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भूगोल: सप्त द्वीप, पाताल और नरक

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श्रीमैत्रेयजीने कहा, हे भगवन्! अब मुझे इस सम्पूर्ण पृथ्वी-मण्डलका विवरण सुनाइए; जितने सागर, द्वीप, वर्ष, पर्वत और नदियाँ हैं, उनका परिमाण और आकार कहिए। पराशरजी बोले, हे मैत्रेय! यह विस्तार तो सौ वर्षमें भी पूरा नहीं कहा जा सकता, इसलिए संक्षेपमें सुनिए। जम्बू, प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर, ये सात द्वीप क्रमशः खारे जल, इक्षुरस, मदिरा, घी, दही, दूध और मीठे जलके सात समुद्रोंसे घिरे हुए हैं। इन सबके बीचमें जम्बूद्वीप है, और उसके ठीक मध्यमें सुवर्णमय सुमेरु पर्वत खड़ा है, जो चौरासी हजार योजन ऊँचा है, सोलह हजार योजन पृथ्वीमें धँसा है, ऊपर बत्तीस हजार और नीचे सोलह हजार योजन चौड़ा है।

सुमेरुके दक्षिणमें हिमवान्, हेमकूट और निषध तथा उत्तरमें नील, श्वेत और शृंगी नामक वर्ष-पर्वत हैं, जो अलग-अलग वर्षोंका विभाग करते हैं। जम्बूद्वीपके नौ खण्ड हैं, जिनके बीचमें इलावृत है; उसके चारों ओर मन्दर, गन्धमादन, विपुल और सुपार्श्व नामक चार पर्वत मानो मेरुको थामे खड़े हैं, जिनपर क्रमशः कदम्ब, जम्बू, पीपल और वटके विशाल वृक्ष हैं। जम्बू वृक्षके फलोंके रससे जम्बू नदी बहती है, और उसके किनारेकी मिट्टी सूखकर जाम्बूनद नामका सोना बन जाती है। मेरुके शिखरपर ब्रह्माजीकी चौदह हजार योजनवाली महापुरी है, और उसके चारों ओर इन्द्र आदि आठ लोकपालोंके नगर हैं। विष्णुके चरणसे निकली श्रीगंगाजी पहले चन्द्रमण्डलपर, फिर उस ब्रह्मपुरीमें गिरती हैं और वहाँसे सीता, अलकनन्दा, चक्षु और भद्रा नामक चार धाराओंमें बँटकर चारों दिशाओंमें बह जाती हैं। इन वर्षोंके लोग दस से बारह हजार वर्षतक निरोग जीते हैं, वहाँ शोक और युगोंका भेद नहीं है।

भारतवर्ष: कर्मभूमि

हे मैत्रेय! समुद्रके उत्तर और हिमालयके दक्षिणमें जो देश है, वही भारतवर्ष कहलाता है, जिसमें भरतकी सन्तान बसी है; इसका विस्तार नौ हजार योजन है। यही एकमात्र कर्मभूमि है, जहाँसे मनुष्य स्वर्ग अथवा मोक्ष पा सकता है, और यहीं पाप करनेपर नरक अथवा नीच योनिमें भी गिरता है। इसमें महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य और पारियात्र, ये सात कुलपर्वत हैं। इसके नौ भाग हैं, जिनमें अन्तिम समुद्रसे घिरा हुआ है। हिमालयसे शतद्रु और चन्द्रभागा, विन्ध्यसे नर्मदा और सुरसा, तथा सह्यसे गोदावरी, भीमरथी और कृष्णा जैसी पापहारिणी नदियाँ निकली हैं, जिनके तटपर कुरु, पांचाल, कलिंग और मगध आदि अनेक जनपद बसे हैं।

इसी भारतवर्षमें सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि, ये चार युग घूमते हैं, अन्यत्र कहीं नहीं। यहीं मुनिजन तपस्या करते और यज्ञ करके परलोक साधते हैं; जम्बूद्वीपके सब वर्षोंमें भारत ही श्रेष्ठ है, क्योंकि शेष सब तो केवल भोगभूमियाँ हैं। देवता तक गाते हैं कि जिन्होंने स्वर्ग और मोक्षके मार्गभूत भारतवर्षमें जन्म लिया, वे मनुष्य हम देवताओंसे भी अधिक धन्य हैं; सहस्रों जन्मोंके पुण्य उदय होनेपर ही कहीं इस देशमें मनुष्य-जन्म मिलता है।

सात द्वीप और उनके समुद्र

जम्बूद्वीपके आगे क्रमशः दुगुने-दुगुने विस्तारवाले छह और द्वीप हैं, और हर द्वीप अपनेसे दुगुने एक समुद्रसे घिरा है। प्रत्येक द्वीपपर प्रियव्रतके एक पुत्रका राज्य है, और वह सात वर्षोंमें बँटा है, जिनके नाम उस राजाके सात पुत्रोंपर पड़े हैं; वहाँ सात वर्ष-पर्वत और सात नदियाँ भी हैं। प्लक्षद्वीपके स्वामी मेधातिथि हैं, वह इक्षुरसके समुद्रसे घिरा है, और वहाँ भगवान् सोमरूपसे पूजे जाते हैं। शाल्मलके स्वामी वपुष्मान् हैं, वह मदिराके समुद्रसे घिरा है, वहाँ भगवान् वायुरूपसे पूजित हैं। कुशद्वीपके स्वामी ज्योतिष्मान् हैं, वह घीके समुद्रसे घिरा है, वहाँ श्रीहरि ब्रह्मरूपसे पूजे जाते हैं।

