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भागवतम् और पुराणलीला, भक्ति और अवतार

शिव और मोहिनी

कथा 34 · भागवतम् की कथाएँ

शिव और मोहिनी

जब महादेव भी मोहित हुए
स्कन्ध 8, अध्याय 12

मोहिनी की वह लीला महादेव तक पहुँची।

देवता प्रसन्न थे, असुर हारे हुए। पर एक और थे, जिनके मन में वह बात बैठ गई।

शंकर।

वे सती के साथ बैठे थे, उस ख़ामोशी में जहाँ साँस तक सुनाई देती है।

उन्होंने सुना था कि विष्णु ने एक स्त्री का रूप धरा, और उस रूप ने असुरों की सुध-बुध हर ली।

एक जिज्ञासा उठी, धीमी, अनकही। “वह रूप कैसा रहा होगा? हमें भी देखना है।”

शिव सती के साथ बैठे मोहिनी की लीला की बात सुनते हैं, मन में उठती है, वह रूप हमें भी देखना है।
शिव सती के साथ बैठे मोहिनी की लीला की बात सुनते हैं, मन में उठती है, वह रूप हमें भी देखना है।

वे उठे, बैल पर सवार हुए, और अपने सब गणों को साथ लेकर वहाँ चल दिए जहाँ श्रीहरि का निवास था। सती देवी भी साथ थीं।

श्रीहरि ने बड़े प्रेम से उनका स्वागत-सत्कार किया, उठकर गले लगाया, आसन दिया। दो पुराने, जिनमें एक-दूसरे के लिए गहरा अदब था। सुख से बैठकर शंकर ने उनका सम्मान किया, और श्रीहरि मुस्कुराते हुए बोले।

शंकर ने पहले श्रीहरि की स्तुति की। बोले, “देवदेव, आप ही जगत्-व्यापी हैं, जगदीश्वर हैं, जगत्-स्वरूप हैं। समस्त चराचर के मूल कारण आप ही हैं, ईश्वर भी आप, आत्मा भी आप। इस जगत् के आदि, मध्य और अन्त आप ही से हैं, पर आप आदि-मध्य-अन्त से रहित हैं। आप सत्य हैं, चिन्मात्र ब्रह्म हैं।”

“कोई आपको ब्रह्म कहता है, कोई धर्म, कोई प्रकृति-पुरुष से परे परमेश्वर। कोई विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, ईशाना और अनुग्रहा, इन नौ शक्तियों से युक्त अविनाशी पुरुष मानता है। मैं, ब्रह्मा, मरीचि आदि ऋषि, जो आपकी ही सत्त्वगुणमयी सृष्टि के भीतर हैं, हम आपकी रची हुई माया का पार नहीं पाते, तो जिनका चित्त माया ने अपने वश में कर रखा है, वे असुर और मनुष्य उसे क्या जानेंगे।”

शिव और मोहिनी की कथा का यह प्रसंग, जहाँ आगे की बात खुलती है।
शिव और मोहिनी की कथा का यह प्रसंग, जहाँ आगे की बात खुलती है।

“आप जब लीला के लिए अवतार लेते हैं, मैं उनका दर्शन करता ही हूँ। अब उस अवतार का भी दर्शन करना चाहता हूँ, जो आपने स्त्री-रूप में लिया था। जिससे दैत्यों को मोहित कर आपने देवताओं को अमृत पिलाया, स्वामी, उसी को देखने हम सब आये हैं। हमारे मन में उस दर्शन का बड़ा कौतूहल है।”

श्रीहरि की मुस्कान में एक गम्भीर छाया तैर गई। “शंकरजी, उस समय अमृत का कलश दैत्यों के हाथ चला गया था, इसीलिए मैंने वह रूप धरा था। आप उसे देखना चाहते हैं, तो दिखाऊँगा। पर वह रूप तो कामी पुरुषों का ही आदरणीय है, कामभाव को उकसाने वाला है।”

