महर्षि मैत्रेय ने पराशरजी से पूछा, “गुरुदेव! आपने पृथ्वी, समुद्र, सूर्य और ग्रहों की व्यवस्था कही, देव-सृष्टि तथा ध्रुव और प्रह्लाद के चरित्र सुनाए; अब मुझे मन्वन्तरों का वर्णन सुनाइए, एक-एक कल्प में जो मनु, इन्द्र, देवता और सप्तर्षि होते हैं, उन सबका।” पराशरजी बोले, “सुनिए, जो मन्वन्तर बीत चुके और जो आगे आएँगे, उन सबको क्रम से कहता हूँ।”
बीते और आने वाले मनु
सृष्टि के आरम्भ से अब तक छह मनु बीत चुके हैं, स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत और चाक्षुष। इस समय सातवाँ, सूर्यपुत्र वैवस्वत मनु का मन्वन्तर चल रहा है। हर मन्वन्तर के अपने इन्द्र, अपने देवगण, अपने सप्तर्षि और अपने मनुपुत्र राजा होते हैं। स्वारोचिष के समय इन्द्र विपश्चित् थे, पारावत और तुषित देवगण थे; उत्तम के समय इन्द्र सुशान्ति थे और वसिष्ठ के सात पुत्र सप्तर्षि; तामस के समय शिबि इन्द्र थे; रैवत के समय विभु; और चाक्षुष के समय मनोजव इन्द्र थे। इनमें स्वारोचिष, उत्तम, तामस और रैवत, ये चारों राजा प्रियव्रत के वंशधर कहे जाते हैं, जिन्होंने तपस्या से भगवान् विष्णु की आराधना करके यह मन्वन्तराधिपत्य पाया। इस वैवस्वत मन्वन्तर में वसिष्ठ, काश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भरद्वाज सप्तर्षि हैं, पुरन्दर इन्द्र हैं, और इक्ष्वाकु, नृग, धृष्ट आदि वैवस्वत मनु के नौ पुत्र लोकों के अधिपति हुए।
आगे भी सात मन्वन्तर आएँगे, और उनकी जड़ में एक कथा है। सूर्य की पत्नी संज्ञा उनका तेज न सह सकीं, तो अपनी छाया को अपने स्थान पर बिठाकर तपस्या करने वन चली गयीं। छाया से सूर्य के जो पुत्र हुए, उनमें एक मनु था; अपने बड़े भाई वैवस्वत के सवर्ण होने के कारण वह सावर्णि कहलाया। यही सावर्णि आठवाँ मनु होगा; उस समय पाताल-लोक में रहने वाले विरोचन का पुत्र बलि, भगवान् की कृपा से, इन्द्र होगा। इसके बाद नवाँ दक्षसावर्णि, दसवाँ ब्रह्मसावर्णि, ग्यारहवाँ धर्मसावर्णि, बारहवाँ रुद्रपुत्र सावर्णि, तेरहवाँ रुचि और चौदहवाँ भौम, ये मनु होंगे, और हर एक के अपने इन्द्र, देवगण और सप्तर्षि होंगे। इस प्रकार चौदह मन्वन्तर मिलकर एक सहस्र युग के होते हैं, और इतना ही ब्रह्माजी का एक दिन; उतनी ही बड़ी उनकी रात होती है, जब भगवान् जनार्दन सम्पूर्ण त्रिलोकी को अपनी माया में समेटकर शेष-शय्या पर शयन करते हैं, और फिर जागकर पुनः सृष्टि रचते हैं।
हर मन्वन्तर में भगवान् की मूर्ति
समस्त मन्वन्तरों में जगत् की स्थिति भगवान् विष्णु की सत्त्वप्रधान शक्ति ही सँभालती है, और हर मन्वन्तर में वे एक मूर्ति के रूप में प्रकट होते हैं। स्वायम्भुव मन्वन्तर में आकूति से यज्ञपुरुष के रूप में, स्वारोचिष में अजित होकर तुषित देवों के साथ, उत्तम में सत्य नाम से, तामस में हरि होकर, रैवत में सम्भूति नाम से, चाक्षुष में वैकुण्ठ के रूप में, और इस वैवस्वत मन्वन्तर में कश्यप द्वारा अदिति से वामन बनकर, जिन्होंने अपने तीन डगों से समस्त लोक जीतकर यह निष्कण्टक त्रिलोकी इन्द्र को दे दी। इसी शक्ति से सारा विश्व व्याप्त है; ‘विश्’ धातु का अर्थ है प्रवेश करना, इसीलिए वे ‘विष्णु’ कहलाते हैं। देवता, मनु, सप्तर्षि, मनुपुत्र और इन्द्र, ये सब उन्हीं की विभूतियाँ हैं।
हर युग के व्यास
