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चन्द्रवंश का आरम्भ
मैत्रेय ने पूछा, “भगवन्, सूर्यवंश तो आपने कह दिया; अब चन्द्रवंशी राजाओं की कथा सुनाइए, जिनकी स्थिर कीर्ति आज भी गाई जाती है।” पराशर बोले, “सुनिए। यह वंश नहुष, ययाति और कार्तवीर्य-अर्जुन जैसे अनेक बल-पराक्रमी और गुणवान् राजाओं से सुशोभित है।”
समस्त जगत् के रचयिता भगवान् नारायण के नाभि-कमल से ब्रह्मा प्रकट हुए। ब्रह्मा के पुत्र हुए अत्रि, और अत्रि के पुत्र हुए चन्द्रमा। ब्रह्मा ने उन्हें समस्त औषधि, ब्राह्मण और नक्षत्रों का अधिपति बना दिया। चन्द्रमा ने राजसूय यज्ञ किया, किन्तु अपने ऐश्वर्य के मद में आकर उन्होंने देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा का हरण कर लिया। ब्रह्मा और देवर्षियों के बहुत समझाने पर भी उन्होंने उसे न छोड़ा। इसी को लेकर देवता और दैत्यों में तारकामय नामक घोर संग्राम छिड़ गया, जिसमें बृहस्पति से द्वेष के कारण शुक्र चन्द्रमा के सहायक हुए और उनके साथ जम्भ, कुम्भ आदि समस्त दैत्य-दानव; अंगिरा से विद्या पाने के कारण रुद्र बृहस्पति के सहायक हुए, और इन्द्र भी सारी देवसेना लेकर बृहस्पति के पक्ष में आए। तब सारा संसार क्षुब्ध होकर ब्रह्मा की शरण गया, और ब्रह्मा ने युद्ध रोककर तारा को बृहस्पति के पास लौटा दिया।
किन्तु तारा गर्भवती थीं। बृहस्पति के कहने पर उन्होंने वह गर्भ सींक की झाड़ी में छोड़ दिया, और उस अत्यन्त तेजस्वी बालक के जन्म पर बृहस्पति और चन्द्रमा दोनों उसे अपना कहने लगे। देवताओं के बहुत पूछने पर भी लज्जावश तारा मौन रहीं। तब वह बालक उन्हें शाप देने को उद्यत होकर बोला, “दुष्ट माता! आप मेरे पिता का नाम क्यों नहीं बतातीं?” पितामह ब्रह्मा ने बालक को रोका और स्वयं तारा से पूछा, तब उन्होंने लज्जा से कहा, “चन्द्रमा का।” तब चन्द्रमा ने प्रसन्न होकर उसे हृदय से लगाया और उसका नाम बुध रखा।
पुरूरवा और उर्वशी का मिलन
उसी बुध ने इला से पुरूरवा को उत्पन्न किया। पुरूरवा अत्यन्त दानशील, यज्ञनिष्ठ और तेजस्वी राजा थे। उधर अप्सरा उर्वशी को मित्र और वरुण के शाप से मृत्युलोक में रहना पड़ा था। उसकी दृष्टि जब उस सत्यवादी, रूपवान और बुद्धिमान राजा पर पड़ी, तो वह स्वर्ग-सुख की इच्छा छोड़कर तन्मय भाव से उनके पास चली आई; और राजा भी उसके रूप, सुकुमारता और गति-विलास पर मुग्ध होकर सब कुछ भूल गए।
राजा ने साहसपूर्वक कहा, “हे सुभगे, मैं आप की इच्छा करता हूँ; प्रसन्न होकर मुझे प्रेम दीजिए।” उर्वशी ने लज्जा से कहा, “यदि आप मेरी तीन प्रतिज्ञाएँ निभा सकें तो ऐसा हो सकता है। मेरी शय्या के पास पुत्रों के समान पले हुए दो मेष बँधे हैं, इन्हें कभी मुझसे दूर न होने दीजिए। मुझे कभी नग्न न दिखाई दीजिए। और घृत ही मेरा आहार होगा।” राजा ने कहा, “ऐसा ही होगा।”
