मैत्रेय के मन में एक जिज्ञासा उठी। पराशरजी अभी-अभी कह चुके थे कि भृगु और ख्याति की पुत्री के रूप में लक्ष्मीजी का प्रादुर्भाव (manifestation) हुआ। मैत्रेय ने हाथ जोड़कर पूछा, “भगवन्! यह भी तो सुना जाता है कि लक्ष्मीजी अमृत-मन्थन के समय क्षीर-सागर से प्रकट हुई थीं। फिर आप उन्हें भृगु की कन्या कैसे कहते हैं?” पराशरजी हलके-से मुसकराए। बोले, “हे मैत्रेय! सुनिए। यह कथा मैंने भी मरीचि-नन्दन ऋषि के मुख से सुनी थी।
एक बार भगवान् शंकर के अंश से प्रकट हुए दुर्वासाजी पृथ्वी पर विचर रहे थे। घूमते-घूमते उन्होंने एक विद्याधरी के हाथ में सन्तानक-पुष्पों की एक दिव्य माला देखी, जिसकी गन्ध से सारा वन महक उठा था। मुनि ने वह माला माँगी, और उस बड़ी आँखोंवाली विद्याधरी ने आदरपूर्वक प्रणाम कर वह उन्हें दे दी। उसे सिर पर धारण किए मुनि आगे बढ़े ही थे कि सामने ऐरावत पर चढ़े, देवताओं के बीच आते हुए देवराज इन्द्र दिखाई पड़े।
दुर्वासाजी ने वह भौंरों से गुंजायमान माला अपने सिर से उतारकर इन्द्र की ओर उछाल दी। इन्द्र ने उसे लेकर ऐरावत के मस्तक पर रख दिया, पर उस मदमत्त हाथी ने गन्ध से खिंचकर सूँड़ से उसे उठाया और धरती पर फेंक दिया। यह देखते ही मुनि क्रोध से भर उठे। बोले, “अरे देवराज! ऐश्वर्य के मद ने आपकी बुद्धि हर ली। हमारी दी हुई इस शोभा के धाम माला को आपने तिनके-सा फेंक दिया। न प्रणाम किया, न एक शब्द का आदर। अतः आज से आपका यह त्रिभुवन श्रीहीन हो जाए।”
इन्द्र ऐरावत से उतरकर मुनि को मनाने लगे, पर दुर्वासाजी ने कहा, “हमारे हृदय में क्षमा का वास नहीं। हम वे मुनि नहीं जो बार-बार मनाने पर पिघल जाएँ। जाइए।” इतना कहकर वे चल दिए, और इन्द्र भारी मन से अमरावती लौट आए।
तीनों लोक श्रीहीन
उसी क्षण से तीनों लोक श्री से रीतने लगे। वृक्ष-लता सूखने लगे, यज्ञ बन्द हो गए, तपस्वियों ने तप छोड़ दिया, दान–धर्म में किसी का मन न रहा। लोग लोभ के वश होकर सत्त्वहीन हो गए। और जहाँ सत्त्व नहीं, वहाँ लक्ष्मी भला कहाँ ठहरतीं। श्रीहीन तथा निर्बल देवताओं पर दैत्यों ने चढ़ाई कर दी और उन्हें रण में परास्त कर दिया।
हारे हुए देवगण अग्निदेव को आगे कर पितामह ब्रह्माजी की शरण में गए। सारा वृत्तान्त सुनकर ब्रह्माजी बोले, “हे देवगण! आप उन परावरेश्वर भगवान् विष्णु की शरण में जाइए, जो इस संसार की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के कारण होकर भी स्वयं निर्विकार हैं। वे ही शरणागतवत्सल आपका मंगल करेंगे।” ऐसा कहकर ब्रह्माजी स्वयं देवताओं को साथ लेकर क्षीर-सागर के उत्तर तट पर पहुँचे और वहाँ भगवान् की स्तुति की। स्तुति से प्रसन्न होकर शंख-चक्र-गदा धारण किए भगवान् उनके सम्मुख प्रकट हुए। उस अपूर्व तेज-राशि को देख देवगण नतमस्तक हो उठे।
