मैत्रेय ने पराशरजी से कहा, “हे भगवन्! मैं उस योग को जानना चाहता हूँ, जिसे जान लेने पर अखिलाधार परमेश्वर के दर्शन हो सकें। उसका वर्णन कीजिए।” पराशरजी बोले, “सुनिए, मैत्रेय। पूर्वकाल में यही योग महात्मा केशिध्वज ने राजा खाण्डिक्य को बताया था; वही मैं आपसे कहता हूँ।” मैत्रेय ने पूछा, “पर ये केशिध्वज और खाण्डिक्य कौन थे, और उनका यह संवाद किस कारण हुआ?”
पराशरजी ने कहा, “धर्मध्वज नामक एक जनक थे। उनके दो पुत्र हुए, अमितध्वज और कृतध्वज। कृतध्वज का पुत्र केशिध्वज हुआ, जो अध्यात्म–विद्या में विशेषज्ञ था; और अमितध्वज का पुत्र खाण्डिक्य जनक हुआ, जो कर्म-मार्ग में अत्यन्त निपुण था। ये दोनों चचेरे भाई परस्पर एक-दूसरे को जीतने की चेष्टा में लगे रहते थे। अन्त में केशिध्वज ने खाण्डिक्य को राज्य से च्युत कर दिया, और वह अपने पुरोहित तथा मन्त्रियों को लेकर दुर्गम वन में चला गया। केशिध्वज ज्ञाननिष्ठ था, फिर भी मृत्यु को पार करने के लिए अनेक यज्ञों का अनुष्ठान करता रहता था।”
गौ की मृत्यु और शत्रु का द्वार
“एक दिन, जब केशिध्वज यज्ञ में लगा था, हवि के लिए दूध देने वाली उसकी धर्मधेनु को निर्जन वन में एक सिंह ने मार डाला। राजा ने ऋत्विजों से पूछा, ‘इसका क्या प्रायश्चित्त है?’ उन्होंने कहा, ‘हम नहीं जानते; कशेरु से पूछिए।’ कशेरु ने भी यही कहकर भृगुपुत्र शुनक के पास भेज दिया। शुनक बोले, ‘इस समय भूमण्डल में इस बात को न मैं जानता हूँ, न कोई और; केवल वही जानता है जिसे आपने परास्त किया है, आपका शत्रु खाण्डिक्य।’”
“यह सुनकर केशिध्वज ने मन में सोचा, ‘मैं अपने शत्रु खाण्डिक्य से ही यह बात पूछने जाऊँगा। यदि उसने मुझे मार डाला, तो मुझे महायज्ञ का फल मिलेगा; और यदि उसने प्रायश्चित्त बता दिया, तो मेरा यज्ञ निर्विघ्न पूरा हो जाएगा।’ ऐसा सोचकर वह मृगचर्म का कवच धारण कर, रथ पर चढ़कर उस वन में गया, जहाँ खाण्डिक्य रहता था। अपने शत्रु को आते देख खाण्डिक्य ने धनुष चढ़ा लिया और क्रोध से नेत्र लाल करके कहा, ‘क्या आप यह मृगचर्म बाँधकर हमें मारने आए हैं?’ केशिध्वज बोले, ‘हे खाण्डिक्य! मैं आपको मारने नहीं, एक सन्देह पूछने आया हूँ; इस बात को सोचकर आप मुझ पर क्रोध अथवा बाण छोड़ दीजिए।’”
“खाण्डिक्य ने अपने मन्त्रियों से एकान्त में सलाह की। मन्त्रियों ने कहा, ‘इस समय शत्रु आपके वश में है; इसे मार डालिए, सारी पृथ्वी आपके अधीन हो जाएगी।’ पर खाण्डिक्य ने विचार किया, ‘इसे मारने से मुझे यह पृथ्वी अवश्य मिलेगी, पर इसे न मारने से पारलौकिक जय मिलेगी। पारलौकिक जय अनन्त काल की होती है, और पृथ्वी तो थोड़े ही दिन रहती है। इसलिए मैं इसे मारूँगा नहीं; यह जो पूछेगा, बता दूँगा।’ यह निश्चय कर वह अपने शत्रु के पास गया और बोला, ‘जो पूछना हो, पूछिए।’ केशिध्वज ने धर्मधेनु के वध का सारा वृत्तान्त कहा, और खाण्डिक्य ने उसका सम्पूर्ण प्रायश्चित्त विधिपूर्वक बता दिया।”
गुरु-दक्षिणा
