Lulla Family

सूर्यवंश: सौभरि, त्रिशंकु और सगर

पढ़ने में लगभग 10 मिनट · 1,619 शब्द

सूर्यवंश का आरम्भ

मैत्रेय जी ने कहा, “हे भगवन्! अब मुझे राजाओं के वंश का विवरण सुनने की इच्छा है।” पराशर जी बोले, “हे मैत्रेय! जिस मनुवंश का आदिपुरुष स्वयं ब्रह्मा जी हैं, अनेक यज्ञकर्ता और धैर्यशाली भूपालों से सुशोभित उस वंश की कथा सुनिए। सकल संसार के आदिकारण भगवान् विष्णु के मूर्तरूप हिरण्यगर्भ ब्रह्मा हुए; ब्रह्मा के दाहिने अँगूठे से दक्ष प्रजापति, दक्ष से अदिति, अदिति से विवस्वान् और विवस्वान् से मनु का जन्म हुआ। मनु के इक्ष्वाकु आदि दस पुत्र हुए।

“पुत्र की कामना से मनु ने मित्र और वरुण का यज्ञ किया, किन्तु होता के संकल्प में विपर्यय हो जाने से उनके ‘इला’ नामक कन्या हुई। मित्र-वरुण की कृपा से वही इला ‘सुद्युम्न’ नामक पुत्र हो गयी; फिर महादेव के कोप से वह स्त्री होकर चन्द्रमा के पुत्र बुध के आश्रम के निकट घूमने लगी। बुध से उसके पुरूरवा नामक पुत्र हुआ, और महर्षियों की आराधना से भगवान् ने सुद्युम्न को पुनः पुरुषत्व दिया। इसी वंश में आगे चलकर चक्रवर्ती मरुत्त हुए, जिनके विषय में आज भी यह श्लोक गाया जाता है कि मरुत्त के जैसा यज्ञ इस पृथ्वी पर और किसका हुआ, जिसके सभी याज्ञिक पात्र सुवर्णमय और अति सुन्दर थे, जिसमें इन्द्र सोमरस से और ब्राह्मण दक्षिणा से तृप्त हुए, मरुद्गण परोसनेवाले और देवगण सदस्य थे।”

इसी वंश की एक शाखा में रैवत ककुद्मी हुए, जो कन्या रेवती के योग्य वर पूछने ब्रह्मलोक गये। वहाँ गन्धर्वों का गान सुनते अनेक युग बीत गये, पर उन्हें एक मुहूर्त-सा जान पड़ा। लौटने पर ब्रह्मा जी के कहने से उन्होंने रेवती का विवाह भगवान् विष्णु के अंश बलदेव से किया, जो उस समय द्वारका में विराजमान थे।

इक्ष्वाकु से ककुत्स्थ तक

मनु के छींकने पर उनकी नासिका से इक्ष्वाकु का जन्म हुआ। उनके सौ पुत्रों में विकुक्षि प्रधान थे। एक बार अष्टका-श्राद्ध के लिए इक्ष्वाकु ने विकुक्षि को मांस लाने भेजा। वन में थके-भूखे विकुक्षि उसमें से एक शशक खा गये, तो कुलपुरोहित वसिष्ठ ने उस मांस को अपवित्र बताया। इसी से विकुक्षि का नाम ‘शशाद’ पड़ा और पिता ने उन्हें त्याग दिया। उनके पुत्र पुरञ्जय के विषय में एक और कथा है। त्रेता में देवासुर-संग्राम में पराजित देवताओं की आराधना पर भगवान् विष्णु ने कहा कि वे पुरञ्जय के शरीर में अंश से प्रवेश कर असुरों का नाश करेंगे। पुरञ्जय ने शर्त रखी कि इन्द्र वृषभ बनें और वे उनके कन्धे पर बैठकर युद्ध करें। इन्द्र वृषभरूप हुए, भगवान् के तेज से पूर्ण पुरञ्जय ने उनके ककुद अर्थात् कन्धे पर बैठकर सब दैत्यों को मार डाला; इसी से उनका नाम ‘ककुत्स्थ’ पड़ा।

जल पीकर जन्मा मान्धाता

इसी वंश में आगे युवनाश्व हुए, जो निःसन्तान होने के कारण दुखी रहते थे। दयालु मुनियों ने उनके पुत्र के लिए यज्ञ किया और आधी रात को मन्त्रपूत जल का कलश वेदी पर रखकर सो गये। अत्यन्त प्यासे राजा ने जागकर, मुनियों को न जगाकर, वही जल स्वयं पी लिया। जागने पर मुनियों ने जाना कि जो जल रानी के पीने से पुत्र देता, वह राजा पी गये। समय आने पर राजा की दाहिनी कोख फाड़कर एक बालक निकला, पर राजा की मृत्यु नहीं हुई। “यह बालक किसका पान करेगा?” यह सुनकर देवराज इन्द्र ने अपनी तर्जनी उसके मुख में देकर कहा कि यह मुझे पिएगा। इसी से उसका नाम मान्धाता हुआ, और वह अमृतमयी अँगुली चूसकर एक ही दिन में बढ़ गया। आगे चलकर वह चक्रवर्ती मान्धाता सातों द्वीपों का अधिपति हुआ। उसकी रानी बिन्दुमती से पुरुकुत्स, अम्बरीष और मुचुकुन्द नामक तीन पुत्र तथा पचास कन्याएँ हुईं।