क्षीर-सागर का मन्थन
भगवान् ने कहा, “हे देवगण! मैं आपके तेज को फिर बढ़ाऊँगा। जैसा कहता हूँ वैसा कीजिए। दैत्यों के साथ मिलकर समस्त ओषधियाँ लाकर क्षीर-सागर में डालिए। मन्दराचल की मथानी और वासुकि नाग की नेती बनाकर, मेरी सहायता से उसे मथिए और अमृत निकालिए। दैत्यों से कहिए कि इस काम में हाथ बँटाने से फल में उनका भी बराबर का भाग होगा। किन्तु मैं ऐसी युक्ति करूँगा कि अमृत आपके बैरियों को न मिलेगा, उनके हिस्से केवल मन्थन का श्रम ही आएगा।”
देवताओं ने सन्धि कर ली, और दैत्य–दानव भी जुट गए। शरद् के आकाश-सी निर्मल क्षीर-सागर की जलराशि में नाना ओषधियाँ डाली गईं। मन्दराचल मथानी बना, वासुकि नेती बने, और बड़े वेग से मन्थन आरम्भ हुआ। एक ओर देवता वासुकि की पूँछ थामे थे, दूसरी ओर दैत्य उसके मुख की ओर। वासुकि के मुख से निकलती विष-मिली अग्नि की फुफकार दैत्यों को झुलसाती रही, और पूँछ की ओर बरसते मेघ देवताओं का बल बढ़ाते रहे।
भगवान् ने स्वयं कच्छप का रूप धरकर, समुद्र में डूबते मन्दराचल को अपनी पीठ पर आधार दिया। फिर एक रूप से देवताओं में मिलकर और दूसरे रूप से दैत्यों में मिलकर वे नागराज को खींचने लगे, और एक विशाल रूप से ऊपर से पर्वत को दबाए रहे। इस प्रकार अपने ही अनेक रूपों से उन्होंने सारा भार सँभाल लिया।
लक्ष्मीजी का प्रादुर्भाव (manifestation)
मथते-मथते सबसे पहले हवि की आश्रयरूपा, सुरभि नाम की कामधेनु प्रकट हुई। फिर मद से घूमती आँखोंवाली वारुणी देवी निकलीं। फिर तीनों लोकों को महकानेवाला पारिजात वृक्ष उठा, और उसके पीछे रूप-गुण से भरी अप्सराओं का समूह आया। तब शीतल किरणोंवाला चन्द्रमा प्रकट हुआ, जिसे महादेवजी ने ग्रहण किया। सागर से जो विष उठा, उसे नागों ने ले लिया। इसके पश्चात् श्वेत वस्त्र धारण किए, अमृत से भरा कमण्डलु लिए साक्षात् धन्वन्तरिजी जल से बाहर आए। यह देख समस्त देव और दानव प्रसन्न हो उठे।
तभी क्षीर-सागर के जल से, खिले हुए कमल पर विराजमान, हाथों में कमल-पुष्प लिए, स्फुट-कान्तिमयी श्रीलक्ष्मीदेवी प्रकट हुईं। महर्षिगण श्रीसूक्त से उनकी स्तुति करने लगे। विश्वावसु आदि गन्धर्व सामने गान करने लगे, घृताची आदि अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। गंगा आदि नदियाँ उन्हें स्नान कराने स्वयं उपस्थित हुईं, और दिग्गजों ने सुवर्ण-कलशों में भरे निर्मल जल से सर्वलोक-महेश्वरी का अभिषेक किया। क्षीर-सागर ने उन्हें कभी न मुरझानेवाले कमलों की माला दी, और विश्वकर्मा ने उनके अंग-अंग में दिव्य आभूषण सजाए। इस प्रकार दिव्य माला-वस्त्र और आभूषणों से विभूषित होकर, समस्त देवताओं के देखते-देखते श्रीलक्ष्मीजी भगवान् विष्णु के वक्षःस्थल पर जा विराजीं।
