लुल्ला परिवारLulla Family
English
← संग्रह
क्रियाएँ
भागवतम् और पुराणलीला, भक्ति और अवतार

भूगोल: सप्त द्वीप, पाताल और नरक

इस पृष्ठ पर

पढ़ने में लगभग 8 मिनट

भूगोल: सप्त द्वीप, पाताल और नरक

श्रीमैत्रेयजी ने कहा, हे भगवन्! अब मुझे इस सम्पूर्ण पृथ्वी-मण्डल का विवरण सुनाइए; जितने सागर, द्वीप, वर्ष, पर्वत और नदियाँ हैं, उनका परिमाण और आकार कहिए। पराशरजी बोले, हे मैत्रेय! यह विस्तार तो सौ वर्ष में भी पूरा नहीं कहा जा सकता, इसलिए संक्षेप में सुनिए। जम्बू, प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर, ये सात द्वीप क्रमशः खारे जल, इक्षुरस, मदिरा, घी, दही, दूध और मीठे जल के सात समुद्रों से घिरे हुए हैं। इन सबके बीच में जम्बूद्वीप है, और उसके ठीक मध्य में सुवर्णमय सुमेरु पर्वत खड़ा है, जो चौरासी हजार योजन ऊँचा है, सोलह हजार योजन पृथ्वी में धँसा है, ऊपर बत्तीस हजार और नीचे सोलह हजार योजन चौड़ा है।

सुमेरु के दक्षिण में हिमवान्, हेमकूट और निषध तथा उत्तर में नील, श्वेत और शृंगी नामक वर्ष-पर्वत हैं, जो अलग-अलग वर्षों का विभाग करते हैं। जम्बूद्वीप के नौ खण्ड हैं, जिनके बीच में इलावृत है; उसके चारों ओर मन्दर, गन्धमादन, विपुल और सुपार्श्व नामक चार पर्वत मानो मेरु को थामे खड़े हैं, जिनपर क्रमशः कदम्ब, जम्बू, पीपल और वट के विशाल वृक्ष हैं। जम्बू वृक्ष के फलों के रस से जम्बू नदी बहती है, और उसके किनारे की मिट्टी सूखकर जाम्बूनद नाम का सोना बन जाती है। मेरु के शिखर पर ब्रह्माजी की चौदह हजार योजनवाली महापुरी है, और उसके चारों ओर इन्द्र आदि आठ लोकपालों के नगर हैं। विष्णु के चरण से निकली श्रीगंगाजी पहले चन्द्रमण्डल पर, फिर उस ब्रह्मपुरी में गिरती हैं और वहाँ से सीता, अलकनन्दा, चक्षु और भद्रा नामक चार धाराओं में बँटकर चारों दिशाओं में बह जाती हैं। किम्पुरुष आदि आठ वर्षों के लोग दस से बारह हजार वर्ष तक निरोग जीते हैं; वहाँ न शोक है, न इन्द्र वर्षा करते हैं, और न युगों की गणना होती है।

भारतवर्ष: कर्मभूमि

हे मैत्रेय! समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में जो देश है, वही भारतवर्ष कहलाता है, जिसमें भरत की सन्तान बसी है; इसका विस्तार नौ हजार योजन है। यही एकमात्र कर्मभूमि है, जहाँ से मनुष्य स्वर्ग अथवा मोक्ष पा सकता है, और यहीं पाप करने पर नरक अथवा नीच योनि में भी गिरता है। इसमें महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य और पारियात्र, ये सात कुलपर्वत हैं। इसके नौ भाग हैं, जिनमें अन्तिम समुद्र से घिरा हुआ है। हिमालय से शतद्रु और चन्द्रभागा, विन्ध्य से नर्मदा और सुरसा, तथा सह्य से गोदावरी, भीमरथी और कृष्णा जैसी पापहारिणी नदियाँ निकली हैं, जिनके तट पर कुरु, पांचाल, कलिंग और मगध आदि अनेक जनपद बसे हैं।

