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भागवतम् और पुराणलीला, भक्ति और अवतार

सृष्टि और शिवलिंग का प्रादुर्भाव

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देवर्षि नारद एक लम्बी यात्रा के अन्त में ब्रह्मलोक पहुँचे। पृथ्वी पर घूमते हुए उन्होंने असंख्य शिवलिंगों के प्रेमपूर्वक दर्शन किए थे, काशीपुरी में ठहरकर विश्वनाथ की आराधना की थी, और अब उनके हृदय में एक ही प्यास शेष थी। पितामह ब्रह्मा को भक्तिपूर्वक प्रणाम करके वे बोले, “प्रभो! भगवान विष्णु का माहात्म्य तो हमने जान लिया, भक्ति, ज्ञान और तीर्थ के मार्ग भी सुन लिए, किन्तु शिवतत्त्व का ज्ञान अब तक हमें नहीं हुआ। आप कृपा करके शिव और शिवा के आविर्भाव की, उनके स्वरूप की वह कथा हमें सुनाइए।”

अपने पुत्र नारद की यह विनती सुनकर लोकपितामह ब्रह्मा गम्भीर हो उठे और इस प्रकार कहने लगे।

देवर्षि नारद अपनी वीणा पास रखकर हाथ जोड़े ब्रह्मलोक में कमल पर विराजमान श्वेत-दाढ़ी वाले चतुर्मुख ब्रह्मा के सम्मुख भक्तिपूर्वक घुटनों के बल बैठे हैं और पितामह उन्हें शिवतत्त्व की कथा सुनाने को उद्यत हैं।

महाप्रलय का अन्धकार

ब्रह्माजी ने कहा, “देवर्षि! जिस समय समस्त जगत नष्ट हो गया था, तब सर्वत्र केवल अन्धकार ही अन्धकार था। न सूर्य था, न चन्द्रमा, न ग्रह थे न नक्षत्र। न दिन था न रात। अग्नि, पृथ्वी, वायु और जल का भी पता न था। उस समय जिसे श्रुति ‘तत्सद्ब्रह्म’ कहकर पुकारती है, वही एकमात्र ‘सत्’ शेष था। वह न स्थूल था न कृश, न उसमें कभी वृद्धि होती है न ह्रास। वाणी वहाँ तक पहुँच नहीं पाती; योगीजन उसे अपने हृदयाकाश में ही निरन्तर देखते हैं। वही सत्य, ज्ञानस्वरूप, अनन्त, निराकार और निर्गुण परब्रह्म था।”

सदाशिव और अम्बिका का प्राकट्य

“कुछ काल बीतने पर उस निराकार परमात्मा के भीतर एक से अनेक होने का संकल्प उदित हुआ। तब उसने अपनी लीलाशक्ति से अपने लिए एक मूर्ति की कल्पना की। वह मूर्ति समस्त ऐश्वर्य से सम्पन्न, सर्वज्ञानमयी और शुभस्वरूपा थी। मूर्तिरहित परब्रह्म की वही मूर्ति भगवान सदाशिव हैं। उन्हीं को परम पुरुष, ईश्वर, शिव, शम्भु और महेश्वर कहते हैं। वे मस्तक पर आकाश-गंगा और भाल पर चन्द्रमा धारण करते हैं, उनके पाँच मुख हैं और प्रत्येक मुख में तीन नेत्र, दस भुजाएँ और हाथ में त्रिशूल; सारे अंगों में भस्म रमाए वे कर्पूर-से श्वेत हैं।”

“एकाकी सदाशिव ने अपने ही विग्रह से एक स्वरूपभूता शक्ति की सृष्टि की, जो उनके अंग से कभी अलग होने वाली न थी। वही पराशक्ति प्रकृति, गुणवती माया और बुद्धितत्त्व की जननी कही गई; उसी को अम्बिका, नित्या और मूलकारण भी कहते हैं। उसकी आठ भुजाएँ हैं और उसके मुखमण्डल पर सहस्र चन्द्रमाओं की कान्ति खेलती है। वही सबकी योनि है और एकाकिनी होने पर भी अपनी माया के वश अनेक हो जाती है।”