जल में तप करते सौभरि

उन्हीं दिनों सौभरि नामक एक महर्षि बारह वर्ष तक जल के भीतर तप करते रहे। उसी जल में सम्मद नामक एक अति दीर्घकाय मत्स्यराज रहता था, जिसकी बहुत सन्तान थी। उसके पुत्र, पौत्र और दौहित्र दिन-रात उसके साथ क्रीड़ा करते, और वह भी उनके सुकोमल स्पर्श से हर्षित होकर उनके साथ रमता रहता। यह देखकर समाधि छोड़ सौभरि सोचने लगे, “अहो! यह मत्स्य धन्य है, जो ऐसी अनिष्ट योनि में भी अपने पुत्र-पौत्रों के साथ निरन्तर रमता है और हमारे हृदय में भी स्पृहा जगा देता है। हम भी इसी प्रकार सन्तान के साथ ललित क्रीड़ाएँ करेंगे।” ऐसा सोचकर वे जल से निकल आये और गृहस्थ बनने की इच्छा से राजा मान्धाता के पास कन्या माँगने गये।

महर्षि ने कहा, “हे नरेन्द्र! मुझे अपनी एक कन्या दीजिए, मेरा प्रणय-भंग मत कीजिए। ककुत्स्थवंश में आया कोई प्रार्थी कभी खाली हाथ नहीं लौटता।” राजा उनके जराजीर्ण शरीर को देख शाप के भय से इनकार भी न कर सके और मन-ही-मन चिन्ता करने लगे। सौभरि उनकी दुविधा ताड़ गये और बोले, “यदि ऐसी बात है तो आज्ञा दीजिए कि मुझे अन्तःपुर में प्रवेश करा दिया जाय; जो कन्या स्वयं मुझे वरे, उसी को मैं ग्रहण करूँगा।” अन्तःपुर में प्रवेश करते ही सौभरि ने अपना रूप सिद्ध-गन्धर्वों से भी अधिक मनोहर बना लिया। अन्तःपुर-रक्षक की बात सुनकर पचासों राजकन्याएँ अनुराग से भर उठीं और ‘मैं ही इन्हें वरूँगी, मैं ही’ कहती हुई परस्पर विवाद करने लगीं। विवश होकर राजा ने विधिपूर्वक सब कन्याओं का विवाह उन्हीं महर्षि से कर दिया।

सौभरि ने विश्वकर्मा को बुलाकर प्रत्येक कन्या के लिए पृथक्-पृथक् महल बनवाये, जिनमें खिले कमल, सुन्दर हंस और स्वच्छ जलाशय थे। एक दिन राजा मान्धाता, यह देखने कि कन्याएँ सुखी हैं या दुखी, आश्रम आये। प्रत्येक कन्या ने कहा कि उसका सब सुख तो है, पर एक ही दुख है कि महर्षि केवल उसी के पास रहते हैं, दूसरी बहिनों के पास जाते ही नहीं; इससे बहिनें अवश्य दुखी होंगी। यह सुनकर राजा विस्मित रह गया, क्योंकि सौभरि अपने योगबल से एक ही समय सब महलों में विराजमान थे।

कालक्रम से राजकन्याओं से सौभरि के डेढ़ सौ पुत्र हुए, और दिन-दिन स्नेह के साथ उनकी ममता भी बढ़ती गयी। तब वे सोचने लगे, “अहो! मेरे मोह का कैसा विस्तार है! मनोरथों का अन्त तो मृत्युपर्यन्त नहीं होता, और जिस चित्त में मनोरथों की आसक्ति है वह परमार्थ में लग ही नहीं सकता। जल में मेरी समाधि मत्स्य के संग से नष्ट हुई, और उसी संग के कारण मैंने स्त्री और धन का परिग्रह किया। एक शरीर धारण करना ही महान् दुख है, और मैंने पचास गुना कर लिया।” ऐसा सोचकर सौभरि सब कुछ त्याग वन में चले गये, और अन्त में समस्त कर्मों को छोड़कर परमात्मपरायण हो भगवान् के अच्युत पद को प्राप्त हुए।