इसी भारतवर्ष में सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि, ये चार युग घूमते हैं, अन्यत्र कहीं नहीं। यहीं मुनिजन तपस्या करते और यज्ञ करके परलोक साधते हैं; जम्बूद्वीप के सब वर्षों में भारत ही श्रेष्ठ है, क्योंकि शेष सब तो केवल भोगभूमियाँ हैं। देवता तक गाते हैं कि जिन्होंने स्वर्ग और मोक्ष के मार्गभूत भारतवर्ष में जन्म लिया, वे मनुष्य हम देवताओं से भी अधिक धन्य हैं; सहस्रों जन्मों के पुण्य उदय होने पर ही कहीं इस देश में मनुष्य-जन्म मिलता है।

सात द्वीप और उनके समुद्र

जम्बूद्वीप के आगे क्रमशः दुगुने-दुगुने विस्तारवाले छह और द्वीप हैं, और हर द्वीप अपने ही बराबर के एक समुद्र से घिरा है। प्रत्येक द्वीप पर प्रियव्रत के एक पुत्र का राज्य है, और वह सात वर्षों में बँटा है, जिनके नाम उस राजा के सात पुत्रों पर पड़े हैं; वहाँ सात वर्ष-पर्वत और सात नदियाँ भी हैं। प्लक्षद्वीप के स्वामी मेधातिथि हैं, वह इक्षुरस के समुद्र से घिरा है, और वहाँ भगवान् सोमरूप से पूजे जाते हैं। शाल्मल के स्वामी वपुष्मान् हैं, वह मदिरा के समुद्र से घिरा है, वहाँ भगवान् वायुरूप से पूजित हैं। कुशद्वीप के स्वामी ज्योतिष्मान् हैं, वह घी के समुद्र से घिरा है, वहाँ श्रीहरि ब्रह्मरूप से पूजे जाते हैं।

क्रौंचद्वीप के स्वामी द्युतिमान् हैं, वह दही के समुद्र से घिरा है, वहाँ भगवान् रुद्ररूप से पूजित हैं। शाकद्वीप के स्वामी भव्य हैं; वहाँ एक विशाल शाक वृक्ष है जिसके वायु के स्पर्श से हृदय में आह्लाद होता है, और वह दूध के समुद्र से घिरा है, जहाँ भगवान् सूर्यरूप से पूजे जाते हैं। अन्तिम पुष्करद्वीप के स्वामी सवन हैं; उसमें महावीर और धातकी, ये दो ही वर्ष हैं, और बीच में वलयाकार मानसोत्तर नाम का एक ही पर्वत है। वहाँ न रोग है, न शोक, न ऊँच-नीच का भेद; मनुष्य दस हजार वर्ष जीते हैं और वहाँ का न्यग्रोध वृक्ष ब्रह्माजी का उत्तम निवास है, जहाँ देवता और दानव उनकी पूजा करते हैं। यह मीठे जल के समुद्र से घिरा है, जिसके आगे सुवर्णमयी भूमि, फिर लोकालोक पर्वत, फिर घोर अन्धकार और अन्त में अण्ड-कटाह है। इस प्रकार सारा भूमण्डल पचास करोड़ योजन विस्तारवाला है।

सात पाताल और शेषनाग

हे मैत्रेय! पृथ्वी के नीचे दस-दस हजार योजनवाले सात पाताल हैं, उनके नाम अतल, वितल, नितल, गभस्तिमान्, महातल, सुतल और पाताल हैं। उनकी भूमियाँ कहीं श्वेत, कहीं काली, अरुण अथवा पीली हैं, कहीं काँकरीली, कहीं पथरीली और कहीं सुवर्णमयी; उनमें सुन्दर महलों में दानव, दैत्य, यक्ष और बड़े-बड़े नाग बसते हैं। एक बार नारदजी पाताल से लौटकर स्वर्ग में बोले कि पाताल तो स्वर्ग से भी अधिक सुन्दर है, जहाँ नागों के आभूषणों में जगमगाते मणि हैं, जहाँ दिन में सूर्य की किरणें केवल प्रकाश देती हैं, ताप नहीं, और रात में चन्द्रमा की किरणें केवल चाँदनी फैलाती हैं, शीत नहीं।

