दक्ष-यज्ञ और सती-दहन

प्रयाग की वह सभा

पूर्वकाल में प्रयाग के तट पर समस्त महात्मा मुनि जुटे और विधि-विधान से एक बहुत बड़ा यज्ञ रचा गया। सनकादि सिद्ध, देवर्षि, प्रजापति और देवता पधारे; ब्रह्माजी स्वयं सपरिवार आये। ऐसे में सती और पार्षदों के साथ भगवान् रुद्र भी आ पहुँचे। सबने, ब्रह्माजी ने भी, भक्तिभाव से उन्हें प्रणाम किया; फिर शिव की आज्ञा पाकर सब यथास्थान बैठे।

तभी प्रजापतियों के भी पति, महातेजस्वी दक्ष वहाँ आ निकले। उन दिनों वे समस्त ब्रह्माण्ड के अधिपति थे; इसी पद ने तत्त्वज्ञान से खाली मन को मैला कर रखा था। देवर्षियों ने हाथ जोड़ मस्तक नवाये। बस एक महेश्वर अपने आसन पर ज्यों के त्यों बैठे रहे। जो स्वयं स्वतन्त्र परमेश्वर हैं, वे किसके आगे सिर नवाते?

दक्ष के भीतर आग भड़क उठी। रुद्र पर क्रूर दृष्टि डालकर वे सबको सुनाते हुए बोले, ‘देवता, असुर, ब्राह्मण, ऋषि, सब हमें मस्तक झुकाते हैं, पर श्मशान में बसनेवाला यह निर्लज्ज हमें प्रणाम नहीं करता। यह मतवाला शास्त्र की विधि की भी अवहेलना करता है; चारों वर्णों से पृथक् है। हम इसे शाप देते हैं कि यह यज्ञ से बहिष्कृत हो; देवताओं के साथ इसे यज्ञ में भाग न मिले।’

शाप पर शाप

यह वचन गूँजा तो भृगु आदि कितने ही महर्षि, शिव की माया से मोहित, रुद्रदेव की निन्दा में सुर मिलाने लगे। पर शिलादपुत्र नन्दी से यह सहा न गया। वे गरजे, ‘अरे महामूढ़ दक्ष! जिनके स्मरणमात्र से यज्ञ सफल होते हैं और तीर्थ पवित्र, उन्हीं मेरे स्वामी महेश्वर को यज्ञ से बहिष्कार? जगत् के रचयिता, पालक और संहारक, उन निर्दोष महाप्रभु का उपहास?’

दक्ष आगबबूला हो उठे। उन्होंने रुद्रगणों को शाप दिया कि वे वेद से बहिष्कृत हों, पाखण्ड में लगें, जटा-भस्म धारण किये मद्यपान में आसक्त रहें। उत्तर में नन्दी ने ब्राह्मणकुल को शाप दिया कि शिवद्रोही ब्राह्मण वेदवाद में फँसकर तत्त्वज्ञान से शून्य हों, भोगों में डूबे भिक्षुक बनें, कोई ब्रह्मराक्षस हों; और यह दक्ष आत्मज्ञान भूलकर पशु के समान हो जाय, शीघ्र ही बकरे के मुख से युक्त हो।

चारों ओर हाहाकार मच गया। तब सदाशिव ने, हँसते हुए-से, मधुर वाणी से नन्दी को समझाया, ‘नन्दिन्! आप परम ज्ञानी हैं; क्रोध आपको शोभा नहीं देता। हमें किसी का शाप छू भी नहीं सकता। और वेद तो मन्त्रमय, मूर्तिमय हैं, मन्त्र-मन्त्र में परमात्मा प्रतिष्ठित; ब्राह्मणकुल को व्यर्थ शाप मत दीजिए।’ नन्दी शान्त हो गये, पर दक्ष के हृदय की गाँठ वैसी की वैसी रह गयी।

दक्ष का महायज्ञ

आगे चलकर दक्ष ने एक महान् यज्ञ ठाना। देवता और मुनि न्योते गये; बस वही एक नहीं बुलाये गये जिनके बिना यज्ञ यज्ञ नहीं होता। दक्ष ने साफ कह दिया कि शिव को जान-बूझकर नहीं बुलाया गया; ‘दधीचजी! फिर ऐसी बात न कहिए; सब मिलकर यज्ञ सफल बनाइए।’ तब सबके सुनते हुए दधीचि बोले, ‘दक्ष! भगवान् शिव के बिना यह महायज्ञ अयज्ञ हो गया; और विशेष बात यह कि इसी यज्ञ में आपका विनाश हो जायगा।’ कहकर दधीचि अकेले आश्रम की राह चल पड़े; मुख्य शिवभक्त भी निकल गये। दक्ष ने उपहास किया, नाममात्र के ब्राह्मण गये, शुभ हुआ; और शिव की माया ऐसी कि बचे देवर्षि पूजन-हवन में जुट गये।

