संसार का भार उतारने के लिये भगवान् श्रीकृष्ण ने बलराम के साथ अनेक दैत्यों और दुष्ट राजाओं का वध किया, और अन्त में अर्जुन के साथ मिलकर अठारह अक्षौहिणी सेना को मारकर पृथ्वी का भार हल्का कर दिया। अब एक कार्य शेष था, अपने ही कुल का उपसंहार; और वह भी उन्होंने ब्राह्मणों के शाप के बहाने कर दिखाया।
ऋषियों का शाप
एक बार पिण्डारक नामक महातीर्थ में कुछ यादव-कुमारों ने विश्वामित्र, कण्व और नारद जैसे महामुनियों को देखा। यौवन के मद में चूर, और मानो होनहार से प्रेरित, उन बालकों ने जाम्बवती के पुत्र साम्ब को स्त्री का वेश पहनाकर मुनियों के सामने ला खड़ा किया, और विनम्रता का ढोंग रचकर पूछा, “यह स्त्री पुत्र की इच्छा रखती है, हे मुनिजन! कहिए, इसे क्या होगा?” इस प्रकार धोखा दिए जाने पर वे दिव्यज्ञानी मुनि कुपित हो उठे और बोले, “यह एक ऐसा मूसल जनेगी, जो समस्त यादवों के नाश का कारण होगा, और जिससे आप सबका सारा कुल संसार में निर्मूल हो जाएगा।”
बालकों ने घबराकर सारा वृत्तान्त उग्रसेन से कहा, और सचमुच साम्ब के उदर से एक लोहमय मूसल उत्पन्न हुआ। उग्रसेन ने उसे पिसवाकर चूर्ण करा दिया और वह चूर्ण समुद्र में फिंकवा दिया, जिससे वहाँ बहुत-से सरकण्डे उग आए। मूसल का जो लोहे-भर एक भाले-सा नुकीला टुकड़ा पीसने से बच रहा, वह भी समुद्र में डाल दिया गया; उसे एक मछली निगल गई, और वह मछली पकड़ी जाने पर उसके पेट से निकला वह टुकड़ा जरा नामक व्याध ने ले लिया। भगवान् मधुसूदन यह सब जानते थे, पर विधाता की इच्छा को उन्होंने अन्यथा करना न चाहा।
द्वारका के अपशकुन और प्रभास-यात्रा
इसी समय देवताओं ने वायु को दूत बनाकर भेजा। वायु ने प्रणाम कर कहा, “हे विभो! वसु, अश्विनीकुमार, रुद्र, आदित्य, मरुद्गण और साध्यों सहित इन्द्र का सन्देश है कि आपको भूमण्डल पर आए सौ वर्ष से अधिक हो गए; दुष्ट दैत्य मारे जा चुके, पृथ्वी का भार उतर चुका; अब यदि रुचे तो देवताओं को अपने में सनाथ करते हुए स्वर्गलोक पधारिए।” भगवान् बोले, “हे दूत! जो आप कहते हैं वह सब मैं जानता हूँ; यादवों के नाश का आरम्भ तो मैंने कर ही दिया है। इनके संहार बिना पृथ्वी का भार पूरा हल्का न होगा; अतः सात रात्रि के भीतर इन्हें समेटकर मैं भी स्वर्ग आऊँगा। यह द्वारका की भूमि जो मैंने समुद्र से माँगी थी, उसे उसी को लौटाकर जाऊँगा।” वायु प्रणाम कर लौट गया।
उधर द्वारका में रात-दिन नाश के सूचक दिव्य, भौम और आन्तरिक्ष महान् उत्पात होने लगे। उन्हें देखकर भगवान् ने यादवों से कहा, “देखिए, कैसे घोर उपद्रव हो रहे हैं; इनकी शान्ति के लिये शीघ्र ही प्रभासक्षेत्र चलें।” तभी महाभागवत उद्धव ने प्रणाम कर कहा, “भगवन्! जान पड़ता है अब आप इस कुल का नाश करेंगे; मुझे क्या आज्ञा है?” भगवान् बोले, “हे उद्धव! आप मेरी कृपा से दिव्य गति द्वारा गन्धमादन के नर-नारायण–आश्रम, बदरिकाश्रम को जाइए; वही पृथ्वी का सबसे पावन स्थान है, वहाँ मुझमें चित्त लगाकर आप सिद्धि पाएँगे। मेरे स्वर्ग जाने पर समुद्र सारी द्वारका को डुबो देगा, केवल मेरा भवन छोड़कर, जहाँ मैं भक्तों के हित के लिये सदा निवास करता हूँ।” उद्धव प्रणाम कर बदरिकाश्रम चले गए।
