लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish

पात्र

गणेश

पढ़ने में लगभग 14 मिनट

बर्फ़ से ढके कैलास के महल में एक छोटी सी बात चली है, और उसी बात से एक जन्म निकल आता है। शिवपुराण की रुद्रसंहिता का कुमार खण्ड कहता है कि सखियों जया और विजया ने पार्वती से कहा था कि ये जितने गण हैं, सब रुद्र के हैं, हमारा अपना कोई नहीं; और एक दिन स्नान करती देवी के भीतर सदाशिव नन्दी को डाँटते सीधे चले आए। उसी घड़ी देवी अपने शरीर के मैल से एक चेतन पुरुष गढ़ती हैं, सम्पूर्ण शुभ लक्षणों वाला, विशाल देह, बल पराक्रम से भरा, उसे वस्त्र और आभूषण पहनाती हैं, और वह बालक हाथ जोड़कर पहला प्रश्न पूछता है कि आज आपको कौन सा काम आ पड़ा है, कहिए, हम उसे पूरा करेंगे। माता कहती हैं, “आज से आप हमारे द्वारपाल हुए। हमारी आज्ञा के बिना कोई भी हठ करके हमारे भवन के भीतर पाँव न रखने पाये, चाहे वह कहीं से आये, कोई भी हो।” वे बेटे के हाथ में एक सुदृढ़ छड़ी थमाती हैं, उसका मुख चूमती हैं, और स्नान करने चली जाती हैं। गणेश की कथा इसी छड़ी से शुरू होती है, और उसकी हर कड़ी में वही बालक एक आज्ञा को पकड़े खड़ा रहता है, चाहे सामने त्रिशूल हो, चाहे सारी पृथ्वी की परिक्रमा।

द्वार पर ठनी

उसी समय परम कौतुकी शिव द्वार पर आ पहुँचते हैं, और बालक उन्हें पहचानता नहीं। वह छड़ी उठाकर कहता है, “देव, माता की आज्ञा के बिना आप अभी भीतर न जाइए। माता स्नान करने बैठी हैं। इस समय यहाँ से लौट जाइए।” शिव झिड़कते हैं, “अरे मूर्ख, यह किसे रोक रहा है? क्या यह हमें पहचानता नहीं? शिव के सिवा हम और कोई नहीं हैं।” पर बालक टस से मस नहीं होता। महेश्वर के गण समझाने आते हैं कि हम यहाँ के द्वारपाल हैं, आपको भी गण समझकर अब तक हाथ नहीं उठाया, “व्यर्थ अपनी मृत्यु को क्यों बुलाते हैं?” गिरिजानन्दन निर्भय खड़े रहते हैं, गणों को फटकारते हैं और दरवाज़ा नहीं छोड़ते। गण लौटकर सारा हाल कहते हैं तो लीलाधारी महेश्वर उलटे उन्हीं पर बरसते हैं कि यह कौन है जो शत्रु की भाँति इतना बढ़ चढ़कर बोल रहा है, उसे दूर भगाया जाए; गण फिर जाते हैं, बालक फिर रोकता है, और पता लगाने पर मालूम होता है कि ये गिरिजा के पुत्र हैं, द्वारपाल नियुक्त हुए हैं। तब शंकर एक विचित्र लीला ठानते हैं, जिसमें अपने गणों का गर्व भी गलाना है; गणों और देवताओं को बुलाकर भीषण संग्राम छिड़ता है, और कोई गणेश को पराजित नहीं कर पाता। अन्त में स्वयं शूलपाणि आगे आते हैं, और उन्हीं के त्रिशूल से गणेश का सिर कटकर गिर पड़ता है। कथा अपनी ओर से इतना जोड़ती है कि माँ की आज्ञा का पहरा देते देते बालक ने प्राण दे दिए, पर द्वार नहीं छोड़ा; और ब्रह्मा नारद से यह भी कहते हैं कि शनि की दृष्टि से मस्तक कटने वाली कथा किसी और कल्प की है, इस कल्प में शिव ने ही यह लीला रची।