आज ही चलिए

उधर गन्धमादन पर्वत पर, चँदोवे से सजे धारागृह में, दक्षकन्या सती सखियों संग क्रीड़ा में लगी थीं। दृष्टि ऊपर गयी तो देखा, चन्द्रदेव रोहिणी के साथ कहीं चले जा रहे हैं। सती ने सखी विजया को पूछने भेजा; चन्द्रमा से यज्ञोत्सव का वृत्तान्त पाकर विजया लौटीं, और सुनते ही सती के हृदय में हलचल मची। मायके में इतना बड़ा यज्ञ, और अपने यहाँ सूचना तक नहीं? तब वे अपने स्वामी के पास आयीं, ‘प्रभो! पिताजी के यहाँ बड़ा यज्ञ हो रहा है; सब देवर्षि एकत्र हो रहे हैं। वहाँ चलने की रुचि आपको क्यों नहीं हो रही? सुहृदों का धर्म है कि वे सुहृदों से मिलें। प्रार्थना मानिए, हमारे साथ आज ही चलिए।’

महेश्वर का हृदय दक्ष के वाग्बाणों से पहले ही घायल था। मधुर वाणी में बोले, ‘देवि! आपके पिता हमारे विशेष द्रोही हो गये हैं। जो बिना बुलाये दूसरे के घर जाते हैं, वे वहाँ ऐसा अनादर पाते हैं जो मृत्यु से भी बढ़कर दुखदायी है। इसलिये प्रिये! हमको और आपको तो वहाँ नहीं जाना चाहिये।’ पर सती के मन में रोष उमड़ आया, ‘जिनके जाने से यज्ञ सफल होता है, उन्हीं आपको हमारे दुष्ट पिता ने नहीं बुलाया! हम उस दुरात्मा का अभिप्राय जानना चाहती हैं। नाथ! आज्ञा दीजिए, हम आज ही जायेंगी।’

सर्वज्ञ रुद्र ने देखा, निश्चय हो चुका है; बोले, ‘तो हमारी आज्ञा से जाइए; महारानी के अनुरूप इस विभूषित वृषभ पर आरूढ़ होकर प्रमथगणों के साथ यात्रा कीजिए।’ शिव ने उन्हें वस्त्र, आभूषण, छत्र, चामर, राजोचित सब उपचार दिये। साठ हजार रुद्रगण उत्साह से उछलते-कूदते साथ चले, सती और शिव का यश गाते; जय-जयकार से तीनों लोक गूँज उठे।

भरी यज्ञशाला में

यज्ञशाला के द्वार पर सती नन्दी से उतरीं और अकेली भीतर चली गयीं। माता असिक्नी और बहिनों ने बढ़कर आदर किया, पर दक्ष ने देखकर भी एक शब्द न कहा; बाकी लोग दक्ष के भय और शिव की माया से चुप रहे। तिरस्कार पाकर भी सती ने माता-पिता के चरणों में मस्तक झुकाया। फिर दृष्टि उठायी तो यज्ञ में विष्णु आदि देवताओं के भाग रखे थे, पर शम्भु का भाग कहीं नहीं। बस, दुस्सह क्रोध फूट पड़ा; दक्ष को मानो दृष्टि से ही जलाती हुई वे बोलीं, ‘प्रजापते! परम मंगलकारी भगवान् शिव को क्यों नहीं बुलाया गया? जो स्वयं यज्ञ हैं, यज्ञ के अंग, दक्षिणा और यजमान भी वही, उनके बिना यह सारा यज्ञ अपवित्र हो जायगा। आज आपकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी है; इसीलिये आप पिता होकर भी हमें अधम जँच रहे हैं। और ये विष्णु, ब्रह्मा आदि देवता, ये मुनि! अपने प्रभु के आये बिना ये यहाँ कैसे चले आये?’ विष्णु आदि सब चुप रह गये।

दक्ष कुपित हो उठे, ‘भद्रे! बहुत कहने से क्या लाभ? यहाँ आपका कोई काम नहीं; जाइए या ठहरिए, आपकी इच्छा। सब जानते हैं कि आपके पति अमंगल-रूप हैं; कुलीन नहीं, वेद से बहिष्कृत, भूतों-प्रेतों के स्वामी। इसीलिये रुद्र को नहीं बुलाया गया। बेटी! इस मूढ़ ने ब्रह्माजी के कहने से वह विवाह कर दिया था। उन्हें छोड़कर शान्त हो जाइए; और आ ही गयी हैं तो अपना भाग आप ही उठा लीजिए।’

एक ओर पिता के मुख से पति की निन्दा, दूसरी ओर यह सोच कि शंकरजी समाचार पूछेंगे तो क्या उत्तर देंगी? लंबी साँस खींचकर तीनों लोकों की जननी बोलीं, ‘जो महादेव की निन्दा करता है और जो वह निन्दा सुनता है, दोनों तब तक नरक में रहते हैं जब तक सूर्य और चन्द्रमा हैं। अतः तात! हम यह शरीर त्याग देंगी, अग्नि में प्रवेश कर जायेंगी। स्वामी का अनादर देखकर अब इस जीवन से क्या प्रयोजन? समर्थ हो तो मनुष्य शिव-निन्दक की जीभ काट डाले; असमर्थ हो तो कान मूँदकर हट जाय।’