प्रभास में यादवों का संहार
तदनन्तर सम्पूर्ण यादव शीघ्रगामी रथों पर चढ़कर श्रीकृष्ण और बलराम के साथ प्रभास पहुँचे। वहाँ कुकुर, अन्धक और वृष्णि वंश के यादवों ने वासुदेव की ही प्रेरणा से मदिरापान किया। पीते समय “मेरा ही भोजन शुद्ध है, औरों का नहीं”, ऐसी कहा-सुनी से विवाद बढ़ा, और वही कुवाक्य ईंधन बनकर प्रलयकारी कलह-अग्नि धधक उठी। दैवी प्रेरणा से विवश, क्रोध से आँखें लाल किए वे एक-दूसरे पर शस्त्र चलाने लगे; और जब शस्त्र चुक गए, तो पास उगे हुए वे सरकण्डे उठा लिए।
हाथ में आते ही वे सरकण्डे वज्र-से हो गए, और उन्हीं वज्रों से प्रद्युम्न, साम्ब, कृतवर्मा, सात्यकि, अनिरुद्ध, पृथु, विपृथु, चारुवर्मा और अक्रूर आदि यादव परस्पर प्रहार करने लगे। भगवान् ने जब उन्हें रोकना चाहा, तो वे उन्हें विपक्ष का सहायक समझकर उन्हीं पर टूट पड़े। तब कुपित होकर भगवान् ने भी एक मुट्ठी सरकण्डे उठा लिए, जो उनके हाथ में लोहे के मूसल-से बन गए, और उनसे उन्होंने समस्त आततायी यादवों को मार डाला। थोड़ी ही देर में, महात्मा श्रीकृष्ण और उनके सारथि दारुक को छोड़कर, कोई यादव जीवित न बचा; और भगवान् के शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग तथा खड्ग आदि आयुध सूर्य के मार्ग से ऊपर चले गए।
बलराम और श्रीकृष्ण का स्वधामगमन
वहीं घूमते हुए दोनों ने देखा कि बलरामजी एक वृक्ष के नीचे बैठे हैं और उनके मुख से एक विशाल फणधारी सर्प निकल रहा है; वह सर्प सिद्धों और नागों से पूजित होता हुआ समुद्र की ओर चला गया, और समुद्र ने अर्घ्य देकर उसे ग्रहण किया। बलराम का यों प्रयाण देख भगवान् ने दारुक से कहा, “उग्रसेन और वसुदेव से जाकर कहिए कि बलभद्र चले गए, यादवों का क्षय हो गया, और मैं भी योगस्थ होकर शरीर छोड़ूँगा; अब समुद्र सारी नगरी को डुबो देगा। सब लोग अर्जुन के आने की प्रतीक्षा करें और उसके साथ यहाँ से चले जाएँ; हमारे पीछे वज्र यदुवंश का राजा होगा।” दारुक बार-बार प्रणाम कर द्वारका गया, सबसे यह कह सुनाया और वज्र का राज्याभिषेक कराया।
तब भगवान् गोविन्द ने अपने सर्वभूतमय आत्मा को परब्रह्म में स्थापित कर, लीला समेटकर, तुरीय पद में स्थित हो गए। उसी समय, दुर्वासा के वचन का मान रखने के लिये (जिन्होंने पूर्वकाल में शाप दिया था कि उनके चरण में कभी छेद हो जाएगा) वे एक चरण दूसरी जाँघ पर रखकर योगयुक्त बैठ गए। तभी वह जरा नामक व्याध वहाँ आया, जिसने मूसल के बचे हुए लोहखण्ड को अपने बाण की नोक पर लगा रखा था। भगवान् के उस चरण-तल को मृग का मुख समझकर उसने दूर से ही उसे बाण से बींध डाला। पास आकर जब उसने चतुर्भुज पुरुष को देखा, तो चरणों में गिरकर बार-बार कहने लगा, “प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए! अनजाने में, मृग की आशंका से मैंने यह अपराध किया; कृपया क्षमा कीजिए।” भगवान् ने कहा, “आप तनिक भी न डरें; मेरी कृपा से आप अभी देवताओं के लोक स्वर्ग को चले जाइए।” वचन पूरा होते ही एक विमान आया, और वह व्याध उस पर चढ़कर स्वर्ग चला गया। तदनन्तर भगवान् अपने अव्यय, अचिन्त्य, अजन्मा और अमर विष्णु-स्वरूप में लीन होकर इस मानव-शरीर को त्याग गए।
