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गंगावतरण, राम और निमि

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सगर के साठ हजार पुत्र

अयोध्या के राजा सगर की दो रानियाँ थीं। एक थीं कश्यप की पुत्री सुमति और दूसरी विदर्भराज की कन्या केशिनी। बहुत काल तक सन्तान न हुई, तो दोनों ने भृगुवंशी महर्षि और्व की आराधना की। ऋषि प्रसन्न हुए और वर दिया, “आप दोनों में एक को वंश चलानेवाला एक ही पुत्र होगा, और दूसरी को साठ हजार पुत्र। जिसे जो अभीष्ट हो, वही माँग लीजिए।” केशिनी ने वंश चलानेवाले एक पुत्र का वर माँगा और सुमति ने साठ हजार पुत्रों का। समय पर केशिनी ने असमंजस को जन्म दिया और सुमति ने साठ हजार बलवान पुत्रों को।

असमंजस बचपन से ही दुराचारी था। पिता ने सोचा कि यौवन आने पर सुधर जाएगा, किन्तु जब न सुधरा तो उन्होंने उसे त्याग दिया। उधर वे साठ हजार भाई भी असमंजस के ही आचरण का अनुकरण करने लगे, और उनके उपद्रव से सारे संसार का सन्मार्ग नष्ट होने लगा। घबराकर देवता भगवान् पुरुषोत्तम के अंशभूत कपिलदेव की शरण गए। भगवान् ने कहा कि कुछ ही दिनों में ये सब नष्ट हो जाएँगे।

अश्वमेध का घोड़ा और कपिल की दृष्टि

इसी बीच सगर ने अश्वमेध यज्ञ आरम्भ किया। पुत्रों की रखवाली में जिस घोड़े को छोड़ा गया था, उसे कोई चुराकर पृथ्वी के एक बिल में घुस गया। खुर के चिह्नों का अनुसरण करते हुए साठ हजार राजकुमारों ने एक-एक योजन पृथ्वी खोद डाली और खोदते-खोदते पाताल जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने अपने घोड़े को विचरते देखा, और थोड़ी ही दूर पर शरत्काल के सूर्य-से तेजस्वी, सिर झुकाए बैठे एक महर्षि को देखा। वही कपिलदेव थे।

“यही हमारा अपकारी है, यही घोड़े का चोर है, मारो इसे” ऐसा चिल्लाते हुए वे शस्त्र उठाकर उनकी ओर दौड़े। भगवान् कपिल ने कुछ आँख बदलकर उनकी ओर देखा भर, और वे सब अपने ही शरीरों से उठी अग्नि में जलकर भस्म हो गए।

अंशुमान् और गंगा का वचन

घोड़ा न लौटने पर सगर ने असमंजस के पुत्र अंशुमान् को भेजा। अंशुमान् उसी खोदे हुए मार्ग से कपिल के पास पहुँचे और भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति की। भगवान् प्रसन्न होकर बोले, “बेटा, यह घोड़ा ले जाकर अपने पितामह को दीजिए, और जो इच्छा हो वह वर माँग लीजिए। आप का पौत्र गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाएगा, और उसके जल का स्पर्श पाकर आप के पितर स्वर्ग को जाएँगे। विष्णु के चरण-नख से निकले उस जल का ऐसा माहात्म्य है कि मृत पुरुष की अस्थि, चर्म अथवा एक अंग का भी स्पर्श उसे स्वर्ग पहुँचा देता है।”

अंशुमान् घोड़ा लेकर लौटे और सगर ने यज्ञ पूरा किया। जिस विशाल गर्त को पुत्रों ने खोदा था, उसी को सगर ने पुत्र-स्नेह से अपना पुत्र मान लिया, और इसी से समुद्र का नाम सागर पड़ा। अंशुमान् के पुत्र हुए दिलीप, और दिलीप के भगीरथ। भगीरथ ने गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा और उनका नाम भागीरथी रखा। कपिल ने जो वचन दिया था वह इस प्रकार पूरा हुआ, और सगर के पुत्रों का उद्धार हो गया।

यही गंगावतरण की कथा रामायण और श्रीमद्भागवत में भी आती है, किन्तु विष्णुपुराण का यह वर्णन अपने ही संक्षिप्त ढंग का है।

भगीरथ से राम तक

भगीरथ से आगे यह सूर्यवंश अनेक राजाओं तक बहता रहा। इसी वंश में सौदास हुए, जिन्हें एक राक्षस के छल से गुरु वसिष्ठ का शाप लगा और वे कुछ काल तक नरभक्षी बनकर वन में भटकते रहे। शाप-जल अपने ही पैरों पर पड़ने से उनके पाँव चितकबरे हो गए, इसी से उनका नाम कल्माषपाद पड़ा। सात वर्ष तक जब उनकी रानी मदयन्ती के गर्भ से पुत्र न जन्मा, तो उन्होंने गर्भ पर पत्थर से आघात किया; इससे जो पुत्र हुआ उसका नाम अश्मक पड़ा, और वंश आगे बढ़ा।

