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दक्ष और सती

कथा 35 · भागवतम् की कथाएँ

दक्ष और सती

जब एक बेटी ने अपने स्वामी के मान के लिए अपनी ही देह आग को सौंप दी
स्कन्ध 4, अध्याय 2-7

परीक्षित् ने शुकदेव की ओर देखा और हाथ जोड़कर पूछा, ”भगवन्, कल आपने प्रेम की वे कथाएँ कहीं जिनमें भक्त ने प्रभु को पुकारा और प्रभु दौड़े आए। पर एक बात अब भी हमें चुभ रही है। जिस घर में हमारा जन्म हुआ, जिस पिता ने हमें गोद में खिलाया, वही जब हमारे प्रिय की निंदा करने लगें, तब क्या किया जाए? हमारे पास गिनती के दिन बचे हैं, मुनिवर। हम उस घड़ी की रीत जानना चाहते हैं, जब अपने ही रक्त के सामने प्रिय का मान खड़ा करना पड़े।”

Painterly classical-Indian color illustration: Daksha Prajapati, a regal crowned patriarch with a proud bearing, seated on a high throne presiding over a Vedic yajna, mantras and ghee-flames around him; lesser sages and attendants bow their heads low before him while he counts the bowing heads with cold satisfaction, his pride subtly visible; warm gold and crimson palette.

शुकदेव कुछ देर मौन रहे। फिर बोले, ”राजन्, तो सुनिए दक्ष-प्रजापति और उनकी बेटी सती की कथा। एक पिता था जिसे झुके हुए सिर गिनने की आदत पड़ गई थी, और एक बेटी थी जिसने अपने भीतर वह आग जगा ली जिसे बुझाने का उपाय किसी देवता के पास न था।”

दक्ष ब्रह्मा के पुत्रों में थे, प्रजापति, प्रजा के रचयिता। अपनी कन्याओं से उनका बड़ा ही स्नेह था। यज्ञ की हर विधि उन्हें कंठस्थ थी, हर मंत्र का स्वर ठीक उतना ही ऊँचा या धीमा जितना शास्त्र कहता था। पर इस सारी विधि-विधान के नीचे एक छोटी-सी बात पल रही थी। जिस मान की चाह उन्हें भीतर से दबाए रहती थी, उसकी जड़ें झुके हुए सिर देखने में थीं, और यही चाह आगे चलकर उन्हें अपनी ही कन्या से वैर करा बैठी।

Painterly classical-Indian color illustration: young Sati, a gentle innocent maiden, seated in deep tapasya in a forest clearing, eyes closed in devotion, longing only for Shiva; above or before her a luminous vision of ascetic Shiva with matted locks and crescent moon; soft dawn light, blues and saffron, lotuses and rudraksha motifs.

उनकी एक बेटी थी, सती। घर भर में अति प्यारी, भोली कन्या। पर उसके मन में बचपन से एक ही नाम बसा था, शिव का। उसने तप किया, और उसी एक को पति रूप में माँगा जिसे संसार समझ नहीं पाता था। शिव मान गए। दोनों का विवाह हुआ, और दक्ष की वह सुकुमारी बेटी शिव की संगिनी हो गई।

मगर दक्ष के मन में यह बात कभी बैठी नहीं। पिता के भीतर एक विचित्र विरोध था। वे जानते थे कि शिव चराचर के गुरु हैं, वैररहित, शान्तमूर्ति, आत्माराम, जगत् के परम आराध्य देव, और यही बात उन्हें और अखरती थी, क्योंकि ऐसे जामाता के आगे उनका अपना मान छोटा पड़ता था।

Painterly classical-Indian color illustration: grand assembly hall of sages and gods; radiant sun-bright Daksha entering, all assembled rishis and devas rising from their seats with bowed heads, except Brahma and Mahadeva; Shiva alone seated serene with half-closed eyes lost in inner meditation, unmoving; lamplit golden hall, jewel-toned robes.

