लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish

पात्र

पार्वती

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हिमालय के भवन में उन दिनों एक ही चिन्ता बसती है, और उसी चिन्ता में वसन्त की वह रात आती है, चैत्र की नवमी, मृगशिरा नक्षत्र, आधी रात का समय। शिवपुराण की रुद्रसंहिता का पार्वती खण्ड कहता है कि चन्द्रमण्डल से आकाशगंगा के उतरने की भाँति मेना के उदर से देवी शिवा अपने ही स्वरूप में प्रकट होती हैं। स्तवन करके देवताओं के लौट जाने पर मेना देखती हैं कि नील कमल की पंखुड़ी सी श्याम कान्ति वाली एक दिव्य कन्या उनके सामने विराजमान है, और वह कन्या माता से स्वयं कहती है कि यह रूप केवल इसलिए दिखाया है कि आपको हमारे यथार्थ स्वरूप का स्मरण रहे, “हम पृथ्वी पर लीला करके देवताओं का कार्य सिद्ध करेंगे और शम्भु की पत्नी होंगी।” इतना कहकर जगदम्बा माता के देखते देखते एक नवजात शिशु में बदल जाती हैं और रोने लगती हैं। पार्वती की कथा इसी उलटे क्रम से शुरू होती है, पहले देवी, फिर बालिका; और उसके बाद की हर कड़ी में वह बालिका तप के मोल उसी देवी को वापस कमाती है।

पहले सती

शिवपुराण पार्वती से पहले सती को कहता है, और जन्म की कड़ी में नारद हिमवान् से यही बताते हैं कि पूर्वकाल में यही कन्या दक्ष की पुत्री सती थीं, रुद्र की प्रिया पत्नी, जिन्होंने पिता के यज्ञ में अपना और शंकर का अनादर देखकर शरीर त्याग दिया था। सती खण्ड में वह कन्या दक्ष के आँगन में बारह महीने नन्दाव्रत करती है, और नवमी को ध्यानमग्न सती के सामने शिव स्वयं आकर वर माँगने को कहते हैं; लज्जा से बात होंठों तक नहीं आती, और वे इतना ही कह पाती हैं, “प्रभो, ऐसा वर दीजिये जो टल न सके।” दण्डकारण्य में वे सीता का रूप धरकर राम की परीक्षा लेने जाती हैं और पहचान ली जाती हैं; फिर बिना बुलाए पिता के यज्ञ में जाना, वहाँ शम्भु का भाग कहीं न देखना, और भूमि पर बैठकर योग से प्राण और अपान को नाभि में स्थिर करना; कथा कहती है कि वह आग बाहर से नहीं आई, भीतर से उठी थी। पार्वती खण्ड उसी ज्योति को हिमालय के घर में उतारता है।

हाथ की एक रेखा

एक दिन शिव की प्रेरणा से नारद आते हैं, कालिका का हाथ देखते हैं, और माता पिता को वह सुनाते हैं जो कोई माता पिता नहीं सुनना चाहते: इसे ऐसा पति मिलेगा जो योगी, नंग धड़ंग, निर्गुण और निष्काम होगा, जिसके न माता होगी न पिता, जो सदा अमंगल वेष धारण किए रहेगा। मेना और हिमाचल क्षुब्ध हो जाते हैं, और जगदम्बा शिवा मन ही मन खिल उठती हैं, क्योंकि वे उस भावी पति को पहचान गई हैं; “नारदजी की बात कभी झूठ नहीं हो सकती”, यही सोचकर वे शिव के चरणों में स्नेह रखने लगती हैं। माता तप का उपदेश देने जाती हैं और सुकुमार अंगों को देखकर उनकी आँखें भर आती हैं, और तब बालिका स्वयं अपना स्वप्न कह सुनाती है, जिसमें एक तपस्वी ब्राह्मण ने उसे शिव के लिए तपस्या का उपदेश दिया है।