आनन्दवन और वामांग से विष्णु

“फिर उन कालरूप सदाशिव ने शक्ति के साथ एक उत्तम क्षेत्र की रचना की, जिसे शिवलोक अथवा काशी कहते हैं। वह परम निर्वाण का स्थान है, सबके ऊपर विराजमान। प्रलय के समय भी शिव ने उसे अपने सान्निध्य से कभी रहित नहीं किया, इसीलिए विद्वान उसे ‘अविमुक्त क्षेत्र’ कहते हैं। पहले शिव ने उसका नाम ‘आनन्दवन’ रखा था।”

“एक समय उसी आनन्दवन में विहार करते हुए शिव और शिवा के मन में यह इच्छा हुई कि किसी दूसरे पुरुष की भी सृष्टि की जाए, जिस पर सृष्टि-संचालन का भार रखकर हम दोनों केवल काशी में रहकर इच्छानुसार विचरें। ऐसा निश्चय करके शक्तिसहित परमेश्वर शिव ने अपने वाम अंग पर अमृत मल दिया। तब वहाँ से एक पुरुष प्रकट हुआ, जो तीनों लोकों में सबसे अधिक सुन्दर था। वह शान्त था, सत्त्वगुण से भरा, गम्भीरता में सागर के समान, और इन्द्रनील मणि-सा श्याम। उसने शिव को प्रणाम करके कहा, ‘स्वामिन्! मेरा नाम निश्चित कीजिए और कार्य बताइए।’ शिव मेघ-से गम्भीर स्वर में हँसते हुए बोले, ‘आप व्यापक हैं, इसीलिए आपका नाम विष्णु विख्यात होगा। आप स्थिर होकर उत्तम तप कीजिए, वही समस्त कार्यों का साधन है।’ ऐसा कहकर उन्होंने विष्णु को वेदों का ज्ञान दे दिया।”

चौबीस तत्त्वों की रचना

“आज्ञा पाकर विष्णु ने सुदीर्घ काल तक कठोर तप किया। परिश्रम से उनके अंगों से नाना जलधाराएँ निकलने लगीं और वह जल सारे सूने आकाश में व्याप्त हो गया। थके हुए विष्णु उसी जल में शयन करने लगे, और जल में शयन करने के कारण ही उनका ‘नारायण’ नाम प्रसिद्ध हुआ। इसके पश्चात प्रकृति से महत्तत्त्व प्रकट हुआ, महत्तत्त्व से तीनों गुण, गुणों से त्रिविध अहंकार, अहंकार से पाँच तन्मात्राएँ, तन्मात्राओं से पाँच भूत, और फिर ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों का प्राकट्य हुआ। इस प्रकार चौबीस तत्त्व हुए; पुरुष को छोड़कर शेष सब जड़ हैं। उन तत्त्वों को ग्रहण करके नारायण शिव की इच्छा से फिर ब्रह्मरूप जल में सो गए।”

नाभि-कमल से ब्रह्मा और अग्नि-स्तम्भ

“जब नारायण जल में शयन कर रहे थे, तब शिव की इच्छा से उनकी नाभि से एक उत्तम कमल प्रकट हुआ, जो बहुत बड़ा था और करोड़ों सूर्यों-सा प्रकाशित। तत्पश्चात सदाशिव ने अपने दाहिने अंग से मुझे उत्पन्न किया, और अपनी माया से मोहित करके नारायण के नाभि-कमल में डालकर वहीं से मुझे प्रकट किया। इस प्रकार उस कमल से पुत्र के रूप में मुझ हिरण्यगर्भ का जन्म हुआ। मेरे चार मुख हुए और शरीर की कान्ति लाल थी। शिव की माया से मोहित होकर मैं अपने जनक को न जान सका, और सोचने लगा कि मैं कौन हूँ और किसने मुझे रचा।”

