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अपने नित्यकर्म से निवृत्त होकर मुनिवर मैत्रेय पराशरजी के पास आए, उनके चरण छूकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बैठ गए। बोले, “हे गुरुदेव! आपकी कृपा से मैंने सम्पूर्ण वेद, वेदाङ्ग और सारे धर्मशास्त्र क्रम से पढ़ लिए हैं, यहाँ तक कि मेरे विरोधी भी यह नहीं कह सकते कि मैंने परिश्रम नहीं किया। अब मेरे मन में एक ही जिज्ञासा उठती है, और वह आप ही के मुखारविन्द से सुनना चाहता हूँ। यह सारा जगत् कहाँ से उपजा, किस कारण से बना, पहले किसमें लीन था और आगे किसमें लीन होगा? आकाश, समुद्र, पर्वत, देवता, सूर्य, मनु और मन्वन्तर, बार-बार लौटनेवाले युग, प्रलय का स्वरूप और वेद की शाखाएँ, यह सब मुझे बतलाने की कृपा कीजिए।”
पराशरजी बोले, “हे मैत्रेय! आपने एक पुरानी बात याद दिला दी, इसके लिए आप धन्यवाद के पात्र हैं। सुनिए। जब मैंने सुना कि विश्वामित्र की प्रेरणा से एक राक्षस ने मेरे पिता को खा लिया, तब मुझे बड़ा भारी क्रोध हुआ। राक्षसों के नाश के लिए मैंने एक यज्ञ आरम्भ किया, और उसमें सैकड़ों निशाचर जलकर भस्म होने लगे। यह देखकर मेरे पितामह वसिष्ठजी ने मुझे रोका। बोले, बेटा, अत्यन्त क्रोध ठीक नहीं। क्रोध तो मूर्खों में होता है, विचारवान में कैसे हो सकता है? पुरुष अपने ही किए हुए कर्म का फल भोगता है, इन बेचारे राक्षसों का कोई अपराध नहीं। यह क्रोध बड़े परिश्रम से संचित यश और तप को जला देता है; इसे शान्त कीजिए, इस यज्ञ को समाप्त कीजिए। साधुओं का धन तो सदा क्षमा ही है।”
उनके वचनों का गौरव समझकर मैंने वह यज्ञ रोक दिया, और वसिष्ठजी बहुत प्रसन्न हुए। उसी समय ब्रह्मा के पुत्र पुलस्त्यजी वहाँ आए। पितामह ने उन्हें अर्घ्य दिया, और वे आसन ग्रहण करके मुझसे बोले, हे वत्स! इतना बड़ा वैर मन में रहते हुए भी आपने बड़े-बूढ़ों के कहने से क्षमा स्वीकार की, इसी से आप सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता होंगे। अत्यन्त क्रोधित होकर भी आपने मेरी सन्तान का सर्वथा मूलोच्छेद नहीं किया; अतः मैं आपको एक और उत्तम वर देता हूँ, कि आप पुराणसंहिता के वक्ता होंगे और देवताओं के यथार्थ स्वरूप को जानेंगे। मेरे प्रसाद से आपकी बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों कर्मों में निःसन्देह होगी। पुलस्त्यजी के इतना कहने पर पितामह वसिष्ठजी ने भी कहा, पुलस्त्यजी ने जो कुछ कहा है, वह सब सत्य होगा। हे मैत्रेय! वही सब आपके पूछने से मुझे स्मरण हो आया; अतः वही पुराणसंहिता आपको सुनाता हूँ, ध्यान देकर सुनिए। यह जगत् विष्णु से उपजा है, उन्हीं में स्थित है, वे ही इसकी स्थिति और लय के कर्ता हैं, और यह जगत् भी वे ही हैं।
जगत् का मूल एक ही है
