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क्रियाएँ
भागवतम् और पुराणलीला, भक्ति और अवतार

काशी विश्वनाथ

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सूतजी ने मुनियोंकी ओर देखकर कहा, “अब हम आपलोगोंको काशीके उस विश्वेश्वर नामक ज्योतिर्लिङ्गका माहात्म्य सुनाते हैं, जो बड़े-से-बड़े पातकोंका भी नाश कर देता है। ध्यान लगाकर सुनिए।

इस भूतलपर जो कुछ भी आँखोंके सामने दिखायी पड़ता है, वह सब सच्चिदानन्दस्वरूप, निर्विकार और सनातन ब्रह्म ही है। अपने अद्वैत भावमें रमे रहनेवाले उन अद्वितीय परमात्मामें एक बार यह इच्छा जागी कि एकसे अनेक हो जायँ। तब वे ही परमात्मा सगुण रूप धारण करके शिव कहलाये। वे शिव ही पुरुष और स्त्री, दो रूपोंमें प्रकट हो गये। जो पुरुष हुआ, उसका नाम शिव पड़ा, और जो स्त्री हुई, वह शक्ति कहलायी।”

चार भुजाओंवाले नीले श्रीहरि आकाशमें तैरती हुई देदीप्यमान मन्दिर-नगरीके बीच समाधिस्थ बैठे हैं, उनके शरीरसे श्वेत जलकी धाराएँ बहकर सूने आकाशको भर रही हैं, और एक चमकती मणि नीचे गिरकर मणिकर्णिका तीर्थको प्रकट कर रही है।

शून्यमें बसा एक नगर

सूतजी बोले, “उन चिदानन्दस्वरूप शिव और शक्तिने स्वयं अदृश्य रहकर, अपने ही स्वभावसे दो चेतन तत्त्व रच दिये, प्रकृति और पुरुष। परन्तु उन दोनोंने अपने माता-पिताको सामने न पाया, तो बड़े संशयमें पड़ गये। उसी समय निर्गुण परमात्मासे आकाशवाणी हुई कि आप दोनों तपस्या कीजिए; उसी तपसे आगे परम उत्तम सृष्टिका विस्तार होगा।

प्रकृति और पुरुष हाथ जोड़कर बोले, ‘प्रभो! तपके लिए तो कोई स्थान ही नहीं है। फिर हम इस समय कहाँ बैठकर आपकी आज्ञाके अनुसार तप करें?’

तब निर्गुण शिवने अपने ही तेजके सारसे पाँच कोस लम्बा-चौड़ा एक शुभ और सुन्दर नगर रच दिया। वह नगर उनका अपना ही स्वरूप था, और सारी आवश्यक वस्तुओंसे भरा हुआ था। उसे बनाकर उन्होंने प्रकृति और पुरुष, दोनोंके पास भेज दिया। वह नगर आकाशमें पुरुषके पास आकर ठहर गया।”

पुरुष अर्थात् श्रीहरि उस नगरमें बैठकर, सृष्टिकी कामनासे, शिवका ध्यान करने लगे। बहुत वर्षोंतक उनका यह तप चलता रहा। परिश्रमके कारण उनके शरीरसे श्वेत जलकी अनेक धाराएँ फूट पड़ीं, और उनसे सारा सूना आकाश भर गया। वहाँ और कुछ दिखायी ही नहीं देता था। इस अद्भुत दृश्यको देखकर श्रीहरि मन-ही-मन चकित हुए और सिर हिलाने लगे। उसी हिलनेसे उनके एक कानकी मणि छिटककर गिर पड़ी। जहाँ वह मणि गिरी, वही स्थान मणिकर्णिका नामक महान् तीर्थ बन गया।

राख जैसे गौरवर्ण महादेव नीले समुद्रकी लहरोंसे ऊपर उठे हुए हैं, अपने त्रिशूलपर सम्पूर्ण पाँच कोसकी सुनहरी नगरीको उठाये हुए हैं, और दूसरे हाथमें डमरू धारण किये हुए हैं।

अब वही पाँच कोसवाली पुरी उस बढ़ती जलराशिमें डूबने और बहने लगी। यह देखकर निर्गुण शिवने झटपट उसे अपने त्रिशूलपर उठा लिया। इतनेमें श्रीहरि अपनी पत्नी प्रकृतिके साथ वहीं शयन कर गये। तब उनकी नाभिसे एक कमल प्रकट हुआ, और उस कमलसे ब्रह्माका जन्म हुआ; इसमें भी आदेश शंकरका ही था। ब्रह्माने शिवकी आज्ञा पाकर अद्भुत सृष्टिका आरम्भ किया, ब्रह्माण्डमें चौदह भुवन बसाये, और उस ब्रह्माण्डका विस्तार पचास करोड़ योजनका हुआ।