इतना कहकर श्रीहरि वहीं अन्तर्धान हो गये।

एक पल को हवा ठहर गई। शंकर सती के साथ चारों ओर दृष्टि दौड़ाते वहीं बैठे रहे।

श्रीहरि अन्तर्धान हो जाते हैं, और शंकर सती के साथ वहीं बैठे रहते हैं, अभी-अभी सुनी मोहिनी-रूप की बात मन में लिए।
श्रीहरि अन्तर्धान हो जाते हैं, और शंकर सती के साथ वहीं बैठे रहते हैं, अभी-अभी सुनी मोहिनी-रूप की बात मन में लिए।

तभी उन्होंने देखा, सामने एक सुन्दर उपवन है। भाँति-भाँति के वृक्ष, रंग-बिरंगे फूल और लाल-लाल कोंपलों से लदे हुए। और उस उपवन में एक सुन्दरी स्त्री गेंद उछाल-उछालकर खेल रही है। बड़ी सुन्दर साड़ी पहने, कमर में करधनी की लड़ियाँ झूलती हुई।

गेंद को उछालने और लपककर पकड़ने से उसके वस्त्र और हार हिल रहे थे। ऐसा जान पड़ता था, मानो उस भार से उसकी पतली कमर पग-पग पर टूटे जाती हो। साड़ी सरकती, केशों की वेणी खुलने लगती, तो वह बायें हाथ से उसे सम्हाल लेती, और दाहिने हाथ से गेंद उछालती हुई सारे जगत् को अपनी माया से मोहित कर रही थी।

शंकर ने उन्हें देखा।

वही शंकर, जो योगियों के भी योगी हैं, जिनकी एक दृष्टि ने कामदेव को राख कर दिया था, जिनके ध्यान को आज तक कोई हिला न सका, उनकी सुध हाथ से निकल गई। पास ही सती बैठी थीं, और गण भी, पर अब उनकी याद कहाँ।

गेंद उछलकर थोड़ी दूर जा गिरी, तो वह उसके पीछे दौड़ीं। उसी क्षण वायु ने उनकी झीनी-सी साड़ी करधनी के साथ ही उड़ा दी।

मोहिनी ने तनिक सलज्ज भाव से मुस्कुराकर तिरछी नज़र से शंकर की ओर देखा। बस, शंकर का मन हाथ से निकल गया। वे उनकी ओर अत्यन्त आकृष्ट हो गये। भवानी के सामने ही, लज्जा छोड़कर, बिना सोचे, वे उनकी ओर चल पड़े।

शंकर आगे बढ़े। मोहिनी पीछे हटीं।

शंकर के क़दम तेज़ हुए। मोहिनी दौड़ पड़ीं।

जिसका वर्णन शास्त्र करते हैं, उस पर विश्वास करना सहज नहीं।

मोहिनी का वह परम सुंदर रूप देखकर स्वयं शिव भी अपनी सुधि-बुधि खो बैठे।
मोहिनी का वह परम सुंदर रूप देखकर स्वयं शिव भी अपनी सुधि-बुधि खो बैठे।

शंकर, महादेव, जटाधारी, त्रिनेत्रधारी, अपना सब कुछ पीछे छोड़कर, जैसे हथिनी के पीछे मतवाला हाथी, उस छाया के पीछे भागे।

मोहिनी कभी किसी वृक्ष की ओट हो जातीं, और हँसने लगतीं, कहीं ठहरती न थीं। शंकर ने अत्यन्त वेग से उनका पीछा करके पीछे से उनका जूड़ा पकड़ लिया और उनकी इच्छा न होने पर भी उन्हें दोनों भुजाओं में भर लिया।

मोहिनी इधर-उधर खिसककर छूटने की चेष्टा करने लगीं, और इसी छीना-झपटी में उनके सिर के बाल बिखर गये। फिर वे उनकी भुजाओं के बीच से अपने को छुड़ाकर बड़े वेग से भागीं।

शंकर फिर भी पीछे-पीछे दौड़ते रहे। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो उनके शत्रु कामदेव ने इस समय उन पर विजय पा ली हो।