द्वारका जलमग्न और परीक्षित् का राज्याभिषेक
अर्जुन ने राम, कृष्ण और अन्य मुख्य यादवों के शवों को ढूँढकर क्रमशः उनके और्ध्वदैहिक संस्कार किए। रुक्मिणी आदि आठ पटरानियों ने भगवान् के शरीर का आलिंगन कर अग्नि में प्रवेश किया; सती रेवती ने बलराम के देह के साथ, और यह अनिष्ट-समाचार सुनते ही उग्रसेन, वसुदेव, देवकी तथा रोहिणी ने भी अग्नि में प्रवेश किया। फिर अर्जुन वज्र, शेष कुटुम्बियों और श्रीकृष्ण की सहस्रों पत्नियों को साथ लेकर द्वारका से बाहर निकले। जिस दिन भगवान् ने पृथ्वी छोड़ी, उसी दिन सुधर्मा सभा और पारिजात-वृक्ष भी स्वर्ग को लौट गए, और मलिनदेह महाबली कलियुग पृथ्वी पर आ बैठा। जनशून्य द्वारका को समुद्र ने डुबो दिया; केवल श्रीकृष्ण का एक भवन उसने नहीं डुबोया, क्योंकि वहाँ भगवान् सदा निवास करते हैं।
मार्ग में एक विचित्र घटना हुई। अकेले धनुर्धारी अर्जुन को उन असहाय स्त्रियों को ले जाते देख आभीर दस्युओं के मन में लोभ जागा, और वे लाठियाँ तथा ढेले लेकर उन पर टूट पड़े। आश्चर्य यह कि जिस अर्जुन ने भीष्म, द्रोण और कर्ण को हराया था, वही आज अपना गाण्डीव भली-भाँति चढ़ा तक न सका, उसके अस्त्र-मन्त्र विस्मृत हो गए, और अक्षय तूणीर के बाण चुक गए; उसके देखते-देखते वे नीच आभीर बहुत-सी स्त्रियों को हर ले गए। दुःखी अर्जुन समझ गए कि उसका सारा बल तो श्रीकृष्ण का ही प्रभाव था, जो अब उसे छोड़ गया।
व्यासजी ने उसे इसका रहस्य समझाया: पूर्वकाल में महर्षि अष्टावक्र जल में डूबे तप कर रहे थे; रम्भा और तिलोत्तमा आदि अप्सराएँ उनकी स्तुति करने लगीं, तो प्रसन्न होकर मुनि ने उन्हें पुरुषोत्तम को पति-रूप में पाने का वर दिया। किन्तु जल से बाहर आते समय उनकी टेढ़ी देह देखकर वे हँस पड़ीं, तो मुनि ने शाप दिया कि पुरुषोत्तम को पाकर भी वे लुटेरों के हाथ पड़ेंगी। वे ही अप्सराएँ श्रीकृष्ण की पत्नियाँ हुईं, और उसी शाप से आभीरों के हाथ पड़ीं।
फिर व्यासजी ने कहा, “हे पाण्डव! शोक मत कीजिए; अखिलेश्वर ने ही सारे यदुकुल का उपसंहार किया है, और अब आप लोगों का अन्त भी निकट है। जो उत्पन्न हुआ उसकी मृत्यु निश्चित है, जो उठा उसका गिरना निश्चित, हर संयोग का अन्त वियोग और हर संचय का अन्त क्षय है; यह जानकर बुद्धिमान् न हानि पर शोक करते हैं, न लाभ पर हर्ष। अतः भाइयों सहित राज्य छोड़कर तप के लिये वन जाइए।” अर्जुन ने इन्द्रप्रस्थ लौटकर युधिष्ठिर और शेष भाइयों को सब कुछ कह सुनाया। तब पाण्डवों ने परीक्षित् को राज्य-पद पर अभिषिक्त किया और स्वयं वन को चले गए।
यही प्रसंग श्रीमद्भागवत में विस्तार से आता है (देखिए श्रीमद्भागवत का वर्णन), किन्तु विष्णुपुराण का यह कथन उससे प्राचीन और अधिक संक्षिप्त है। भगवान् वासुदेव ने यदुवंश में जन्म लेकर जो लीलाएँ कीं, उनका जो श्रद्धा से श्रवण करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर अन्त में विष्णुलोक को जाता है।
आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)