उधर सती के विरह में असंख्य वर्ष समाधि में बिताकर शम्भु, पार्वती के आठ वर्ष की होने पर, हिमालय के गंगावतरण तीर्थ पर तप करने आते हैं। हिमवान् पुत्री को आगे करके कहते हैं कि यह आपकी सेवा करने को उत्सुक है, और वह योगी कन्या को देखकर आँखें मूँद लेता है; कारण पूछने पर वह हँसकर कहता है कि वेद के पारंगत स्त्री को मायारूपिणी कहते हैं, हम योगी हैं, हमें स्त्री से क्या प्रयोजन। पिता व्याकुल होकर चुप रह जाते हैं, और तब वह आठ वर्ष की कन्या प्रणाम करके वह कहती है जिसे पाठ स्वयं सांख्य वचन कहता है: सब कर्मों को करने की जो शक्ति है, उसी को प्रकृति जानिए, प्रकृति के बिना लिंगरूपी महेश्वर भी कैसे रह सकते हैं। शिव हँसते हैं कि हम तपस्या से प्रकृति का ही नाश करते हैं, और काली मन ही मन हँसकर पूछती हैं, “आपने अभी जो कुछ कहा, क्या वह वाणी प्रकृति नहीं है?” और फिर, “हम प्रकृति हैं और आप पुरुष हैं; हमारे अनुग्रह से ही आप सगुण और साकार माने गए हैं।” वेदान्त में स्थित शिव इस पर उन्हें प्रतिदिन सेवा की आज्ञा देते हैं, और महादेव मन में ठान लेते हैं कि यह काली जब ऐसा तप करेगी कि इसमें गर्व का बीज न रह जाए, तभी हम इसका पाणिग्रहण करेंगे।

अपर्णा

तारकासुर से पीड़ित देवता काम को उसी योगी पर भेजते हैं, और तीसरे नेत्र की आग में काम भस्म हो जाता है। उस घड़ी पार्वती की दशा कथा अलग से बताती है: उनका सारा शरीर सफ़ेद पड़ जाता है, जैसे देह में रक्त ही न बचा हो, और वे सखियों को लेकर भवन लौट जाती हैं। नारद उन्हें शिवपंचाक्षर मन्त्र का उपदेश देते हैं। मेना रोकती हैं, और रोकते हुए उनके मुख से दो अक्षर निकलते हैं, उ, मा, अर्थात् न जाइए; उसी दिन से शिवा का नाम उमा पड़ जाता है। कमर में मूँज की मेखला बाँधे वे उसी शिखर की ओर चल पड़ती हैं जहाँ काम जला था। ग्रीष्म में पंचाग्नि के बीच, वर्षा में खुली चट्टान पर, शीत में जल के भीतर खड़ी; पहला वर्ष फल पर, दूसरा पत्तों पर, और फिर पत्ते भी छूट जाते हैं, इसलिए देवता उनका नाम अपर्णा रख देते हैं। एक पैर पर खड़ी, महेश्वर का चिन्तन करते काली के तीन हजार वर्ष बीत जाते हैं। हिमाचल और मेना लौट चलने का अनुरोध लेकर आते हैं, और वह तपस्विनी अपनी प्रतिज्ञा फिर सुनाती है, “जिन्होंने रोष में कामदेव को भस्म किया, जिन्होंने इस पर्वत के वन तक को जला डाला, वे महादेवजी विरक्त सही, पर भक्तवत्सल भी हैं; मैं उन्हें केवल तपस्या से यहीं बुला लूँगी और अवश्य संतुष्ट करूँगी।” उनके जाते ही तप और उग्र हो जाता है, तीनों लोक तपने लगते हैं, और विष्णु देवताओं के साथ कैलास जाकर उसी योगी के सामने विवाह का अनुरोध रखते हैं जिसने काम को भस्म किया था।

