तीन भाई तप में बैठे थे, और तप ऐसा कड़ा कि अन्त में पितामह ब्रह्मा को स्वयं उतरना पड़ा। ये तारकासुर के पुत्र थे, तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली, जिनका पिता देवसेनापति कार्तिकेय के हाथों मारा जा चुका था। वर मांगने की घड़ी आई तो तीनों के होंठों पर वही शब्द था जो हर असुर मांगता आया है, अमरत्व।
ब्रह्माजी ने सिर हिला दिया। ‘असुरो! अमरत्व किसी को नहीं मिल सकता; जो जन्मा है, वह अजर-अमर नहीं हो सकता। कोई ऐसा दुर्लभ वर मांगिए जो देवताओं और असुरों के लिए अशक्य हो; अपने मरण का हेतु आप स्वयं चुन लीजिए।’
अब असुरों की चतुराई देखिए। तारकाक्ष ने सोने का ऐसा नगर मांगा जिसे देवता भी भेद न सकें, कमलाक्ष ने चांदी का, विद्युन्माली ने वज्र-से कठोर लोहे का। फिर शर्त जुड़ी। तीनों पुर आकाश में एक के ऊपर एक विचरें, दृष्टि से ओझल; पुष्करावर्तक मेघों की वर्षा में एक सहस्र वर्ष बीतने पर पुष्य के योग में ही तीनों मिलकर एक हों; और वध तभी हो जब उसी घड़ी स्वयं शंकर किसी असम्भव-से रथ पर बैठकर एक ही अनोखे बाण से तीनों पुर भेद दें। भीतर की गिनती यह कि शंकर तो हमारे पूज्य हैं, वे हमें कैसे भस्म करेंगे? ब्रह्माजी ने कहा, ऐसा ही होगा, और मय दानव को तीनों नगर बनाने की आज्ञा दी।
तीन नगर, एक साम्राज्य
धैर्यशाली मय ने तारकाक्ष के लिए स्वर्ग में सोने का दुर्ग रचा, कमलाक्ष के लिए अन्तरिक्ष में चांदी का, विद्युन्माली के लिए भूतल पर लोहे का। कल्पवृक्ष, मणिजड़े महल, सूर्यमण्डल जैसे विमान, कैलास-शिखर जैसे प्रासाद। और सुनिए, वहां केवल भोग नहीं था; वेदाध्ययन की पाठशालाएं थीं, अग्निहोत्रशालाएं, पतिव्रता नारियां, स्वधर्म में लगे ब्राह्मण। नीले केश वाले वे दैत्य सुशिक्षित, युद्धप्रिय और ब्रह्मा तथा शिव के पूजन से विशुद्ध पराक्रम वाले थे। इन्हीं पुरों से वे सारी त्रिलोकी दबाकर राज्य भोगने लगे, और लंबा काल बीत गया।
पुण्य की ढाल
संतप्त देवता ब्रह्माजी के पास पहुंचे कि तारक-पुत्रों और मयासुर ने स्वर्गवासियों को व्याकुल कर डाला है। ब्रह्माजी बोले, बढ़ाया इन्हें हमने ही है, हमारे हाथों वध उचित नहीं, और अभी त्रिपुर में इनका पुण्य भी तप रहा है; चलिए, शिव से प्रार्थना कीजिए। फिर सब वृषभध्वज के पास गए और स्तवन कर बोले, ‘महादेव! तारक के तीनों पुत्रों ने इन्द्र समेत देवताओं को परास्त कर दिया है, त्रिलोकी उनके अधीन है, यज्ञों के भाग वे स्वयं हड़प लेते हैं। रक्षा कीजिए।’
और यहीं इस कथा की सबसे अनूठी गांठ है। शिव ने अस्त्र नहीं उठाया। बोले, ‘वे त्रिपुरवासी बड़े पुण्य-कार्यों में लगे हैं, और पुण्यात्मा पर प्रहार नहीं किया जाता। हम रणकर्कश सही, पर जान-बूझकर मित्रद्रोह कैसे करें? ब्रह्माजी स्वयं कह चुके हैं, मित्रद्रोह से बढ़कर कोई पाप नहीं। जब तक वे दैत्य हमारी भक्ति में तत्पर हैं, उनका वध असम्भव है। आप विष्णु से निवेदन कीजिए।’ तब देवगण विष्णु के पास गए, और विष्णु ने ऐसी व्यवस्था रची कि वे असुर सनातन धर्म से विमुख होकर अनाचार में गिर गए; पूजन, श्राद्ध, यज्ञ, व्रत, तीर्थ, दान सब बुझ गए। माया और अलक्ष्मी उन पुरों में जा बैठीं, तप की कमाई लक्ष्मी चली गई, और भाइयों समेत दैत्यराज की तथा मय की शक्ति क्षीण हो गई।
