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ययाति की कथा

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राजा रजि और इन्द्रपद

चन्द्रवंश की इसी धारा में, आयु के पुत्रों में एक हुए राजा रजि, जिनके पाँच सौ पुत्र थे और सब के सब अतुल बल और पराक्रम से भरे। उन्हीं दिनों देवताओं और दैत्यों में फिर एक बार संग्राम ठनने को था। दोनों पक्ष अपनी-अपनी विजय के लिये आतुर थे, और अन्त में दोनों ही ब्रह्मा के पास जाकर पूछने लगे, “भगवन्, हम दोनों में कौन जीतेगा?” ब्रह्मा ने कहा, “जिस पक्ष की ओर से राजा रजि शस्त्र उठाकर लड़ेंगे, विजय उसी की होगी।”

यह सुनते ही दैत्य पहले रजि के पास पहुँचे। रजि ने कहा, “यदि जीतने पर मैं आप लोगों का इन्द्र हो सकूँ, तभी आप के पक्ष में लड़ूँ।” दैत्य बोले कि वे एक बात कहकर उसके विरुद्ध दूसरा आचरण नहीं करते; उनके इन्द्र तो प्रह्लाद हैं, और उन्हीं के लिये वे यह सारा उद्योग कर रहे हैं। इतना कहकर वे लौट गए। फिर देवता आए और रजि ने उनसे भी वही शर्त रखी। देवताओं ने, “आप ही हमारे इन्द्र होंगे,” यह कहकर उनकी बात स्वीकार कर ली। तब रजि ने देवसेना की सहायता कर सम्पूर्ण दैत्यसेना का नाश कर दिया।

विजय के बाद इन्द्र ने एक विचित्र चाल चली। उन्होंने रजि के दोनों चरण अपने मस्तक पर रखकर कहा, “आप भय से रक्षा और अन्न देनेवाले हैं, इसलिए सब लोकों में उत्तम हैं; और मैं त्रिलोकेन्द्र आप का पुत्र हुआ।” राजा इस मीठी विनती पर हँस पड़े और बोले कि अच्छा, ऐसा ही सही, क्योंकि शत्रु तक की चाटु-वाणी और अनुनय का उल्लंघन उचित नहीं, फिर अपने पक्ष की तो बात ही क्या। ऐसा कहकर वे अपनी राजधानी लौट गए, और इन्द्र अपने पद पर बने रहे।

पीछे देवर्षि नारद के बहकाने पर रजि के पाँच सौ पुत्रों ने इन्द्र से अपने पिता का पद माँगा। न मिलने पर उन बलवानों ने इन्द्र को ही जीतकर स्वयं इन्द्रपद भोगना आरम्भ कर दिया। बहुत काल बीत गया; तीनों लोकों के यज्ञ-भाग से वंचित इन्द्र एकान्त में उदास बैठे थे, तब बृहस्पति ने उन्हें देखा और सहायता का वचन दिया। बृहस्पति ने अभिचारकर्म से रजि-पुत्रों की बुद्धि को मोहित कर दिया; वे ब्राह्मण-विरोधी, धर्मत्यागी और वेद-विमुख हो गए। धर्म से गिरते ही इन्द्र ने उन्हें मार डाला और फिर अपने पद पर आरूढ़ हो गए। कहते हैं, इन्द्र के इस गिरकर फिर उठने के प्रसंग को जो सुनता है, वह अपने पद से कभी नहीं गिरता।

ययाति का शाप

अब उसी चन्द्रवंश की एक और शाखा की सुनिए, नहुष-वंश की। नहुष के छः महाबली और विक्रमशाली पुत्र थे, यति, ययाति, संयाति, आयति, वियति और कृति। इनमें यति ने राज्य की इच्छा ही न की, इसलिए राजपद ययाति को मिला। ययाति ने दो विवाह किए, एक शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से और दूसरा दैत्यराज वृषपर्वा की कन्या शर्मिष्ठा से। देवयानी से यदु और तुर्वसु उत्पन्न हुए, और शर्मिष्ठा से द्रुह्यु, अनु और पूरु, जिनके वंश आगे सारी पृथ्वी पर फैले।

