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पराशरजी बोले, हे मैत्रेय! अब कश्यपजी की अन्य स्त्रियों के वंश की बात सुनिए। संह्राद के पुत्र आयुष्मान्, शिबि और बाष्कल हुए, और प्रह्लाद के पुत्र विरोचन से राजा बलि उत्पन्न हुए। बलि के सौ पुत्र थे, जिनमें बाणासुर सबसे बड़ा और सबसे बलवान् था। हिरण्याक्ष के भी उत्कुर, शकुनि, भूतसन्तापन, महानाभ और कालनाभ आदि अनेक महाबली पुत्र हुए। कश्यपजी की दूसरी स्त्री दनु से द्विमूर्धा, शम्बर, अयोमुख, शंकुशिरा, एकचक्र, तारक, वृषपर्वा, महाबली पुलोम और परम पराक्रमी विप्रचित्ति जैसे विख्यात दानव जन्मे। वैश्वानर की दो कन्याएँ पुलोमा और कालका इन्हीं कश्यप को ब्याही गईं, और उनसे साठ हजार दानव-श्रेष्ठ हुए, जो पौलोम और कालकेय कहलाए। विप्रचित्ति ने सिंहिका के गर्भ से वातापी, नमुचि, इल्वल, नरक, अन्धक और वक्त्र जैसे और भी भयंकर पुत्र पाए, और प्रह्लाद के ही कुल में कठिन तप से निवातकवच नामक दैत्य उत्पन्न हुआ।
कश्यपजी की स्त्री ताम्रा की छह कन्याओं से उल्लू, बाज, गीध, कौवे और जल के पक्षी उपजे, तथा सुग्रीवी से घोड़े, ऊँट और गदहे जन्मे। विनता के दो पुत्र गरुड और अरुण विख्यात हुए; सर्पों को खानेवाले गरुडजी अत्यन्त भयंकर थे। सुरसा से सहस्रों सर्प हुए, और कद्रू से शेष, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक और धनञ्जय आदि महाबली नाग जन्मे, जो गरुडजी के वश में रहते थे। क्रोधवशा से दाढ़ोंवाले हिंसक जीव, क्रोधा से पिशाच, सुरभि से गौ और भैंस, इरा से वृक्ष, लता और तृण, खसा से यक्ष और राक्षस, मुनि से अप्सराएँ और अरिष्टा से गन्धर्व उत्पन्न हुए। ये सब स्थावर और जंगम कश्यपजी की ही सन्तान हैं, और यही स्वारोचिष मन्वन्तर का सर्ग कहा जाता है।
दिति का सौ वर्ष का व्रत
वैवस्वत मन्वन्तर के आरम्भ में एक बड़ा वारुण यज्ञ हुआ, जिसमें स्वयं ब्रह्माजी होता बने। उसी काल की एक कथा है। जब दिति के पुत्र नष्ट हो चुके थे, तब दिति ने अपने पति कश्यपजी को प्रसन्न करके यह वर माँगा कि उन्हें ऐसा पुत्र मिले जो इन्द्र को मार सके। कश्यपजी ने वह उग्र वर देते हुए कहा, हे देवि! यदि आप भगवान् के ध्यान में तत्पर रहकर पूरी पवित्रता और संयम के साथ सौ वर्ष तक इस गर्भ को धारण कर सकें, तो आपका पुत्र इन्द्र को मारनेवाला होगा। ऐसा कहकर उन्होंने दिति को वह गर्भ दिया, और वह बड़े शौच के साथ उसे धारण करने लगी।
अपने वध का कारण जानकर इन्द्र भी बड़ी विनय के साथ दिति की सेवा में लग गए, पर मन में यही ताक रखते थे कि कहीं उसके नियम में कोई चूक दिख जाए। सौ वर्ष में थोड़ा ही समय शेष रह गया था, तभी एक दिन दिति पैर धोए बिना ही अपनी शय्या पर लेट गई, और निद्रा ने उसे घेर लिया। बस, यही अवसर पाकर इन्द्र हाथ में वज्र लिए उसके गर्भ में घुस गए और उस महागर्भ के सात टुकड़े कर डाले। वज्र की पीड़ा से वह गर्भ जोर-जोर से रोने लगा। इन्द्र बार-बार कहते रहे कि रोइए मत, मा रोदीः; किन्तु जब सात भागों में बँटकर भी वह न मरा, तब कुपित होकर इन्द्र ने एक-एक टुकड़े के फिर सात-सात टुकड़े कर दिए। वे ही अत्यन्त वेगवान् उनचास मरुत् नामक देवता हुए। इन्द्र ने जो ‘मा रोदीः’ कहा था, इसी से वे मरुत् कहलाए, और आगे चलकर यही उनचास मरुद्गण इन्द्र के सहायक देवता बने।