उत्तर दिशा का पहला जीव

समाचार पार्वती तक पहुँचता है तो वे बहुत सी शक्तियाँ उत्पन्न करके आज्ञा देती हैं कि बिना विचारे प्रलय मचा दिया जाए; शिवगण भागकर दूर जा खड़े होते हैं, और देवता और ऋषि गिरिजा के चरणों में झुककर स्तुति करते हैं। चण्डिका का हृदय पसीजता है और वे अपनी शर्त रखती हैं, “यदि हमारा पुत्र जी उठे और आप सब लोगों के बीच पूजनीय मान लिया जाये, तो संहार नहीं होगा।” शिव कहते हैं, “उत्तर दिशा की ओर जाइए, और जो जीव सबसे पहले मिले, उसका सिर काटकर इस बालक के धड़ से जोड़ दीजिए।” सबसे पहले एक हाथी मिलता है, एक दाँत वाला; देवता उसी का मस्तक लाकर बालक के धड़ से जोड़ देते हैं, वेदमन्त्रों से अभिमन्त्रित जल छिड़कते हैं, और स्पर्श होते ही बालक चेतना से भरकर ऐसे उठ बैठता है जैसे कोई सोकर जागा हो, गज का सा मुख, दमकती देह, चेहरे पर खेलती प्रसन्नता। माँ उसे दोनों हाथों से छाती से लगाकर वर देती हैं, “बेटा, इस बार आपने बड़ा कष्ट झेला, पर अब आप कृतकृत्य हैं, धन्य हैं। आज से सम्पूर्ण देवताओं में आपकी अग्रपूजा होगी, आपको कभी दुख नहीं देखना पड़ेगा।” इन्द्र आदि देवता बालक को शिव की गोद में बैठाते हैं, और जिस हाथ ने सिर काटा था, वही मस्तक पर फिरता है, “यह हमारा दूसरा पुत्र है।” गणेश उठकर शिव, पार्वती, ब्रह्मा, विष्णु और नारद सबको प्रणाम करते हैं और विनय से कहते हैं, “अभिमान करना मनुष्य का स्वभाव ही है, अतः आप सब हमारा अपराध क्षमा करें।” जिसने जगत के स्वामी को द्वार पर रोका था, वही क्षमा माँगता है। तब ब्रह्मा, विष्णु और शंकर एक साथ वर देते हैं, “मनुष्य पहले इनकी पूजा करें, फिर हमारी, तभी हमारा पूजन पूरा होगा।” और शिव अपनी ओर से जोड़ते हैं, “विघ्न मिटाने के कामों में आपका नाम सबसे ऊपर रहेगा। आप सबके पूज्य हैं, अतः अब हमारे सम्पूर्ण गणों के अध्यक्ष हो जाइए।” जिन गणों को सुबह छड़ी से भगाया था, उन्हीं का अध्यक्ष पद शाम को मिलता है। और एक वर और, कि जिस घड़ी गिरिजा के चित्त में यह रूप प्रकट हुआ, वह भाद्रपद के कृष्णपक्ष की चतुर्थी थी, इसलिए उसी तिथि को इनका व्रत किया जाए।

सात परिक्रमाएँ

कुमार खण्ड की अगली कड़ी में कैलास पर दो पुत्र हैं, एक ओर छह मुख वाले कार्तिकेय, दूसरी ओर गजमुख गणेश, जिनकी बुद्धि का कोई पार नहीं। शिव और शिवा एकान्त में विवाह की सोचते हैं, दोनों बेटे माता पिता के मन की बात ताड़ लेते हैं, और होड़ लग जाती है कि पहले किसका विवाह हो। कथा अपनी ओर से कह देती है कि कुछ लोग इसमें एक फल की होड़ जोड़ते हैं, पर शिवपुराण में फल कहीं नहीं आता। माता पिता शर्त रखते हैं कि जो सारी पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले लौट आएगा, उसी का विवाह पहले होगा। कार्तिकेय उसी क्षण उठकर चल पड़ते हैं, और गणेश वहीं खड़े रह जाते हैं और मन ही मन सोचते हैं, “परिक्रमा तो हमसे होगी नहीं। एक कोस चलने के बाद आगे पैर ही न बढ़ेंगे। फिर सारी पृथ्वी घूमकर हम सुख कैसे पाएँगे?” वे घर लौटते हैं, स्नान करते हैं, और माता पिता से कहते हैं, “मैंने आपकी पूजा के लिए यहाँ दो आसन रख दिए हैं। आप दोनों इन पर विराजिए और हमारा मनोरथ पूरा कीजिए।” वे विधिपूर्वक पूजा करते हैं और सात बार उनकी परिक्रमा करके विवाह माँगते हैं। माता पिता लीला करते हुए कहते हैं कि पहले आप भी पृथ्वी की परिक्रमा कर आइए, कुमार तो निकल चुके; और नियम के पक्के गणेश तनिक रोष में पूछते हैं, “हमने तो सात बार पृथ्वी की परिक्रमा कर ली, फिर आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?” सात द्वीपों वाली पृथ्वी आपने कब घूमी, माता पिता पूछते हैं, और उत्तर में वह तर्क आता है जो इस पूरी कड़ी की धुरी है: “हमने अपनी बुद्धि से आप दोनों की, शिव और पार्वती की, पूजा करके परिक्रमा कर ली, इसी से समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी की हमारी परिक्रमा पूरी हो गई।” वेद और शास्त्र कहते हैं कि जो पुत्र माता पिता की पूजा करके परिक्रमा करता है, उसे सारी पृथ्वी घूमने का फल मिलता है, “और जो माता-पिता को छोड़कर तीर्थयात्रा को निकल जाता है, वह पाप का भागी होता है, क्योंकि पुत्र के लिए माता-पिता के चरण-कमल ही सबसे बड़ा तीर्थ हैं।” और फिर वह वाक्य जो माता पिता को निरुत्तर कर देता है, “इसलिए या तो शीघ्र हमारा विवाह कर दीजिए, या कह दीजिए कि वेद-शास्त्र झूठे हैं।”

