Lulla Family

भविष्य के राजा और कलियुग का आगमन

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मैत्रेय के प्रश्न पर पराशरजी ने बताया कि अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से गर्भ में ही भस्म हुए अभिमन्यु के पुत्र को भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने प्रभाव से पुनः जीवित कर दिया; वही परीक्षित् इस समय धर्मपूर्वक समस्त भूमण्डल का शासन कर रहे हैं। फिर मुनि बोले, “अब मैं आगे होनेवाले राजाओं का वर्णन करता हूँ।” और मानो काल के परदे के उस पार देखते हुए, उन्होंने वह वंश-कथा कही जो अभी घटी ही नहीं थी।

परीक्षित् का वंश और क्षेमक तक

परीक्षित् के चार पुत्र होंगे: जनमेजय, श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन। जनमेजय का पुत्र शतानीक याज्ञवल्क्य से वेद और कृप से अस्त्रविद्या पढ़कर, विषयों से विरक्त होकर, शौनक के उपदेश से आत्मज्ञान में निपुण होगा और परमनिर्वाण-पद पाएगा। उसका पुत्र अश्वमेधदत्त, फिर अधिसीमकृष्ण, और फिर निचक्नु होगा; जिस समय गंगा हस्तिनापुर को बहा ले जाएगी, तब यह निचक्नु कौशाम्बी में जा बसेगा।

उससे आगे उष्ण, विचित्ररथ, शुचिरथ, वृष्णिमान्, सुषेण, सुनीथ, नृप, चक्षु, सुखावल, पारिप्लव, सुनय, मेधावी, रिपुंजय, मृदु, तिग्म, बृहद्रथ, वसुदान, फिर दूसरा शतानीक, उदयन, अहीनर, दण्डपाणि, निमित्र और अन्त में क्षेमक होंगे। ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों की उत्पत्ति के मूल तथा अनेक राजर्षियों से सम्मानित यह पुरुवंश कलियुग में राजा क्षेमक के होने पर समाप्त हो जाएगा।

भविष्य के इक्ष्वाकु

इसी प्रकार भविष्य के इक्ष्वाकुवंशी राजाओं में बृहद्बल का पुत्र बृहत्क्षण होगा, और उससे आगे उरुक्षय, वत्सव्यूह, प्रतिव्योम, दिवाकर, सहदेव, बृहदश्व, भानुरथ, प्रतीताश्व, सुप्रतीक, मरुदेव, सुनक्षत्र, किन्नर, अन्तरिक्ष, सुपर्ण, अमित्रजित्, बृहद्राज, धर्मी, कृतंजय, रणंजय, संजय, शाक्य, शुद्धोदन, राहुल, प्रसेनजित्, क्षुद्रक, कुण्डक, सुरथ और सुमित्र होंगे। यह इक्ष्वाकुवंश राजा सुमित्र तक ही रहेगा, क्योंकि कलियुग में उसके पश्चात् यह भी समाप्त हो जाएगा।

मगध, नन्द और मौर्य

अब मगधदेश की बारी है, जिसके बृहद्रथवंश में महाबली जरासन्ध प्रधान थे। जरासन्ध के पुत्र सहदेव से आगे सोमापि, श्रुतश्रवा, अयुतायु आदि होते हुए यह वंश एक हजार वर्ष तक मगध पर राज्य करेगा। इसका अन्तिम राजा रिपुंजय होगा, जिसे उसका मन्त्री सुनिक मारकर अपने पुत्र प्रद्योत का राज्याभिषेक कर देगा। प्रद्योत, बलाक, विशाखयूप, जनक और नन्दि, ये पाँच प्रद्योतवंशी राजा एक सौ अड़तीस वर्ष पृथ्वी का पालन करेंगे। फिर शिशुनाग का वंश आएगा, काकवर्ण, क्षेमधर्मा, क्षत्रौजा, विधिसार, अजातशत्रु, दर्भक, उदयन, नन्दिवर्धन और महानन्दि; ये शैशुनाग राजा तीन सौ बासठ वर्ष राज्य करेंगे।

महानन्दि से शूद्रा के गर्भ में महापद्म नामक नन्द उत्पन्न होगा, जो दूसरे परशुराम के समान समस्त क्षत्रियों का नाश करनेवाला होगा; तब से शूद्रजातीय राजा राज्य करेंगे। महापद्म सम्पूर्ण पृथ्वी का एकछत्र शासन करेगा, और उसके सुमाल्य आदि आठ पुत्र उसके पीछे राज्य भोगेंगे; ये सब मिलकर सौ वर्ष राज्य करेंगे। इन नौ नन्दों को कौटिल्य नामक ब्राह्मण नष्ट करेगा, और उनके अन्त पर मौर्यगण पृथ्वी भोगेंगे; कौटिल्य ही चन्द्रगुप्त का राज्याभिषेक करेगा। चन्द्रगुप्त का पुत्र बिन्दुसार, फिर अशोकवर्धन, सुयशा, दशरथ, संयुत, शालिशूक, सोमशर्मा, शतधन्वा और बृहद्रथ, ये दस मौर्य राजा एक सौ सैंतीस वर्ष राज्य करेंगे।

