पृथु के वंश में आगे चलकर प्राचीनबर्हि नामक एक महान् प्रजापति हुए। उनके समय में यज्ञों की अधिकता से पूर्व की ओर नोकवाला कुश सारी पृथ्वी पर फैल गया था, इसीलिए वे “प्राचीनबर्हि” कहलाए। समुद्र की पुत्री सवर्णा से उनके दस पुत्र हुए, जो सब प्रचेता नाम से विख्यात और धनुर्विद्या के पारगामी थे।
एक दिन प्रजापति की प्रेरणा से पिता प्राचीनबर्हि ने उन्हें बुलाकर आदरपूर्वक कहा, “हे पुत्रो! देवाधिदेव ब्रह्माजी ने मुझे आज्ञा दी है कि प्रजा की वृद्धि करो, और मैंने भी उनसे स्वीकार कर लिया है। अतः मेरी प्रसन्नता के लिए आप लोग सावधानी से प्रजा की वृद्धि कीजिए।” पुत्रों ने पूछा, “पिताजी! किस कर्म से हम इसमें समर्थ होंगे, वह हमें समझाइए।” पिता ने कहा, “वरदायक भगवान् विष्णु की आराधना से ही मनुष्य को अभीष्ट की प्राप्ति होती है। इसलिए यदि सिद्धि चाहते हैं, तो सर्वभूतों के स्वामी भगवान् गोविन्द की उपासना कीजिए।”
समुद्र में सहस्रों वर्ष का तप
पिता की यह आज्ञा पाकर दसों प्रचेता समुद्र के जल में डूबकर सावधानी से तप करने लगे। सर्वलोक के आश्रय भगवान् नारायण में चित्त लगाए हुए, उन्होंने वहीं जल के भीतर दस हज़ार वर्ष तक एकाग्र-चित्त से भगवान् की स्तुति की। उन्होंने भगवान् को कालस्वरूप, सोमस्वरूप, सूर्यस्वरूप, अग्नि और वायु का स्वरूप, तथा समस्त जगत् का बीज कहकर बारम्बार प्रणाम किया। वे उन अविनाशी परमपद को नमस्कार करते रहे, जो न लम्बा है, न छोटा, न स्थूल, न सूक्ष्म; जिसे न देवता जानते हैं, न मुनि।
दस हज़ार वर्ष के इस तप से प्रसन्न होकर भगवान् श्रीहरि खिले हुए नील कमल-सी आभावाली दिव्य छवि में जल के भीतर ही प्रकट हुए। गरुड़ पर चढ़े श्रीहरि को देखकर प्रचेता भक्ति के भार से झुक गए। भगवान् ने कहा, “मैं प्रसन्न हूँ; अपना अभीष्ट वर माँगिए।” प्रचेताओं ने प्रणाम कर वही निवेदन किया जो उनके पिता ने कहा था, प्रजा की वृद्धि का वर। भगवान् उन्हें अभीष्ट वर देकर अन्तर्धान हो गए, और वे जल से बाहर निकल आए।
वृक्षों का दहन और सोम की सन्धि
इतने वर्षों तक जब प्रचेता तप में लगे रहे, तब बिना किसी रखवाले के पृथ्वी को वृक्षों ने ढक लिया और बहुत-सी प्रजा नष्ट हो गई। आकाश तक वृक्षों से भर गया था, इसलिए न वायु चल पाती थी, न प्रजा कोई चेष्टा कर सकती थी। जल से बाहर निकलकर यह देखते ही प्रचेतागण अत्यन्त क्रोधित हुए और उन्होंने अपने मुखों से वायु और अग्नि छोड़ दी। वायु ने वृक्षों को उखाड़-उखाड़कर सुखा दिया और प्रचण्ड अग्नि ने उन्हें जला डाला।
