प्रजापति दक्ष के आँगन में सखियों के बीच एक बालिका बैठी है जिसे खेल की सुध नहीं। भाव में डूबती है तो भगवान शिव की मूर्ति चित्रित करने लगती है और स्थाणु, हर, रुद्र नामों की रट लगाती है। दक्ष ने जगदम्बा की आराधना करके उन्हें पुत्री रूप में पाया था; वीरिणी के गर्भ से वे प्रकट हुईं तो आकाश से फूल बरसे। दक्ष ने नाम रखा उमा, लोग कहने लगे दक्षकन्या सती।
कन्या युवावस्था की देहरी पर आयी तो दक्ष को चिन्ता लगी, महादेव से इनका विवाह हो तो कैसे। उधर सती स्वयं महादेव को ही पति रूप में चाहती थीं। माता से आज्ञा लेकर उन्होंने घर पर ही नन्दाव्रत का कठोर पालन आरम्भ किया, आश्विन में गुड़ और भात का नैवेद्य, कार्तिक में मालपूए, पौष की रातों का जागरण, माघ की पूर्णिमा को नदी तट की पूजा, यों बारहों महीने आराधना चली, और सती ध्यान में ऐसी ठहरीं जैसे निर्वात में दीपशिखा।
कैलास पर ब्रह्मा और विष्णु का अनुरोध
उन्हीं दिनों ब्रह्मा और विष्णु के साथ देवता और ऋषि सती की तपस्या देखने आये और ठिठक गये, वे मूर्तिमती तपस्या जान पड़ती थीं। देवी को प्रणाम करके सब कैलास पहुँचे और शिव की स्तुति करके चुप खड़े रह गये। शंकर प्रसन्न होकर जोर से हँसे, बोले, निर्भय होकर आने का प्रयोजन बताइये।
ब्रह्माजी ने बात छेड़ी, देवदेव, सृष्टि हम करें, पालन श्रीहरि, संहार के लिये आप प्रकट हुए हैं; हम तीनों एक ही परमात्मा के अंश हैं, श्रीहरि वाम अंग से, हम दक्षिण अंग से, और आप सदाशिव के हृदय से प्रकट हुए। आपने ही कहा था कि आपका उत्तम रूप हमारे ललाट से प्रकट होकर रुद्र नाम पायेगा और एक स्त्री से विवाह करके लोकहित सिद्ध करेगा। स्वामिन्, वही प्रतिज्ञा पूर्ण कीजिये; जैसे लक्ष्मी और सावित्री सहधर्मिणी हुईं, वैसे आप भी सहचरी ग्रहण करें।
महादेव मुसकराकर बोले, हमारे लिये विवाह उचित नहीं, हम विरक्त योगी हैं; जो आत्माराम, अवधूत, ज्ञानी और कामनाशून्य है, उसे कामिनी से क्या प्रयोजन; विवाह तो पराये बन्धन में बँधना है। फिर भी जगत के हित में आपका वचन रखकर हम विवाह करेंगे, पर उसी नारी को पत्नी बनायेंगे जो हमारा तेज धारण कर सके, जो हमारे योग के समय योगिनी रहे और प्रेम के समय कामिनी; और यदि उसे हम पर या हमारे वचनों पर अविश्वास होगा, तो हम उसे त्याग देंगे।
ब्रह्मा और श्रीहरि मन ही मन मुसकराये। ब्रह्माजी बोले, नाथ, वैसी नारी प्रकट हो चुकी है। सदाशिव की धर्मपत्नी उमा ही भिन्न भिन्न रूप धरती हैं, लक्ष्मी होकर वे श्रीविष्णु की प्राणवल्लभा हुईं, सरस्वती होकर हमारी, और अब वे दक्षपुत्री सती होकर आपके लिये कठोर तपस्या कर रही हैं; आप उन्हें वर देकर उनसे विवाह कीजिये। मधुसूदन ने समर्थन किया, शिव ने हँसकर कहा, बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा।
वर माँगिये, वर माँगिये
उधर आश्विन की अष्टमी को नन्दाव्रत पूर्ण हुआ, और नवमी को ध्यानमग्न सती को शिव ने प्रत्यक्ष दर्शन दिया। गौर वर्ण, पाँच मुख, हर मुख में तीन नेत्र, मस्तक पर चन्द्रमा और गंगा, कण्ठ में नीला चिह्न, हाथों में त्रिशूल और वर तथा अभय की मुद्राएँ, भस्म से दमकता शरीर। सती ने चरणों की वन्दना की और लाज से उनका मुख झुक गया।