फिर तो चैत्ररथ आदि रमणीय वनों और मानस आदि सरोवरों में विहार करते हुए वे दोनों साठ हजार वर्ष तक साथ रहे, और दिन-दिन उनका अनुराग बढ़ता गया। उर्वशी को अब देवलोक में लौटने की इच्छा ही न रही।
वियोग
उधर उर्वशी के बिना स्वर्ग, अप्सराओं और गन्धर्वों को सूना लगने लगा। तब विश्वावसु नामक गन्धर्व एक रात उनके शयनागार के पास से एक मेष चुरा ले गया। मेष का आर्तनाद सुनकर उर्वशी बोली, “मुझ अनाथ के पुत्र को कौन लिये जाता है।” किन्तु रानी नग्न देख लेगी, इस भय से राजा नहीं उठे। तब गन्धर्व दूसरा मेष भी ले चले। अब उर्वशी विलाप करने लगी, “हाय, मैं अनाथ और भर्तृहीन होकर एक कायर के अधीन हो गई।”
यह ताना राजा से सहा न गया। अन्धकार है, रानी अब नग्न न देख सकेगी, यह सोचकर वे तलवार लेकर गन्धर्वों के पीछे दौड़े। उसी क्षण गन्धर्वों ने आकाश में अत्यन्त उज्ज्वल विद्युत् प्रकट कर दी, और उसके प्रकाश में राजा को वस्त्रहीन देखकर, प्रतिज्ञा टूट जाने से, उर्वशी तुरन्त वहाँ से चली गई। मेष वहीं छोड़कर गन्धर्व स्वर्ग लौट गए।
मेष लेकर लौटे राजा ने शयनागार में उर्वशी को न पाया, तो वस्त्रहीन अवस्था में ही पागल-से वन-वन भटकने लगे। घूमते-घूमते एक दिन कुरुक्षेत्र में उन्होंने एक कमल-सरोवर में चार अन्य अप्सराओं के साथ उर्वशी को देखा। “ठहरिए, हे हृदय की निष्ठुर” ऐसे अनेक वचन वे कहने लगे। उर्वशी ने कहा, “इन उन्मत्त-सी चेष्टाओं से कोई लाभ नहीं। इस समय मैं गर्भवती हूँ; एक वर्ष बाद आइए, तब आप को एक पुत्र मिलेगा और एक रात मैं आप के साथ भी रहूँगी।”
वर्ष बीतने पर राजा वहाँ आए। उर्वशी ने उन्हें आयु नामक पुत्र दिया और एक रात साथ रहकर पाँच और पुत्रों का गर्भ धारण किया, तथा कहा कि उनके प्रेम के कारण सब गन्धर्व राजा को वर देना चाहते हैं। राजा बोले, “मुझे उर्वशी के सहवास के अतिरिक्त और कुछ पाना शेष नहीं।” तब गन्धर्वों ने उन्हें एक अग्निस्थाली देकर कहा, “इस अग्नि को वैदिक विधि से गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिण, इन तीन भागों में बाँटकर उर्वशी के सहवास की कामना से यजन कीजिए; तो अवश्य अपना अभीष्ट पा लेंगे।”
राजा वह स्थाली लेकर चले, किन्तु मार्ग में वन के भीतर सोचा कि मैं कैसा मूर्ख हूँ, उर्वशी को नहीं, इस स्थाली को ले आया; और उसे वहीं छोड़कर नगर लौट आए। आधी रात बीते जब नींद खुली तो पछताकर वे उसे लाने गए, पर स्थाली वहाँ न थी। उसके स्थान पर एक शमीगर्भ पीपल का वृक्ष उग आया था। राजा उसी अश्वत्थ को नगर ले आए, उससे अरणि बनाई, गायत्री के अक्षरों के अनुसार उसे नापकर अग्नि मथी, और तीन प्रकार के अग्नियों में हवन कर उर्वशी के सालोक्य का फल पाया। इस प्रकार वे फिर उर्वशी से कभी विलग न हुए। पूर्वकाल में एक ही अग्नि थी; इसी एक से इस मन्वन्तर में तीन प्रकार के अग्नियों का प्रचार हुआ।
