पात्र-यात्रा · वाल्मीकि रामायण के चुने हुए प्रसंग
राम का परिचय केवल उनके नाम से नहीं खुलता। वाल्मीकि पहले कुछ गुणों का पता पूछते हैं। आइए, उसी प्रश्न से चलें और देखें कि कथा में संबंध और वचन किस तरह सामने आते हैं।
नाम से पहले एक प्रश्न
बालकाण्ड के पहले सर्ग में वाल्मीकि नारद से पूछते हैं कि इस समय संसार में गुणवान्, पराक्रमी, धर्म को जानने वाला, उपकार मानने वाला और अपने वचन पर दृढ़ कौन है। प्रश्न में बल है, लेकिन अकेला बल नहीं। उसमें कृतज्ञता भी है और सत्य भी। आगे सब प्राणियों का हित चाहने और अपने क्रोध पर अधिकार रखने की बात आती है। नारद उत्तर में राम का नाम लेते हैं।
यहीं ज़रा ठहरिए। किसी पात्र के बारे में पढ़ते हुए हम प्रायः उसका परिचय पहले से तय कर लेते हैं। फिर कथा में उसी परिचय के प्रमाण ढूँढ़ते चलते हैं। इस आरम्भ को पढ़ने का एक दूसरा ढंग भी हो सकता है: वाल्मीकि के प्रश्न साथ रखिए, और हर प्रसंग में देखिए कि उनका उत्तर कैसे बन रहा है। यह हमारे पढ़ने का सुझाव है; ऋषि के शब्दों में जोड़ा हुआ कोई नया उपदेश नहीं।
रामायण की पहली कड़ी से आरम्भ कीजिए। इस परिचय का मूल आधार बालकाण्ड 1.1–8 है। अपने लिए केवल एक गुण चुन लीजिए, जैसे कृतज्ञता। आगे की यात्रा में उसे याद रखिए; सभी प्रश्न एक ही बैठक में हल करना आवश्यक नहीं।
एक व्यक्ति, अनेक संबंध
उसी आरम्भिक सर्ग में नारद कथा का संक्षिप्त क्रम भी सुनाते हैं। दशरथ राम का युवराज के रूप में अभिषेक करना चाहते हैं। कैकेयी पहले मिले वरों के आधार पर भरत का अभिषेक और राम का वनवास माँगती हैं। पिता के वचन का पालन करते हुए राम वन जाते हैं। लक्ष्मण स्नेह से उनके साथ चलते हैं; सीता भी उनके पीछे जाती हैं। ये बातें बालकाण्ड 1.19–28 के संक्षिप्त कथासार में आती हैं।
ध्यान दीजिए कि इस छोटे से अंश में कितने संबंध एक साथ उपस्थित हैं: पिता और पुत्र, पति और पत्नी, दो भाई, राजा और उत्तराधिकारी। किसी एक संबंध का नाम ले देने से बाकी संबंध विदा नहीं हो जाते। पाठक के सामने कठिनाई बनी रहती है कि एक निर्णय अलग-अलग लोगों के जीवन में क्या बदल देता है। राम को पढ़ते हुए यह कठिनाई साथ रखना कथा के प्रति असम्मान नहीं; यह उसके पात्रों को ध्यान से देखने का एक ढंग है।
यह पन्ना उस वनगमन की पूरी कथा नहीं सुनाता। पहले सर्ग का संक्षेप और बाद की विस्तृत कथा अलग आकार के पाठ हैं। रामायण के क्रम में आगे बढ़ते समय दोनों के बीच यह अंतर याद रखिए। संक्षेप राह दिखाता है; विस्तृत प्रसंग में बातचीत, ठहराव और दूसरे पात्रों की दृष्टि खुलती है।
सीता को साथ पढ़िए
राम की यात्रा को केवल राम के भीतर बंद कर देना भी ठीक नहीं होगा। आरम्भिक कथासार सीता को उनके साथ चलते हुए रखता है। इसलिए अगला पड़ाव सीता का परिचय रखिए। दोनों पन्ने पढ़कर एक छोटा-सा प्रश्न लिखिए: साथ चलने का निर्णय किसकी आवाज़ में सुनाई दे रहा है, और किसकी आवाज़ मुझे आगे के मूल प्रसंग में खोजनी है?
यह प्रश्न किसी पात्र की ओर से उत्तर गढ़ने के लिए नहीं है। जहाँ पाठ चुप है, वहाँ हमारी कल्पना को अपना नाम बताना चाहिए। कथा में जो कहा गया है, व्याख्याकार उससे जो अर्थ खोलता है, और पढ़ते समय जो बात अपने मन में उठती है, इन तीनों को अलग पहचानना पढ़ने का सुख बढ़ा सकता है। तब सहमति भी अधिक सोच-समझकर होती है और असहमति भी।
राम की पूरी जीवन-यात्रा इस छोटे परिचय में समेट देने का दावा नहीं है। यहाँ एक आरम्भ, एक पारिवारिक मोड़ और साथ पढ़ने का एक निमंत्रण है। अगली बार पहला सर्ग खोलिए तो वाल्मीकि का प्रश्न फिर सुनिए। शायद वही शब्द अब थोड़ी अलग रोशनी में दिखाई दें।
आधार-संस्करण और इस परिचय का दायरा
आधार-संस्करण: इस पुस्तकालय में प्रयुक्त गीताप्रेस वाल्मीकि रामायण, प्रथम खण्ड; बालकाण्ड 1.1–8 और 1.19–28। इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए प्रसंगों पर आधारित पात्र-परिचय और मौलिक पाठकीय प्रश्न; सम्पूर्ण जीवनी या श्लोकानुसार अनुवाद नहीं।
तुलना के पाठ: बालकाण्ड का पहला सर्ग, संस्कृत पाठ और स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद; तथा रूप रघुनाथ वाणी प्रकाशन का 1.1.24। यहाँ प्रयुक्त प्रश्न, नाम और वनगमन का क्रम इन पाठों में संगत है। अन्य रामायणों के प्रसंग इस परिचय में नहीं मिलाए गए हैं।
यह पात्र-परिचय अभी हिन्दी में उपलब्ध है। इसी परिचय का अंग्रेज़ी संस्करण अभी नहीं है; read the opening Ramayana episode in English.