महादेव बोले, दक्षनन्दिनि, हम आपके व्रत से प्रसन्न हैं, कोई वर माँगिये। हृदय की बात लज्जा के मारे होंठों तक न आयी, तो अन्तर्यामी उतावली से बारंबार कहने लगे, वर माँगिये, वर माँगिये। सती ने इतना ही कहा, प्रभो, ऐसा वर दीजिये जो टल न सके। बात फिर भी पूरी न हुई, तो शंकर ने स्वयं कह दिया, देवि, आप हमारी भार्या हो जाइये। तब सती ने हाथ जोड़कर कहा, देवाधिदेव, हमारे पिता से कहकर वैवाहिक विधि से हमारा पाणिग्रहण कीजिये। शिव ने यह भी स्वीकारा, और सती आनन्द से भरी माता के पास लौट गयीं।
अब लीला देखिये, जो विवाह को बन्धन कहते थे, वही अपने आश्रम में सती के वियोग में उन्हीं का चिन्तन करने लगे। स्मरण करते ही ब्रह्माजी सरस्वती सहित उपस्थित हुए। शिव ने कहा, हमने दक्षकन्या को पत्नी रूप में स्वीकार किया है, पर उनका आग्रह है कि विधि से पाणिग्रहण हो; आप दक्ष के घर जाकर ऐसा यत्न कीजिये कि वे शीघ्र हमें कन्यादान कर दें।
इधर सखी के मुँह से वर का समाचार पहुँचा तो दक्ष के घर उत्सव मच गया, माता वीरिणी ने पुत्री का मस्तक सूँघा। पर प्रजापति चिन्ता में पड़े, कि महादेव तो चले गये, फिर कैसे आयेंगे, और अनुरोध पर भी ग्रहण न करें तो याचना निष्फल हो जायगी। तभी ब्रह्माजी सहसा आ पहुँचे, बोले, शंकर ने आपकी पुत्री के लिये स्वयं हमें भेजा है; जैसी आराधना सती ने उनकी की, वैसी अब वे सती की करते हैं; पुत्री को अविलम्ब उनकी सेवा में सौंपिये, हम नारद के साथ उन्हें आपके घर ले आयेंगे। दक्ष बोले, पिताजी, ऐसा ही होगा, और दोनों ओर ऐसा सन्तोष छाया मानो अमृत बरस गया हो।
चैत्र शुक्ल त्रयोदशी की बारात
ब्रह्माजी कैलास लौटे, बोले, वृषध्वज, दक्ष कहते हैं कि यह कन्या शिव के ही लिये जन्मी है, वे शुभ लग्न में पधारें। रुद्र हँसे, हम आपके और नारद के साथ चलेंगे, मरीचि आदि मानस पुत्रों को बुला लीजिये, हमारे पार्षद भी रहेंगे। सब आ पहुँचे, विष्णु भी कमला देवी के साथ गरुड़ पर आ गये। चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में महेश्वर ने विवाह की यात्रा की; उनकी इच्छा से वृषभ, व्याघ्रचर्म, सर्प, जटा और चन्द्रकला सब यथायोग्य आभूषण बन गये, और नन्दिकेश्वर पर आरूढ़ महादेव क्षण भर में दक्ष के द्वार जा पहुँचे।
विनीत दक्ष कुटुम्बियों सहित अगवानी को आये, अंग अंग पुलकित। सत्कार और मुनियों सहित देवताओं की परिक्रमा करके वे शिव को भीतर ले आये, उनका और फिर विष्णु, ब्रह्मा, ब्राह्मणों, शिवगणों का पूजन किया, और पिता ब्रह्मा से कहा, प्रभो, आप ही वैवाहिक कार्य करायें। शुभ लग्न में दक्ष ने सती का हाथ शंकर के हाथ में दे दिया और वृषध्वज ने वैवाहिक विधि से पाणिग्रहण किया। स्तुतियाँ गूँजीं, नाच गान का महोत्सव हुआ, कन्यादान करके दक्ष कृतार्थ हुए, और सारा संसार मंगल का निकेतन बन गया।
अग्नि के फेरे और अनोखी दक्षिणा
फिर दक्ष ने दहेज दिया, ब्राह्मणों को धन बाँटा। लक्ष्मी सहित विष्णु ने हाथ जोड़कर कहा, देवदेव, आप जगत के पिता हैं, सती देवी जगत की माता; और मुसकराकर जोड़ा, अनूठा संयोग है, सती नीलवर्णा और आप गौरवर्ण, हम नीलवर्ण और लक्ष्मी गौरवर्णा।
फिर आचार्य बने ब्रह्माजी और ब्राह्मणों की आज्ञा से शिवा और शिव ने बड़े हर्ष के साथ विधिपूर्वक अग्नि की परिक्रमा की। उसी मण्डप में विष्णु ने शिव की आज्ञा से शिवतत्त्व कहा, कि ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र एक ही परमात्मा के अंश हैं, जैसे मस्तक और ग्रीवा शरीर से भिन्न नहीं; आप ही निर्गुण ब्रह्म, आप ही सगुण, आप ही सब कुछ।
