मैत्रेय बहुत कुछ सुन चुके थे। सृष्टि की रचना, अनेक वंशों की परम्परा, मन्वन्तरों की स्थिति और बड़े-बड़े राजाओं के चरित्र, यह सब पराशरजी ने उन्हें विस्तार से कह सुनाया था। अब उनके मन में एक और जिज्ञासा उठी। हाथ जोड़कर वे बोले, “हे महामुने! अब हम आपसे उस महाप्रलय का यथार्थ वर्णन सुनना चाहते हैं, जिसमें कल्प के अन्त में यह सारा संसार समेट लिया जाता है।”
पराशरजी ने कहा, “सुनिए, मैत्रेय। पहले काल का माप समझ लीजिए, फिर प्रलय की बात सहज हो जाएगी। मनुष्यों का एक मास पितरों का एक दिन-रात होता है, और मनुष्यों का एक वर्ष देवताओं का एक दिन-रात। ऐसे दो सहस्र चतुर्युग बीतने पर ब्रह्माजी का एक दिन-रात पूरा होता है। सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि, ये चार युग मिलकर बारह हजार दिव्य वर्ष के होते हैं। हर मन्वन्तर में पहले सत्ययुग और अन्तिम कलियुग को छोड़कर शेष सब चतुर्युग एक समान रहते हैं। जैसे आदि सत्ययुग में ब्रह्माजी जगत् की रचना करते हैं, वैसे ही अन्तिम कलियुग में वे उसका उपसंहार करते हैं।”
यह सुनकर मैत्रेय ने पूछा, “हे भगवन्! उस कलि का स्वरूप विस्तार से कहिए, जिसमें चार चरणों वाले धर्म का प्रायः लोप हो जाता है।”
कलियुग का रूप
पराशरजी बोले, “सुनिए, मैत्रेय। कलियुग में मनुष्यों की प्रवृत्ति वर्णाश्रम-धर्म के अनुकूल नहीं रहती। न ऋक्-साम-यजु रूप त्रयी-धर्म का सम्पादन होता है, न विवाह धर्म्य रीति से होते हैं, न शिष्य और गुरु का सम्बन्ध टिकता है, न अग्नि में देवयज्ञ की क्रिया होती है। जो किसी भी कुल में बलवान् हो, वही सबका स्वामी बन बैठता है, और सब वर्ण परस्पर घुलमिल जाते हैं। जैसी-तैसी क्रिया को प्रायश्चित्त मान लिया जाता है, और जिसके मुख से जो निकल जाए वही शास्त्र समझ लिया जाता है।”
“थोड़े-से धन से ही लोगों को धनाढ्यता का गर्व हो जाएगा, और केवल केशों से स्त्रियाँ अपनी सुन्दरता का अभिमान करेंगी। सोना, मणि और रत्न जब दुर्लभ हो जाएँगे, तब स्त्रियाँ केश-कलापों से ही अपने को सजाएँगी। जो पति निर्धन हो जाएगा उसे स्त्री छोड़ देगी; जिसके पास धन होगा वही स्त्रियों का पति माना जाएगा। जो अधिक धन देगा वही स्वामी होगा, कुलीनता स्वामित्व का कारण न रहेगी। सारा द्रव्य घर बनाने में ही लग जाएगा, बुद्धि केवल धन बटोरने में रमी रहेगी, और सम्पत्ति अपने ही उपभोग में चुक जाएगी।”
