पराशरजी ने कहा, “अब सुनिए, मैत्रेय। संसार एक ही रूप में नहीं, कई रूपों में समेटा जाता है। एक नित्य प्रलय है, जो इसी क्षण चल रहा है, जिसमें प्राणी प्रतिदिन जन्मते और मरते रहते हैं। इसके अतिरिक्त तीन बड़े प्रलय हैं, नैमित्तिक, प्राकृत और आत्यन्तिक। पर इनके पहले काल का माप जान लीजिए, क्योंकि प्रलय काल की ही गोद में होता है।”
“मनुष्य का निमेष, अर्थात् एक मात्रा वाले अक्षर के उच्चारण में जितना समय लगे, वही माप की सबसे छोटी इकाई है। ऐसे पन्द्रह निमेषों की एक काष्ठा, तीस काष्ठा की एक कला, और पन्द्रह कला की एक नाडिका होती है, जिसे ताँबे के जल-पात्र से नापा जाता है। दो नाडिका का एक मुहूर्त, तीस मुहूर्त का एक दिन-रात, तीस दिन-रात का एक मास, और बारह मास का एक वर्ष होता है। मनुष्यों का यही एक वर्ष देवलोक में एक दिन-रात है; ऐसे तीन सौ साठ वर्षों का देवताओं का एक वर्ष, और बारह हजार दिव्य वर्षों का एक चतुर्युग होता है। एक हजार चतुर्युग का ब्रह्माजी का एक दिन होता है, और इसी में चौदह मनु बीत जाते हैं। यही एक कल्प है।”
नैमित्तिक प्रलय
“कल्प के अन्त में, हे मैत्रेय, ब्रह्माजी की रात्रि आती है, और तभी नैमित्तिक प्रलय होता है। सुनिए, इसका रूप अत्यन्त भयानक है। एक सहस्र चतुर्युग बीतने पर जब पृथ्वी क्षीण हो जाती है, तब सौ वर्ष तक घोर अनावृष्टि होती है, और अल्प शक्ति वाले प्राणी भूख से नष्ट हो जाते हैं। तब रुद्र रूप धारण किए भगवान् विष्णु सूर्य की सातों किरणों में स्थित होकर समुद्रों, नदियों और पातालों का सारा जल सोख लेते हैं। जल पीकर पुष्ट हुई वे सातों किरणें सात सूर्य बन जाती हैं, और ऊपर-नीचे, चारों ओर देदीप्यमान होकर सम्पूर्ण त्रिलोकी को भस्म कर डालती हैं। कहीं-कहीं बारह सूर्यों का वर्णन मिलता है, पर विष्णुपुराण यहाँ सात ही कहता है।”
“फिर काल-अग्नि रूप रुद्र शेषनाग के मुख से प्रकट होकर नीचे के पातालों को जला डालते हैं, और वह महान् अग्नि भूतल, भुवर्लोक और स्वर्गलोक को भी जलाकर ज्वालाओं का महान् आवर्त बना देती है; सारी त्रिलोकी एक तपे हुए कड़ाह के समान हो उठती है। ताप से पीड़ित होकर महर्लोक के निवासी जनलोक को चले जाते हैं। तब रुद्ररूपी भगवान् अपने मुख के निःश्वास से मेघों को उत्पन्न करते हैं। गजराज के समान विशाल वे मेघ, कोई नील, कोई श्वेत, कोई धूम्रवर्ण, बड़ी भयंकर गर्जना करते हुए आकाश को ढँक लेते हैं और मूसलधार वर्षा से उस भयंकर अग्नि को शान्त कर देते हैं। अग्नि के बुझ जाने पर भी वे मेघ सौ वर्ष से अधिक बरसते रहते हैं और सारे संसार को जल में डुबो देते हैं। जहाँ तक सप्तर्षियों का स्थान है, वहाँ तक जल भर जाता है, और सारी त्रिलोकी एक महासमुद्र के समान हो जाती है।”
“उस अपार जल पर भगवान् नारायण ब्रह्मरूप धारण किए शेषशय्या पर शयन करते हैं। जब तक वे सर्वात्मा जागते हैं, तब तक संसार की चेष्टाएँ चलती रहती हैं; और जब वे माया-शय्या पर सो जाते हैं, तब संसार भी लीन हो जाता है। ब्रह्माजी की यह रात्रि उनके दिन के ही समान एक सहस्र चतुर्युग की होती है। रात्रि के अन्त में वे फिर जागकर, ब्रह्मरूप धारण कर, पहले के समान ही सृष्टि रच देते हैं। कल्प के अन्त में होने वाला यही नैमित्तिक अथवा अवान्तर प्रलय कहलाता है।”
प्राकृत प्रलय
“अब प्राकृत प्रलय सुनिए, हे मैत्रेय। अनावृष्टि आदि के संयोग से जब समस्त लोक और पाताल नष्ट हो जाते हैं, तब महत्तत्त्व से लेकर पृथ्वी तक के समस्त विकार क्रमशः क्षीण होने लगते हैं। सबसे पहले जल पृथ्वी के गुण गन्ध को अपने में लीन कर लेता है; गन्ध के छिन जाने पर पृथ्वी गल जाती है और केवल जल शेष रहता है। फिर तेज जल के गुण रस को खींच लेता है; रस के नष्ट होने पर जल भी सूख जाता है और अग्नि रूप हो जाता है। फिर वायु अग्नि के गुण रूप को लीन कर लेती है, और अग्नि बुझ जाती है। फिर आकाश वायु के गुण स्पर्श को ग्रस लेता है, और वायु शान्त हो जाती है। तब केवल शब्द-गुण वाला, गोल और छिद्र-रूप आकाश ही सबको ढँके रहता है।”