फिर एक दिन वह घड़ी आई जिसने सुलगती चिनगारी को भड़का दिया। प्रजापतियों के यज्ञ में सब बड़े-बड़े ब्रह्मर्षि, देवता और मुनि अपने-अपने अनुयायियों के साथ एकत्र हुए थे। दक्ष ने उस सभा में प्रवेश किया, तो वे अपने तेज से सूर्य के समान प्रकाशमान थे, और उस विशाल सभा-भवन का अँधेरा छँट गया। ब्रह्मा और महादेव को छोड़कर बाकी सब सभासद उनके तेज से प्रभावित होकर अपने आसनों से उठ खड़े हुए, सिर झुके। शिव अपने आसन पर बैठे रहे, आँखें आधी मुँदी, मन किसी ऐसी गहराई में डूबा जहाँ सभा का, दक्ष का, किसी का होश न था।

दक्ष ने आते ही समस्त सभासदों से सम्मान पाया, और तेजस्वी दक्ष जगत्पिता ब्रह्मा को प्रणाम कर उनकी आज्ञा से अपने आसन पर बैठ गए। पर महादेव को पहले से ही बैठा देख, और उनसे अभ्युत्थान आदि कोई आदर न पाकर, वे यह सहन न कर सके। उनकी छाती में वह न-उठना एक काँटे की तरह धँस गया, और जिस आत्माराम मौन को सारी सृष्टि नमन करती थी, उसी मौन को उन्होंने अपना अपमान समझ लिया। उन्होंने शिव की ओर ऐसी टेढ़ी दृष्टि से देखा मानो उन्हें क्रोधाग्नि से जला डालेंगे।

”देवताओं और अग्नियों के बीच मेरी बात सब सुनें,” दक्ष का स्वर रुका नहीं। ”मैं द्वेषवश नहीं, शिष्टाचार की बात कहता हूँ। यह निर्लज्ज महादेव समस्त लोकपालों की पवित्र कीर्ति को धूल में मिला रहा है। बंदर-सी आँखोंवाले इस संन्यासी ने मेरी मृगनयनी, सावित्री-सरीखी पवित्र कन्या का हाथ अग्नि और ब्राह्मणों के सामने थामा है, इस नाते यह मेरे पुत्र समान हुआ। उचित तो यह था कि उठकर मेरा स्वागत करता, प्रणाम करता। पर इसने वाणी से भी मेरा आदर न किया।”

Painterly classical-Indian color illustration: enraged Daksha standing in the assembly, hand raised, hurling insults; he holds water in his palm to pronounce a curse barring Shiva from yajna shares; the assembled gods and sages sit stunned and silent; Shiva serene and undisturbed; dramatic firelit hall, tense crimson and shadow tones.

और फिर वे जो कहते गए, वह सभा के पत्थर तक सुन्न कर गया। ”यह श्मशानों में भूत-प्रेतों के साथ घूमता है, सारी देह पर चिता की राख मले, गले में मुर्दों की हड्डियों की माला, सिर पर बिखरी जटा। यह बस नाम भर का शिव है, है तो पूरा अशिव, अमंगलरूप। जैसे यह स्वयं मतवाला है, वैसे ही इसे मतवाले ही प्यारे लगते हैं।” इतना कहकर भी उनकी आग न बुझी। हाथ में जल लेकर उन्होंने शाप दे दिया कि अब से इस महादेव को इन्द्र-उपेन्द्र आदि देवताओं के साथ यज्ञ का भाग न मिले।

उपस्थित मुख्य सभासदों ने उन्हें बहुत रोका, पर दक्ष ने किसी की न सुनी। तब शिव के अग्रगण्य पार्षद नन्दीश्वर क्रोध से तमतमा उठे। एक भक्त का अपने स्वामी के लिए तड़पना उनके स्वर में काँप रहा था, जब उन्होंने पलटकर दक्ष को शाप दिया कि जिस मुख से यह इतना अहंकार बोलता है, वह मुख शीघ्र ही बकरे का हो जाएगा।

