पात्र-यात्रा · वाल्मीकि रामायण के चुने हुए प्रसंग
वह राजा जिसने एक गाय के लिए सेना और सौ पुत्र खो दिए, फिर हज़ारों वर्ष के तप से वह एक शब्द कमाया जो देवता भी नहीं दे सकते थे, और जो अयोध्या के द्वार पर एक किशोर को दस दिन के लिए माँगने आया।
अयोध्या के राजभवन का द्वार। भीतर राजा दशरथ मन्त्रियों के बीच पुत्रों के विवाह की बात कर रहे हैं, और बाहर एक मुनि द्वारपालों से कहते हैं, “राजा को सूचना दीजिए कि कुशिक के वंश के गाधि-पुत्र विश्वामित्र द्वार पर आए हैं।” वाल्मीकि के बालकाण्ड का सर्ग 18 यहीं रुकता है। राजा अर्घ्य देते हैं, कहते हैं कि इनका आना वैसा है जैसे सूखी धरती पर वर्षा हो, और जो माँगें, वह उनका हुआ। सर्ग 19 में माँग आती है। मारीच और सुबाहु नाम के दो राक्षस उनके अनुष्ठान की वेदी पर आकाश से मांस और रुधिर बरसा जाते हैं, और उस अनुष्ठान में शाप का एक शब्द भी नहीं निकाला जा सकता। “इसलिए अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को मुझे सौंप दीजिए, वीर राम को, जिनकी कनपटियों पर अभी बालपन के काकपक्ष लहराते हैं और जिनका पराक्रम बालक होते हुए भी सच्चा और अचूक है।” माप भी वे स्वयं तय कर देते हैं: “बस दस दिन और दस रातों के लिए, मेरे यज्ञ के निमित्त, अपने कमल-नयन प्रिय पुत्र को मुझे दीजिए।” राजा शोक से मूर्च्छित हो जाते हैं। जो मुनि द्वार पर खड़े हैं, वे कभी राजा थे, और उस सभा में सब यह जानते हैं।
होश में आए राजा कहते हैं कि राम अभी सोलह बरस के भी नहीं, और रावण का नाम सुनते ही यह भी कि उसके सामने वे टिक नहीं सकते। सर्ग 20 से 21 में मुनि का क्रोध घी पाई आग की तरह भड़कता है: “यदि आपको यह सह्य है, तो मैं जैसे आया था वैसे ही, राम को लिए बिना, लौट जाता हूँ।” उस रोष से समूची पृथ्वी काँपती है। तब वसिष्ठ राजा को समझाते हैं, और उसी समझाने में इस मुनि का परिचय है: ये साक्षात् धर्म हैं, और प्रजापति कृशाश्व के पुत्रों के रूप में जन्मे सारे अस्त्र महादेव ने इन्हें तब दिए थे, “विश्वामित्र जब राजा थे।” आपके पुत्र का भला करने के लिए ही ये राम को माँग रहे हैं। राजा का चेहरा खिल उठता है, और राम लक्ष्मण के साथ मुनि के पीछे चल पड़ते हैं।
ताड़का का वन और सिद्धाश्रम
सरयू के तट पर डेढ़ योजन चलते ही मुनि पहला उपहार देते हैं, बला और अतिबला नाम की दो विद्याएँ; “ये दोनों सब विद्याओं की माता हैं।” घास की शय्या पर कटी रात राजकुमारों को मीठी लगती है, क्योंकि मुनि के बोलों में लाड़ है। संगम से आगे एक भयावना वन है, और सर्ग 24 से 26 में वे उसकी कथा सुनाते हैं: ताड़का, जिसमें ब्रह्मा के वर से हज़ार हाथियों का बल है और अगस्त्य के शाप से राक्षसी का रूप। राम पूछते हैं कि एक स्त्री में इतना बल कैसे, और उत्तर इस काव्य की सबसे सीधी आज्ञाओं में है: “स्त्री का वध करने में आपको घृणा नहीं होनी चाहिए, नरश्रेष्ठ। चारों वर्णों के हित के लिए क्षत्रिय राजकुमार को क्रूर काम भी करना पड़ता है और कोमल भी।” राम का मन फिर भी उसके हाथ-पाँव काटकर छोड़ देने का है, और जब वह शिलाओं की वर्षा में भाइयों को घेर लेती है, तब मुनि चेताते हैं, “राम, कोमलता बहुत हुई।” एक बाण उसकी छाती में, और वह वन उसी दिन कुबेर के चैत्ररथ उपवन-सा खिल उठता है।
