जड़भरत ने सौवीर-नरेश को एक पुरानी कथा सुनायी, महर्षि ऋभु और उनके शिष्य निदाघ की। ब्रह्माजी के पुत्र ऋभु स्वभाव से ही परमार्थ–तत्त्व के ज्ञाता थे। पुलस्त्य के पुत्र निदाघ उनके शिष्य थे, और ऋभु ने उन्हें बड़े प्रेम से सम्पूर्ण तत्त्वज्ञान का उपदेश दिया था। किन्तु ऋभु ने देखा कि निदाघ सब शास्त्रों को जानते हुए भी अद्वैत में स्थिर नहीं हो पाए हैं; भेद की गाँठ अभी बनी है। देविका नदी के तट पर वीरनगर नामक एक रमणीय, समृद्ध नगर था, जहाँ निदाघ रहते थे। एक सहस्र दिव्य वर्ष बीतने पर ऋभु अपने शिष्य को देखने वहाँ पहुँचे।
उस समय निदाघ बलि-वैश्वदेव के पश्चात् अपने द्वार पर अतिथि की प्रतीक्षा कर रहे थे। गुरु को द्वार पर देखते ही वे उन्हें आदरपूर्वक घर ले गए, हाथ-पैर धुलाए, आसन पर बिठाया और बोले, “भोजन कीजिए।” ऋभु ने कहा, “हे विप्रवर! आपके यहाँ कैसा भोजन बनेगा? मुझे तुच्छ अन्न में रुचि नहीं।” निदाघ बोले, “घर में सत्तू है, जौ की लपसी है, कन्द-मूल-फल और पुए बने हैं; इनमें से जो रुचे, वही ग्रहण कीजिए।” ऋभु ने कहा, “ये तो सब साधारण अन्न हैं; मुझे तो हलवा, खीर और खाँड़ से बना कोई स्वादिष्ट भोजन कराइए।” निदाघ ने अपनी गृहिणी से कहकर बड़े यत्न से मीठा, स्वादिष्ट भोजन तैयार कराया, और गुरु ने उसे तृप्ति से खाया।
भोजन के बाद निदाघ ने बड़ी विनय से पूछा, “कहिए, आप तृप्त और सन्तुष्ट हुए न? और यह भी बताइए कि आप कहाँ रहते हैं, कहाँ जा रहे हैं, कहाँ से पधारे हैं?” ऋभु मुसकराए और बोले, “भूख तो उसे लगती है, तृप्ति भी उसी को होती है; मुझे तो कभी भूख लगती ही नहीं, फिर तृप्ति क्या पूछते हैं? भूख और प्यास देह के धर्म हैं, मेरे नहीं; स्वस्थता और सन्तोष मन के धर्म हैं, आत्मा का इनसे कोई सम्बन्ध नहीं। और जो आपने पूछा, कहाँ रहता हूँ, कहाँ जाता हूँ, सो सुनिए: आत्मा तो आकाश के समान सर्वव्यापी है; फिर कहाँ का आना और कहाँ का जाना? न मैं कहीं जाता हूँ, न आता हूँ, न किसी एक स्थान पर रहता हूँ। वस्तुतः न कोई ‘आप’ है, न कोई ‘अन्य’, न कोई ‘मैं’। और जिस स्वादिष्ट भोजन की आपने बात की, जो अन्न आज रुचिकर लगता है वही समय पाकर अरुचिकर हो जाता है; तो सचमुच स्वादु क्या और अस्वादु क्या? यह देह मिट्टी का घर है, और जौ-गेहूँ, घी-दूध, फल और मिष्ठान्न, सब पार्थिव परमाणु ही तो हैं जिनसे यह पुष्ट होती है। यह जानकर अपने चित्त को समदर्शी बनाइए, क्योंकि मोक्ष का एकमात्र उपाय समता ही है।”
ये परमार्थमय वचन सुनकर निदाघ ने गुरु के चरणों में प्रणाम कर कहा, “प्रभो! प्रसन्न हूजिए। मुझ पर कृपा करके आए हुए आप कौन हैं? आपके इन वचनों को सुनकर मेरा सारा मोह नष्ट हो गया।” ऋभु बोले, “हे द्विज! मैं आपका गुरु ऋभु हूँ; आपके स्नेह के कारण आपको उपदेश देने आया था। समस्त पदार्थों में अद्वैत-आत्म-बुद्धि रखना, यही परमार्थ का सार है, जो मैंने आपको संक्षेप में कह दिया।” इतना कहकर ऋभु स्वेच्छा से चले गए।
ऊपर कौन, नीचे कौन
