, और इसकी रखवाली से तनिक भी सुख नहीं मिला। यह निश्चय कर उन्होंने कटि-वस्त्र में छिपाई एक छोटी सोने की पिटारी से वह मणि निकालकर सभा के बीच रख दी, और सारा स्थान उसकी तीव्र कान्ति से देदीप्यमान हो उठा। सब यादव “साधु-साधु” कह उठे। बलभद्र ने फिर अधिकार जताया, “अच्युत के समान इस पर मेरा भी समान अधिकार है।” सत्यभामा बोलीं, “यह तो मेरी पैतृक सम्पत्ति है।” दोनों ओर से घिरे-से श्रीकृष्ण ने कहा, “इस पर मेरा और बलभद्र का समान अधिकार है, और सत्यभामा की यह पैतृक सम्पत्ति। किन्तु यह मणि शुद्ध और ब्रह्मचर्यसम्पन्न पुरुष के धारण करने पर ही राष्ट्र का हित करती है, अशुद्ध धारण करनेवाले को आश्रितों सहित मार डालती है। मेरी सोलह हजार स्त्रियाँ हैं, अतः मैं इसे धारण नहीं कर सकता; सत्यभामा भी कैसे धारण करें? आर्य बलभद्र को भी इसके लिये मदिरापान आदि भोगों का त्याग करना पड़ेगा। अतः हे दानपते! राष्ट्र के मंगल के लिये आप ही इसे पूर्ववत् धारण कीजिए।” तब अक्रूर ने “जो आज्ञा” कहकर वह महामणि ले ली, और उसे गले में धारण किए सूर्य के समान किरण-जाल से युक्त होकर विचरने लगे।

भगवान् के इस मिथ्या-कलंक-शोधन का जो श्रद्धा से स्मरण करता है, उस पर कभी मिथ्या कलंक नहीं लगता, उसकी इन्द्रियाँ समर्थ बनी रहती हैं और वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। यही कथा श्रीमद्भागवत में भी आती है, किन्तु विष्णुपुराण का यह वर्णन अपने ही ढंग का है।

आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)