जह्नु और आगे का वंश
पुरूरवा के छः पुत्र हुए, आयु, अमावसु, विश्वावसु, श्रुतायु, शतायु और अयुतायु। अमावसु की परम्परा में जह्नु हुए, जिन्होंने अपनी समस्त यज्ञशाला को गंगा के जल से डूबी देखकर, क्रोध से आँखें लाल कर, समाधि द्वारा भगवान् को अपने में स्थापित कर सारी गंगा पी ली। तब देवर्षियों ने उन्हें प्रसन्न किया और गंगा को उनकी पुत्री-रूप में लौटा लिया।
इसी वंश में आगे कुश हुए। कुश के चार पुत्र हुए, कुशाम्ब, कुशनाभ, अधूर्तरजा और वसु; इनमें कुशाम्ब ने इन्द्र के समान पुत्र की कामना से तपस्या की। उसका उग्र तप देखकर, कहीं अपने समान कोई न हो जाए इस भय से, इन्द्र स्वयं ही उनके पुत्र हो गए; वे गाधि नाम से कौशिक कहलाए। गाधि ने सत्यवती नामक कन्या को जन्म दिया, जिसे भृगुपुत्र ऋचीक ने माँगा। अत्यन्त क्रोधी और वृद्ध ब्राह्मण को कन्या न देने की इच्छा से गाधि ने कन्या-शुल्क में चन्द्रमा-से उज्ज्वल और पवन-से वेगवान् एक हजार श्यामकर्ण घोड़े माँगे, और ऋचीक ने वरुण से वैसे ही घोड़े लाकर दे दिए; तब उन्होंने सत्यवती से विवाह किया। आगे सन्तान की कामना से ऋचीक ने सत्यवती के लिये चरु तैयार किया, और उससे प्रसन्न होकर उसकी माता के लिये भी श्रेष्ठ क्षत्रिय पुत्र के निमित्त दूसरा चरु बनाया; एक में ब्राह्मणोचित शान्ति और ज्ञान भरा, दूसरे में क्षत्रियोचित बल और पराक्रम।
किन्तु चरु के प्रयोग के समय माता ने पुत्री से कहा, “बेटी! सब लोग अपने लिये ही सबसे गुणवान् पुत्र चाहते हैं। अतः अपना चरु मुझे दे दीजिए और मेरा ले लीजिए; मेरे पुत्र को तो सारी पृथ्वी का शासन करना है, ब्राह्मण-बालक को बल, पराक्रम और ऐश्वर्य से क्या काम?” यह सुनकर सत्यवती ने अपना चरु माता को दे दिया। लौटकर ऋचीक ने यह जान लिया और कहा कि चरुओं की अदला-बदली से अब सत्यवती का पुत्र क्षत्रिय-सा प्रचण्ड होगा और माता का पुत्र शान्तिप्रिय ब्राह्मण। सत्यवती के प्रार्थना करने पर उन्होंने इतना किया कि यह प्रचण्डता पुत्र में नहीं, पौत्र में उतरेगी। आगे सत्यवती ने जमदग्नि को जन्म दिया और उनकी माता ने विश्वामित्र को; सत्यवती स्वयं कौशिकी नामक नदी हो गईं। जमदग्नि और रेणुका से समस्त क्षत्रियों का संहार करनेवाले भगवान् परशुराम प्रकट हुए, जो नारायण के अंश थे; और विश्वामित्र को देवताओं ने भृगुवंशी शुनःशेप को पुत्र-रूप में दिया; उसके बाद उनके देवरात, मधुच्छन्द, धनञ्जय, कृतदेव, अष्टक आदि और पुत्र हुए, जिनसे अनेक कौशिकगोत्रीय वंश चले।
आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)