पृथु के राज्य में ब्रह्मा का बँटवारा
हे मैत्रेय! अब विष्णुभगवान् की विभूति सुनिए। पूर्वकाल में जब महर्षियों ने महाराज पृथु को राज्यपद पर अभिषिक्त किया, तब लोक-पितामह ब्रह्माजी ने भी क्रम से सारे राज्यों का बँटवारा कर दिया। उन्होंने चन्द्रमा को नक्षत्र, ग्रह, ब्राह्मण, समस्त वनस्पति तथा यज्ञ और तप का अधिपति बनाया; कुबेर को राजाओं का, वरुण को जल का, विष्णु को आदित्यों का और अग्नि को वसुओं का स्वामी किया; दक्ष को प्रजापतियों का, इन्द्र को मरुद्गण का और प्रह्लाद को दैत्य-दानवों का आधिपत्य दिया। धर्मराज यम को पितरों का राजा और ऐरावत को समस्त गजराजों का स्वामी बनाया; गरुड को पक्षियों का, इन्द्र को देवताओं का, उच्चैःश्रवा को घोड़ों का और वृषभ को गौओं का अधिपति किया; सिंह को वन्य पशुओं का राजा, शेषनाग को सर्पों का स्वामी, हिमालय को स्थावरों का, कपिलदेव को मुनियों का और व्याघ्र को नख तथा दाढ़ोंवाले पशुओं का राजा बनाया।
राज्यों का यह विभाग करने के बाद ब्रह्माजी ने सब दिशाओं में दिक्पालों की स्थापना की। पूर्व दिशा में वैराज प्रजापति के पुत्र राजा सुधन्वा को, दक्षिण में कर्दम प्रजापति के पुत्र राजा शंखपद को, पश्चिम में कभी न डिगनेवाले महात्मा केतुमान् को और उत्तर में पर्जन्य प्रजापति के अति दुर्धर्ष पुत्र राजा हिरण्यरोमा को अभिषिक्त किया। ये चारों आज भी सात द्वीपों और अनेक नगरों से भरी इस सारी पृथ्वी का अपने-अपने विभाग के अनुसार धर्मपूर्वक पालन करते हैं।
सब कुछ विष्णु का अंश
हे मुनिसत्तम! ये और ऐसे जितने भी राजा जगत् के पालन में लगे हैं, वे सब परमात्मा श्रीविष्णु के ही विभूतिरूप हैं। जो-जो भूतों के अधिपति पहले हो चुके और जो आगे होंगे, जो देवों, दैत्यों, दानवों, पशुओं, पक्षियों, मनुष्यों, सर्पों, वृक्षों, पर्वतों और ग्रहों के स्वामी हैं, वे सब सर्वभूतमय भगवान् विष्णु के अंश से ही उत्पन्न हुए हैं। श्रीहरि को छोड़कर पालन करने की शक्ति और किसी में नहीं। रज और सत्त्व आदि गुणों का आश्रय लेकर वही सनातन प्रभु सृष्टि के समय रचते, स्थिति के समय पालते और अन्त में कालरूप से संहार करते हैं।
वे जनार्दन चार-चार विभागों से यह सब करते हैं। सृष्टि में एक अंश से अव्यक्तरूप ब्रह्मा, दूसरे से मरीचि आदि प्रजापति, तीसरा अंश काल और चौथा समस्त प्राणी बनते हैं। स्थिति में एक अंश से विष्णु स्वयं पालन करते हैं, दूसरे से मनु आदि होते हैं, तीसरा काल और चौथा सब भूतों में स्थित रहता है। और प्रलय में एक अंश रुद्ररूप, दूसरा अग्नि तथा यम आदि रूप, तीसरा कालरूप और चौथा सम्पूर्ण भूतस्वरूप हो जाता है। इस प्रकार ब्रह्मा, दक्ष आदि प्रजापति, काल और सारे प्राणी श्रीहरि की ही विभूतियाँ हैं, जो जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और नाश के कारण बनती हैं; उनका अपना परमपद तो इन सबसे परे, महान् और निर्गुण है।