शिव ने मोहिनी को पीछे से पकड़ लिया, वे छूटकर भाग निकलीं और शंकर कामदेव के वश में हुए उनके पीछे दौड़ते रहे।
शिव ने मोहिनी को पीछे से पकड़ लिया, वे छूटकर भाग निकलीं और शंकर कामदेव के वश में हुए उनके पीछे दौड़ते रहे।

नदी, सरोवर, पर्वत, वन और उपवन में, जहाँ-जहाँ ऋषि-मुनि निवास करते थे, वहाँ-वहाँ शंकर उस माया के पीछे भागते रहे। और उसी आवेग के क्षण में महादेव का वीर्य स्खलित होकर धरती पर जा गिरा। जहाँ-जहाँ वह गिरा, वहाँ-वहाँ की मिट्टी में सोने और चाँदी की खानें फूट पड़ीं।

वीर्यपात हो जाने के बाद उन्हें अपनी सुध लौट आई। उन्होंने जाना, अरे, भगवान् की माया ने तो मुझे ख़ूब छकाया।

पर आत्मस्वरूप, सर्वात्मा भगवान् की यह महिमा जानकर उन्हें कोई आश्चर्य न हुआ। वे जानते थे, भला, भगवान् की शक्तियों का पार कौन पा सकता है। उस प्रसंग से वे तुरन्त अलग हो गये, लज्जा और विषाद मिट गए।

तब श्रीहरि अपना पुरुष-शरीर धारण करके फिर प्रकट हो गये और बड़ी प्रसन्नता से बोले।

“देवशिरोमणि, मेरी स्त्री-रूपिणी माया से विमोहित होकर भी आप स्वयं अपनी निष्ठा में स्थित हो गये। यह बड़े ही आनन्द की बात है।”

“मेरी यह गुणमयी माया बड़े-बड़ों को मोहित कर देती है, पर अब यह आपको कभी मोहित न करेगी। क्योंकि सृष्टि आदि के लिए समय पर उसे क्षुब्ध करने वाला काल मैं ही हूँ, इसलिए मेरी इच्छा के विपरीत वह रजोगुण आदि की सृष्टि नहीं कर सकती।”

इस प्रकार श्रीहरि ने शंकर का सत्कार किया। फिर उनसे विदा लेकर, परिक्रमा करके, वे अपने गणों के साथ कैलास को चले गये।

शंकर ने सती से कुछ छिपाया नहीं। बड़े-बड़े ऋषियों की सभा में, अपनी अर्द्धांगिनी सती के सामने, उन्होंने विष्णुरूपधारी उस मोहिनी की सारी माया, जैसी हुई थी, बड़े प्रेम से कह सुनाई।

शंकर ने उस दिन एक बात जानी, जो किसी गुरु ने नहीं सिखाई थी।

कि उससे बड़ा कोई योगी नहीं, जो जान ले कि वह भी एक दिन डगमगा सकता है, और फिर भी चलता रहे।

साहित्यिक-संदर्भ

शिव-मोहिनी प्रसंग श्रीमद्भागवत के अष्टम स्कन्ध, अध्याय 12 में आता है। मोहिनी-रूपधारी श्रीहरि को देखकर स्वयं शंकर धैर्य खो बैठते हैं और उनके पीछे दौड़ पड़ते हैं; गीता प्रेस के पाठ में उनका वीर्य धरती पर गिरकर स्वर्ण-रजत की खानों में बदल जाता है।

मोहिनी और शंकर के मिलन से ‘हरिहरपुत्र’ अय्यप्पन का जन्म, यह बाद की दक्षिण-भारतीय स्थल-परम्परा की मान्यता है, भागवत इसका वर्णन नहीं करता। कथा का मूल भाव सरल है: माया के स्वामी की माया के आगे बड़े-से-बड़ा योगी भी ठहर सकता है।

हम जिसे अपनी सब से पक्की दीवार मानते हैं, माया अक्सर वहीं सेंध लगाती है। शंकर जैसे योगी का एक क्षण को डगमगा जाना, और फिर बिना लज्जा के उसे स्वीकार कर लेना, यही इस कथा की सब से बड़ी सीख है, और सब से बड़ी राहत भी।

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