“राजा प्रजा की रक्षा नहीं करेंगे, कर के बहाने प्रजा का धन ही छीन लेंगे। जिसके पास हाथी, घोड़े और रथ होंगे वही राजा कहलाएगा, और जो निर्बल होगा वह सेवक बनेगा। वैश्य कृषि और वाणिज्य छोड़कर शिल्प-कर्म में लग जाएँगे, और शूद्र संन्यास का वेश धरकर पाखण्ड की वृत्ति से आजीविका चलाएँगे और लोगों से सम्मान पाएँगे। अनावृष्टि के भय से प्रजा सदा आकाश की ओर आँखें लगाए रहेगी; अन्न के अभाव में तपस्वियों के समान केवल कन्द-मूल-फल पर जीएगी, और दुःखी होकर आत्मघात तक कर बैठेगी।”
“उस समय मनुष्य बिना स्नान किए ही भोजन करेंगे; अग्नि, देवता और अतिथि का पूजन छोड़ देंगे। सास और ससुर ही लोगों के गुरुजन होंगे, और मन को हरने वाली भार्या तथा साले ही सुहृद् माने जाएँगे। लोग कहेंगे, ‘किसका पिता कौन और किसकी माता कौन; सब अपने-अपने कर्म के अनुसार जन्मते और मरते हैं।’ स्त्रियाँ पाँच-छ या सात-आठ वर्ष में ही सन्तान को जन्म देंगी, पुरुष आठ-नौ या दस वर्ष में पिता बन जाएँगे, बारह वर्ष में बाल पक जाएँगे, और कोई बीस वर्ष से अधिक न जिएगा।”
धर्म का ह्रास कैसे पहचानें
“हे मैत्रेय! जब-जब धर्म की अधिक हानि दिखाई दे, तब-तब बुद्धिमान् को कलियुग की वृद्धि समझ लेनी चाहिए। जब-जब पाखण्ड बढ़ा हुआ दिखे, जब सन्मार्ग पर चलने वाले सत्पुरुषों का अभाव हो, जब धर्मात्माओं के आरम्भ किए कार्य असफल होने लगें, और जब लोग यज्ञों से पुरुषोत्तम भगवान् का पूजन छोड़ दें, तब जानिए कि कलि का बल बढ़ गया है। वेद-वाद में प्रीति न रहे और पाखण्ड से प्रेम हो, तब प्राज्ञ पुरुष कलि की वृद्धि पहचान लेता है। पाखण्ड के वशीभूत होकर लोग कहेंगे, ‘इन देव, द्विज, वेद और जल से होने वाले शौच में क्या रखा है?’”
“वर्षा अल्प जल वाली होगी, खेती थोड़ी उपज वाली, फल सार-रहित। वस्त्र प्रायः सन के बने होंगे, वृक्ष अधिकतर शमी के, और सब वर्ण बहुधा शूद्र के समान हो जाएँगे। अन्न अत्यन्त छोटे दानों वाला होगा, प्रायः बकरी का ही दूध मिलेगा, और उशीर ही एकमात्र अनुलेपन रह जाएगा। वेद-मार्ग का लोप और अधर्म की वृद्धि होने से प्रजा की आयु घट जाएगी।”
“किन्तु, मैत्रेय, इस घोर युग में एक बड़ा गुण भी है। सत्ययुग में जो अत्यन्त उत्तम पुण्य-राशि महान् तपस्या से मिलती है, वही कलियुग में मनुष्य थोड़े-से प्रयत्न से ही पा लेता है।” यह कहकर पराशरजी क्षण भर रुके, फिर बोले, “इसी विषय में महामति व्यासदेव ने जो कुछ कहा है, वह भी सुन लीजिए।”
व्यास की तीन डुबकियाँ
“एक बार मुनियों में यह चर्चा चल पड़ी कि किस युग में थोड़ा-सा पुण्य भी महान् फल देता है, और उसे सुखपूर्वक कौन कर सकता है। इस सन्देह को मिटाने के लिए वे सब मुनिश्रेष्ठ मेरे पुत्र महाभाग व्यासजी के पास पहुँचे। वहाँ जाकर उन्होंने देखा, व्यासजी गंगाजी में आधे डूबे स्नान कर रहे हैं। मुनिगण तट पर वृक्षों के नीचे बैठकर उनकी प्रतीक्षा करने लगे।”