“प्रायश्चित्त जानकर केशिध्वज लौट आया और यज्ञभूमि में पहुँचकर उसने सम्पूर्ण कर्म समाप्त किया। यज्ञ के अन्त में अवभृथ-स्नान करके, कृतकृत्य होकर, वह सोचने लगा, ‘मैंने सब ऋत्विजों और सदस्यों का सम्मान किया, याचकों को उनकी इच्छित वस्तुएँ दीं, सब कर्तव्य पूरे किए; फिर भी मेरे चित्त में कोई क्रिया अधूरी-सी क्यों खटक रही है?’ तब उसे स्मरण हुआ कि उसने अपने आचार्य खाण्डिक्य को गुरु–दक्षिणा नहीं दी। वह फिर रथ पर चढ़कर उसी वन में गया। खाण्डिक्य उसे फिर शस्त्र लिए आते देख मारने को उद्यत हुआ, पर केशिध्वज ने कहा, ‘खाण्डिक्य! क्रोध न कीजिए; मैं आपका कोई अनिष्ट करने नहीं, गुरु-दक्षिणा देने आया हूँ। आपके उपदेश से मैंने अपना यज्ञ भली प्रकार समाप्त किया; अब जो चाहें, माँग लीजिए।’”
“खाण्डिक्य ने फिर मन्त्रियों से परामर्श किया। उन्होंने कहा, ‘इससे सम्पूर्ण राज्य माँग लीजिए; बुद्धिमान् लोग शत्रुओं से बिना सैनिकों को कष्ट दिए राज्य ही माँगा करते हैं।’ खाण्डिक्य हँसकर बोला, ‘मेरे-जैसे लोग, जो कुछ ही दिन रहने वाला राज्य भोगते हैं, वे राज्य क्यों माँगेंगे? आप स्वार्थ-साधन का ही परामर्श देते हैं; परमार्थ क्या है, यह आप नहीं जानते।’ फिर वह केशिध्वज के पास जाकर बोला, ‘क्या आप मुझे सचमुच गुरु-दक्षिणा देंगे?’ केशिध्वज ने कहा, ‘अवश्य दूँगा।’ तब खाण्डिक्य बोला, ‘आप अध्यात्म-विद्या में बड़े कुशल हैं। यदि देना ही चाहते हैं, तो वह उपाय बता दीजिए, जो समस्त क्लेशों की शान्ति करने में समर्थ हो।’”
“केशिध्वज ने पूछा, ‘क्षत्रिय को राज्य से बढ़कर कुछ प्रिय नहीं; फिर आपने मेरा राज्य क्यों नहीं माँगा?’ खाण्डिक्य ने उत्तर दिया, ‘राज्य की आकांक्षा मूर्खों को हुआ करती है। क्षत्रिय का धर्म तो प्रजा का पालन और धर्म-युद्ध में शत्रुओं का वध है। यदि आपने मेरी निर्बलता के कारण मेरा राज्य ले लिया, तो इसमें मुझ पर कोई दोष नहीं। राज्य की चाह जन्मान्तर के भोगों के लिए होती है; मेरे जैसे लोग उसे नहीं चाहते।’”
ब्रह्मयोग
“केशिध्वज प्रसन्न होकर बोला, ‘सुनिए, खाण्डिक्य। संसार-वृक्ष का बीज अविद्या है। अनात्मा में आत्मा की बुद्धि, और जो अपना नहीं उसे अपना मानना, यही अविद्या है। यह पंचभूतों का शरीर मिट्टी के घर के समान है, जिस पर मिट्टी का ही लेप है; इसमें जो मैं और मेरा का भाव करता है, वही बँधता है। इस बन्धन को काटने वाला योग है। मन ही बन्धन और मोक्ष का कारण है; विषयों में लगा हुआ वह बाँधता है, और विषयों से हटकर परब्रह्म में लगा हुआ वह मुक्त कर देता है। जैसे चुम्बक लोहे को अपनी ओर खींच लेता है, वैसे ही ब्रह्म-चिन्तन करने वाले मुनि को परमात्मा स्वभाव से ही अपने में लीन कर लेता है। आत्मज्ञान के प्रयत्न से युक्त मन की जो विशिष्ट गति है, वही ब्रह्म के साथ संयोग, अर्थात् योग कहलाता है।’”
“‘योगी को पहले ब्रह्मचर्य, अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह, इन पाँच यमों का, तथा स्वाध्याय, शौच, सन्तोष, तप और परब्रह्म में मन लगाने, इन पाँच नियमों का निष्काम भाव से पालन करना चाहिए। फिर भद्रासन आदि किसी आसन पर बैठकर वह प्राण और अपान का निरोध करे; रेचक, पूरक और कुम्भक, ये तीन प्राणायाम हैं, और आलम्बन-भेद से यह सबीज तथा निर्बीज दो प्रकार का है। प्राणायाम से इन्द्रियों को वश में करके, प्रत्याहार से चित्त को विषयों से हटाकर, वह धारणा में स्थित हो।’”