सर्ग 27 से 28 में सवेरे मुनि पूर्व की ओर मुख करके सारे अस्त्र राम को सौंप देते हैं, और माँगने पर उन्हें लौटाने की संहार-विद्या भी। सर्ग 29 में वे अपने आश्रम का नाम समझाते हैं: यहीं विष्णु ने वामन रूप में उतरने से पहले तप किया था; “तात, इस आश्रम की भूमि जितनी मेरी है उतनी ही आपकी भी है, क्योंकि आप वही विष्णु हैं जिनकी यह पहले थी।” फिर वे यज्ञ की दीक्षा लेकर छह दिन कठोर मौन में बैठते हैं। छठे दिन राम मारीच को मानव अस्त्र से सौ योजन दूर समुद्र में फेंकते हैं और सुबाहु को मारते हैं। यज्ञ पूरा होता है, और छह दिन बाद विश्वामित्र का पहला वाक्य यह है: “महाबाहु, यशस्वी वीर, मैं कृतार्थ हुआ; आपने गुरु का वचन निभा दिया।”
शोण के तट पर अपना वंश
मिथिला की राह कथाओं से बिछी है, और सर्ग 31 से 49 में हर कथा इन्हीं के मुख से है, गंगा के उतरने से अहल्या तक। पर शोण के तट पर, सर्ग 32 से 34 में, राम पूछते हैं कि यह देश किसका है, और मुनि अपना घर सुनाते हैं: ब्रह्मा के पुत्र कुश, कुश के पुत्र कुशनाभ, और उनके यज्ञ से जन्मे गाधि। “काकुत्स्थ, वही गाधि मेरे पिता थे। कुश के वंश में जन्म लेने से मैं कौशिक कहलाता हूँ।” उनकी बड़ी बहन सत्यवती ऋचीक मुनि को ब्याही गईं और इसी शरीर से स्वर्ग जाकर कौशिकी नदी बनीं। ऋषि कहते हैं कि आप इस वंश में भी विशेष हैं, “जिन्होंने तप से ब्रह्मत्व पाया।” वह तप क्या था, यह राम ने अभी नहीं सुना। मिथिला के द्वार पर एक सूना आश्रम है, और सर्ग 48 से 49 में मुनि गौतम की पत्नी की कथा सुनाकर कहते हैं, “अब पुण्यकर्मा गौतम के इस आश्रम में प्रवेश कीजिए, और देव-रूपिणी महाभागा अहल्या का उद्धार कीजिए।”
शतानन्द की कथा: राजा से ब्रह्मर्षि
जनक के पुरोहित शतानन्द उसी अहल्या के पुत्र हैं। माता की मुक्ति सुनकर वे राम से कहते हैं कि इन्होंने “केवल तप के बल से ब्राह्मणत्व पाया है,” और सर्ग 51 से 65 तक वह कथा सुनाते हैं जो मुनि ने स्वयं कभी नहीं सुनाई। राजा विश्वामित्र ने हज़ारों वर्ष राज्य किया। एक दिन वे पूरी अक्षौहिणी सेना लेकर वसिष्ठ के आश्रम पहुँचते हैं, और मुनि की कामधेनु शबला पूरी सेना को छहों रसों का भोजन कराती है। तृप्त राजा कहते हैं, “यह शबला मुझे दे दीजिए, बदले में एक लाख गायें ले लीजिए। यह रत्न है, और रत्न का अधिकारी राजा होता है।” उत्तर मना है, और राजा गाय को बल से खींचने लगते हैं। शबला मुनि के चरणों में लौटती है, और उसके हुंकार से निकले योद्धा क्षण में पूरी सेना मिटा देते हैं; सौ पुत्र वसिष्ठ पर टूटते हैं और मुनि की एक हुंकार से राख हो जाते हैं। एक बचे पुत्र को राज्य सौंपकर राजा अकेले हिमालय जाते हैं, और महादेव से जो माँगते हैं वह ब्रह्मत्व नहीं, धनुर्वेद है, “जितने दिव्य अस्त्र हैं, सब मेरी आँखों के आगे प्रकाशित हों।” उन्हीं अस्त्रों से वे तपोवन जलाते हैं, और वसिष्ठ एक लाठी लिए सामने आते हैं। आग्नेय से लेकर ब्रह्मास्त्र तक, सब उस ब्रह्म-दण्ड में समा जाते हैं। हारे हुए राजा की गहरी साँस में अगला सब कुछ तय है: “धिक्कार है क्षत्रिय के बल को! ब्राह्मण के तेज से जो बल निकलता है, सच्चा बल वही है। अब मैं इन्द्रियों और मन को शुद्ध करके ऐसा घोर तप करूँगा जो मुझे इसी जन्म में ब्राह्मण बना दे।”