जो ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के रूप से इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करते हैं, वे विष्णु ही सबके मूल हैं। वे विकार से रहित हैं, शुद्ध हैं, अविनाशी हैं, सदा एकरस हैं। एक होकर भी अनेक रूपों में दिखते हैं, स्थूल भी हैं और सूक्ष्म भी, कारण भी हैं और कार्य भी। यह ज्ञान परम्परा से चला आया है। पहले ब्रह्माजी ने दक्ष आदि मुनियों को बताया, उन मुनियों ने नर्मदा के तट पर राजा पुरुकुत्स को सुनाया, पुरुकुत्स ने सारस्वत को और सारस्वत ने मुझसे कहा।
अब उस परमतत्त्व का वर्णन सुनिए। वह प्रकृति से भी परे है, सबके भीतर बसा है, रूप, वर्ण, नाम और विशेषण से रहित है। उसमें न जन्म है, न वृद्धि, न परिणाम, न क्षय, न नाश। उसके विषय में बस इतना ही कहा जा सकता है कि वह सदा है। वही नित्य, अजन्मा, अक्षय और निर्मल ब्रह्म है, जिसे विद्वान् वासुदेव कहते हैं, क्योंकि वे सर्वत्र हैं और उन्हीं में सारा विश्व बसा हुआ है। उसके चार रूप जान लीजिए। पुरुष उसका पहला रूप है, अव्यक्त प्रकृति और व्यक्त महदादि उसके दूसरे रूप हैं, और काल उसका परम रूप है। इन चारों से परे जो है, जिसे पण्डितजन ही देख पाते हैं, वही भगवान् विष्णु का परम पद है।
प्रलयकाल में जब यह सारा दृश्य प्रपञ्च प्रकृति में लीन हो जाता है, तब न दिन रहता है न रात, न आकाश न पृथ्वी, न अन्धकार न प्रकाश; बस एक अव्यक्त प्रधान और पुरुष ही शेष रहते हैं। तब विष्णु का कालरूप ही इन दोनों को धारण किए रहता है। इसी कारण संसार की उत्पत्ति, स्थिति और लय कभी नहीं रुकते, प्रवाहरूप से निरन्तर चलते रहते हैं।
फिर जब सृष्टि का समय आता है, तब वही परमेश्वर अपनी इच्छा से प्रकृति और पुरुष में प्रवेश करके उन्हें क्षुब्ध कर देते हैं। जैसे गन्ध स्वयं कोई काम नहीं करती, केवल अपने पास से मन को हिला देती है, वैसे ही परमेश्वर अपनी समीपता से प्रधान को प्रेरित करते हैं। उस क्षोभ से पहले महत्तत्त्व उपजा, फिर सात्त्विक, राजस और तामस तीन प्रकार का अहंकार; तामस अहंकार भूतादि से शब्द-तन्मात्रा और उससे आकाश प्रकट हुआ; आकाश से स्पर्श-तन्मात्रा और वायु, वायु से रूप-तन्मात्रा और तेज, तेज से रस-तन्मात्रा और जल, और जल से गन्ध-तन्मात्रा और पृथ्वी; हर पिछला भूत अगले को ढँके रहा। इन पाँचों भूतों की अलग-अलग शक्तियाँ थीं, अकेले वे कुछ न रच सकते थे; अतः पुरुष के अधिष्ठान से और प्रकृति के अनुग्रह से वे सब मिलकर एक गोलाकार अण्ड बन गए।