शिव की निन्दा, और उसका उत्तर

परीक्षा की कड़ी में पहले सप्तर्षि आते हैं और छलपूर्ण बातें कहते हैं: रुद्र ने सती से विवाह किया और कुछ दिन निर्वाह न कर सके, आप घर लौट चलिए, आपके योग्य वर तो वैकुण्ठवासी विष्णु हैं। जगदम्बिका हँस पड़ती हैं, “यदि शिव मुझसे विवाह न करेंगे तो मैं सदा कुमारी रह जाऊँगी, पर दूसरे का वरण कभी न करूँगी।” और फिर, “यदि सूर्य पश्चिम में उगने लगे, मेरु अपने स्थान से हट जाय, अग्नि शीतलता अपना ले और कमल शिला पर खिलने लगे, तो भी मेरा हठ नहीं छूट सकता।” तब शिव स्वयं दण्ड और छत्र लिए बूढ़े जटाधारी ब्राह्मण के रूप में आश्रम आते हैं। पूछने पर वह तपस्विनी अपना पूरा परिचय देती है, पहले जन्म में दक्ष की पुत्री सती, इस जन्म में हिमाचल की पुत्री पार्वती, और कहती है, “अब मैं अग्नि में प्रवेश करूँगी, क्योंकि शिव ने मुझे स्वीकार नहीं किया; किन्तु जहाँ जहाँ जन्म लूँगी, उन्हीं का पति रूप में वरण करूँगी।” वे ब्राह्मण के सामने ही अग्नि में समा जाती हैं, और उनके तप के प्रभाव से वह आग चन्दन के लेप सी शीतल हो जाती है। तब वह ब्राह्मण महादेव का चित्र खींचता है, भीख का खप्पर, बाघ का चाम, सवारी में एक बूढ़ा बैल, “वर में जो गुण खोजे जाते हैं, एक भी उनमें नहीं।” पार्वती मन ही मन कुपित होकर उत्तर देती हैं, “अब तक तो समझती थी कि कोई ज्ञानी महात्मा पधारे हैं, पर अब आपकी कलई खुल गयी।” “रुद्र को आप जैसा भी कहें, वे नित्य निर्विकार शिव ही मेरे अभीष्टतम देव हैं।” और जैसे ही वे दूसरी जगह जाने को पैर उठाती हैं, शिव अपने साक्षात् स्वरूप में प्रकट होकर प्रिया का हाथ पकड़ लेते हैं, “मुझे छोड़कर कहाँ जाएँगी? अब मैं फिर कभी आपका त्याग न करूँगा।”

याचक बनकर पधारिए

तप के बल पर महादेव को पा लेने पर भी वे उनका हाथ थामकर सीधे कैलास चल देने पर राज़ी नहीं होतीं। हाथ जोड़कर वे कहती हैं, “आप मेरे पिता हिमवान् के पास याचक बनकर पधारिए और विधि के अनुसार मेरी याचना कीजिए। ऐसा करने पर ही लोक में यह विवाह विख्यात होगा।” बारात आती है, और ऊपर अपने भवन में मेना नारद से वर का परिचय पूछती हैं; एक से एक सुन्दर गण निकलते जाते हैं, और जब नारद भयंकर गणों के बीच खड़े पाँच मुख, दस भुजा और सर्पों वाले साक्षात् शिव को दिखाते हैं, तो मेना कटी लता सी गिरती हैं और होश में आकर बेटी को कोसती हैं कि इसने सोना देकर काँच खरीदा है। तब पार्वती शान्त भाव से कहती हैं कि ये रुद्रदेव सबकी उत्पत्ति के कारण, साक्षात् ईश्वर हैं, “मैंने मन, वाणी और क्रिया से हर का ही वरण किया है; अब दूसरे किसी वर का वरण न करूँगी।” मेना का हठ तभी छूटता है जब शिव अपना परम सुन्दर रूप प्रकट करते हैं, और गिरिराज शिवा का हाथ शिव के हाथ में दे देते हैं। विदा के समय मेना रोती हुई वर से कहती हैं कि यह बालिका जन्म जन्म में आपके चरणों की भक्त रही है, “आपके प्रति भक्ति की बात सुनते ही इसकी आँखें भर आती हैं, और आपकी निन्दा सुनकर यह ऐसा मौन साध लेती है मानो मर ही गई हो।”