नीले श्रीहरि कुण्डली मारे शेषनागपर लेटे हुए हैं, उनके पास सुनहरी प्रकृति बैठी हैं, और उनकी नाभिसे उठे कमलपर चतुर्मुख ब्रह्मा सृष्टि रचनेकी मुद्रामें विराजमान हैं।

फिर भगवान् शिवने सोचा, ‘इस ब्रह्माण्डके भीतर जो प्राणी कर्मके पाशसे बँधे हुए हैं, वे मुक्ति कैसे पायेंगे?’ यही सोचकर उन्होंने मुक्ति देनेवाली उस पञ्चक्रोशीको इसी जगत्में छोड़ दिया।

प्रलयमें भी जिसका नाश नहीं

सूतजी बोले, “ब्रह्माजीका एक दिन पूरा होनेपर जब सारे जगत्का प्रलय हो जाता है, तब भी इस काशीपुरीका नाश नहीं होता। उस समय भगवान् शिव इसे फिर अपने त्रिशूलपर धारण कर लेते हैं, और जब ब्रह्मा नयी सृष्टि रचते हैं, तब वे इसे फिरसे इसी भूतलपर बैठा देते हैं। कर्मोंको खींच लेनेके कारण ही इस पुरीका नाम काशी पड़ा। इसीमें अविमुक्तेश्वर लिङ्ग सदा विराजमान रहता है, जो बड़े-से-बड़े पातकीको भी मोक्ष दे देता है।

मुनीश्वरो! और जितने मोक्ष देनेवाले धाम हैं, वहाँ तो सालोक्य आदि मुक्ति ही मिलती है। केवल इस काशीमें जीवोंको सायुज्य नामक सबसे ऊँची मुक्ति सहज ही मिल जाती है। जिनकी और कहीं गति नहीं, उनके लिए यह वाराणसी ही गति है। यह महापुण्यमयी पञ्चक्रोशी करोड़ों हत्याओंका पाप मिटा देती है। यहाँ तो देवता भी मरनेकी कामना करते हैं, फिर औरोंकी क्या बात है।”

विश्वेश्वरका विराजना

तब प्रजाके पति वे, जो भीतरसे सत्त्वगुणी और बाहरसे तमोगुणी हैं और वालाग्नि रुद्रके नामसे प्रसिद्ध हैं, तथा जो निर्गुण होते हुए भी सगुण रूपमें प्रकट हुए शिव ही हैं, बारंबार प्रणाम करके बोले, “विश्वनाथ! महेश्वर! हम आपके ही हैं, इसमें कोई संशय नहीं। नाथ! लोकके हितकी कामनासे आप सदा यहीं रहिए। हम आपसे प्रार्थना करते हैं, आप यहीं रहकर जीवोंका उद्धार कीजिए।”

जिनका मन और इन्द्रियाँ वशमें थीं, उन अविमुक्तको भी बारंबार यही प्रार्थना करते देखकर भगवान् शिव प्रसन्न हो उठे। तब अविमुक्तने कहा, “देवाधिदेव महादेव! आप तीनों लोकोंके स्वामी हैं, ब्रह्मा और विष्णु आदि भी आपकी सेवा करते हैं। देव! काशीपुरीको आप अपनी राजधानी स्वीकार कीजिए। हम अविमुक्त मुक्तिकी प्राप्तिके लिए यहाँ सदा आपका ध्यान लगाये स्थिरभावसे बैठे रहेंगे। आप ही मुक्ति देनेवाले और सब कामनाओंको पूरा करनेवाले हैं, दूसरा कोई नहीं। इसलिए परमेश्वर! उमाके साथ आप सदा यहीं विराजिए। सदाशिव! आप समस्त जीवोंको संसार-सागरसे पार कीजिए।”

जब विश्वनाथसे इस प्रकार प्रार्थना की गयी, तब भगवान् शंकर जगत्का कल्याण करनेके लिए वहीं विराजमान हो गये। वे ही विश्वेश्वर हुए, वे ही विश्वनाथ कहलाये, और वहीं सदाके लिए जीवोंकी परम गति बन गये।

सिंहासनपर पञ्चमुख विश्वनाथ शिव विराजमान हैं, उनके पास सुनहरी उमा बैठी हैं, सामने एक देदीप्यमान ज्योतिर्लिङ्ग प्रकाशित है, और तपस्वी अविमुक्तेश्वर हाथ जोड़े घुटनोंके बल प्रार्थना कर रहे हैं।