इनके पीछे पुष्यमित्र नामक सेनापति अपने स्वामी बृहद्रथ को मारकर राज्य करेगा; उसके पुत्र अग्निमित्र आदि दस शुंग राजा एक सौ बारह वर्ष रहेंगे। फिर शुंगवंशी देवभूति को उसका मन्त्री वसुदेव मारकर काण्ववंश चलाएगा, वसुदेव, भूमित्र, नारायण और सुशर्मा, ये चार काण्व पैंतालीस वर्ष अधिपति रहेंगे। काण्ववंशी सुशर्मा को उसका आन्ध्रजातीय सेवक बलिपुच्छक मारकर स्वयं पृथ्वी भोगेगा; इस प्रकार तीस आन्ध्रभृत्य राजा चार सौ छप्पन वर्ष राज्य करेंगे।

इनके पीछे सात आभीर, दस गर्दभिल, सोलह शक, आठ यवन, चौदह तुरुष्क, तेरह मुण्ड और ग्यारह मौन राजा होंगे। मगध में विश्वस्फटिक नामक राजा नीच वर्णों को राज्य में बैठाकर समस्त क्षत्रिय-जाति को उच्छिन्न कर देगा; प्रयाग और गया में मागध तथा गुप्त राजा राज्य भोगेंगे, और कोसल, कलिंग, सौराष्ट्र, अवन्ति, काश्मीर आदि देशों पर व्रात्य, म्लेच्छ और शूद्र आदि का अधिकार होगा। ये सब राजा एक ही काल में होंगे, थोड़ी प्रसन्नतावाले, अत्यन्त क्रोधी, असत्य और अधर्म में रुचि रखनेवाले, स्त्री, बालक और गौओं तक की हत्या करनेवाले, अल्पायु और अत्यन्त लोभी; और अपनी ही प्रजा को नष्ट-भ्रष्ट कर देंगे।

कलियुग के लक्षण और कल्कि का अवतार

जैसे-जैसे धर्म और अर्थ का ह्रास होगा, वैसे-वैसे संसार भी क्षीण होता जाएगा। तब धन ही कुलीनता का हेतु होगा, बल ही धर्म का, केवल रुचि ही विवाह का, और असत्य ही व्यवहार में सफलता का। यज्ञोपवीत मात्र ब्राह्मणत्व का चिह्न रह जाएगा, बाहरी वेश ही आश्रम का प्रमाण, और निर्भय होकर धृष्टता से बोलना ही पाण्डित्य। भारी करों से पीड़ित प्रजा पर्वत-कन्दराओं में जा छिपेगी और पत्ते, मूल तथा फल खाकर दिन काटेगी; कोई तेईस वर्ष से अधिक जीवित न रहेगा।

जब श्रौत और स्मार्त धर्म प्रायः लुप्त हो जाएँगे और कलियुग का थोड़ा-सा अंश शेष रहेगा, तब सर्वात्मा भगवान् वासुदेव शम्भल-ग्राम के मुख्य ब्राह्मण विष्णुयश के घर कल्किरूप में अवतार लेकर समस्त म्लेच्छों और दुष्टों का नाश करेंगे और सबको अपने-अपने धर्म में स्थापित करेंगे। उस रात्रि के अन्त में जागे हुए लोगों के समान उस समय की सन्तान की बुद्धि स्फटिकमणि-सी निर्मल होगी, और वह सत्ययुग के धर्म का अनुसरण करेगी। जब चन्द्रमा, सूर्य और बृहस्पति पुष्य नक्षत्र में एक ही राशि में आ मिलेंगे, तब सत्ययुग का आरम्भ होगा।

पराशरजी ने कहा, “हे मुनिश्रेष्ठ! परीक्षित् के जन्म से नन्द के अभिषेक तक एक हजार पचास वर्ष का समय जानना चाहिए। जिस दिन भगवान् वासुदेव अपने धाम पधारे, उसी दिन कलियुग का आगमन हुआ; जब तक वे अपने चरण-कमलों से इस पृथ्वी का स्पर्श करते रहे, तब तक कलि का यहाँ प्रवेश न हो सका। मानवी गणना के अनुसार कलियुग तीन लाख साठ हजार वर्ष रहेगा, और उसके पश्चात् बारह सौ दिव्य वर्ष का कृतयुग आएगा।”

पृथ्वी की हँसी

अन्त में पराशरजी ने वह गीत सुनाया जो पृथ्वी स्वयं गाती है। पृथ्वी कहती है, “आश्चर्य है! बुद्धिमान् होते हुए भी इन राजाओं को कैसा मोह है, जो फेन के बुलबुले-से क्षणस्थायी होकर भी अपनी स्थिरता पर इतना विश्वास रखते हैं। ‘क्रम से हम समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथ्वी को जीत लेंगे’, इस बुद्धि से मोहित ये अपनी निकट खड़ी मृत्यु को नहीं देखते। जिसे छोड़कर इनके पूर्वज चले गए, जिसे इनके पिता तक साथ न ले जा सके, उसी मुझको ये मूढ़ जीतना चाहते हैं; मेरे लिये पिता-पुत्र और भाई तक आपस में लड़ मरते हैं। जो राजा दूतों के द्वारा शत्रुओं से कहलाते हैं कि ‘यह पृथ्वी मेरी है, इसे तुरन्त छोड़ दो’, उन मूढ़ों पर मुझे बड़ी हँसी आती है, और फिर दया भी।”

पराशरजी बोले, “जो इस गीत को श्रद्धा से सुनता है, उसकी ममता सूर्य के ताप में बर्फ के समान गल जाती है। इस प्रकार मैंने आपसे उस मनुवंश का वर्णन किया, जिसमें स्थितिकारक भगवान् विष्णु का अंश सदा रहा; इस राजवंश की कथा को जो सुनता है, वह अपने समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।”

आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)