लक्ष्मी को हरि के हृदय पर विराजमान देख देवताओं को अपार आनन्द हुआ, पर लक्ष्मी से त्यागे गए विप्रचित्ति आदि दैत्य व्याकुल हो उठे। उन्होंने धन्वन्तरि के हाथ से वह अमृत-कमण्डलु छीन लिया। तब भगवान् विष्णु ने एक अपूर्व स्त्री का रूप धारण कर, अपनी माया से दानवों को मोहित किया और उनसे वह कमण्डलु लेकर देवताओं को दे दिया। इन्द्र आदि देवता अमृत पी गए। तीखे शस्त्र लिए दैत्य उन पर टूट पड़े, पर अमृत से बलवान् हुए देवताओं ने उनकी सारी सेना काट डाली; जो बची, वह दिशाओं में और पाताल में भाग गई। सूर्य फिर अपने मार्ग पर चलने लगे, अग्नि प्रज्वलित हो उठे, प्राणियों की धर्म में प्रवृत्ति हुई, और तीनों लोक पुनः श्री-सम्पन्न हो गए।
लक्ष्मी का वरदान
स्वर्ग का राज्य पुनः पाकर सिंहासन पर बैठे इन्द्र ने पद्महस्ता श्रीलक्ष्मीजी की स्तुति की, “हे समस्त लोकों की जननी! कमल के समान नेत्रोंवाली, विष्णु के वक्षःस्थल पर विराजमान देवी! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आप ही सिद्धि हैं, स्वधा हैं, स्वाहा और सुधा हैं; आप ही सन्ध्या, रात्रि, प्रभा, मेधा, श्रद्धा और सरस्वती हैं। आपके बिना पुरुष निर्गुण हो जाता है; और आपकी कृपा-दृष्टि हो, तो गुणहीन भी शीलवान् और ऐश्वर्यवान् हो जाता है। हे माता! हमारे कोश, गृह, शरीर और स्वजनों को कभी न त्यागिए।”
प्रसन्न होकर लक्ष्मीजी बोलीं, “हे देवेश्वर! मैं आपकी इस स्तुति से अति प्रसन्न हूँ। जो अभीष्ट हो, वह वर माँग लीजिए।” इन्द्र ने दो वर माँगे, “पहला यह कि आप इस त्रिलोकी को कभी न त्यागें; और दूसरा यह कि जो कोई इस स्तोत्र से आपकी स्तुति करे, उसे भी आप कभी न त्यागें।” लक्ष्मीजी ने दोनों वर दे दिए, “मैं इस त्रिलोकी को कभी न छोड़ूँगी, और जो प्रातः तथा सायं इस स्तोत्र से मेरी स्तुति करेगा, उससे भी मैं कभी विमुख न होऊँगी।”
पराशरजी बोले, “हे मैत्रेय! अब आपकी शंका का उत्तर सुनिए। लक्ष्मीजी नित्य हैं। पहले वे भृगु की पुत्री ख्याति के रूप में प्रकट हुईं, फिर अमृत-मन्थन के समय क्षीर-सागर से। जब-जब जगत्पति विष्णु अवतार लेते हैं, तब-तब लक्ष्मी उनके साथ रहती हैं। भगवान् जब आदित्य हुए तब वे कमल से प्रकट होकर पद्मा कहलाईं; परशुराम हुए तब पृथ्वी हुईं; राम हुए तब सीता, और श्रीकृष्ण हुए तब रुक्मिणी। जो मनुष्य लक्ष्मीजी के इस प्रादुर्भाव (manifestation) की कथा को सुनता या पढ़ता है, उसके घर से तीनों पीढ़ियों तक लक्ष्मी कभी नहीं जातीं, और जहाँ यह स्तोत्र पढ़ा जाता है वहाँ दरिद्रता कभी नहीं ठहर पाती।”
आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)