काशीका रहस्य

एक बार भगवान् शिवने उमासे स्वयं यह रहस्य कहा, “महेश्वरि! वाराणसी पुरीमें रहना हमें सदासे अच्छा लगता है। जिस कारण हम सब कुछ छोड़कर काशीमें रहते हैं, वह सुनिए। जो हमारा भक्त है और जो हमारे तत्त्वको जानता है, वे दोनों निश्चय ही मोक्षके भागी होते हैं। उनके लिए किसी तीर्थकी अपेक्षा नहीं। विहित और अविहित, दोनों प्रकारके कर्म उनके लिए बराबर हैं। उन्हें जीवन्मुक्त ही समझिए। वे कहीं भी शरीर छोड़ें, तुरन्त मोक्ष पा लेते हैं।

देवि! इस अविमुक्त तीर्थकी एक विशेष बात मन लगाकर सुनिए। सभी वर्ण और सभी आश्रमोंके लोग, चाहे बालक हों, जवान हों या बूढ़े, यदि इस पुरीमें प्राण छोड़ें तो मुक्त हो ही जाते हैं, इसमें संशय नहीं। स्त्री पवित्र हो या अपवित्र, कुमारी हो या विवाहिता, विधवा हो या बाँझ, कैसी भी क्यों न हो, यदि इस क्षेत्रमें उसकी मृत्यु हुई तो वह अवश्य मोक्षकी अधिकारिणी होती है। स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज या जरायुज, हर प्राणी यहाँ मरनेपर वह गति पाता है जो और कहीं नहीं मिलती।

यहाँ मरनेवालेको न ज्ञानकी अपेक्षा है, न भक्तिकी; न कर्म चाहिए, न दान; न किसी संस्कारकी अपेक्षा है, न ऊँची जातिकी। जो मनुष्य हमारे इस क्षेत्रमें बसता है, वह चाहे जैसे मरे, उसका मोक्ष निश्चित है। प्रिये! हमारा यह दिव्य पुर गुह्यसे भी गुह्यतर है। ब्रह्मा आदि देवता भी इसके माहात्म्यको नहीं जानते। धर्मका सार सत्य है, मोक्षका सार समता है, और समस्त क्षेत्रों तथा तीर्थोंका सार यही अविमुक्त है।

इस काशीपुरीमें शिवभक्तोंने अनेक शिवलिङ्ग स्थापित किये हैं; वे सब मनकी हर कामना पूरी करते और मोक्ष देते हैं। इस चारों दिशाओंमें पाँच-पाँच कोस फैले हुए क्षेत्रको ही अविमुक्त कहा गया है। यदि किसी निष्पापका यहाँ अन्त हो, तो उसे तत्काल मोक्ष मिल जाता है। परन्तु जो पापी यहाँ मरता है, वह पहले कायव्यूहको प्राप्त होता है, बालकका जीवन भोगता है, और तब कहीं आगे चलकर मोक्ष पाता है। और जो इस अविमुक्त क्षेत्रमें ही पाप करता है, वह हजारों वर्ष भैरवी यातना सहकर, पापका पूरा फल भोगनेके बाद ही मुक्त होता है।

सौ करोड़ कल्प बीत जायँ, तो भी अपने किये कर्मका फल भोगे बिना नहीं छूटता। केवल अशुभ कर्म नरक देता है, केवल शुभ स्वर्ग, और दोनों मिलकर मनुष्य-योनि। शुभकी अधिकतासे उत्तम जन्म और अशुभकी अधिकतासे अधम जन्म मिलता है; और जब शुभ-अशुभ दोनों कर्म क्षीण हो जाते हैं, तब जीवको सच्चा मोक्ष मिलता है। जिसने पहले कभी आदरके साथ काशीका दर्शन किया हो, उसीको यहाँ आकर मृत्यु प्राप्त होती है। जो यहाँ आकर गंगामें स्नान करता है, उसके क्रियमाण कर्मका नाश हो जाता है; पर प्रारब्ध तो भोगे बिना नहीं छूटता, यह निश्चित बात है। हाँ, जिसका अन्त काशीमें होता है, उसका प्रारब्ध भी क्षीण हो जाता है। यहाँतक कि जो किसी एक ब्राह्मणको भी काशीवास करा देता है, वह भी काशीवासका अवसर पाकर मोक्ष लाभ करता है।”

राख जैसे गौरवर्ण शिव सुनहरी उमाकी ओर मुड़कर काशीका रहस्य कह रहे हैं, पीछे गंगाके तटपर घाटों और मन्दिरोंसे भरी काशी दीप्तिमान है, और प्रकाशमय जीव मुक्तिकी ओर आकाशमें ऊपर उठ रहे हैं।

सूतजी बोले, “मुनिवरो! इस प्रकार हमने आपसे वाराणसी और विश्वेश्वर लिङ्गका यह विशाल माहात्म्य कहा, जो महान् पुण्य देनेवाला तथा भोग और मोक्ष, दोनों प्रदान करनेवाला है।”

आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), कोटिरुद्रसंहिता

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