इन सातों पातालों के नीचे भगवान् विष्णु का तमोमय विग्रह शेष है, जिसे ‘अनन्त’ कहते हैं। वे सहस्र फणोंवाले, स्वस्तिक-चिह्नों से विभूषित, श्वेत पर्वत के समान उज्ज्वल और नील वस्त्र धारण किए हुए हैं; उनके हाथों में हल और मूसल हैं। वे इस सारी पृथ्वी को अपने मस्तक पर मुकुट की भाँति धारण किए पाताल के मूल में विराजते हैं। कल्प के अन्त में उनके मुख से संकर्षणरूपी रुद्र विष की अग्नि-ज्वाला के समान निकलकर तीनों लोकों को भस्म कर देते हैं। जब मदमत्त शेषजी जँभाई लेते हैं, तब समुद्र और वनोंसहित सारी पृथ्वी काँप उठती है। इन्हीं की आराधना से पूर्वकाल में महर्षि गर्ग ने समस्त ज्योतिष्चक्र तथा शकुन-अपशकुन का ज्ञान पाया था।

नरक और भगवान् के नाम का माहात्म्य

पृथ्वी और जल के नीचे नरक हैं, जिनमें पापी लोग गिराए जाते हैं। रौरव, सूकर, रोध, ताल, विशसन, महाज्वाल, तप्तकुम्भ, लवण, वैतरणी, कृमीश, असिपत्रवन, कृष्ण, लालाभक्ष, पूयवह, वह्निज्वाल, अधःशिर, संदंश, कालसूत्र, तमस् और अवीचि जैसे सैकड़ों नरक यमराज के अधीन हैं। झूठी गवाही देनेवाला और पक्षपात से बोलनेवाला रौरव में, ब्रह्महत्या करनेवाला और सोना चुरानेवाला सूकर में, गो-हत्यारा रोध में, और खेतों की बाड़ तोड़नेवाला कृष्ण नरक में पड़ता है। नरक का भोग भोगकर जीव क्रमशः स्थावर, कृमि, जलचर, पक्षी, पशु और फिर मनुष्य होकर धर्म की ओर बढ़ता है।

किन्तु, हे मैत्रेय! जितने भी तप और कर्मरूप प्रायश्चित्त हैं, उन सबमें श्रीकृष्ण का स्मरण सबसे श्रेष्ठ है। पाप करके जिसके मन में पश्चात्ताप होता है, उसके लिए यही हरि-स्मरण एकमात्र परम प्रायश्चित्त है। प्रातःकाल, सन्ध्या, मध्याह्न अथवा रात, किसी भी समय जो श्रीनारायण का स्मरण करता है, उसके समस्त पाप तुरन्त क्षीण हो जाते हैं, और वह फिर नरक में नहीं जाता; ऐसे भक्त के लिए तो स्वर्ग का सुख भी विघ्नरूप माना जाता है। मन को जो प्रिय लगे वही स्वर्ग है और जो अप्रिय वही नरक; पाप और पुण्य इन्हीं के दूसरे नाम हैं। सच तो यह है कि ज्ञान ही परब्रह्म है, और अविद्या की उपाधि से वही बन्धन का कारण बनता है; यह सम्पूर्ण विश्व ज्ञानमय है, और विद्या तथा अविद्या को भी ज्ञान ही जानिए। इस प्रकार, हे मैत्रेय! मैंने आपसे समुद्र, पर्वत, द्वीप, वर्ष, पाताल और नरकोंसहित सारे भूमण्डल का वर्णन कर दिया।

आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)