“‘धारणा बिना किसी आधार के नहीं होती; इसलिए योगी पहले भगवान् विष्णु के स्थूल मूर्तरूप का ध्यान करे। प्रसन्न मुख, कमलदल-से नेत्र, सुन्दर कपोल और विशाल भाल, कानों में कुण्डल, शंख-सी ग्रीवा, वक्ष पर श्रीवत्स का चिह्न, गहरी नाभि, लम्बी भुजाएँ, किरीट, केयूर और कटक से विभूषित, शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग तथा खड्ग धारण किए, वर और अभय देते हुए, पीताम्बरधारी उस दिव्य रूप का चिन्तन करे, जब तक चलते-फिरते और उठते-बैठते भी वह मूर्ति चित्त से दूर न हो जाए। धारणा दृढ़ हो जाने पर वह आभूषण और आयुधों से रहित शान्त रूप का, फिर किसी एक अंग का, और अन्त में अमूर्त परब्रह्म का ही ध्यान करे। जिसमें चित्त लगाने वाला फिर कभी नरक नहीं जाता, जिसके स्मरण में स्वर्ग भी विघ्नरूप है, वही अच्युत परमात्मा ज्ञान का विषय है; और उसमें भेद-बुद्धि का नाश ही आत्यन्तिक मुक्ति है।’”
“यह ब्रह्मयोग सुनकर खाण्डिक्य कृतकृत्य हो गया और बोला, ‘आपने मेरे चित्त का सारा मल धो दिया। मैंने जो मेरा कहा था, वह भी असत्य ही था; मैं और मेरा, यह सब अविद्या ही है।’ दोनों ने परस्पर पूजा की और केशिध्वज अपने नगर लौट आया। खाण्डिक्य अपने पुत्र को राज्य सौंपकर वन में गया, गोविन्द में चित्त लगाकर योग सिद्ध किया, और विष्णु नामक निर्मल ब्रह्म में लीन हो गया। केशिध्वज भी अपने कर्मों का क्षय करता हुआ, ताप-त्रय को दूर करने वाली आत्यन्तिक सिद्धि को प्राप्त हो गया।”
उपसंहार
पराशरजी ने कहा, “इस प्रकार, मैत्रेय, मैंने आपसे वह आत्यन्तिक प्रलय भी कह दिया, जो सनातन ब्रह्म में लय, अर्थात् मोक्ष ही है। मैंने आपको संसार की उत्पत्ति, प्रलय, वंश, मन्वन्तर और वंशों के चरित्र सुना दिए। यह वैष्णव पुराण समस्त शास्त्रों में श्रेष्ठ, सर्वपापनाशक और पुरुषार्थ का प्रतिपादक है। इसे भक्तिपूर्वक सुनने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। अश्वमेध-यज्ञ का, प्रयाग, पुष्कर और कुरुक्षेत्र में उपवास का, तथा वर्ष भर अग्निहोत्र का जो फल है, वही इसके श्रवण से मिल जाता है।”
“इस आर्ष पुराण को सबसे पहले ब्रह्माजी ने ऋभु को सुनाया; ऋभु ने प्रियव्रत को, प्रियव्रत ने भागुरि को, भागुरि ने स्तम्भमित्र को, स्तम्भमित्र ने दधीचि को, दधीचि ने सारस्वत को, और सारस्वत ने भृगु को सुनाया। फिर भृगु ने पुरुकुत्स को, पुरुकुत्स ने नर्मदा को, और नर्मदा ने नागराज वासुकि को दिया; वासुकि से होता हुआ यह वत्स, अश्वतर, कम्बल और एलापुत्र तक पहुँचा। तब मुनिवर वेदशिरा पाताल में पहुँचकर इसे पा गए और प्रमति को सुनाया, प्रमति ने जातुकर्ण को, और जातुकर्ण ने अन्य पुण्यशील महात्माओं को। मुझे यह पुराण पूर्वजन्म में सारस्वत के मुख से सुना हुआ, पुलस्त्यजी के वरदान से स्मरण रह गया, सो मैंने ज्यों-का-त्यों आपको सुना दिया; और आप भी कलियुग के अन्त में इसे शिनीक को सुनाएँगे।”
यह सुनकर मैत्रेय ने हाथ जोड़कर कहा, “हे गुरो! आपकी कृपा से मेरे समस्त सन्देह निवृत्त हो गए और मेरा चित्त निर्मल हो गया। मैंने चार प्रकार की राशि, तीन प्रकार की शक्तियों और तीन भाव-भावनाओं को भली प्रकार जान लिया। अब मुझे यह भी बोध हो गया कि यह सम्पूर्ण जगत् श्रीविष्णुभगवान् से भिन्न नहीं है; इसलिए और कुछ जानना शेष नहीं रहा।” इस प्रकार पराशर और मैत्रेय का यह संवाद, और यह श्रीविष्णुमहापुराण, यहीं पूर्ण होता है।
आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)