नन्दीश्वर का यह शाप सुनकर सभा में बैठे ब्राह्मणों का एक दल तप गया, और उनमें से भृगु ऋषि उठ खड़े हुए। उन्होंने ब्रह्मदंड के समान एक दुस्तर प्रति-शाप दिया, ”जो लोग शिव के भक्त हैं और जो उन भक्तों के पीछे-पीछे चलते हैं, वे सब सत्-शास्त्रों के विरुद्ध आचरण करनेवाले पाखंडी हों।” इस प्रकार एक ओर शिव का गण, दूसरी ओर ब्राह्मणों का तेज, और बीच में जल हाथ में लिए दक्ष, अत्यंत क्रोध में भरे, सभा छोड़कर अपने घर लौट गए।

आगे चलकर ब्रह्मा ने दक्ष को सब प्रजापतियों का अधिपति बना दिया। इस मान से उनका गर्व और भी बढ़ गया। शिव आदि ब्रह्मनिष्ठों को यज्ञभाग न देकर उनका तिरस्कार करते हुए उन्होंने पहले वाजपेय-यज्ञ किया, और फिर बृहस्पतिसव नाम का एक महायज्ञ आरम्भ किया। सब ब्रह्मर्षि, देवर्षि, पितर और देवता अपनी-अपनी पत्नियों के साथ वहाँ पधारे।

उस यज्ञोत्सव की चर्चा करते हुए देवता आकाश-मार्ग से जा रहे थे। दक्ष की बेटी सती ने उन्हीं के मुख से अपने पिता के घर होने वाले इस यज्ञ की बात सुन ली।

उन्होंने देखा कि कैलास के पास से होकर देवांगनाओं के झुंड-के-झुंड जा रहे हैं, चंचल आँखोंवाली गन्धर्व और यक्षों की स्त्रियाँ, चमकीले कुण्डल और हार पहने, ख़ूब सज-धजकर, अपने-अपने पतियों के साथ राजहंस जैसे श्वेत विमानों पर बैठी हुईं। इन सब से आकाशमण्डल सज उठा था, और उस सजे हुए आकाश को देखकर सती के भीतर अपने मायके की वह देहरी काँप उठी जिस पर वे बचपन में दौड़ती थीं।

वे शिव के पास गईं और बहुत देर तक कुछ न बोल सकीं, फिर धीरे से बात रखी।

”स्वामी, सुना है, इस समय मेरे पिता के यहाँ बड़ा भारी यज्ञोत्सव हो रहा है। मेरी बहनें भी अपने-अपने पतियों के साथ वहाँ आएँगी। वहाँ माता-पिता की गोद, बहनों का स्नेह, मौसियों की पुकार, मेरा मन बहुत दिनों से इन्हें देखने को उत्सुक है। आप कहें तो हम भी चलें।”

शिव कुछ पल उन्हें देखते रहे, उस भोली लालसा को जो उनकी आँखों में थी।

”देवी, अपने सगे-संबंधियों के घर बिन बुलाए भी जाया जा सकता है, यह तो ठीक है। पर ऐसा तभी, जब उनकी दृष्टि देहाभिमान से उपजे मद और क्रोध के दोष से न भरी हो। आपके पिता हमसे जलते हैं, और जलते मन की दृष्टि टेढ़ी हो जाती है। बाणों से बिंध जाएँ तो घाव भर जाता है, देवी, पर अपनों के कुवचन मर्म में धँसकर दिन-रात सालते हैं। मेरा मन इसी से रुकता है।”

”पर वे मेरे पिता हैं।” सती की आवाज़ में बेटी की वह ज़िद थी जो किसी तर्क से नहीं टूटती। ”जिस गोद में पली, उसकी देहरी मुझे बुलाए या न बुलाए, मेरा मन उधर को छटपटाता है। मुझे जाने दीजिए।”

शिव कुछ पल चुप रहे, फिर मुस्कराए, पर उस मुस्कान में दूर तक देख लेनेवाली एक उदासी थी। ”जाइए तो।”

Painterly classical-Indian color illustration: Sati riding upon the great white bull Nandi, Shiva's vahana, setting out for her father's yajna; thousands of Shiva's ganas, parshadas and yakshas follow with white parasol, chamara fans, garlands, conch, drums and flute, and toys like a myna bird, ball, mirror and lotus; festive procession, white and gold, mountain sky.