अब ब्रह्मा-विष्णु समेत सारे देवता कैलास पहुंचे। स्तुति हुई, विष्णु ने रुद्रमन्त्र का डेढ़ करोड़ जप किया। शिव प्रसन्न होकर वृषभ पर प्रकट हुए, विष्णु को गले लगाया, पर बात फिर अटकी; बोले, ‘वे विष्णु ही, या और कोई, उन्हें क्यों नहीं मारते?’ श्रीहरि तक का मुख उतर गया। तब ब्रह्माजी हाथ जोड़कर बोले, ‘परमेश्वर! मोह में तो वे आपके ही आदेश से डाले गए हैं। अब वे भक्ति से विमुख हैं; उनका वध आपके सिवा कोई नहीं कर सकता, और राजा को धर्मानुसार पापियों को दण्ड देने से पाप नहीं लगता। यह कांटा उखाड़िए। मुनीश्वर, यज्ञ, वेद, हम और विष्णु, सब आपकी प्रजा हैं; आप सार्वभौम सम्राट् हैं, श्रीहरि युवराज, हम पुरोहित, इन्द्र मन्त्री।’
शिव प्रसन्न हुए, पर एक नई अड़चन मुस्कराती हुई आई। ‘ब्रह्मन्! सम्राट् कहते हैं, तो सम्राट् के योग्य सामग्री कहां? न वैसा दिव्य रथ, न सारथि, न वे बाण।’ देवता और ऋषि व्याकुल हो उठे; तब श्रीहरि ने समझाया कि बड़ी आराधना बिना कष्ट के सिद्ध नहीं होती, और एक मन्त्र रच दिया, ॐ नमः शुभं शुभं कुर कुर शिवाय नमः ॐ। देवता शिव-शिव रटते एक करोड़ जप में बैठ गए, हरि भी जपने लगे। तब साक्षात् शिव प्रकट हुए, ‘हम प्रसन्न हैं, वर मांगिए।’ देवताओं ने एक ही वर मांगा, त्रिपुर का संहार। महेश्वर बोले, ‘अब त्रिपुर को नष्ट हुआ ही समझिए। हरे! विधे! हमारे लिए सम्राट् के योग्य रथ, सारथि, धनुष, बाण प्रस्तुत कीजिए। और जिस मन्त्र का आपने जप किया, वह भुक्ति-मुक्ति का दाता है।’
सर्वदेवमय रथ
तब शिव की आज्ञा से विश्वकर्मा ने वह रथ रचा जिसकी जोड़ का दूसरा न बना। छहों ऋतुएं पहियों की नेमि, सत्ताईसों नक्षत्र सजावट, अन्तरिक्ष अगला भाग, मन्दराचल बैठक, उदयाचल और अस्ताचल धुरे, महामेरु आधार। शेषनाग बांधने की रस्सी, दिशाएं पाद, पुष्कर आदि तीर्थ रत्नजड़ी पताकाएं, चारों समुद्र ओढ़ने के वस्त्र। गंगा आदि सरिताएं सुन्दरियां बनकर चंवर डुलाने लगीं, सातों वायु सोने की सीढ़ियां। ब्रह्मा स्वयं लगाम थामे सारथि, ॐकार उनका चाबुक। हिमालय धनुष, नागराज शेष प्रत्यंचा, श्रुतिरूपिणी सरस्वती धनुष की घंटा। और बाण? बाण स्वयं विष्णु, अग्नि उसकी नोक, चारों वेद जुतने वाले घोड़े। ब्रह्माण्ड में जो कुछ वस्तु थी, सब उस रथ में थी।
ब्रह्माजी ने रथ शिव को समर्पित किया और शम्भु आरूढ़ हुए। चढ़ते ही वेदरूपी घोड़े सिर के बल गिर पड़े, पृथ्वी कांपी, पर्वत डोले, शेष कराह उठे। धरणीधर ने नन्दीश्वर का रूप धर रथ को नीचे से उठाया, पर महेश का तेज वे भी न सह सके, घुटने टेक दिए। तब ब्रह्माजी ने घोड़ों को संभाला और वायु-वेग वाले उन वेदमय अश्वों को तीनों पुरों की ओर बढ़ा दिया।
राह में रुद्र बोले, ‘यदि आप सब प्राणियों के लिए अलग-अलग पशुभाव मानकर उन पशुओं का आधिपत्य हमें दे दें, तभी हम असुरों का संहार करेंगे।’ पशु बनने की बात से देवताओं का मन कांप गया। भाव समझकर देवदेव हंसे, ‘पशुभाव से आपका पतन नहीं होगा; जो दिव्य पाशुपत व्रत करेगा, या नैष्ठिक भाव से बारह या तीन वर्ष हमारी सेवा करेगा, वह पशुत्व से छूट जाएगा।’ देवताओं ने तथास्तु कहा; बड़े-बड़े देवता महादेव के पशु बने, और उस पाश से छुड़ाने वाले रुद्र उसी दिन से पशुपति कहलाए। फिर जय-जयकार के बीच यात्रा चली; हाथी, घोड़े, सिंह और बैलों पर चढ़े देवता हल, शूल, मुसल लिए साथ चले, सिद्ध-चारण फूल बरसाते रहे, अनगिनत गण महेश्वर को घेरे रहे।
अभिजित् मुहूर्त का बाण