फिर, अपने आने पर पछताती हुई भी, वे निडर होकर बोलीं, ‘तात! आप शंकर के निन्दक हैं; इसकी यातना भोगनी पड़ेगी। जिनका दो अक्षरों का नाम ‘शिव’ वाणी से एक बार निकल जाय तो सारी पापराशि नष्ट हो जाती है, उनसे द्वेष! सच पूछिए तो अमंगल-रूप आप स्वयं हैं। भगवान् शंकर परब्रह्म परमात्मा हैं; प्रवृत्ति-निवृत्ति दोनों कर्म उन तक पहुँचते ही नहीं। हमारा ऐश्वर्य अव्यक्त है; वह आपके पास नहीं। जिस दिन भगवान् शिव हमें आपके नाते ‘दाक्षायणी’ कहकर पुकारेंगे, उस दिन हमारा मन दुखी हो जायगा। इसलिये आपके अंश से उत्पन्न, शव के समान घृणित इस शरीर को हम अभी त्याग देंगी। और हे देवताओ, मुनियो! शिव-निन्दा सुनना आप सबको प्रिय है; इस कुकर्म का पूरा दण्ड मिलेगा।’ इतना कहकर सती चुप हो गयीं और मन-ही-मन प्राणवल्लभ शम्भु का स्मरण करने लगीं।

भीतर से उठी आग

मौन होकर वे भूमि पर बैठ गयीं; आचमन किया, आँखें मूँदीं, योगमार्ग में स्थित हुईं। प्राण और अपान को एक कर नाभिचक्र में स्थिर किया; उदान को बुद्धि के साथ हृदय में, फिर कण्ठ के मार्ग से भौंहों के बीच ले गयीं। सम्पूर्ण अंगों में योग के अनुसार वायु और अग्नि की धारणा की, और पति के चरणारविन्दों का चिन्तन करते-करते उन्हें और कुछ दिखायी ही न दिया। उसी क्षण सती का निष्पाप शरीर गिरा और उनकी इच्छा के अनुसार योगाग्नि से तत्काल भस्म हो गया। लोक में प्रचलित कथा सती को यज्ञकुण्ड में कूदते दिखाती है, पर शिवपुराण कहता है कि वह अग्नि बाहर से नहीं आयी, भीतर से उठी थी।

देखनेवाले हाहाकार कर उठे; वह हाहाकार आकाश और धरती पर सब ओर फैल गया। लोग कहते थे, ‘हाय! शंकर की परम प्रेयसी ने किस दुष्ट के दुर्व्यवहार से प्राण त्याग दिये! अपनी ही पुत्री प्राण त्यागने को उद्यत हुई और इस शंकरद्रोही दक्ष ने उसे रोका तक नहीं!’

द्वार पर खड़े शंकर के साठ हजार बलवान् पार्षद रोष से भर उठे। ‘धिक्कार है, धिक्कार है’ कहते वे हाहाकार करने लगे; कितने ही शोक में व्याकुल होकर अपने ही शस्त्रों से अपने अंगों पर आघात करने लगे। बीस हजार पार्षद उसी समय सती के साथ ही नष्ट हो गये। जो बचे, वे हथियार उठाकर दक्ष को मारने दौड़े। तब भृगु ने विघ्न डालनेवालों के नाश के लिये नियत यजुर्मन्त्र से दक्षिणाग्नि में आहुति दी, और यज्ञकुण्ड से ऋभु नाम के सहस्रों प्रबल वीर देवता प्रकट हो गये, हाथों में जलती लकड़ियाँ लिये; ऐसा विकट युद्ध हुआ कि रोंगटे खड़े हो जायँ, और ब्रह्मतेज की मार से प्रमथगण भाग खड़े हुए। यह सब भगवान् शिव की महाशक्तिमती इच्छा से ही हुआ।

अब यज्ञशाला में विजय का नहीं, आशंका का सन्नाटा था। ऋषि, इन्द्र आदि देवता, मरुद्गण, विश्वेदेव और लोकपाल चुप रह गये; सब विष्णु से प्रार्थना करते थे कि यह विघ्न टल जाय; श्रीविष्णु स्वयं भावी परिणाम सोचकर उद्विग्न थे। शंकरद्रोही दक्ष के महायज्ञ में बड़ा भारी विघ्न उपस्थित हो चुका था, और यह समाचार अभी कैलास नहीं पहुँचा था। जिस दिन पहुँचा, उस दिन जो हुआ, वह अगली कथा में सुनिए।

आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), रुद्रसंहिता (सती खण्ड)