मैत्रेयजी के पूछने पर पराशरजी ने वह परमपद भी चार भेदों में खोलकर बताया। मुक्ति चाहनेवाले योगी के लिए प्राणायाम आदि जो साधन हैं, उनका ज्ञान पहला भेद है; साध्यरूप ब्रह्म का ज्ञान दूसरा; दोनों के अभेद का अद्वैत-ज्ञान तीसरा; और इन तीनों से परे, अनुभवगम्य, निर्व्यापार, अनिर्वचनीय, शान्त, शुद्ध और भावातीत जो आत्मस्वरूप है, वही विष्णु नामक ब्रह्म चौथा और अन्तिम भेद है। जो योगी इसी भेद में लीन हो जाते हैं, वे संसार में कर्म करते हुए भी निर्बीज हो जाते हैं, और उनके कर्म का कोई पाप-पुण्यरूप फल नहीं बँधता। यही निर्मल, नित्य, सर्वव्यापक, अक्षय और समस्त दोषों से रहित विष्णु नामक परमपद है; पुण्य और पाप के क्षीण होने तथा क्लेशों के मिट जाने पर अत्यन्त शुद्ध हुआ योगी उसी परब्रह्म का आश्रय लेता है, जहाँ से फिर लौटना नहीं होता। उस ब्रह्म के दो रूप हैं, मूर्त और अमूर्त, अर्थात् क्षर और अक्षर। जैसे एक जगह जलती अग्नि का प्रकाश चारों ओर फैल जाता है, वैसे ही यह सारा जगत् उसी परब्रह्म की शक्ति है; और जैसे अग्नि के पास और दूर से उसका ताप घटता-बढ़ता है, वैसे ही ब्रह्मा, विष्णु और शिव से लेकर देव, प्रजापति, मनुष्य, पशु और वृक्ष तक उस शक्ति में तारतम्य है।
विष्णु के आभूषण और आयुध
अन्त में मैत्रेयजी ने पूछा कि भगवान् इस जगत् को अपने भूषण और आयुधरूप में किस प्रकार धारण करते हैं। पराशरजी बोले, यह मैं वैसे ही कहता हूँ जैसे वसिष्ठजी ने मुझसे कहा था। इस जगत् के निर्लेप और निर्मल आत्मा को, अर्थात् शुद्ध क्षेत्रज्ञ को, श्रीहरि कौस्तुभमणि के रूप में धारण करते हैं; प्रधान अर्थात् प्रकृति को श्रीवत्स के रूप में आश्रय देते हैं; बुद्धि को गदा के रूप में; भूतों के कारण तामस अहंकार और इन्द्रियों के कारण राजस अहंकार को शंख और शार्ङ्ग धनुष के रूप में; और अत्यन्त चंचल सात्त्विक अहंकाररूप मन को अपने हाथ के उस चक्र के रूप में, जो वेग में पवन को भी पीछे छोड़ देता है। पाँच रत्नों की वैजयन्ती माला पाँच तन्मात्राओं और पाँच भूतों का संघात है, ज्ञान और कर्म की इन्द्रियाँ उनके बाण हैं, और अविद्यारूप म्यान में छिपा विद्यामय ज्ञान उनका निर्मल खड्ग है।
इस प्रकार पुरुष, प्रधान, बुद्धि, अहंकार, पंचभूत, मन, इन्द्रियाँ और विद्या-अविद्या, सब श्रीहृषीकेश में ही आश्रित हैं। रूपरहित होकर भी वे मायामय रूप से प्राणियों के कल्याण के लिए इन सबको अस्त्र और भूषण के रूप में धारण करते हैं। कला, काष्ठा, निमेष, दिन, ऋतु और वर्षरूप कालस्वरूप भी वही हैं; भूर्लोक से लेकर सत्यलोक तक सातों लोक भी वही हैं। ऋक्, यजु, साम, अथर्व, इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र और समस्त काव्य तथा राग-रागिनी, जो कुछ शब्दमय है, वह सब उन शब्दमूर्ति परमात्मा का ही शरीर है; और इस लोक में अथवा कहीं भी जितने मूर्त-अमूर्त पदार्थ हैं, वे सब उन्हीं के शरीर हैं। जिसके मन में यह भावना दृढ़ हो जाती है कि मैं और यह सारा जगत् श्रीजनार्दन ही हैं, उसे फिर राग-द्वेषरूपी रोग नहीं सताता। इस प्रकार, हे मैत्रेय! इस पुराण का पहला अंश मैंने आपसे कहा; इसे श्रद्धा से सुननेवाला मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)