कैलास की माता

कुमार खण्ड में देवता छह मुखों वाले बालक को कैलास लाते हैं; पार्वती के हृदय में प्रेम समाता नहीं, वे कुमार को चूमकर परमोत्तम ऐश्वर्य देती हैं और चिरंजीवी बना देती हैं। दूसरा पुत्र उनका अपना गढ़ा हुआ है। एक दिन स्नान करती देवी के भीतर सदाशिव नन्दी को डाँटते सीधे चले आते हैं। उसी घड़ी देवी अपने शरीर के मैल से एक चेतन पुरुष गढ़ती हैं और कहती हैं, “आज से आप हमारे द्वारपाल हुए। हमारी आज्ञा के बिना कोई भी हठ करके हमारे भवन के भीतर पाँव न रखने पाये, चाहे वह कहीं से आये, कोई भी हो।” उस आज्ञा का पहरा देते देते बालक का सिर शूलपाणि के त्रिशूल से कटकर गिरता है, और समाचार पाकर माँ बहुत सी शक्तियाँ उत्पन्न करके आज्ञा देती हैं कि बिना विचारे प्रलय मचा दिया जाए। देवता और ऋषि हाथ जोड़े स्तुति करते हैं, और परादेवी पसीजकर अपनी शर्त रखती हैं, “यदि हमारा पुत्र जी उठे और आप सब लोगों के बीच पूजनीय मान लिया जाये, तो संहार नहीं होगा।” उत्तर दिशा के पहले जीव का सिर जुड़ता है, बालक जैसे सोकर उठ बैठता है, और माँ उसे छाती से लगाकर वर देती हैं, “आज से सम्पूर्ण देवताओं में आपकी अग्रपूजा होगी, आपको कभी दुख नहीं देखना पड़ेगा।” युद्ध खण्ड में मन्दराचल पर वही गिरिजा हँसी में पीछे से आकर शंकर के नेत्र मूँद लेती हैं; तीनों लोकों में क्षण भर अन्धकार छा जाता है, और ललाट के पसीने से एक अन्धा, विकट जीव जन्मता है। और जब कुमार पृथ्वी की परिक्रमा से लौटकर गणेश का विवाह हो चुका पाते हैं और क्रौंच पर्वत चले जाते हैं, तो स्कन्द के बिछोह में उमा दीन होकर स्वामी से कहती हैं, “प्रभो! हमें भी साथ लेकर वहाँ चलिए।” शंकर एक अंश से वहाँ मल्लिकार्जुन होकर बस जाते हैं, और पूर्णिमा के दिन पार्वती आज भी वहाँ जाती हैं।