तब विवाह यज्ञ के यजमान शिव ने प्रसन्न होकर ब्रह्माजी से कहा, आप हमारे आचार्य हैं, माँगिये, क्या दक्षिणा दें, हमारे लिये कुछ अदेय नहीं। ब्रह्माजी ने माँगा, देवेश, आप इसी रूप में इसी वेदी पर सदा विराजें, जिससे दर्शनमात्र से पाप धुल जायँ; और चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को पूर्वाफाल्गुनी में रविवार के दिन जो यहाँ भक्तिभाव से दर्शन करे, उसके पाप और रोग मिटें, और दुर्भगा, वन्ध्या, कानी अथवा रूपहीना नारी भी निर्दोष हो जाय। शिव ने कहा, विधातः, ऐसा ही होगा, और पत्नी सहित अपनी अंशरूपिणी मूर्ति प्रकट करके वे वेदी के मध्य सदा के लिये विराजमान हो गये।
विदा की बेला आयी। शिव ने सती को वृषभ की पीठ पर बिठाया, स्वयं आरूढ़ हुए और हिमालय की ओर चले। मनोहर हँसीवाली नीलश्याम सती गौर शिव के पास ऐसी शोभित थीं जैसे चन्द्रमा में नीली रेखा; देवता और महर्षि ठगे रह गये, दक्ष भी मोहित हो गये। बीच रास्ते से शिव ने दक्ष को लौटाया, और शम्भु सती सहित कैलास पहुँचकर हिमालय के शिखर पर प्राणप्रिया के साथ विहार करने लगे।
हिमालय के शिखर पर पहला उपदेश
बरस पर बरस बीते। एक दिन सती एकान्त में हाथ जोड़ बोलीं, देवदेव, करुणासागर, हम धन्य हैं कि आपकी प्रिया हुईं; बहुत वर्षों के विहार से हम सन्तुष्ट हैं, पर अब मन उधर से हट गया है। वह परम तत्त्व बताइये जिससे जीव संसार के दुःख से अनायास छूट जाय, और वह साधन भी जिससे विषयी जीव भी परम पद पा ले।
प्रश्न सुनकर शिव प्रसन्न होकर बोले, देवि, विज्ञान को ही परम तत्त्व जानिये। विज्ञान वह है जिसके उदय होने पर मैं ब्रह्म हूँ, ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाता है, ब्रह्म के सिवा कुछ स्मरण नहीं रहता। वह विज्ञान दुर्लभ है, उसका जाननेवाला विरला ही है, और वह सदा हमारा ही स्वरूप है, साक्षात परात्पर ब्रह्म। उस विज्ञान की माता है हमारी भक्ति, जो भोग और मोक्ष दोनों देती है; भक्ति और ज्ञान में कोई भेद नहीं, और भक्ति के विरोधी को ज्ञान मिलता ही नहीं। हम सदा भक्त के अधीन रहते हैं, भक्ति के बल से नीच समझे जानेवाले घरों में भी चले जाते हैं।
भक्ति सगुणा भी होती है, निर्गुणा भी; जो हृदय के सहज अनुराग से उपजे वही श्रेष्ठ है। मुनियों ने उसके नौ अंग कहे हैं, श्रवण, कीर्तन, स्मरण, सेवन, दास्य, अर्चन, वन्दन, सख्य और आत्मसमर्पण। कानों से कथा का अमृत पीना श्रवण, प्रभु के चरित गाना कीर्तन, उन्हें सर्वत्र व्यापक जान निर्भय रहना स्मरण, प्रभु जो करें वह मंगल के लिये ही है, ऐसा विश्वास सख्य, और देह तक उन्हीं को सौंप देना आत्मसमर्पण। यह भक्ति ज्ञान और वैराग्य की जननी है, मुक्ति इसकी दासी है, और चारों युगों में इसके समान सुखदायक कोई मार्ग नहीं, कलियुग में तो विशेष।
यों बालिका के चित्रों से चली कथा फेरों की अग्नि पार करके ज्ञान पर आ ठहरी। सूतजी कहते हैं, जो विवाह अथवा शुभ कार्य के आरम्भ में यह कथा सुनता है, उसका आयोजन निर्विघ्न पूर्ण होता है, और जो कन्या इसे सुनकर ब्याही जाती है, वह सुख और सौभाग्य से सम्पन्न होती है।
आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), रुद्रसंहिता (सती खण्ड)