उस दिन से कथा एक ही शब्द की खोज है। दक्षिण में हज़ार वर्ष का तप, और ब्रह्मा का वचन कि आप राजर्षि हैं। “तो मेरे इस तप का फल ब्राह्मणत्व नहीं है।” सर्ग 57 से 60 में इक्ष्वाकु-वंश के त्रिशंकु सशरीर स्वर्ग जाने का यज्ञ चाहते हैं; वसिष्ठ मना करते हैं, उनके सौ पुत्र राजा को चाण्डाल बना देते हैं, और वह चाण्डाल उन्हीं विश्वामित्र के पास आता है जिनका धन अब केवल तप है। “मैं आपको शरण देता हूँ; डरिए मत।” जो यज्ञ में नहीं आते, महोदय और वसिष्ठ के सौ पुत्र, उन्हें वे सात सौ जन्मों का शाप देते हैं; कोई देवता भाग लेने नहीं आता, तो स्रुव उठाकर वे कहते हैं, “नरेश्वर, अब मेरे अपने उद्यम से अर्जित तप का बल देखिए,” और त्रिशंकु इसी देह से स्वर्ग की ओर उठ चलता है। इन्द्र उसे सिर के बल गिराते हैं। “ठहरिए! वहीं ठहर जाइए!” और राजा आकाश में टँग जाता है। फिर मुनि दक्षिण आकाश में दूसरे सप्तर्षि और 27 नए नक्षत्र रचने लगते हैं, “मैं दूसरा इन्द्र बनाऊँगा, या मेरा यह स्वर्ग बिना इन्द्र का ही रहेगा।” देवता विनती करते हैं, और उत्तर में वह बात है जो इस पुरुष को सबसे कसकर बाँधती है: “मैंने इस राजा को वचन दिया है कि इसे सशरीर स्वर्ग पहुँचाऊँगा; उस वचन से मैं पीछे नहीं हट सकता।” देवता मान लेते हैं कि त्रिशंकु उन तारों के बीच सिर नीचे किए चमकता रहेगा, और विश्वामित्र केवल इतना कहते हैं, “अच्छा।”
सर्ग 61 से 62 में पुष्कर के तट पर एक बालक उनकी गोद में आ गिरता है, उनकी बहन का पुत्र शुनःशेप, जिसे राजा अम्बरीष ने यज्ञ-पशु की तरह ख़रीदा है। मुनि अपने पुत्रों से कहते हैं कि इसकी जगह आप अग्नि को तृप्त कीजिए; मधुच्छन्द और उसके भाई हँसकर मना करते हैं, और पिता उन्हें भी हज़ार वर्ष का शाप देते हैं। फिर वे बालक को दो गाथाएँ सिखाते हैं, जिन्हें यूप से बँधा बालक गाता है और दीर्घ आयु पाता है। फिर हज़ार वर्ष, और ब्रह्मा का वचन कि अब आप ऋषि हुए। फिर मेनका; “काम के मोह में डूबे मुझे दस वर्ष ऐसे बीत गए जैसे एक दिन और एक रात।” वे उसे कोमल शब्दों में विदा करते हैं और कौशिकी के तट पर आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेते हैं। ब्रह्मा उन्हें महर्षि कहते हैं, और उत्तर में वे अपना वही एक शब्द माँगते हैं, ब्रह्मर्षि; ब्रह्मा कहते हैं, “अभी आपने इन्द्रियों को नहीं जीता है। और यत्न कीजिए।” इन्द्र की भेजी रम्भा को वे एक क्षण में पहचान लेते हैं और दस हज़ार वर्ष के लिए पत्थर कर देते हैं, और उसी क्षण जान लेते हैं कि क्रोध में तप का पुण्य फिर खर्च हो गया। सर्ग 64 से 65 में इसलिए व्रत बदलता है: अब क्रोध नहीं, अब एक शब्द भी नहीं। हज़ार वर्ष बाद पहले कौर से पहले इन्द्र ब्राह्मण बनकर सारा भोजन माँग