जगत के स्वामी अपने पुत्र के वचन सुनकर विस्मित रह जाते हैं और उसकी सच्चाई की प्रशंसा करते हैं, “जिसके पास बुद्धि है, वही बलवान है; बुद्धिहीन के पास बल कहाँ?” हमने आपकी बात मान ली, वे कहते हैं, अब इसके विरुद्ध कुछ न करेंगे। प्रजापति विश्वरूप की दो कन्याएँ हैं, सिद्धि और बुद्धि; शंकर और गिरिजा उन दोनों से गणेश का विवाह निश्चित करते हैं, और विश्वकर्मा उसे सम्पन्न कराते हैं। सिद्धि से क्षेम जन्मते हैं और बुद्धि से लाभ, और गणेश अचिन्त्य सुख भोगते हुए अपने घर में बस जाते हैं। इसी बीच कार्तिकेय परिक्रमा पूरी करके लौटते हैं, नारद उन्हें सारा समाचार सुना देते हैं, और क्षुब्ध कुमार माता पिता के रोकने पर भी क्रौंच पर्वत चले जाते हैं; उसी दिन से उनका कुमारत्व तीनों लोकों में प्रसिद्ध होता है। कथा यहाँ दो भाइयों को आमने सामने नहीं रखती, एक को घर में बसाती है और दूसरे को पर्वत पर, और माता पिता को हर पर्व पर उस पर्वत की राह पर।

अँगूठे पर बैठा विघ्न

युद्ध खण्ड में त्रिपुर के विरुद्ध वह रथ बनता है जिसमें ब्रह्मा सारथि हैं, और अभिजित् मुहूर्त में रथ के शीर्ष पर खड़े शम्भु प्रत्यंचा चढ़ाकर बाण का संधान करते हैं। पर तीनों पुर लक्ष्य में आते ही नहीं; उनके अँगूठे के अगले भाग पर विराजे गणेश निरन्तर पीड़ा पहुँचा रहे हैं। तभी आकाशवाणी होती है, “जब तक आप इन गणेश की अर्चना नहीं कर लेंगे, इन पुरों का संहार नहीं कर सकेंगे।” त्रिशूलधारी भद्रकाली को बुलाकर गजानन का विधिवत् पूजन करते हैं, विनायक प्रसन्न होते हैं, और तीनों नगर आकाश में साफ़ दीख पड़ते हैं। पुराण स्वयं पूछ लेता है कि सबके उपास्य का भी उपास्य कैसे, और कह देता है कि उस वरदानी के चरित में कौतुक से सब घटता है। जो वर कुमार खण्ड में दिया गया था, कि जो पहले इनकी पूजा किए बिना किसी और देवता का पूजन करे उसका फल नष्ट हो, वह यहाँ स्वयं वर देने वाले पर लागू होता है, और पिता पुत्र की पूजा करके ही बाण छोड़ पाता है। कोटिरुद्रसंहिता में वही गणेश एक दूसरी भूमिका में हैं। गौतम की प्रतिष्ठा से जलते कुछ ऋषि उनकी आराधना करके वर माँगते हैं कि किसी उपाय से गौतम आश्रम से बाहर निकाल दिए जाएँ, और गणेशराज मना करते हैं, “ऋषियो, आप उचित नहीं कर रहे। जिसने पहले उपकार किया हो, उसे बिना अपराध दुःख देना अपना ही नाश बुलाना है।” अकाल में जिसने जल की व्यवस्था करके आपको जिलाया, उसी से छल ठीक नहीं, कोई दूसरा वर माँग लीजिए; पर वे नहीं मानते, और भक्तों के अधीन गणेश कहते हैं, “जो आपने माँगा वही होगा; आगे जो होनहार है, वह होकर रहेगा।” फिर एक दिन गौतम के पके धान के खेत में वे स्वयं एक दुर्बल गाय बनकर चरने लगते हैं; गौतम दया से मुट्ठी भर तिनके लेकर उसे हाँकते हैं, और तिनकों का छूना था कि वह गाय वहीं गिरकर प्राण छोड़ देती है। उसी गोहत्या के प्रायश्चित्त में आगे गौतम गंगा को लाते हैं और त्र्यम्बक का ज्योतिर्लिंग स्थापित होता है।