“इसके पश्चात् भूतादि, अर्थात् तामस अहंकार, आकाश के गुण शब्द को ग्रस लेता है; और उस भूतादि को महत्तत्त्व अपने में लीन कर लेता है। अन्त में मूल प्रकृति महत्तत्त्व को भी अपने में समेट लेती है। सत्त्व, रज और तम, इन तीनों गुणों की जो साम्यावस्था है, वही प्रधान अथवा प्रकृति कहलाती है, और वही सम्पूर्ण जगत् का परम कारण है। इस व्यक्त और अव्यक्त रूप वाली प्रकृति में जो एक शुद्ध, अक्षर, नित्य और सर्वव्यापक पुरुष है, वह भी परमात्मा का ही अंश है। अन्त में प्रकृति और पुरुष, दोनों उसी परमात्मा में लीन हो जाते हैं। वही सबका आधार और एकमात्र अधीश्वर है; वेद और वेदान्तों में उसी को विष्णु के नाम से गाया गया है। यही प्रलय-वर्णन श्रीमद्भागवत में भी आता है, किन्तु विष्णुपुराण का यह ढंग अपने ही में सम्पूर्ण है।”
तीन ताप और आत्यन्तिक प्रलय
“हे मैत्रेय! आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक, इन तीनों तापों को जानकर जब मनुष्य में ज्ञान और वैराग्य उत्पन्न होता है, तब वह आत्यन्तिक प्रलय, अर्थात् मोक्ष को पाता है। आध्यात्मिक ताप दो प्रकार का है, शारीरिक और मानसिक। शिरोरोग, ज्वर, शूल और नाना व्याधियाँ शारीरिक ताप हैं; काम, क्रोध, भय, द्वेष, लोभ, मोह और शोक मानसिक ताप हैं। शीत, उष्ण, वायु और वर्षा से जो पीड़ा हो वह आधिदैविक, और मृग, सर्प, चोर आदि से जो कष्ट हो वह आधिभौतिक ताप है।”
“इनके अतिरिक्त गर्भ, जन्म, जरा और मृत्यु के दुःख तो सहस्रों प्रकार के हैं। मल से भरे गर्भ में उल्ब से लिपटा हुआ जीव, पीठ और गर्दन की हड्डियाँ मुड़ी हुई, माता के खाए खट्टे-कड़वे अन्न से पीड़ित, अपने सैकड़ों पूर्वजन्मों को स्मरण करता हुआ पड़ा रहता है। जन्म लेते समय प्रसूति-वायु उसका मुख नीचे कर देती है, और वह बड़े क्लेश से बाहर आता है। फिर बाल्यावस्था के मोह में वह भूल जाता है कि ‘मैं कहाँ से आया, कौन हूँ, कहाँ जाऊँगा।’ वृद्धावस्था में अंग शिथिल पड़ जाते हैं, दाँत उखड़ जाते हैं, और मरण-काल में यम-किंकरों के पाश तथा यातना-देह का भय सिर पर आ खड़ा होता है।”
“मनुष्य को जो-जो वस्तुएँ प्रिय हैं, वे ही उसके दुःख की बीज बन जाती हैं। स्त्री, पुत्र, धन और गृह से जितना सुख जान पड़ता है, उससे कहीं अधिक दुःख उन्हीं से मिलता है। इसलिए इस संसार-रूपी सूर्य के ताप से जिनका अन्तःकरण तप रहा है, उनके लिए भगवत्प्राप्ति ही एकमात्र शीतल छाया है। यही आत्यन्तिक निवृत्ति है, और इसके साधन दो हैं, कर्म और ज्ञान।”
भगवान् और वासुदेव
“ज्ञान दो प्रकार का है, हे मैत्रेय। शास्त्र से जन्मा शब्दब्रह्म का ज्ञान दीपक के समान है, और विवेक से जन्मा परब्रह्म का बोध सूर्य के समान। जो अव्यक्त, अजर, अचिन्त्य, अजन्मा और अव्यय है, जिसे विद्वज्जन परमधाम कहते हैं, वही अति सूक्ष्म परमपद है। परमात्मा का वही स्वरूप ‘भगवत्’ शब्द का वाच्य है। इस शब्द में भकार के दो अर्थ हैं, पोषण करने वाला और सबका आधार; और गकार के अर्थ हैं, कर्मफल देने वाला, लय करने वाला और रचयिता। सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य, इन छहों का नाम ‘भग’ है, और इसी से युक्त होने के कारण परब्रह्म को ‘भगवान्’ कहते हैं।”
“और ‘वासुदेव’ का अर्थ पूर्वकाल में केशिध्वज ने राजा खाण्डिक्य को इस प्रकार बताया था, कि जो समस्त भूतों में निवास करते हैं और सम्पूर्ण भूत भी जिन्हीं में रहते हैं, वे ही संसार के रचयिता और रक्षक भगवान् ‘वासुदेव’ कहलाते हैं। वे सर्वात्मा समस्त आवरणों से परे हैं, प्रकृति और उसके विकारों से विलक्षण हैं, समस्त कल्याण-गुणों के आगार हैं। जो उन्हें निर्दोष, विशुद्ध और एकरूप देखता या जानता है, उसी का नाम ज्ञान है, और जो इसके विपरीत है वही अज्ञान।” यह कहकर पराशरजी बोले, “इस प्रकार, मैत्रेय, मैंने आपसे आत्यन्तिक प्रलय भी कह दिया।”
आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)