लेते हैं; मुनि एक शब्द कहे बिना सब दे देते हैं, और फिर हज़ार वर्ष साँस रोक लेते हैं। उनके सिर से धुआँ उठता है और तीनों लोक तपने लगते हैं। तब ब्रह्मा कहते हैं, “कुशिक-नन्दन, अपने घोर तप से आपने ब्राह्मणत्व पा लिया।” पर एक माँग बाकी है: “ब्रह्मा के पुत्र वसिष्ठ मुझे ब्राह्मण कहकर पुकारें।” वसिष्ठ आते हैं, मित्रता करते हैं, और कहते हैं, “ऐसा ही हो। आप निःसन्देह ब्रह्मर्षि हैं।” शतानन्द कहते हैं, “राम, इस तरह महात्मा विश्वामित्र ने इसी जन्म में, यही शरीर रखते हुए, ब्राह्मणत्व पा लिया।”
धनुष, चार विवाह और उत्तर की राह
अगली सुबह, सर्ग 66 से 67 में, जनक के यह कहने पर कि जो इस धनुष को चढ़ा दे उसे वे अपनी अयोनिजा पुत्री देंगे, विश्वामित्र केवल इतना कहते हैं, “राम को धनुष दिखाइए,” और फिर, “वत्स राम, धनुष देखिए।” धनुष टूटता है, और उस गर्जन से गिरे हुए लोगों के बीच केवल विश्वामित्र, जनक और दोनों रघुकुमार खड़े रहते हैं। सर्ग 70 से 73 में यही मुनि कुशध्वज की दो पुत्रियों को भरत और शत्रुघ्न के लिए माँगते हैं, और विवाह की वेदी पर वसिष्ठ उन्हें और शतानन्द को आगे रखते हैं। सर्ग 74 में, अगली सुबह, वे दोनों राजाओं से अनुमति लेकर उत्तर की ओर चल देते हैं। काव्य में उनका यह अन्तिम दृश्य है; राह में परशुराम जब राम को ललकारते हैं, तब दशरथ उनसे कहते हैं कि आप विश्वामित्र के कारण भी पूज्य हैं, “जो आपके पिता के मामा हैं।”
दूसरे ग्रन्थों के विश्वामित्र
महाभारत उन्हीं कौशिक को दो और कथाओं में रखता है, दोनों वाल्मीकि से अलग। आदि पर्व में कल्माषपाद का शाप है, जहाँ विश्वामित्र के आदेश से किंकर नाम का राक्षस राजा में प्रवेश करता है और वसिष्ठ के सौ पुत्र खा लिए जाते हैं। उद्योग पर्व में गालव की कथा है, जहाँ धर्म वसिष्ठ का रूप धरकर आते हैं, विश्वामित्र सौ वर्ष सिर पर चरु लिए वायु पर जीते खड़े रहते हैं, और उसी क्षण उन्हें ब्राह्मण का पद मिलता है; शिष्य गालव के हठ पर वे आठ सौ चन्द्र-श्वेत घोड़े माँग बैठते हैं, हर एक का एक कान काला। योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण में वही मुनि फिर दशरथ की सभा में राम को माँगते हैं, और वसिष्ठ को निषध पर्वत पर ब्रह्मा से मिला वह ज्ञान याद दिलाते हैं जिसने दोनों की पुरानी शत्रुता मिटाई थी। तुलसीदास के बालकाण्ड में भी वे अयोध्या आते हैं; वह कथा अपनी है और यहाँ नहीं मिलाई गई।
उनकी राह
तीन ठहराव, तीन प्रश्न
नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ विश्वामित्र माँगते हैं, हारते हैं, या वचन पर अड़ जाते हैं। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।
- दस दिन की माँग। विश्वामित्र, ताड़का-वध और यज्ञ-रक्षा पढ़िए, बालकाण्ड 19 से 21। पूछिए: जो मुनि राक्षसों को स्वयं दण्ड दे सकता है, वह एक किशोर को क्यों माँगता है?
- एक लाठी के सामने। मिथिला की कथाएँ पढ़िए, बालकाण्ड 52 से 56, शबला से “धिक्कार है क्षत्रिय के बल को” तक। पूछिए: जो पुरुष हारकर पहली बार अस्त्र माँगता है, वह दूसरी बार तप क्यों चुनता है?