व्यास की लेखनी

महाभारत का आदि पर्व गणेश को एक ही बार लाता है, और उस एक बार में उन्हें पूरा ग्रन्थ सौंप देता है। सौति नैमिषारण्य में कहते हैं कि व्यास ने अपनी रचना पूरी कर ली है पर उसे लिखने वाला कोई नहीं; ब्रह्मा स्वयं आते हैं, रचना को काव्य का पद देते हैं, और कहते हैं कि इस काव्य को लिखने के लिए गणेश का स्मरण कीजिए। व्यास स्मरण करते हैं, और विघ्नों को हटाने वाले गणेश स्मरण करते ही वहाँ आ जाते हैं। व्यास कहते हैं कि हे गणों के नायक, आप उस भारत के लेखक बनिए जिसे हमने अपनी कल्पना में रचा है और जिसे हम अब बोलने जा रहे हैं। गणेश अपनी शर्त रखते हैं, “हम आपकी रचना के लेखक बनेंगे, इस शर्त पर कि हमारी लेखनी एक क्षण के लिए भी लिखना न रोके।” और व्यास अपनी काट, “जहाँ कहीं कोई बात ऐसी आए जो आप समझ न पाएँ, वहाँ लिखना रोक दीजिए।” गणेश ओम् कहकर स्वीकार करते हैं और लिखना आरम्भ करते हैं, और व्यास मन बहलाने के लिए रचना की गाँठें बहुत कसकर बाँधते हैं। सौति कहते हैं कि आठ हज़ार आठ सौ श्लोक ऐसे हैं जिन्हें वे जानते हैं, शुक जानते हैं, और शायद संजय भी; उनके अर्थ की गूढ़ता के कारण आज तक कोई उन कसी हुई गाँठों को भेद नहीं सका, और सर्वज्ञ गणेश को भी उन पर सोचने में एक क्षण लगता था, और उतने में व्यास बहुत से दूसरे श्लोक रच लेते थे। जो बालक कैलास पर एक आज्ञा पकड़े द्वार पर खड़ा था, वह यहाँ एक शर्त पकड़े लेखनी थामे बैठा है, और दोनों जगह सामने वाले को उससे पार पाने के लिए अपनी ओर से कुछ रचना पड़ता है।

उनकी राह

तीन ठहराव, तीन प्रश्न

नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ वे एक द्वार नहीं छोड़ते, एक परिक्रमा का अर्थ बदल देते हैं, और एक लेखनी की शर्त रखते हैं। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।

  1. माता की आज्ञा के बिना। गणेश का जन्म पढ़िए, छड़ी थमाने से त्रिशूल तक। पूछिए: जो बालक शिव को पहचानता ही नहीं, वह किस बल पर उनके गणों को फटकारता है?
  2. या कह दीजिए कि वेद झूठे हैं। गणेश और कार्तिकेय की परिक्रमा में दो आसनों से माता पिता के उत्तर तक पढ़िए। पूछिए: जो माता पिता लीला में बेटे को फिर पृथ्वी घूमने भेजते हैं, वे उसकी बात पर हार क्यों मान लेते हैं?
  3. लेखनी एक क्षण भी न रुके। महाभारत के आदि पर्व का आरम्भ पढ़िए, ब्रह्मा के आने से आठ हज़ार आठ सौ गाँठों तक। पूछिए: जिस शर्त से व्यास बँधे, उसी से उन्हें साँस लेने का समय कैसे मिला?

अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ एक माँ अपने गढ़े हुए बेटे के हाथ में छड़ी थमा रही है। उस छड़ी में जो बल था, वह बालक का था या आज्ञा का?