दूसरे ग्रन्थों की पार्वती

देवीभागवत उसी जन्म को अपनी ओर से कहता है। सातवें स्कन्ध में व्यास जनमेजय को बताते हैं कि दक्ष का द्वेष दुर्वासा की दी हुई माला से उपजता है, सती योगाग्नि से देह भस्म करती हैं और वही ज्योति हिमालय के घर में प्रकट होती है; पर बीच में शिव जलते शरीर को कन्धे पर उठाकर भटकते हैं, और विष्णु के बाणों से कटे अंग जहाँ गिरते हैं, वहाँ सिद्धपीठ बनते हैं। ग्यारहवें स्कन्ध में वही देवी विजय के गर्व में डूबे देवताओं के सामने एक यक्ष बनकर खड़ी होती हैं, और एक लाख वर्ष के जप के बाद चैत्र शुक्ल नवमी के मध्याह्न में इन्द्र के सामने उमा हैमवती प्रकट होकर कहती हैं, “मैं तो आप सबको काठ की पुतलियों की तरह नचाती रहती हूँ।” वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में विश्वामित्र राम को बताते हैं कि हिमालय की दो कन्याएँ थीं, गंगा और उमा, और जब देवताओं ने तेज के भय से रुद्र और उमा के दाम्पत्य को रोका, तो क्रोध से लाल आँखों वाली उमा ने शाप दिया कि आपकी पत्नियाँ सन्तानहीन रहें, और पृथ्वी से कहा कि आप भी पुत्र का सुख न पा सकेंगी। महाभारत के अनुशासन पर्व में नारद कृष्ण को वही नेत्र मूँदने की कथा सुनाते हैं, पर वहाँ तीसरा नेत्र उसी घड़ी प्रकट होता है और उसकी आग हिमवान् को जलाने लगती है, और उमा पिता को नष्ट होते देख नहीं पातीं; उसके बाद वे प्रश्न पर प्रश्न करती हैं, और स्त्री के धर्म गिनाते हुए अपनी ओर से इतना जोड़ती हैं कि यदि आप मुझसे प्रसन्न न हों तो मुझे स्वर्ग भी नहीं चाहिए। और श्रीमद्भागवत के छठे स्कन्ध में भरी सभा में शंकर की गोद में बैठी पार्वती पर विमान से चित्रकेतु हँसता है; शंकर हँसकर चुप रहते हैं, पर पार्वती चुप नहीं रहतीं, “अतः दुर्मते, जाइए, पापमयी असुरयोनि में जन्म लीजिए।” चित्रकेतु हाथ जोड़कर शाप स्वीकार करता है।

उनकी राह

तीन ठहराव, तीन प्रश्न

नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ वे एक योगी से तर्क करती हैं, एक निन्दक को उत्तर देती हैं, और एक कटे सिर पर प्रलय रोक लेती हैं। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।

  1. क्या वह वाणी प्रकृति नहीं है? पार्वती का जन्म पढ़िए, नारद की रेखा से गंगावतरण तीर्थ के उस संवाद तक। पूछिए: आठ वर्ष की कन्या जिस योगी को प्रकृति और पुरुष समझाती है, वह सेवा की आज्ञा क्यों दे देता है?
  2. अब आपकी कलई खुल गयी। पार्वती की परीक्षा में अग्नि में प्रवेश से लेकर जटाधारी ब्राह्मण के उत्तर तक पढ़िए। पूछिए: जिसे तीन हजार वर्ष से माँग रही है, उसी की निन्दा सुनकर वह उठकर क्यों चल देती है?
  3. तो संहार नहीं होगा। गणेश का जन्म पढ़िए, मैल से गढ़े पुत्र से उसकी अग्रपूजा तक। पूछिए: जो माँ प्रलय की आज्ञा देती है, वही एक शर्त पर कैसे पसीज जाती है?

अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ एक देवी अपनी माँ के सामने शिशु बन गई है। जो पहले से ही देवी थी, उसे तीन हजार वर्ष का तप किसलिए चाहिए था?

पार्वती का जन्म · चैत्र की आधी रात, मेना के सामने देवी, और हाथ की वह रेखा जो ब्रह्मा की लिपि है।

कामदेव का दहन · तीसरे नेत्र की आग, और एक कन्या का सफ़ेद पड़ा हुआ शरीर।

पार्वती की तपस्या · मूँज की मेखला, पंचाग्नि, और वह आश्रम जहाँ सिंह और गौ वैर भूल गए।

शिव-पार्वती विवाह · याचक बनकर आया वर, मेना का भय, और भाई की दी हुई अंजलि भर लावा।

गणेश और कार्तिकेय की परिक्रमा · दो पुत्रों की होड़, सात बार माता पिता की परिक्रमा, और पूर्णिमा की क्रौंच यात्रा।