त्रिशंकु और सगर

मान्धाता के पुत्र पुरुकुत्स ने, भगवान् के तेज से युक्त होकर, पातालवासी नागों को सतानेवाले मौनेय गन्धर्वों का नाश किया; इसीलिए नागराजों ने वर दिया कि जो उनकी बहिन नर्मदा का स्मरण करेगा, उसे सर्प-विष का भय न होगा। पुरुकुत्स के वंश में त्रसदस्यु, अनरण्य आदि होते हुए सत्यव्रत हुए, जो त्रिशंकु कहलाये। त्रिशंकु किसी कारण चाण्डाल हो गये थे। बारह वर्ष के अनावृष्टि-काल में वे प्रतिदिन गंगा-तट पर मृग-मांस बाँध आते, जिससे विश्वामित्र के कुटुम्ब का पोषण होता; उसी उपकार से प्रसन्न होकर विश्वामित्र ने उन्हें सदेह स्वर्ग भेज दिया और उनकी चाण्डालता दूर की। त्रिशंकु से हरिश्चन्द्र, और उसी वंश में आगे चलकर बाहु हुए, जो हैहय और तालजंघ आदि क्षत्रियों से पराजित होकर अपनी गर्भवती रानी के साथ वन चले गये।

वहाँ सौत के दिये विष से रानी का गर्भ सात वर्ष तक रुका रहा। वृद्ध बाहु के मरने पर रानी सती होने चली, तब और्व मुनि ने रोककर कहा कि उसके गर्भ में एक चक्रवर्ती राजा है। कुछ ही दिनों में विष के साथ जन्मा वह बालक ‘सगर’ कहलाया। और्व से वेद और भार्गव नामक अस्त्र की शिक्षा पाकर सगर ने हैहय-तालजंघों को प्रायः नष्ट कर दिया। शक, यवन, काम्बोज, पारद और पह्लव वसिष्ठ की शरण गये, तो वसिष्ठ के कहने पर सगर ने उन्हें मारा नहीं, पर उनका वेष बदलवा दिया; यवनों के सिर मुँड़वा दिये, शकों को अर्धमुण्डित किया, पारदों के लम्बे बाल और पह्लवों की लम्बी दाढ़ी रखवा दी, और इन्हें स्वाध्याय तथा वषट्कार से बहिष्कृत कर दिया; अपना धर्म छोड़ देने से ये म्लेच्छ हो गये। तदनन्तर सगर अप्रतिहत सैन्य से सप्तद्वीपवती पृथ्वी पर शासन करने लगे। यही सगर-कथा श्रीमद्भागवत में भी आती है, किन्तु विष्णुपुराण का यह वर्णन अपने ही ढंग का और अधिक संक्षिप्त है।

सगर के साठ हजार पुत्र

सगर की दो पत्नियाँ थीं, केशिनी और सुमति। और्व के वर से केशिनी ने वंश बढ़ानेवाले एक पुत्र असमञ्जस को, और सुमति ने साठ हजार पुत्रों को जन्म दिया। असमञ्जस बचपन से ही दुराचारी था, अतः पिता ने उसे त्याग दिया; उसके पुत्र अंशुमान् सुशील थे, किन्तु साठ हजार पुत्रों ने असमञ्जस के ही आचरण का अनुकरण किया। इनके अत्याचार से यज्ञादि सन्मार्ग का उच्छेद होते देख देवताओं ने भगवान् के अंशभूत कपिलदेव की शरण ली।

उसी समय सगर ने अश्वमेध यज्ञ आरम्भ किया। यज्ञ का घोड़ा कोई चुराकर पृथ्वी के एक बिल में घुस गया। साठ हजार पुत्रों ने खुरों के चिह्नों का अनुसरण करते हुए पृथ्वी को एक-एक योजन खोद डाला और पाताल में पहुँचकर देखा कि पास ही महर्षि कपिल समाधि में बैठे हैं और घोड़ा वहीं फिर रहा है। “यही हमारा अपकारी है, इसे मारो” ऐसा चिल्लाते हुए वे अस्त्र उठाकर उनकी ओर दौड़े। कपिलदेव ने कुछ आँख बदलकर देखा, तो वे सब अपने ही शरीर से उत्पन्न अग्नि में जलकर भस्म हो गये।

तब सगर ने घोड़ा लाने अंशुमान् को भेजा। खुदे मार्ग से जाकर उन्होंने भक्तिपूर्वक कपिल की स्तुति की। भगवान् कपिल प्रसन्न होकर बोले, “बेटा! यह घोड़ा ले जाइए, और जो वर चाहें माँग लें।” अंशुमान् ने कहा, “प्रभो! ब्रह्मदण्ड से भस्म हुए मेरे पितरों को स्वर्ग की प्राप्ति करानेवाला कोई वर दीजिए।” भगवान् बोले, “आपका पौत्र गंगा जी को स्वर्ग से पृथ्वी पर लायेगा; उनके जल का स्पर्श होते ही ये सब स्वर्ग को चले जायँगे। भगवान् विष्णु के चरण-नख से निकले उस जल का माहात्म्य ही ऐसा है कि मृतक का अस्थि या केश-मात्र भी उससे छू जाय तो वह तुरन्त स्वर्ग को चला जाता है।” इस प्रकार सगर के साठ हजार पुत्र उस दिन की प्रतीक्षा में रहे जब गंगा उतरकर उनका उद्धार करेंगी। पर वह कथा फिर कभी।

आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)