यही कथा महाभारत और श्रीमद्भागवत में विस्तार से आती है, किन्तु विष्णुपुराण देवयानी और शर्मिष्ठा का प्रसंग बहुत संक्षेप में कहकर सीधे उस बोध पर आ जाता है जो इस कथा का प्राण है।

हुआ यह कि शुक्राचार्य के शाप से ययाति को असमय ही वृद्धावस्था ने घेर लिया। भरी जवानी में ही देह जर्जर हो चली, केश पक गए, और भोग की सारी इच्छाएँ अधूरी रह गईं। पीछे शुक्र प्रसन्न हुए तो उन्होंने यह छूट दे दी कि ययाति चाहें तो यह बुढ़ापा किसी और को देकर बदले में उसका यौवन ले सकते हैं। तब ययाति ने अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु को बुलाकर कहा, “वत्स, आप के नाना के शाप से मुझे असमय ही बुढ़ापे ने घेर लिया है; अब उन्हीं की कृपा से मैं इसे आप को देना चाहता हूँ। मैं अभी विषय-भोगों से तृप्त नहीं हुआ, इसलिए एक हजार वर्ष तक आप के यौवन से इन्हें भोगना चाहता हूँ। इसमें आनाकानी न कीजिए।”

किन्तु यदु ने बुढ़ापा लेना स्वीकार न किया। पिता ने रुष्ट होकर शाप दिया कि उसकी सन्तान राज्य-पद के योग्य न होगी। इसी प्रकार ययाति ने तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु से भी अपना यौवन माँगा, और एक-एक कर तीनों ने मना कर दिया; पिता ने तीनों को शाप दे दिया। अन्त में सबसे छोटे, शर्मिष्ठा के पुत्र पूरु ने बड़ी नम्रता और आदर से पिता को प्रणाम कर कहा, “यह तो मेरे ऊपर आप का महान् अनुग्रह है,” और सहर्ष अपना यौवन देकर पिता का बुढ़ापा अपने ऊपर ले लिया।

भोग की व्यर्थता

पूरु का यौवन पाकर ययाति फिर तरुण हो उठे। उन्होंने यथेच्छ, यथासमय और धर्मपूर्वक विषयों को भोगा और प्रजा का भी भली प्रकार पालन किया। अप्सरा विश्वाची और देवयानी के साथ भाँति-भाँति के भोग भोगते हुए वे सोचते कि अब कामनाओं का अन्त कर ही डालूँगा; पर जितना भोगते, कामनाएँ उतनी ही और प्रिय लगने लगतीं। पूरे एक हजार वर्ष इसी में बीत गए, और तृष्णा फिर भी वैसी की वैसी बनी रही। तब जाकर उनके भीतर से यह उद्गार फूट पड़ा।

“भोग से तृष्णा कभी शान्त नहीं होती; घी की आहुति पाकर अग्नि के समान वह और भड़कती ही जाती है। सम्पूर्ण पृथ्वी के धान्य, यव, सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ भी एक मनुष्य के लिये पर्याप्त नहीं, यह जानकर तृष्णा को त्याग देना चाहिए। जो पुरुष किसी प्राणी के प्रति पापमयी भावना नहीं रखता, उस समदर्शी के लिये सब दिशाएँ सुखमयी हो जाती हैं। अवस्था के जीर्ण होने पर केश और दाँत तो जीर्ण हो जाते हैं, किन्तु धन और जीवन की आशा जीर्ण नहीं होती। विषयों में आसक्त रहते मेरे एक हजार वर्ष बीत गए, फिर भी नित्य उनमें मेरी नई कामना उठती रहती है। अब इन्हें छोड़कर, अपने चित्त को भगवान् में स्थिर कर, निर्द्वन्द्व और निर्मम होकर मैं वन में मृगों के साथ विचरूँगा।”

ऐसा कहकर ययाति ने पूरु से अपना बुढ़ापा वापस ले लिया और उसका यौवन उसे लौटा दिया। फिर सबसे छोटे पूरु को ही सम्पूर्ण पृथ्वी के राज्य पर अभिषिक्त किया, और शेष पुत्रों को दिशाओं का मण्डलिक राजा बना दिया, तुर्वसु को दक्षिण-पूर्व, द्रुह्यु को पश्चिम, यदु को दक्षिण और अनु को उत्तर। इतना कर, सब कुछ छोड़कर, वे स्वयं तप के लिये वन चले गए।

आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)