जैसे हर सत्ययुग के आरम्भ में मनु धर्म-मर्यादा स्थापित करने प्रकट होते हैं, वैसे ही हर द्वापर में भगवान् विष्णु वेदव्यास का रूप धारण कर वेद का विभाग करते हैं। मनुष्यों का बल, वीर्य और तेज घटता देख, उनके हित के लिए वे एक वेद के अनेक भेद कर देते हैं। इस वैवस्वत मन्वन्तर में अब तक अट्ठाईस बार यह हो चुका है, अर्थात् अट्ठाईस व्यास बीत चुके। पहले द्वापर में स्वयं ब्रह्माजी ने वेद बाँटा; फिर क्रमशः प्रजापति, शुक्राचार्य, बृहस्पति, सूर्य, मृत्यु, इन्द्र, वसिष्ठ, सारस्वत, त्रिधामा और आगे और भी व्यास हुए। इसी क्रम में तेईसवें सोमशुष्मवंशी तृणबिन्दु हुए, फिर भृगुवंशी ऋक्ष, जो वाल्मीकि कहलाए; तदनन्तर पराशरजी के पिता शक्ति व्यास हुए, फिर स्वयं पराशर, फिर जातुकर्ण, और अट्ठाईसवें उनके पुत्र कृष्णद्वैपायन, जिन्हें साक्षात् नारायण ही समझना चाहिए; उनके सिवा भला महाभारत का रचयिता और कौन हो सकता है? आने वाले द्वापर में द्रोणपुत्र अश्वत्थामा वेदव्यास होंगे।
वेद का बँटवारा
पूर्वकाल में वेद एक ही था, एक लाख मन्त्रों वाला, चार पादों से युक्त। कृष्णद्वैपायन व्यास ने ब्रह्माजी की प्रेरणा से उसके चार विभाग किए और चार शिष्यों को सौंपे; ऋग्वेद पैल को, यजुर्वेद वैशम्पायन को, सामवेद जैमिनि को और अथर्ववेद सुमन्तु को; तथा इतिहास और पुराण के लिए सूतजाति के रोमहर्षण को ग्रहण किया। फिर इन शिष्यों और प्रशिष्यों ने अपनी-अपनी शाखाओं के सैकड़ों भेद किए, और वेदरूपी वृक्ष का मानो एक वन ही उग आया। यजुर्वेद के साथ एक घटना जुड़ी है। वैशम्पायन के शिष्य याज्ञवल्क्य ने एक बार गुरु का आदेश न माना, और गुरु ने रुष्ट होकर कहा, “जो कुछ आपने मुझसे पढ़ा है, वह सब लौटा दीजिए।” याज्ञवल्क्य ने अपने पढ़े हुए यजुः को रुधिर से सने रूप में उगल दिया और चले गए। अन्य शिष्यों ने तित्तिर पक्षी बनकर उन शाखाओं को चुन लिया, इसीलिए वे तैत्तिरीय कहलाईं। फिर याज्ञवल्क्य ने सूर्य की आराधना कर नयी यजुः-शाखाएँ पायीं, जो वाजि नाम से विख्यात हुईं।
अठारह पुराण और चौदह विद्याएँ
सामवेद को जैमिनि से आगे उनके पुत्र और पौत्रों ने बाँटा, और सहस्रों शाखाएँ फैलीं; अथर्ववेद के भी सुमन्तु से लेकर कबन्ध, देवदर्श और पथ्य तक अनेक भेद हुए, जिनमें नक्षत्रकल्प, वेदकल्प, संहिताकल्प, आंगिरसकल्प और शान्तिकल्प, ये पाँच कल्प श्रेष्ठ माने गए। इसके बाद व्यासजी ने आख्यान, उपाख्यान, गाथा और कल्पशुद्धि से युक्त पुराण-संहिता रची और अपने शिष्य रोमहर्षण को पढ़ायी; रोमहर्षण के छह शिष्यों ने उसे और विस्तार दिया। इन्हीं संहिताओं के सार से पराशरजी ने यह विष्णुपुराण-संहिता बनायी।
पुराणों की गिनती अठारह है, और उनमें सबसे प्राचीन ब्रह्मपुराण है: ब्राह्म, पाद्म, वैष्णव, शैव, भागवत, नारदीय, मार्कण्डेय, आग्नेय, भविष्यत्, ब्रह्मवैवर्त, लैंग, वाराह, स्कान्द, वामन, कौर्म, मात्स्य, गारुड और ब्रह्माण्ड। इनके अतिरिक्त अनेक उपपुराण भी हैं। इन सबमें सृष्टि, प्रलय, देवताओं और भिन्न-भिन्न राजवंशों के चरित्र वर्णित हैं; और जिस पुराण को पराशरजी सुना रहे थे, वह पाद्म के बाद कहा गया वैष्णव महापुराण है, जिसमें सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश और मन्वन्तर, सर्वत्र केवल विष्णु का ही वर्णन है।
अन्त में विद्याओं की गिनती भी सुन लीजिए। छह वेदांग, चार वेद, मीमांसा, न्याय, पुराण और धर्मशास्त्र, ये चौदह विद्याएँ हैं; इनमें आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद और अर्थशास्त्र मिला लें तो अठारह हो जाती हैं। और ऋषियों के तीन भेद हैं, ब्रह्मर्षि, देवर्षि और राजर्षि। प्रजापति ब्रह्मा से प्रकट हुई श्रुति तो नित्य है; ये सब शाखा-भेद तो उसी के विकल्प-मात्र हैं। इस प्रकार पराशरजी ने मैत्रेय को मन्वन्तरों का, युग-युग के व्यासों का और वेद-शाखाओं के बँटवारे का सारा रहस्य कह सुनाया।
आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)