क्रौंचद्वीपके स्वामी द्युतिमान् हैं, वह दहीके समुद्रसे घिरा है, वहाँ भगवान् रुद्ररूपसे पूजित हैं। शाकद्वीपके स्वामी भव्य हैं; वहाँ एक विशाल शाक वृक्ष है जिसके वायुके स्पर्शसे हृदयमें आह्लाद होता है, और वह दूधके समुद्रसे घिरा है, जहाँ भगवान् सूर्यरूपसे पूजे जाते हैं। अन्तिम पुष्करद्वीपके स्वामी सवन हैं; उसमें महावीर और धातकी, ये दो ही वर्ष हैं, और बीचमें वलयाकार मानसोत्तर नामका एक ही पर्वत है। वहाँ न रोग है, न शोक, न ऊँच-नीचका भेद; मनुष्य दस हजार वर्ष जीते हैं और एक न्यग्रोध वृक्षके नीचे ब्रह्माजीकी पूजा होती है। यह मीठे जलके समुद्रसे घिरा है, जिसके आगे सुवर्णमयी भूमि, फिर लोकालोक पर्वत, फिर घोर अन्धकार और अन्तमें अण्ड-कटाह है। इस प्रकार सारा भूमण्डल पचास करोड़ योजन विस्तारवाला है।

सात पाताल और शेषनाग

हे मैत्रेय! पृथ्वीके नीचे दस-दस हजार योजनवाले सात पाताल हैं, उनके नाम अतल, वितल, नितल, गभस्तिमान्, महातल, सुतल और पाताल हैं। उनकी भूमियाँ कहीं श्वेत, कहीं काली, अरुण अथवा पीली हैं, कहीं काँकरीली, कहीं पथरीली और कहीं सुवर्णमयी; उनमें सुन्दर महलोंमें दानव, दैत्य, यक्ष और बड़े-बड़े नाग बसते हैं। एक बार नारदजी पातालसे लौटकर स्वर्गमें बोले कि पाताल तो स्वर्गसे भी अधिक सुन्दर है, जहाँ नागोंके आभूषणोंमें जगमगाते मणि हैं, जहाँ दिनमें सूर्यकी किरणें केवल प्रकाश देती हैं, ताप नहीं, और रातमें चन्द्रमाकी किरणें केवल चाँदनी फैलाती हैं, शीत नहीं।

इन सातों पातालोंके नीचे भगवान् विष्णुका तमोमय विग्रह शेष है, जिसे ‘अनन्त’ कहते हैं। वे सहस्र फणोंवाले, स्वस्तिक-चिह्नोंसे विभूषित, श्वेत पर्वतके समान उज्ज्वल और नील वस्त्र धारण किए हुए हैं; उनके हाथोंमें हल और मूसल हैं। वे इस सारी पृथ्वीको अपने मस्तकपर मुकुटकी भाँति धारण किए पातालके मूलमें विराजते हैं। कल्पके अन्तमें उनके मुखसे संकर्षणरूपी रुद्र विषकी अग्नि-ज्वालाके समान निकलकर तीनों लोकोंको भस्म कर देते हैं। जब मदमत्त शेषजी जँभाई लेते हैं, तब समुद्र और वनोंसहित सारी पृथ्वी काँप उठती है। इन्हींकी आराधनासे पूर्वकालमें महर्षि गर्गने समस्त ज्योतिष्चक्र तथा शकुन-अपशकुनका ज्ञान पाया था।

नरक और भगवान्‌के नामका माहात्म्य

पृथ्वी और जलके नीचे नरक हैं, जिनमें पापी लोग गिराए जाते हैं। रौरव, सूकर, रोध, ताल, विशसन, महाज्वाल, तप्तकुम्भ, लवण, वैतरणी, कृमीश, असिपत्रवन, कृष्ण, लालाभक्ष, पूयवह, वह्निज्वाल, अधःशिर, संदंश, कालसूत्र, तमस् और अवीचि जैसे सैकड़ों नरक यमराजके अधीन हैं। झूठी गवाही देनेवाला और पक्षपातसे बोलनेवाला रौरवमें, ब्रह्महत्या करनेवाला और सोना चुरानेवाला सूकरमें, गो-हत्यारा रोधमें, और खेतोंकी बाड़ तोड़नेवाला कृष्ण नरकमें पड़ता है। नरकका भोग भोगकर जीव क्रमशः स्थावर, कृमि, जलचर, पक्षी, पशु और फिर मनुष्य होकर धर्मकी ओर बढ़ता है।

किन्तु, हे मैत्रेय! जितने भी तप और कर्मरूप प्रायश्चित्त हैं, उन सबमें श्रीकृष्णका स्मरण सबसे श्रेष्ठ है। पाप करके जिसके मनमें पश्चात्ताप होता है, उसके लिए यही हरि-स्मरण एकमात्र परम प्रायश्चित्त है। प्रातःकाल, सन्ध्या, मध्याह्न अथवा रात, किसी भी समय जो श्रीनारायणका स्मरण करता है, उसके समस्त पाप तुरन्त क्षीण हो जाते हैं, और वह फिर नरकमें नहीं जाता; ऐसे भक्तके लिए तो स्वर्गका सुख भी विघ्नरूप माना जाता है। मनको जो प्रिय लगे वही स्वर्ग है और जो अप्रिय वही नरक; पाप और पुण्य इन्हींके दूसरे नाम हैं। सच तो यह है कि यह सम्पूर्ण विश्व ज्ञानमय ही है; विद्या मुक्ति देती है और अविद्या बन्धन। इस प्रकार, हे मैत्रेय! मैंने आपसे समुद्र, पर्वत, द्वीप, वर्ष, पाताल और नरकोंसहित सारे भूमण्डलका वर्णन कर दिया।

आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)