रथ के शीर्ष पर खड़े शम्भु ने प्रत्यंचा चढ़ाई, बाण का संधान किया, और रोष में होंठ चाटते, दृष्टि गड़ाए, अचल हो गए। पर यह क्या? तीनों पुर लक्ष्य में आते ही नहीं थे; उनके अंगूठे के अगले भाग पर विराजे गणेश निरन्तर पीड़ा पहुंचा रहे थे। तभी आकाशवाणी हुई, ‘जगदीश्वर! जब तक आप इन गणेश की अर्चना नहीं कर लेंगे, इन पुरों का संहार नहीं कर सकेंगे।’ त्रिशूलधारी ने भद्रकाली को बुलाकर गजानन का विधिवत् पूजन किया, और विनायक प्रसन्न हुए तो तीनों नगर आकाश में साफ दीख पड़े। पुराण स्वयं पूछ लेता है, सबके उपास्य का भी उपास्य कैसे; और कह देता है, उस वरदानी के चरित में कौतुक से सब घटता है।
उधर सहस्र वर्ष पूरे हुए, पुष्य का योग आया और तीनों पुर एक हो गए। विष्णु पुकार उठे, ‘महेश्वर! दैत्यों के वध का समय आ गया है; इससे पहले कि ये पुर फिर विलग हों, इन्हें भस्म कर डालिए।’ अभिजित् मुहूर्त चल रहा था। शिवजी ने पूज्य पाशुपतास्त्र का संधान किया, धनुष की टंकार और दुःसह सिंहनाद से अपना नाम घोषित किया, महासुरों को ललकारा, और करोड़ों सूर्यों-सा दहकता वह भीषण बाण छूट गया।
नोक पर अग्नि, भीतर से विष्णुमय, उस जाज्वल्यमान बाण ने त्रिपुरनिवासी दैत्यों को दग्ध कर दिया। तीनों पुर भस्म होकर एक साथ धरती पर गिरे, हाहाकार मच उठा। और उसी आग में से इस कथा का सबसे कोमल स्वर उठा। जलते हुए तारकाक्ष ने भक्तवत्सल शंकर का स्मरण कर कहा, ‘भव! अब ज्ञात हुआ कि आप हम पर प्रसन्न ही हैं। जो लाभ देवताओं और असुरों को भी अप्राप्य है, वह हमें मिला, आपके हाथ से मरण। जिस-जिस योनि में हम जन्में, हमारी बुद्धि आपकी भक्ति में लगी रहे।’ शिव की आज्ञा से अग्नि ने उन्हें राख की ढेरी बना दिया। स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध, कोई नहीं बचा, जैसे कल्पान्त में जगत् भस्म हो जाता है। बचा बस एक, मय; देवताओं का अविरोधी, शम्भु के तेज से सुरक्षित सद्भक्त। और जो दैत्य अन्त तक बन्धु-बान्धवों समेत शिवपूजा में लगे रहे, वे उसी पूजा के प्रभाव से अगले जन्म में गणों के अधिपति हुए।
राख के बाद
त्रिपुर जल गया, पर शंकर का रौद्र रूप अब भी दहक रहा था और दसों दिशाएं झुलसी जा रही थीं। देवता भयभीत होकर पार्वती की ओर देखने लगे, ब्रह्मा-विष्णु तक सहम गए। सबने स्तुति कर एक ही वर मांगा, ‘जब-जब देवताओं पर दुख की छाया पड़े, तब-तब आप प्रकट होकर उसका नाश करते रहें।’ शान्त होकर शिव बोले, ‘सदा ऐसा ही होगा।’ इसी घड़ी मय दानव आया और शिव के चरणों में लोट गया; प्रेम से उसका गला भर आया। शिव ने कहा, ‘दानवश्रेष्ठ! हम प्रसन्न हैं, वर मांगिए।’ मय ने न राज मांगा, न प्रतिशोध; इतना ही कि हम निरन्तर आपके भजन में लीन और निर्भय रहें। महेश्वर बोले, ‘आप हमारे भक्त हैं, धन्य हैं। परिवार समेत वितल लोक जाइए, वह स्वर्ग से भी रमणीय है; वहां निर्भय होकर हमारा भजन कीजिए, आप में आसुर भाव कभी नहीं आएगा।’ मय सिर झुकाकर वितल चला गया।
तब महादेव पार्वती, पुत्रों और गणों समेत अन्तर्धान हो गए, और उनके ओझल होते ही वह धनुष, बाण और सर्वदेवमय रथ भी अदृश्य हो गया। ब्रह्मा, विष्णु, देवता, मुनि, गन्धर्व, सब शंकर का यश गाते अपने-अपने धाम लौटे। तीन पुरों के उस अरि को संसार तभी से त्रिपुरारि कहकर पुकारता है। एक बाण, तीन नगर, और राख के बीच से उठती भक्ति की वह आवाज, यही इस कथा की थाती है।
आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), रुद्रसंहिता (युद्ध खण्ड)