जो माँगती नहीं, कमाती है

शिवपुराण की पार्वती जो चाहती है, वह उसे वर में नहीं मिलता, तप में कमाना पड़ता है। नारद की रेखा उसे वर बताती है, पर पति नहीं देती; आठ वर्ष की उम्र का सांख्य उसे सेवा की आज्ञा दिलाता है, पर पाणिग्रहण नहीं; और काम का बाण योगी को उसकी ओर नहीं मोड़ता, उससे दूर कर देता है। जो मिलता है, वह अपर्णा होने के बाद मिलता है, और वह भी तब जब वह सप्तर्षियों के सामने कुमारी रह जाने को तैयार है और जटाधारी ब्राह्मण के सामने उठकर चल देने को। इस पात्र की धुरी वहीं है: जिसे वह माँग रही है, उसी की निन्दा वह सुनने को राज़ी नहीं, और इसी इनकार पर उसका हाथ पकड़ा जाता है। वाल्मीकि की उमा देवताओं को शाप देती है, भागवत की पार्वती चित्रकेतु को; हर ग्रन्थ में उसका क्रोध उसी एक बात पर उठता है, कि जो उसका है उसे कोई छोटा न कहे। जो देवी शिशु बनकर रोई थी, उसने तप के मोल देवी होना फिर कमाया, और शिवपुराण का शिव इसीलिए अपने को तपस्या के मोल खरीदा हुआ दास कहता है।

आधार-संस्करण और पाठ

आधार-संस्करण: गीताप्रेस का संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क; देवीभागवत, वाल्मीकि रामायण, महाभारत और श्रीमद्भागवत के लिए गीताप्रेस के संस्करण।

इस कथा का पाठ: सती का नन्दाव्रत और विवाह: रुद्रसंहिता, सती खण्ड, अध्याय 7 से 12। दण्डकारण्य में श्रीराम की परीक्षा: सती खण्ड, अध्याय 14 से 15। दक्ष का यज्ञ और देह त्याग: सती खण्ड, अध्याय 16 से 20। जन्म, नारद की रेखा, स्वप्न और गंगावतरण तीर्थ पर प्रकृति पुरुष संवाद: पार्वती खण्ड, अध्याय 2 से 10। काम का दहन: पार्वती खण्ड, अध्याय 12 से 13। तपस्या: पार्वती खण्ड, अध्याय 14 से 17। सप्तर्षि, जटाधारी ब्राह्मण और प्रत्यक्ष दर्शन: पार्वती खण्ड, अध्याय 18 से 22। बारात, मेना का भय और विवाह: पार्वती खण्ड, अध्याय 25 से 40। कुमार और गणेश: कुमार खण्ड, अध्याय 1 से 5। अन्धक का जन्म: युद्ध खण्ड, अध्याय 11। देवीभागवत: स्कन्ध 7, अध्याय 30 (शक्तिपीठ); स्कन्ध 12, अध्याय 8 (उमा हैमवती)। वाल्मीकि: बालकाण्ड, सर्ग 35 से 36। महाभारत: अनुशासन पर्व, उमा महेश्वर संवाद। भागवत: स्कन्ध 6, अध्याय 17।

इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए पात्र-प्रसंग और अलग चिह्नित पाठकीय प्रश्न।

सीमाएँ और पाठ-भेद: यह पात्र-परिचय कथा-सार और संपादकीय मनन को साथ रखता है। प्रसंगों के आधार इस पुस्तकालय की शिवपुराण, देवीभागवत, रामायण, महाभारत और भागवत की कड़ियाँ हैं; अध्याय-संख्याएँ गीताप्रेस के संस्करणों की विषय-सूची से हैं। सती और पार्वती का क्रम शिवपुराण के अनुसार है; देवीभागवत, वाल्मीकि, महाभारत और भागवत के कथन अपने अपने ग्रन्थ के नाम से अलग रखे गए हैं। उद्धरण-चिह्नों के वाक्य इन्हीं कड़ियों के हिन्दी पाठ से हैं।