यह भयंकर वृक्ष-प्रलय देखकर, जब थोड़े-से वृक्ष शेष रह गए, तब उनके राजा सोम, वृक्षों के अधिपति, प्रचेताओं के पास आकर बोले, “हे नृपतिगण! क्रोध शान्त कीजिए। मैं आपके और वृक्षों के बीच सन्धि करा देता हूँ। वृक्षों से उत्पन्न हुई यह सुन्दर वर्णवाली रत्नरूपा कन्या मारिषा है। भविष्य को जानकर मैंने पहले ही इसे अपनी किरणों से पाल-पोसकर बड़ा किया है। यह इसीलिए उत्पन्न की गई है कि आपके वंश को बढ़ानेवाली आपकी भार्या हो। मेरे आधे तेज और आपके आधे तेज से इसके गर्भ से दक्ष नामक प्रजापति उत्पन्न होगा, जो अग्नि के समान तेजस्वी होकर प्रजा की खूब वृद्धि करेगा।”
मारिषा की कथा
फिर सोम ने मारिषा के जन्म की कथा सुनाई। पूर्वकाल में कण्डु नामक वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ एक मुनि थे। गोमती के परम रमणीय तट पर उन्होंने घोर तप किया। इन्द्र ने उनका तप भंग करने के लिए प्रम्लोचा नामक अप्सरा को भेजा, और उस मधुर मुसकानवाली ने उन ऋषिश्रेष्ठ को विचलित कर दिया। उससे मोहित होकर वे मन्दराचल की कन्दराओं में सैकड़ों वर्ष विषयासक्त रहे।
एक दिन प्रम्लोचा ने कहा, “हे ब्रह्मन्! अब मैं स्वर्गलोक जाना चाहती हूँ, आप मुझे आज्ञा दीजिए।” आसक्त मुनि बोले, “अभी कुछ दिन और रहिए।” उनके ऐसा कहने पर वह सुन्दरी और सौ वर्ष रुककर नाना भोग भोगती रही। जब-जब वह जाने की बात कहती, ऋषि यही कहते, “अभी और ठहरिए।” एक दिन वे बड़ी शीघ्रता से कुटी से निकले, तो उसने पूछा, “आप कहाँ जाते हैं?” मुनि बोले, “दिन अस्त हो चला, अब मैं सन्ध्या-उपासना करूँगा; नहीं तो नित्य-क्रिया नष्ट हो जाएगी।” वह हँस पड़ी, “हे सर्वधर्मज्ञ! क्या आज ही आपका दिन अस्त हुआ है? अनेकों वर्ष के पश्चात् आज यह दिन ढला है।” ऋषि चौंके, “आपका आज ही तो आना हुआ था।” प्रम्लोचा ने कहा, “आपका इतना कहना ठीक है, पर उस समय को तो नौ सौ सात वर्ष, छः मास और तीन दिन बीत चुके हैं।”
यह सुनकर मुनि को अपने ऊपर धिक्कार हुआ। पहले तो वे स्त्री को दोष देने लगे, पर फिर सँभलकर बोले, “इसमें इनका क्या दोष? दोष तो सारा मेरा ही है, क्योंकि मैं ही अपनी इन्द्रियों को न जीत सका।” फिर उन्होंने प्रम्लोचा से कहा, “अब जाइए। जहाँ आपकी इच्छा हो, वहाँ पधारिए।” बार-बार फटकारे जाने पर वह आश्रम से निकली, और आकाश-मार्ग से जाते हुए अपना पसीना वृक्षों के पत्तों से पोंछती गई। उस समय ऋषि ने उसके शरीर में जो गर्भ स्थापित किया था, वह भी पसीने के रूप में उसके शरीर से बाहर आ गया। वृक्षों ने उस गर्भ को ग्रहण किया, वायु ने उसे एकत्र किया, और सोम अपनी किरणों से उसे पोसते रहे। इसी से वृक्षों के अग्रभाग से मारिषा नामक वह सुमुखी कन्या उत्पन्न हुई।
सोम ने आगे बताया कि पूर्वजन्म में यह साध्वी एक महारानी थी। पुत्रहीन अवस्था में ही पति के मर जाने पर इसने अपने भक्तिभाव से विष्णु भगवान् को सन्तुष्ट किया। प्रसन्न होकर भगवान् ने प्रकट होकर वर माँगने को कहा। तब इसने कहा, “भगवन्! बाल-विधवा होने के कारण मेरा जन्म व्यर्थ ही हुआ। कृपा कीजिए कि जन्म-जन्म में मुझे प्रशंसनीय पति मिलें और प्रजापति के समान एक पुत्र हो; तथा मैं कुल, शील, सत्य, दाक्षिण्य और गुणों से सम्पन्न, सुन्दर, और माता के गर्भ से जन्म लिए बिना अयोनिजा उत्पन्न होऊँ।” भगवान् ने वर दिया, “एक ही जन्म में आपको दस पराक्रमी पति मिलेंगे, और उसी समय प्रजापति के समान एक महाबली पुत्र भी प्राप्त होगा।” वही रानी अब वृक्षों से मारिषा के रूप में उत्पन्न हुई है।
