शिव और मोहिनी
मोहिनी की कथा सब तक पहुँची।
देव खुश। राक्षस मायूस। पर एक देव और था जिसे यह सब interesting लगा।
शिव।
वो कैलाश पर बैठे थे। पार्वती पास में।
उन्होंने सुना कि विष्णु ने एक स्त्री-रूप लिया। और राक्षसों को मोहित किया।
उन्हें curious हुई। ”ऐसा रूप कैसा होगा? मुझे भी देखना है।”
वो उठे। पार्वती से कहा, ”मैं विष्णु से मिलने जाता हूँ।”
पार्वती मुस्कुराईं। उन्हें पता था कि शिव क्या देखने जा रहे हैं। पर रोका नहीं।
”ठीक है, स्वामी। पर जल्दी लौटिएगा।”
शिव वैकुण्ठ पहुँचे। विष्णु ने उनका स्वागत किया। पुराने मित्र। एक-दूसरे का सम्मान।
बातें हुईं। चाय हुई (पुराण में नहीं है, मगर imagine करें)।
अंत में शिव ने एक request की।
”विष्णु, तुम ने मोहिनी का रूप लिया था। मुझे भी देखना है। एक बार।”
विष्णु ने मुस्कुराकर कहा, ”शिव, सोच लो। यह रूप साधारण नहीं। तुम संभाल पाओगे?”
”हाँ, मैं तपस्वी हूँ। मेरी इन्द्रियों पर मेरा control है।”
”ठीक है।”
विष्णु ने अपना रूप बदला।
एक sudden flash। और सामने वही मोहिनी थी। सब सुन्दरता के साथ।
शिव ने उसे देखा।
और शिव, जो योगियों के योगी हैं, जिन्होंने काम-देव को अपनी आँख से जला दिया था, जिनका ध्यान कोई नहीं तोड़ सकता, उनकी आँखें फटी रह गईं।
तत्क्षणं चित्तचालः सोऽप्यभूत् मायया हरेः ॥
मोहिनी-रूप को देखकर, स्वयं रुद्र (शिव) भी, उसी क्षण, हरि की माया से चित्त-विचलित हो गए।
वो उठे। बिना सोचे।
मोहिनी मुस्कुराईं। थोड़ा सा डर भी।
शिव आगे बढ़े। मोहिनी पीछे हटीं।
शिव और तेज़। मोहिनी भागीं।
और एक scene जिसका शास्त्रों में वर्णन है, और जो लोग शायद ही believe करते हैं।
शिव, महादेव, जटाधारी, त्रिनेत्र-वाले, सब छोड़कर मोहिनी के पीछे जंगल में भागे।
मोहिनी एक पेड़ के पीछे छुपीं। शिव वहाँ पहुँचे।
वो ख़ुद को संभाल नहीं पा रहे थे। एक intense लालसा।
उन्होंने मोहिनी को छुआ। एक पल को embrace किया।
और तब, उस moment में, मोहिनी की कोख में एक बच्चा आ गया।
(पुराण कहते हैं। बाद में यह बच्चा अयप्पन या हरिहर-सुत के रूप में जन्मा। शिव और विष्णु का बेटा।)
मोहिनी ने तुरंत अपना रूप बदला। फिर विष्णु बने।
शिव ने देखा। उनकी आँखें खुलीं।
वो ज़मीन पर बैठ गए। शर्म में।
विष्णु ने उनके कंधे पर हाथ रखा।
”शिव, यह माया की शक्ति। मेरी ख़ुद की। और जब वो assemble होती है, तो योगी भी रुक नहीं पाता।”
शिव ने सिर हिलाया।
”हाँ, मैंने अपनी सीमा देखी। अहंकार में था कि मुझ पर कोई शक्ति काम नहीं करती। यह दर्शन था।”
”अब मैं वापस जाऊँ। पार्वती के पास।”
वो लौटे। पार्वती ने उन्हें देखा।
”क्या हुआ?”
शिव ने सब बताया। बिना छुपाए।
पार्वती ने सिर हिलाया। ”स्वामी, अच्छा हुआ। आपको पता चला कि माया की शक्ति कितनी है। अब आप के तप में एक नई समझ होगी।”
और शिव ने उस दिन एक बात सीखी, जो किसी ने नहीं सिखाई।
कि सबसे बड़ा योगी भी, सबसे बड़ी powerful चीज़ के सामने, हिल सकता है।
तो साधना continuous है। कोई final point नहीं।
यह कथा बहुत साधारण लगती है। मगर इसमें एक deep humility है।
हम सब अपने ego में सोचते हैं कि हम पर कोई particular चीज़ काम नहीं करती। ”मुझे पैसा नहीं पकड़ता।” ”मुझे sex नहीं पकड़ता।” ”मुझे ग़ुस्सा नहीं पकड़ता।” ”मैं उपर हूँ।”
और फिर एक दिन, बिना warning के, वो चीज़ हमारे सामने आती है, और हम पाते हैं हम कितने कमज़ोर थे।
शिव जैसा बड़ा योगी, जिसने अपनी आँख से काम-देव को जलाया, वो भी मोहिनी के सामने रुक नहीं पाए।
क्यों? क्योंकि माया हर एक के लिए अलग रूप लेती है। शिव के लिए वो मोहिनी थी। हमारे लिए कुछ और।
इस कथा का सबसे beautiful हिस्सा यह है कि शिव शर्म में नहीं डूबे। उन्होंने accept किया। पार्वती ने भी accept किया। दोनों ने इसे एक सीख माना।
हम अक्सर अपनी कमज़ोरी छुपाते हैं। शर्म में डूब जाते हैं। पर भागवतम् कह रहा है, accept करो। समझो। आगे बढ़ो।
और एक बात। इस encounter से एक बच्चा हुआ। शिव और विष्णु का बेटा। एक नया देवता।
हमारी कमज़ोरियाँ भी, अगर sincerely accept की जाएँ, कुछ नया पैदा कर सकती हैं।