“उसी समय व्यासजी ने जल में डुबकी लगाई और ऊपर उठकर कहा, ‘कलियुग ही श्रेष्ठ है, शूद्र ही श्रेष्ठ है।’ फिर डुबकी लगाकर बोले, ‘हे शूद्र! आप ही धन्य हैं।’ और फिर उठकर कहा, ‘स्त्रियाँ ही साधु हैं, वे ही धन्य हैं; उनसे अधिक धन्य और कौन है?’ मुनिजन यह सुनकर चकित रह गए।”
“स्नान और नित्यकर्म पूरा करके जब व्यासजी आसन पर बैठे, तो मुनियों ने विनयपूर्वक पूछा, ‘भगवन्! आपने स्नान के समय बार-बार कलियुग, शूद्र और स्त्री की प्रशंसा की; इसका रहस्य क्या है? यदि गोपनीय न हो तो कहिए।’ व्यासजी हँसकर बोले, ‘सुनिए, मैं जिस कारण साधु-साधु कह उठा, वह बतलाता हूँ।’”
कलियुग, शूद्र और स्त्री क्यों धन्य
“‘सत्ययुग में जो फल दस वर्ष की तपस्या, ब्रह्मचर्य और जप से मिलता है, वही त्रेता में एक वर्ष में, द्वापर में एक मास में और कलियुग में केवल एक दिन-रात में मिल जाता है। इसीलिए मैंने कलि को श्रेष्ठ कहा। सत्ययुग में जो ध्यान से, त्रेता में यज्ञ से और द्वापर में देवार्चन से मिलता है, वह कलि में केवल श्रीकृष्णचन्द्र के नाम-कीर्तन से प्राप्त हो जाता है। थोड़े परिश्रम में ही महान् धर्म की सिद्धि, इसी से मैं कलियुग से अति सन्तुष्ट हूँ।’”
“‘अब सुनिए शूद्र क्यों धन्य है। द्विजाति को पहले ब्रह्मचर्य के साथ वेदाध्ययन करना पड़ता है, फिर स्वधर्म से कमाए धन के द्वारा विधिपूर्वक यज्ञ। इन कार्यों में वे सदा परतन्त्र रहते हैं, भोजन और पान तक इच्छानुसार नहीं कर सकते, और बड़े क्लेश से पुण्य-लोकों को पाते हैं। किन्तु जिस शूद्र को केवल पाक-यज्ञ का अधिकार है, वह द्विजों की सेवा मात्र से सद्गति पा लेता है; भक्ष्य-अभक्ष्य और पेय-अपेय का उस पर कोई नियम नहीं, इसीलिए मैंने उसे साधु कहा।’”
“‘और स्त्री? पुरुष को धर्म से कमाया धन सुपात्र को देना और विधिपूर्वक यज्ञ करना पड़ता है; उस धन के अर्जन और रक्षण में ही महान् क्लेश है। किन्तु स्त्री तन, मन और वचन से पति की सेवा करके उसकी हितकारिणी बन जाती है और वही शुभ लोक अनायास पा लेती है जो पुरुष को अत्यन्त परिश्रम से मिलते हैं। इसीलिए मैंने तीसरी बार कहा कि स्त्रियाँ साधु हैं।’ यह रहस्य सुनकर मुनियों को अपने प्रश्न का उत्तर अपने-आप मिल गया, और वे व्यासजी की प्रशंसा करते हुए सन्तुष्ट लौट गए।”
पराशरजी ने अन्त में कहा, “हे मैत्रेय! इस अत्यन्त दुष्ट कलियुग में यही एक महान् गुण है कि केवल श्रीकृष्णचन्द्र के नाम-संकीर्तन से मनुष्य परमपद पा लेता है। अब आपने संसार के उपसंहार, अर्थात् प्राकृत और अवान्तर प्रलय के विषय में जो पूछा था, वह भी सुनाता हूँ।”
आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)