दक्ष का जन्म और वंश
सोम के कहने से प्रचेताओं ने अपना क्रोध शान्त किया और मारिषा को पत्नी-रूप में ग्रहण किया। उन दसों प्रचेताओं से मारिषा के गर्भ से दक्ष प्रजापति का जन्म हुआ, जो पहले ब्रह्माजी से उत्पन्न हुए थे। यहाँ मैत्रेय को शंका हुई, “जो दक्ष पहले ब्रह्माजी के अंगूठे से उत्पन्न हुए थे, वे फिर प्रचेताओं के पुत्र कैसे हुए? और सोम के दौहित्र होकर भी वे उनके श्वशुर कैसे बने?” पराशरजी ने समझाया, “हे मैत्रेय! प्राणियों की उत्पत्ति और नाश प्रवाहरूप से निरन्तर होता रहता है। ये दक्ष आदि युग-युग में होते हैं और फिर लीन हो जाते हैं; इसमें ज्येष्ठता-कनिष्ठता का कोई भेद नहीं। उस समय तप और प्रभाव ही ज्येष्ठता के कारण होते थे।”
ब्रह्माजी की आज्ञा पालते हुए दक्ष ने पहले मन से ऋषि, गन्धर्व, असुर और सर्प आदि प्राणियों को उत्पन्न किया। जब इससे प्रजा न बढ़ी, तब उन्होंने वीरण प्रजापति की तपस्विनी कन्या असिक्नी से विवाह कर मैथुन-धर्म से प्रजा उत्पन्न करने का विचार किया। असिक्नी से पहले उन्होंने हर्यश्व नामक पाँच हज़ार पुत्र उत्पन्न किए। प्रजा बढ़ाने को उत्सुक देख देवर्षि नारद उनके पास गए और बोले, “हे हर्यश्वगण! आप लोग अभी इस पृथ्वी का मध्य, ऊपरी और नीचे का भाग तक नहीं जानते; फिर प्रजा की रचना कैसे करेंगे? पहले जाकर इस पृथ्वी का अन्त तो देखिए।” यह सुनकर वे सब भिन्न-भिन्न दिशाओं में चले गए और समुद्र में गई नदियों की भाँति फिर कभी न लौटे।
तब दक्ष ने असिक्नी से एक हज़ार और पुत्र, शबलाश्व, उत्पन्न किए। नारदजी ने उनसे भी वही बात कह दी, और वे भी अपने भाइयों के मार्ग से सब दिशाओं में चले गए और न लौटे। यह जानकर दक्ष ने क्रोध में आकर नारद को शाप दे दिया। फिर सृष्टि की वृद्धि की इच्छा से उन्होंने असिक्नी से साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं। उनमें से दस उन्होंने धर्म को, तेरह कश्यप को, सत्ताईस काल अर्थात् चन्द्रमा को, चार अरिष्टनेमि को, और शेष बहुपुत्र, अंगिरा तथा कृशाश्व को दीं। इन्हीं कन्याओं की सन्तान से देवता, दैत्य, नाग, गौ, पक्षी, गन्धर्व, अप्सरा और दानव आदि समस्त प्राणी उत्पन्न हुए। हे मैत्रेय! दक्ष के समय से ही प्रजा का जन्म मैथुन से होने लगा; इससे पहले तो सिद्ध पुरुषों के संकल्प, दर्शन अथवा स्पर्शमात्र से ही प्रजा उत्पन्न हो जाती थी।
आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)