जल के बुलबुले के समान बढ़ता हुआ वह महान् अण्ड हिरण्यगर्भ कहलाया। उसी में अव्यक्तस्वरूप जगत्पति विष्णु स्वयं व्यक्त होकर विराजमान हुए। उस अण्ड में सुमेरु गर्भ को ढँकनेवाली झिल्ली हुआ, दूसरे पर्वत जरायु हुए, और समुद्र भीतर का रस। उसी अण्ड के भीतर द्वीप, पर्वत, ग्रह, देव, असुर और मनुष्य प्रकट हुए। उस अण्ड को बाहर से जल, अग्नि, वायु, आकाश और भूतादि अहंकार, प्रत्येक अपने पिछले से दसगुना, घेरे हुए हैं, भूतादि को महत्तत्त्व और इन सबको अव्यक्त प्रधान; इन सात प्राकृत आवरणों से वह अण्ड ऐसे घिरा है जैसे नारियल के फल के भीतरी बीज को ऊपर के छिलके ढँके रहते हैं। उसी में बैठे विश्वेश्वर विष्णु ब्रह्मा बनकर रजोगुण का आश्रय लेकर सृष्टि रचते हैं, फिर सत्त्वगुण से युगों-युगों तक उसका पालन करते हैं, और कल्प के अन्त में अति दारुण रुद्ररूप धारण करके सबका संहार कर लेते हैं। एक ही जनार्दन सृष्टि, स्थिति और संहार के लिए ब्रह्मा, विष्णु और शिव, ये तीन नाम धारण करते हैं। वे ही रचते हैं, वे ही पालते हैं, और वे ही समेट लेते हैं; उनकी यह सारी लीला बालक की क्रीड़ा के समान है।
काल किसे कहते हैं
तब मैत्रेय ने पूछा, हे भगवन्! जो निर्गुण, शुद्ध और निर्मल है, वह भला सृष्टि का कर्ता कैसे हो सकता है? पराशरजी बोले, हे मैत्रेय! पदार्थों की शक्तियाँ अचिन्त्य होती हैं, उनमें कोई तर्क नहीं चलता। जैसे अग्नि में उष्णता स्वाभाविक है, वैसे ही ब्रह्म में सृष्टि रचने की शक्ति स्वाभाविक है। नारायण नामक ब्रह्मा जब सृष्टि में प्रवृत्त होते हैं, तब उपचार से ही उन्हें उत्पन्न हुआ कहा जाता है। उनकी अपनी गणना से उनकी आयु सौ वर्ष की है, जिसका नाम पर है, और उसका आधा परार्ध।
अब काल का माप सुनिए। पन्द्रह निमेष की एक काष्ठा होती है, तीस काष्ठा की एक कला, और तीस कला का एक मुहूर्त। तीस मुहूर्त का एक दिन-रात, और तीस दिन-रात का एक मास। छः मास का एक अयन, और दो अयन का एक वर्ष; दक्षिणायन देवताओं की रात है और उत्तरायण उनका दिन। बारह हज़ार दिव्य वर्षों के चार युग होते हैं, जो सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग के नाम से क्रमशः चार, तीन, दो और एक हज़ार दिव्य वर्ष के हैं, और हर युग के पहले उतने ही सौ दिव्य वर्षों की सन्ध्या तथा पीछे उतने ही सौ वर्षों का सन्ध्यांश होता है।
ऐसे एक हज़ार चतुर्युग का ब्रह्मा का एक दिन होता है, और उतनी ही बड़ी उनकी रात। एक दिन में चौदह मनु बदल जाते हैं। एक मन्वन्तर इकहत्तर चतुर्युग से कुछ अधिक होता है, अर्थात् मनुष्य के वर्षों के हिसाब से पूरे तीस करोड़ सरसठ लाख बीस हज़ार वर्ष, इससे अधिक नहीं। इसका चौदह गुना ब्रह्मा का एक दिन हुआ, और उसके अन्त में तीनों लोक जलने लगते हैं तथा नैमित्तिक प्रलय होता है। कमलयोनि नारायण उस त्रिलोकी को ग्रास से तृप्त होकर दिन के बराबर लम्बी रात शेषशय्या पर शयन करते हैं, और उसके बीत जाने पर फिर सृष्टि रचते हैं। ऐसे सौ वर्ष ब्रह्मा की परम आयु है। उनका एक परार्ध बीत चुका है, जिसके अन्त में पद्म नामक महाकल्प हुआ था; अब जो चल रहा है वह दूसरे परार्ध का पहला कल्प है, जिसका नाम वराह है।
आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)