शिव के सेवक तुरंत लग गए। उन्होंने सती को भगवान् के वाहन वृषभराज, नन्दी, पर सवार करा दिया। मैना पक्षी, गेंद, दर्पण और कमल जैसी खेल की सामग्री, श्वेत छत्र, चँवर और माला, दुन्दुभि, शंख और बाँसुरी, इन सब से सुसज्जित होकर शिव के हज़ारों सेवक, पार्षद और यक्ष बड़ी तेज़ी से निर्भयतापूर्वक उनके पीछे हो लिए। इतने बड़े लाव-लश्कर के साथ दक्ष की वह सुकुमारी बेटी अपने पिता के नगर की ओर चल पड़ीं।

यज्ञशाला में पहुँचते ही उन्हें हवा का रुख़ समझ आ गया। वहाँ वेद-ध्वनि करते हुए ब्राह्मणों में आपस में होड़ लगी थी कि सब में ऊँचे स्वर में कौन बोले। चारों ओर ब्रह्मर्षि और देवता विराजमान थे, और जहाँ-तहाँ मिट्टी, काठ, लोहे, सोने और चमड़े के पात्र रखे थे। हवन की गंध, घी की चटकती लपटें, मंत्रों की गूँज, और इन सबके बीच एक सन्नाटा जो केवल उनके लिए बिछा था।

Painterly classical-Indian color illustration: Sati arrived at the yajna hall; her mother and sisters rush to embrace her warmly, offering seats, jewels, garments and sweet gifts; but Sati stands withholding, refusing the honors, her face grave, while the rest of the assembly and her father turn their faces away from her; busy yajna pavilion, mixed warmth and coldness.

दक्ष के भय से सती की माता और बहनों को छोड़कर किसी ने उनका कुछ भी आदर-सत्कार न किया। माता और बहनों ने उन्हें देखा तो दौड़कर गले लगाया, प्रेम से गद्गद होकर आसन, गहने, कपड़े और मीठे उपहार आगे करने लगीं। पर सती ने वे सब आदर अनछुए लौटा दिए, क्योंकि माँ की उस गोद के पीछे सारी सभा और स्वयं उनके पिता का मुख फिरा हुआ था, और यज्ञ की किसी वेदी पर उनके स्वामी के नाम का एक भाग तक न था।

उन्होंने भीड़ में अपने पिता को खोजा। वही चेहरा, जिसकी उँगली थामकर वे चलना सीखी थीं। पास जाकर उन्होंने पुकारा, ”पिताजी।”

दक्ष ने मुँह फेर लिया। पर मुँह फेरना उन्हें भारी पड़ रहा था, क्योंकि बेटी सामने थी, और भीतर कहीं वह पिता भी जीवित था जो उसे गोद में खिलाता था। उसी पिता को दबाने के लिए उन्होंने आवाज़ और ऊँची कर ली, ताकि सब सुनें और उन्हें अपना निश्चय याद रहे।

”देखिए, मेरी यह भोली कन्या, उस श्मशानी की पत्नी, मेरे पवित्र यज्ञ में पाँव रख रही है। मैंने इच्छा न होते हुए भी भावी के वश इसको अपने अंग से उपजी कन्या दे दी थी, जैसे कोई शूद्र को वेद पढ़ा दे।”

उनका स्वर पूरे प्रांगण में गूँज गया, और गूँजते-गूँजते वे किसी और से नहीं, स्वयं अपने भीतर के उस पिता से लड़ रहे थे जो टूटना चाहता था। ”एक भस्म-लपेटे, हड्डियाँ-पहने संन्यासी से ब्याह कराकर इसने मेरे इस ऊँचे कुल को संसार की हँसी का पात्र बना दिया। और इसका वही पति भरी सभा में मेरा आदर तक न कर सका। अब लौट जाइए। मेरे यज्ञ में आपके लिए कोई आसन नहीं।”