तारों भरे नील कारण-जल पर शयन करते नीलवर्ण चतुर्भुज नारायण की नाभि से एक विशाल दीप्तिमान कमल उगा है, जिस पर रक्तवर्ण चतुर्मुख ब्रह्मा प्रकट होकर चकित भाव से चारों ओर देख रहे हैं।

“अपने उद्गम को खोजने के लिए मैं कमल की नाल में उतरकर सैकड़ों वर्षों तक भ्रमण करता रहा, किन्तु उसका छोर मुझे कहीं न मिला। तब एक आकाशवाणी हुई, ‘तप कीजिए।’ मैंने बारह वर्ष घोर तप किया, और तब चार भुजाओं तथा शंख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण किए भगवान विष्णु मेरे सामने प्रकट हो गए। हम दोनों में बातचीत आरम्भ हुई, किन्तु शिव की लीला से हम दोनों में कुछ विवाद खड़ा हो गया। इसी समय हम दोनों के बीच एक महान अग्नि-स्तम्भ, अर्थात ज्योतिर्मय लिंग, प्रकट हुआ।”

“उसका आदि-अन्त जानने के लिए हमने बड़ा प्रयत्न किया। मैं ऊपर की ओर चढ़ता चला गया और श्रीहरि नीचे की ओर उतरते गए, पर हममें से किसी को उसका ओर-छोर न मिला। थककर हम लौट आए। वह तत्त्व लिंगरहित होकर भी लिंगभाव को प्राप्त था; न उसका कोई नाम था, न कर्म। ध्यानमार्ग में भी उसके स्वरूप का पता न चलता था। तब हम दोनों ने अपने चित्त को स्थिर करके उस अग्नि-स्तम्भ को प्रणाम करना आरम्भ किया और कहा, ‘महाप्रभो! हम आपके स्वरूप को नहीं जानते। आप जो कोई भी हों, आपको हमारा नमस्कार है; हमें अपने यथार्थ रूप का दर्शन कराइए।’ इसी प्रकार नमस्कार करते हुए हमारे सौ वर्ष बीत गए।”

दो देवों के बीच आदि और अन्त से रहित एक विशाल ज्योतिर्मय अग्नि-स्तम्भ आकाश और पाताल तक तन गया है, रक्तवर्ण चतुर्मुख ब्रह्मा उसका ऊपरी छोर खोजने ऊपर उड़ रहे हैं और नीलवर्ण चतुर्भुज विष्णु नीचे की ओर उतर रहे हैं।

ओंकार और शब्दमय शरीर का दर्शन

“निरन्तर प्रणाम करते-करते परमेश्वर हम पर दयालु हो गए। तब उस नाद में से ‘ओम्, ओम्’ ऐसा शब्द स्पष्ट सुनाई देने लगा। हम सोचने लगे कि यह क्या है। तब उन्होंने अपने दक्षिण भाग में अकार का दर्शन कराया, जो सूर्यमण्डल-सा तेजोमय था; उत्तर भाग में उकार अग्नि-सा दीप्तिशाली दिखा; और मध्य भाग में मकार चन्द्रमण्डल-सा उज्ज्वल था। उसके ऊपर हमने शुद्ध स्फटिक-सी निर्मल, तुरीयातीत और अद्वितीय परब्रह्म की मूर्ति देखी। श्रीहरि ने वेद और शब्द के आवेश से उस विश्वात्मा शिव का चिन्तन किया, तब वहाँ एक ऋषि प्रकट हुए, जिनके द्वारा विष्णु ने जाना कि इस शब्दब्रह्ममय परम लिंग के रूप में साक्षात महादेव ही यहाँ प्रकट हुए हैं।”