इसी धारा में आगे खट्वांग नामक राजा हुए। देवासुर-संग्राम में देवताओं की सहायता कर, वर माँगने पर उन्होंने अपनी आयु ही पूछ ली। देवताओं ने कहा कि केवल एक मुहूर्त शेष है। वे तुरन्त विमान से मृत्युलोक लौटे और अपने चित्त को भगवान् वासुदेव में लगाकर उसी क्षण उन्हीं में लीन हो गए। सप्तर्षि आज भी गाते हैं कि खट्वांग-सा दूसरा कोई राजा नहीं हुआ, जिसने एक मुहूर्त के जीवन में ही अपनी बुद्धि और सत्य से तीनों लोक जीत लिए। खट्वांग से दीर्घबाहु, फिर रघु, अज और दशरथ हुए।

भगवान् राम का संक्षिप्त चरित

उन्हीं दशरथ में जगत् की स्थिति के लिये भगवान् ने अपने अंशों से राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न, इन चार रूपों में अवतार लिया। राम ने बाल्यावस्था में ही विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करते हुए ताटका को मारा, मारीच को बाणरूपी वायु से समुद्र में फेंका और सुबाहु आदि राक्षसों का नाश किया। जनक की सभा में उन्होंने महादेव का धनुष तोड़ा, अयोनिजा सीता को पत्नी-रूप में प्राप्त किया और परशुराम का बल-गर्व शान्त किया।

फिर पिता के वचन से राज्य की इच्छा छोड़कर वे लक्ष्मण और सीता के साथ वन गए। वहाँ विराध, खर, दूषण, कबन्ध और बालि का वध किया, समुद्र पर सेतु बाँधा, समस्त राक्षसकुल का संहार कर रावण को मारा, और अग्नि-प्रवेश से निष्कलंक सिद्ध हुई सीता को अयोध्या ले आए। हे मैत्रेय, उनका राज्याभिषेक-मंगल तो सौ वर्षों में भी वर्णन नहीं किया जा सकता। ब्रह्मा, इन्द्र और समस्त देवगण तथा वसिष्ठ, वाल्मीकि आदि मुनियों की स्तुति के बीच, वेदों के घोष में सिंहासन पर आरूढ़ होकर श्रीराम ने ग्यारह हजार वर्ष तक राज्य किया। उनके कुश और लव नामक दो पुत्र हुए। आगे भरत ने गन्धर्वलोक जीतकर तीन करोड़ गन्धर्वों का वध किया और शत्रुघ्न ने मधुपुत्र लवण राक्षस को मारकर मथुरा नगरी बसाई। अन्त में चारों भाई अपनी लीला समेटकर स्वर्ग सिधार गए।

निमि की विदेह-कथा

इक्ष्वाकु के एक पुत्र थे निमि। उन्होंने एक हजार वर्ष में पूरा होनेवाला यज्ञ आरम्भ किया और वसिष्ठ को होता बनने के लिये वरा। वसिष्ठ ने कहा, “पाँच सौ वर्ष के यज्ञ के लिये इन्द्र मुझे पहले ही वरण कर चुके हैं; उतने समय आप ठहर जाइए, फिर मैं आ जाऊँगा।” राजा ने कोई उत्तर न दिया। वसिष्ठ इसे स्वीकृति समझकर इन्द्र के यज्ञ में चले गए, और निमि ने उसी समय गौतम आदि दूसरे होताओं से अपना यज्ञ आरम्भ कर दिया।

इन्द्र का यज्ञ समाप्त होते ही वसिष्ठ लौटे तो देखा कि अपना कर्म गौतम को सौंपकर राजा सो रहे हैं। रुष्ट होकर उन्होंने सोते हुए निमि को शाप दिया कि इन्होंने अवज्ञा की है, इसलिए इनका देह गिर जाए। जागने पर निमि ने भी कहा कि इस गुरु ने बिना कुछ कहे, अनजाने में सोते हुए मुझे शाप दिया, इसलिए इनका देह भी नष्ट हो जाए। ऐसा कहकर राजा ने अपना शरीर छोड़ दिया। वसिष्ठ का चित्त मित्र और वरुण के तेज में प्रवेश कर गया, और उर्वशी को देखने पर उन्होंने दूसरा देह धारण किया। निमि का शरीर सुगन्धित तैलों से सुरक्षित रहकर ऐसा ताजा बना रहा मानो अभी-अभी मरा हो।

यज्ञ की समाप्ति पर देवता भाग लेने आए और ऋत्विजों के कहने पर निमि को वर देने लगे। राजा ने कहा, “आप सब संसार के दुःख हरनेवाले हैं। शरीर और आत्मा के वियोग-सा दूसरा कोई दुःख नहीं। इसलिए मैं फिर देह धारण करना नहीं चाहता, समस्त प्राणियों के नेत्रों में ही निवास करना चाहता हूँ।” देवताओं ने उन्हें सब जीवों के नेत्रों में स्थापित कर दिया; तभी से प्राणी पलक की निमेष-उन्मेष करने लगे।

निमि पुत्रहीन थे, और अराजकता के भय से मुनियों ने उनके शरीर को अरणि से मथा। उससे एक कुमार उत्पन्न हुआ। जन्म लेने के कारण वह जनक कहलाया, पिता के विदेह होने से वैदेह, और मन्थन से उत्पन्न होने के कारण मिथि, जिससे उनकी नगरी मिथिला हुई। इसी जनक-वंश में आगे सीरध्वज हुए, जो पुत्र की कामना से यज्ञभूमि जोत रहे थे; हल की उस रेखा (सीता) से उन्हें सीता नामक कन्या प्राप्त हुई। यह वंश कृति नामक राजा तक चला, और ये सब मैथिल प्रायः आत्मविद्या के आश्रयी होते थे।

आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)