- वचन से पीछे नहीं। उसी कड़ी में बालकाण्ड 57 से 60 का त्रिशंकु पढ़िए, फिर गालव की कथा। पूछिए: जिस क्रोध से उनका तप बार बार खर्च होता रहा, वही क्रोध त्रिशंकु के लिए एक नया आकाश क्यों रच देता है?
अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ द्वारपालों से कहा जा रहा है कि गाधि-पुत्र विश्वामित्र द्वार पर आए हैं। क्या वह परिचय अब उतना ही छोटा लगता है?
दशरथ का पुत्रेष्टि-यज्ञ और राम का जन्म · द्वारपालों से अपना नाम कहलवाता एक मुनि, और सूखी धरती पर वर्षा-सा उसका स्वागत।
अहल्या-उद्धार और मार्ग की कथाएँ · शोण के तट पर आधी रात तक सुनाया गया अपना कुल, और गौतम के सूने आश्रम में दी गई एक आज्ञा।
परशुराम और अयोध्या-वापसी · विवाह के अगले दिन उत्तर की ओर मुड़ा एक मुनि, और एक क्रुद्ध ब्राह्मण के सामने लिया गया उसका नाम।
जो कमाया, वह एक शब्द था
वाल्मीकि के विश्वामित्र को काव्य दो बार दिखाता है, और क्रम उलटा है। राम उन्हें पहले गुरु के रूप में पाते हैं, जो विद्याएँ देता है, अस्त्र देता है, राह भर कथाएँ सुनाता है और आज्ञा देता है, और उसके बाद शतानन्द के मुख से सुनते हैं कि यह पुरुष कौन था: एक राजा जिसने एक गाय के लिए सेना और सौ पुत्र खोए, जिसने हारकर पहले अस्त्र माँगे और फिर तप, जिसका क्रोध त्रिशंकु के लिए नया आकाश रच देता है और रम्भा पर तप का सारा पुण्य खर्च कर देता है। ब्रह्मा चार बार आते हैं, और हर बार मुनि फिर तप में बैठ जाते हैं, क्योंकि जो शब्द वे चाहते हैं वह देवताओं के हाथ में नहीं, उस एक पुरुष के मुख में है जिसकी लाठी ने उन्हें हराया था। उस शब्द के बाद वे अयोध्या के द्वार पर अपने लिए कुछ नहीं माँगते; माँगते हैं दस दिन के लिए एक किशोर, और यज्ञ पूरा होने पर कहते हैं कि आपने गुरु का वचन निभा दिया। मिथिला में वे बस इतना कहते हैं, “वत्स राम, धनुष देखिए,” और विवाह के अगले दिन उत्तर की ओर मुड़ जाते हैं। काव्य उनका अन्त नहीं कहता; कहता है कि वह शब्द इसी जन्म में, इसी देह से कमाया गया था।
आधार-संस्करण और इस परिचय का दायरा
आधार-संस्करण: इस पुस्तकालय में प्रयुक्त गीताप्रेस वाल्मीकि रामायण, संस्कृत मूल और हिन्दी अनुवाद; महाभारत के प्रसंग इस पुस्तकालय की महाभारत की कड़ियों से; योगवासिष्ठ का चौखटा मित्र के अनुवाद से। इस प्रस्तुति के प्रसंग: बालकाण्ड 18 से 34, 48 से 67 और 70 से 74; महाभारत आदि पर्व का कल्माषपाद-प्रसंग और उद्योग पर्व की गालव-कथा; योगवासिष्ठ वैराग्य प्रकरण और मुमुक्षु प्रकरण 2। इस प्रस्तुति का दायरा: एक ग्रन्थ से खींचा गया पात्र-चित्र, दूसरे ग्रन्थ केवल नामित और अलग रखे गए; उद्धृत वचन इस पुस्तकालय की रामायण की कड़ियों के हिन्दी पाठ से।
सीमाएँ और पाठ-भेद: राजा से ब्रह्मर्षि बनने की कथा मिथिला में शतानन्द के मुख से है (बालकाण्ड 51 से 65)। महाभारत की गालव-कथा ब्राह्मणत्व का क्षण वसिष्ठ-रूपी धर्म की परीक्षा में रखती है, वाल्मीकि ब्रह्मा और वसिष्ठ के वचन में; दोनों अपने-अपने ग्रन्थ के नाम से रखी गई हैं। सर्ग 74 में विदा की दिशा इस पुस्तकालय की कड़ी के अनुसार उत्तर है; गीताप्रेस की विषय-सूची उन्हें अपने आश्रम को लौटता कहती है।