सती एक पल को थम गईं। पिता का चेहरा देखती रहीं, वही चेहरा जो अब आधा क्रोध में था और आधा कहीं छिपा हुआ। उनकी छाती के भीतर साँस एक बार ऊपर चढ़ी और बहुत धीरे नीचे उतरी। आँखें भर आईं, पर उन्होंने पलकें बाँध लीं, एक बूँद भी गिरने न दी। यह आँसू पिता के लिए होता, और जिस पिता ने उनके स्वामी को अमंगल कहा हो, उसके लिए वे रोना नहीं चाहती थीं।

जब वे बोलीं, उनका स्वर काँप नहीं रहा था, पर वह इतना धीमा था कि सबको चुप होकर सुनना पड़ा।

”पिताजी, भगवान् शंकर से बड़ा संसार में कोई नहीं। वे सबके आत्मा हैं, सबके प्रिय। उनका न कोई वैरी है, न मित्र। आप-जैसे लोग दूसरों के गुणों में भी दोष ढूँढ लेते हैं, पर ‘शिव’ यह दो अक्षरों का नाम जिनका, एक बार भी मुख से निकल जाए तो मनुष्य के सब पाप उसी क्षण भस्म हो जाते हैं।”

उनका हाथ अनजाने अपनी ही छाती पर जा टिका, जैसे वहाँ कुछ टूट रहा हो जिसे वे थामना चाहती हों। ”आपने उन्हें अमंगल कहा। आपके इन शब्दों की चोट मेरे स्वामी पर पड़ी है, और यह देह उन्हीं का है, उन्हीं का आधा अंग है। जिस देह को आपके रक्त से पाया, उसी देह में अब रहना मुझे लज्जा देता है। जब-जब भगवान् शंकर हँसी में मुझे ‘दाक्षायणी’, दक्ष की बेटी, कहकर पुकारेंगे, उस हँसी को भूलकर मुझे यह नाता याद आएगा और मेरा मन गड़ जाएगा। इसलिए उसके पहले ही मैं आपके अंग से उपजे इस शव-तुल्य शरीर को त्याग दूँगी।”

यह कहकर वे शत्रुओं की उस सभा से मुँह मोड़कर उत्तर दिशा की ओर मुँह करके धरती पर बैठ गईं। प्रांगण की वह सारी होड़, मंत्रों का वह सारा ऊँचा स्वर, अब उनके लिए जैसे किसी दूर की बात हो गया। उन्होंने जल का स्पर्श कर आचमन किया। फिर अपना पीला वस्त्र देह पर समेटकर ओढ़ लिया, और आँखें मूँद लीं।

अब बाहर का कुछ न बचा। भीतर ही भीतर उन्होंने आसन को स्थिर किया, और प्राण तथा अपान, वे दोनों वायु जो साँस को आते-जाते रखती हैं, उन्हें एक कर दिया। फिर उदान वायु को नाभिचक्र से ऊपर उठाकर धीरे-धीरे बुद्धि के साथ हृदय में स्थापित किया। हृदय में, जहाँ उनके स्वामी के चरण-कमल बसे थे, वह वायु एक पल ठहरी। फिर उसे कंठ-मार्ग से चढ़ाया, और दोनों भौंहों के ठीक बीच ले जाकर वहीं उसे थाम लिया।

इस सारे समय उनका ध्यान कहीं और न था। वे अपने जगद्गुरु शिव के उन्हीं चरण-कमलों को निहारती रहीं, और निहारते-निहारते उन्हें भूल गया कि वे दक्ष की बेटी हैं, भूल गया कि कोई सभा है, कोई पिता है, कोई अपमान है। ‘मैं दक्ष की कन्या हूँ’, यह अभिमान भी उस ध्यान में पिघल गया, और वे सर्वथा निर्दोष हो गईं।

Painterly classical-Indian color illustration: Sati seated firmly on the ground facing north, draped in her yellow garment, eyes closed in deep yogic samadhi; the fire of her own meditation rising from within her body and engulfing her in flames on every side; her face utterly serene and peaceful; stunned onlookers in the background; ethereal gold and orange inner fire.