गणेश का जन्म · शरीर के मैल से गढ़ा पुत्र, द्वार पर ठनी, और उत्तर दिशा का पहला जीव।

गणेश और कार्तिकेय की परिक्रमा · दो आसन, सात परिक्रमाएँ, और सिद्धि और बुद्धि से विवाह।

त्रिपुरारि · सर्वदेवमय रथ, अँगूठे पर बैठा विघ्न, और एक बाण जो पूजा के बाद ही छूटा।

त्र्यम्बक, वैद्यनाथ, नागेश्वर · ईर्ष्यालु ऋषियों का वर, एक दुर्बल गाय, और गौतम की लाई हुई गंगा।

शंखचूड · कवच पहनकर कार्तिकेय के साथ शिव की सेना में आए गणेश।

महाभारत, आदि पर्व का आरम्भ · ब्रह्मा का आदेश, एक न रुकने वाली लेखनी, और कसी हुई गाँठों के श्लोक।

जो आज्ञा को पकड़े खड़ा है

शिवपुराण का गणेश अपनी हर कथा में एक नियम को पकड़े खड़ा है, और सामने वाले को उस नियम से पार पाने के लिए अपनी ओर से कुछ रचना पड़ता है। द्वार पर उसके पास माँ की एक आज्ञा है, और उसे पार करने के लिए शिव को गणों की सेना से लेकर अपना त्रिशूल तक चाहिए; परिक्रमा में उसके पास वेद का एक वचन है, और माता पिता उसे झूठा कहने के बजाय हार मान लेते हैं; महाभारत में उसके पास एक शर्त है, और व्यास को उससे बचने के लिए आठ हज़ार आठ सौ गाँठें बाँधनी पड़ती हैं। जो उसे मिलता है, वह उसी पकड़ का फल है, कटे सिर के बदले अग्रपूजा, एक कोस न चल पाने के बदले सिद्धि और बुद्धि, और त्रिपुर के बाण से पहले अपने ही पिता की पूजा। पर कथा उसे हठी नहीं कहती, बुद्धि का सागर कहती है, और उसी के मुख से यह वाक्य रखती है कि जिसके पास बुद्धि है, वही बलवान है। कोटिरुद्रसंहिता का गणेश उस बुद्धि की दूसरी ओर दिखाता है, जहाँ वह ऋषियों के अनुचित वर को उचित नहीं कहता, फिर भी भक्तों के अधीन होकर उसे पूरा करता है और स्वयं गाय बनकर खेत में गिरता है। जो बालक द्वार पर प्राण दे सकता था, वह कैलास से उतरकर एक खेत में तिनकों से मर सकता है; दोनों जगह वह अपनी बात का नहीं, दूसरे की बात का पहरा दे रहा है।

आधार-संस्करण और पाठ

आधार-संस्करण: गीताप्रेस का संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क; महाभारत के लिए इस पुस्तकालय का आदि पर्व का अध्याय, जो किसारी मोहन गांगुली के अनुवाद के क्रम पर है।

इस कथा का पाठ: पार्वती द्वारा गणेश का गढ़ा जाना, द्वार पर संग्राम और शिरच्छेद: रुद्रसंहिता, कुमार खण्ड, अध्याय 3। पार्वती का वर, अग्रपूजा, सर्वाध्यक्ष पद और चतुर्थी व्रत: कुमार खण्ड, अध्याय 4। दोनों भाइयों का विवाद, परिक्रमा, सिद्धि और बुद्धि से विवाह, कार्तिकेय का क्रौंच पर्वत जाना: कुमार खण्ड, अध्याय 5। त्रिपुर के बाण से पहले गणेश का पूजन: युद्ध खण्ड, अध्याय 4। गौतम के विरुद्ध ऋषियों का वर और गाय का रूप: कोटिरुद्रसंहिता, त्र्यम्बकेश्वर की कथा। शंखचूड के युद्ध में गणेश: युद्ध खण्ड, अध्याय 8। महाभारत: आदि पर्व, अनुक्रमणिका पर्व, गांगुली का खण्ड 1।

इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए पात्र-प्रसंग और अलग चिह्नित पाठकीय प्रश्न।

सीमाएँ और पाठ-भेद: यह पात्र-परिचय कथा-सार और संपादकीय मनन को साथ रखता है। प्रसंगों के आधार इस पुस्तकालय की शिवपुराण और महाभारत की कड़ियाँ हैं; अध्याय-संख्याएँ गीताप्रेस के संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क की विषय-सूची से हैं। यहाँ केवल वही प्रसंग हैं जो ये कड़ियाँ कहती हैं; शिवपुराण स्वयं कहता है कि शनि की दृष्टि वाली कथा किसी और कल्प की है और परिक्रमा की होड़ में फल कहीं नहीं आता, और वे दोनों बातें उसी के कथन के रूप में रखी गई हैं। महाभारत का लेखन-प्रसंग उसी ग्रन्थ के नाम से अलग है। उद्धरण-चिह्नों के वाक्य इन्हीं कड़ियों के हिन्दी पाठ से हैं।