फिर एक सहस्र वर्ष और बीते, और ऋभु दुबारा उसी नगर में निदाघ को ज्ञान देने आए। इस बार उन्होंने देखा कि नगर का राजा बड़ी सेना और धूम-धाम से नगर में प्रवेश कर रहा है। भीड़ से हटकर, वन से कुश और समिधा लिए, भूखा-प्यासा निदाघ एक ओर खड़ा था। ऋभु उसके पास गए और बोले, “हे द्विज! यहाँ एकान्त में इस प्रकार क्यों खड़े हैं?” निदाघ ने कहा, “आज इस रमणीय नगर में राजा का प्रवेश हो रहा है, मार्ग में बड़ी भीड़ है, इसीलिए यहाँ खड़ा हूँ।” ऋभु बोले, “आप तो यहाँ की सब बातें जानते हैं; कहिए, इनमें राजा कौन है और दूसरे लोग कौन?” निदाघ ने कहा, “जो यह पर्वत-सा ऊँचा मत्त गजराज पर चढ़ा हुआ है, वही राजा है; शेष सब उसके परिजन हैं।”
ऋभु ने कहा, “आपने राजा और हाथी दोनों एक साथ दिखा दिए, पर इन दोनों का भेद तो नहीं बताया। बताइए, इनमें राजा कौन है और हाथी कौन?” निदाघ बोले, “इनमें जो नीचे है वह हाथी है, और उसके ऊपर जो है वही राजा। यह वाह्य और वाहक का सम्बन्ध कौन नहीं जानता?” ऋभु ने कहा, “फिर भी मुझे इस प्रकार समझाइए कि ‘नीचे’ शब्द का अर्थ क्या है और ‘ऊपर’ किसे कहते हैं।” यह सुनते ही निदाघ अकस्मात् उछलकर ऋभु की पीठ पर चढ़ बैठे और बोले, “सुनिए, जो आपने पूछा वही दिखाता हूँ। इस समय राजा की भाँति मैं ऊपर हूँ, और हाथी की भाँति आप नीचे हैं। समझाने के लिए ही यह दृष्टान्त दिखाया है।” ऋभु ने मुसकराकर कहा, “हे द्विजश्रेष्ठ! यदि आप राजा के समान ऊपर हैं और मैं हाथी के समान नीचे, तो यह भी बता दीजिए, इन दोनों में ‘आप’ कौन हैं और ‘मैं’ कौन?”
इस प्रश्न के साथ ही निदाघ की आँखें खुल गयीं। वे तुरन्त उतरकर गुरु के दोनों चरण पकड़कर बोले, “निश्चय ही आप मेरे आचार्य महर्षि ऋभु हैं! ऐसा अद्वैत-संस्कारयुक्त चित्त और किसका होगा? आप ही मेरे गुरु बनकर फिर पधारे हैं।” ऋभु ने स्नेह से कहा, “हे निदाघ! पहले आपने सेवा और शुश्रूषा से मेरा बड़ा आदर किया था; उसी स्नेह के कारण मैं फिर उपदेश देने आया हूँ। सुनिए, समस्त पदार्थों में अद्वैत-आत्म-बुद्धि रखना, यही परमार्थ का सार है। इस सम्पूर्ण जगत् को एक ही वासुदेव–परमात्मा का स्वरूप जानिए; इसमें भेद-भाव कुछ भी नहीं।” निदाघ ने “बहुत अच्छा” कहकर प्रणाम किया, और गुरु ऋभु स्वेच्छा से चले गए। उनके उपदेश से निदाघ भी अद्वैत-चिन्तन में तत्पर हो गए, समस्त प्राणियों को अपने से अभिन्न देखने लगे, और अन्ततः परम मोक्ष-पद को प्राप्त हुए।
यही कथा सुनाकर जड़भरत ने सौवीर-नरेश से कहा, “जैसे उस ब्रह्मपरायण निदाघ ने परम मोक्ष पाया, वैसे ही आप भी शत्रु और मित्र में समान भाव रखते हुए इसी जन्म में मुक्त हो सकते हैं। जैसे एक ही आकाश भ्रान्त दृष्टि को श्वेत और नील दीखता है, वैसे ही एक ही आत्मा भेद-रूप में प्रतीत होती है। इस संसार में जो कुछ है, सब एक ही अविनाशी आत्मा है; भेद-ज्ञान का यह मोह छोड़ दीजिए।” इतना सुनते ही सौवीर-नरेश ने भेद-बुद्धि त्याग दी, और परमार्थ-दृष्टि का आश्रय लेकर उसी जन्म में मुक्त हो गए।
आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)