मैत्रेय का प्रश्न
मैत्रेय जी ने पराशर जी से कहा, “हे गुरो! आपने जो कुछ बताया, वह सब मैंने भली भाँति सुन लिया। अब एक बात और जाननी है। सातों द्वीप, सातों पाताल और सातों लोक, इस ब्रह्माण्ड के भीतर जितने भी स्थान हैं, स्थूल से लेकर सूक्ष्मातिसूक्ष्म तक के कर्मबद्ध जीवों से भरे पड़े हैं। अंगुल के आठवें भाग जितनी भी ऐसी जगह नहीं, जहाँ कोई प्राणी न हो। ये सब आयु के अन्त में यमराज के वश में चले जाते हैं और उनकी आज्ञा से नरक की नाना यातनाएँ भोगते हैं, फिर उन यातनाओं से छूटकर देव आदि योनियों में घूमते रहते हैं। हे मुनिश्रेष्ठ! मुझे वह कर्म बताइए, जिसे करने से मनुष्य यमराज के वश में नहीं आता।”
पराशर जी बोले, “हे मैत्रेय! यही प्रश्न बहुत पहले महात्मा नकुल ने पितामह भीष्म से पूछा था। भीष्म जी ने जो उत्तर दिया, वही सुनिए। उन्होंने कहा था कि पूर्वकाल में कलिंग देश का एक ब्राह्मण उनके पास आया था। वह जो-जो बात जिस प्रकार होने को कहता, वह वैसी ही होती; उसकी किसी बात को भीष्म ने कभी अन्यथा होते नहीं देखा। इसी श्रद्धा से एक दिन उन्होंने उससे यही प्रश्न पूछा। उस ब्राह्मण को किसी जातिस्मर मुनि ने, जिसे अपने पूर्वजन्मों का स्मरण था, यम और उनके दूतों के बीच हुआ एक अत्यन्त गूढ़ रहस्य सुनाया था। वही संवाद उस ब्राह्मण ने भीष्म को, और भीष्म ने नकुल को कह सुनाया। सुनिए, वह कैसा था।”
यमराज की गुप्त आज्ञा
पाश हाथ में लिये अपने दूत को पास देखकर यमराज ने उसके कान में धीरे से कहा, “जो लोग भगवान् मधुसूदन की शरण में चले गये हैं, उन वैष्णवों को छोड़ देना। उनके सिवा और सब मनुष्यों का स्वामी मैं हूँ, किन्तु उन पर मेरा अधिकार नहीं। देव-पूज्य विधाता ने मुझे ‘यम’ नाम से लोकों के पाप–पुण्य का विचार करने के लिए नियुक्त किया है, पर मैं भी अपने गुरु श्रीहरि के अधीन हूँ, स्वतन्त्र नहीं। भगवान् विष्णु तो मुझ पर भी शासन करने में समर्थ हैं।
“जैसे सोना एक और अभिन्न होकर भी कड़े, मुकुट और कर्णफूल आदि भेदों से नाना रूपों में दीखता है, वैसे ही एक ही हरि देव, मनुष्य और पशु आदि नाना कल्पनाओं से जाने जाते हैं। और जैसे वायु के शान्त होने पर उसमें उड़ते धूलिकण पृथ्वी में मिलकर एक हो जाते हैं, वैसे ही गुण-क्षोभ से उत्पन्न ये सारे प्राणी अन्त में उसी सनातन परमात्मा में लीन हो जाते हैं। जो पुरुष परमार्थ–बुद्धि से भगवान् के चरणों की वन्दना करता है, उसके सारे पाप-बन्धन घी की आहुति पड़ी अग्नि के समान भस्म हो जाते हैं। ऐसे पुरुष को आप दूर ही से छोड़ दीजिए।”
पाशधारी दूत ने पूछा, “प्रभो! सबके विधाता भगवान् हरि का भक्त कैसा होता है, यह आप मुझसे कहिए।”
भक्त कौन है
यमराज बोले, “हे दूत! जो पुरुष अपने वर्ण–धर्म से विचलित नहीं होता, जो मित्र और शत्रु के प्रति समान भाव रखता है, किसी का धन नहीं हरता और किसी जीव की हिंसा नहीं करता, वह राग आदि से रहित निर्मल-चित्त पुरुष ही भगवान् विष्णु का भक्त है। जिसका मन कलि के मल से मलिन नहीं हुआ, जिसने अपने हृदय में श्रीजनार्दन को बसा रखा है, उसे भगवान् का अत्यन्त भक्त जानिए। जो एकान्त में पड़े दूसरे के सोने को भी तृण के समान समझता है और निरन्तर अनन्यभाव से भगवान् का चिन्तन करता है, वही विष्णु का भक्त है।