“वह प्रणव ही परब्रह्म का वाचक है। उसके पहले अक्षर अकार से जगत के बीजभूत अण्डजन्मा ब्रह्मा का, दूसरे अक्षर उकार से परम कारणरूप श्रीहरि का, और तीसरे अक्षर मकार से भगवान नीललोहित शिव का बोध होता है। महेश्वर के लिंग से अकाररूप बीज प्रकट हुआ, जो उकाररूप योनि में स्थापित होकर सुवर्णमय अण्ड के रूप में बढ़ने लगा। वह अण्ड अनेक वर्षों तक जल में स्थित रहा और एक हजार वर्ष के बाद दो टुकड़ों में बँट गया। उसका ऊपरी कपाल द्युलोक बना और नीचे का कपाल पृथ्वी; उसी अण्ड से मुझ चतुर्मुख ब्रह्मा की भी उत्पत्ति हुई। इस प्रकार महेश्वर ही अकार, उकार और मकार, इन तीन रूपों में वर्णित हुए।”

उमा-सहित शिव और तीन देवताओं की एकता

“तब करुणानिधि महेश्वर प्रसन्न होकर उमादेवी के साथ सहसा वहाँ प्रकट हो गए। उनके पाँच मुख, प्रत्येक में तीन नेत्र, भाल पर चन्द्रमा का मुकुट, गौरवर्ण, दस भुजाएँ, कण्ठ में नील चिह्न और सारे अंगों में भस्म शोभा पा रही थी। मैंने और विष्णु ने उनकी स्तुति की। तब भगवान शंकर ने विष्णु को वेद का उपदेश दिया, फिर मुझे भी वह गुह्य ज्ञान दिया, और प्रसन्न होकर बोले, ‘आप दोनों मेरी स्वरूपभूता प्रकृति से प्रकट हुए हैं। ब्रह्मा, आप मेरे दाहिने पार्श्व से उत्पन्न हुए हैं और विष्णु, आप मेरे वाम पार्श्व से। मेरी आज्ञा से आप जगत की सृष्टि कीजिए और आप इस चराचर का पालन करते रहिए।’”

“विष्णु ने हाथ जोड़कर यही वर माँगा कि आप में हम दोनों की सदा अनन्य और अचल भक्ति बनी रहे। तब श्रीमहेश्वर बोले, ‘मैं ही सृष्टि, पालन और संहार का कर्ता हूँ; मैं सगुण भी हूँ और निर्गुण भी, सच्चिदानन्दस्वरूप निर्विकार परब्रह्म हूँ। कार्यों के भेद से मैं ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र नाम धारण करके तीन स्वरूपों में विभक्त हुआ हूँ। ब्रह्मा, मेरा परम उत्कृष्ट रूप आपके शरीर से रुद्र नाम से प्रकट होगा, और उसका सामर्थ्य मुझसे कम न होगा। इसलिए शिव और रुद्र में कभी भेदबुद्धि न कीजिए। मैं, आप, ब्रह्मा और रुद्र सब एक ही रूप हैं; भेद मानने पर बन्धन होगा। वास्तव में सारा दृश्य ही मेरे विचार से शिवरूप है।’”

“फिर उन्होंने प्रकृति की तीन शक्तियों का परिचय दिया: वाग्देवी ब्रह्मा की सेवा करेंगी, लक्ष्मीरूपा शक्ति विष्णु का आश्रय लेंगी, और कालीरूपा तीसरी शक्ति रुद्र को प्राप्त होंगी; इनका कार्य क्रमशः सृष्टि, पालन और संहार है। इन तीनों देवताओं में गुण हैं, पर शिव गुणातीत माने गए हैं। यह कहकर उन्होंने विष्णु को सृष्टि-कर्ता पितामह के पालन का भार सौंप दिया।” इतना कहकर लोकपितामह ब्रह्मा नारद के सम्मुख क्षण भर मौन रह गए, मानो उस अनादि ज्योति का स्मरण अब भी उनके हृदय को भर रहा हो।

आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), रुद्रसंहिता (सृष्टिखण्ड)