“कहाँ तो स्फटिक-गिरि के समान निर्मल भगवान् विष्णु, और कहाँ मनुष्यों के चित्त में बसे राग-द्वेष के दोष! इन दोनों का मेल कभी नहीं हो सकता, जैसे चन्द्रमा की किरणों में अग्नि के ताप की उष्णता कभी नहीं ठहरती। जो निर्मल-चित्त, मात्सर्य से रहित, शान्त और शुद्ध-चरित्र है, जो सब जीवों का सुहृद्, प्रिय और हितकारी है, अभिमान और माया से रहित है, उसके हृदय में भगवान् वासुदेव सदा विराजते हैं। ऐसे पुरुष के हृदय में सनातन भगवान् के बसते ही वह इस जगत् में सौम्यमूर्ति हो जाता है, जैसे नया शालवृक्ष अपने भीतर भरे अति सुन्दर रस को अपने ही सौन्दर्य से प्रकट कर देता है।
“हे दूत! जिनकी पापराशि दूर हो चुकी, जिनका हृदय निरन्तर श्रीअच्युत में लगा रहता है, जिनमें गर्व, अभिमान और मात्सर्य का लेश भी नहीं, उन मनुष्यों को आप दूर ही से त्याग दीजिए। जिसके हृदय में शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले अव्यय भगवान् हरि विराजते हैं, उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं। भला सूर्य के रहते अन्धकार कैसे ठहर सकता है?”
जिनके पास मत जाना
“और हे दूत! जो दूसरों का धन हरता है, जीवों की हिंसा करता है, झूठ और कटु वचन बोलता है, उस दुष्टबुद्धि के हृदय में भगवान् अनन्त कभी नहीं टिकते। जो दूसरों का वैभव देख नहीं सकता, साधुजनों की निन्दा और अपकार करता है, सम्पन्न होकर भी न विष्णु की पूजा करता है और न भक्तों को कुछ देता है, उस अधम के हृदय में श्रीजनार्दन कभी निवास नहीं करते। जो अपने परम सुहृद्, बन्धु-बान्धव, स्त्री, पुत्र, कन्या, पिता और भृत्यवर्ग तक के प्रति अर्थ-तृष्णा दिखाता है, उस पापाचारी को भगवान् का भक्त मत समझिए। और जो नित्य नीच पुरुषों के संग में उन्मत्त रहकर पापमय कर्मों से बँधता जाता है, वह तो मनुष्यरूप में पशु ही है।
“किन्तु जिनकी बुद्धि इतनी स्थिर हो गयी कि ‘यह सारा प्रपंच और मैं, एक परमेश्वर वासुदेव ही हैं’, और जो ‘हे कमलनयन! हे वासुदेव! हे विष्णो! हे धरणीधर! हे अच्युत! हे शंख-चक्र-पाणि! मैं आपकी शरण में हूँ’ यों पुकारते हैं, उन निष्पाप जनों को आप दूर ही से छोड़ दीजिए। जिसके अन्तःकरण में वे अव्यय भगवान् विराजते हैं, उसकी दृष्टि जहाँ तक जा पड़े, वहाँ तक भगवान् के चक्र के प्रभाव से हमारा बल-वीर्य नष्ट हो जाता है। हमारी अथवा आपकी वहाँ कोई गति नहीं। वह महापुरुष तो वैकुण्ठ आदि लोकों का ही पात्र है।”
रहस्य का उपसंहार
कलिंग-ब्राह्मण ने कहा, “हे कुरुश्रेष्ठ! अपने दूत को शिक्षा देने के लिए सूर्यपुत्र धर्मराज ने उससे यही कहा था।” फिर भीष्म जी बोले, “हे नकुल! वही सम्पूर्ण वृत्तान्त मैंने आपको ज्यों-का-त्यों सुना दिया। इस संसार-सागर में एक विष्णु भगवान् को छोड़कर जीव का और कोई रक्षक नहीं। जिसका हृदय निरन्तर भगवान् में लगा रहता है, उसका यम, यमदूत, यमपाश, यमदण्ड अथवा यमयातना कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते।”
पराशर जी बोले, “हे मुने! आपके प्रश्न के अनुसार यमराज ने जो कुछ कहा था, वह सब मैंने आपको सुना दिया।”
आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)