तभी, उनके अपने ही भीतर से, समाधि की वह अग्नि जग उठी जिसे कोई बाहरी चिनगारी नहीं छूती। पहले देह के भीतर एक गरमाहट दौड़ी, फिर वह गरमाहट लपट बनी। उनका शरीर एक पल को बिलकुल निश्चल हुआ, स्थिर, और उसी क्षण भीतर से उठी समाधि की आग ने उसे चारों ओर से घेर लिया।

दक्ष देखते रह गए। देवता देखते रह गए। ब्राह्मणों के ऊँचे स्वर बीच मंत्र में ही कट गए, और घी की चटक भर रह गई।

सती का देह जल रहा था, पर उनका मुख उसी शांति में डूबा था जो शिव के नाम में लीन मन को मिलती है। होंठ ज़रा भी न काँपे। माथे पर, जहाँ अभी उनकी प्राण-वायु ठहरी थी, एक सलवट तक न उभरी। थोड़ी देर में जो रह गया, वह राख का एक ढेर भर था।

उस पूरे प्रांगण में ऐसी ख़ामोशी छा गई कि किसी की साँस की आवाज़ भी पड़ोसी को सुनाई देने लगी। फिर वह ख़ामोशी टूटी। आकाश और पृथ्वी, दोनों ओर एक भयंकर कोलाहल फैल गया, और हर ओर से बस यही सुनाई देता रहा, ”हाय! दक्ष के दुर्वचनों से कुपित होकर देवाधिदेव महादेव की प्रिया सती ने प्राण त्याग दिए।”

उसी क्षण सती के वे हज़ारों पार्षद, जो उन्हें राख होते देख रहे थे, अस्त्र-शस्त्र उठाकर दक्ष को मारने के लिए उठ खड़े हुए। तब भृगु ऋषि ने यज्ञ में विघ्न डालनेवालों के नाश के लिए ‘अपहतं रक्षः’ आदि मंत्र पढ़ते हुए दक्षिणाग्नि में आहुति दी, और उसी आहुति से ‘ऋभु’ नाम के हज़ारों तेजस्वी देवता प्रकट हो गए, जिन्होंने अपनी तपस्या के बल से चन्द्रलोक पाया था। ब्रह्मतेज से भरे उन देवताओं ने जलती लकड़ियाँ उठाकर आक्रमण किया, तो शिव के सारे गुह्यक और प्रमथगण इधर-उधर भाग खड़े हुए।

पर यह दक्ष का यज्ञ अभी पूरा हुआ नहीं था। ख़बर कैलास तक पहुँची। नारद का स्वर अभी पूरा भी न हुआ था कि शिव का देह काँप उठा, उसी देह की जिसकी निश्चलता को दक्ष अपना अपमान समझ बैठे थे।

Painterly classical-Indian color illustration: wrathful Shiva on Mount Kailasa, terrible anger on his face, tearing a single lock from his matted hair and dashing it to the ground with full force; from that lock the colossal sky-touching figure of Virabhadra, eyes blazing with fire, begins to emerge; stormy dramatic sky, lightning, blue and fiery tones.

उनके मुख पर वह क्रोध उतरा जिसके सामने तीनों लोक थरथराते हैं। उन्होंने अपनी जटा से एक लट खींची और पूरे बल से धरती पर दे मारी।

उस लट से एक विकराल आकृति प्रकट हुई, आकाश को छूती, आँखों में आग। वीरभद्र।

वीरभद्र अपने भयानक गणों की सेना लेकर दक्ष के यज्ञ पर टूट पड़ा। वेदियाँ उलट गईं, हवन-कुण्ड बिखर गए, मंडप ढह गए। थोड़ी देर पहले जहाँ ब्राह्मण ऊँचे स्वर की होड़ लगा रहे थे, वहाँ अब केवल चीख और भगदड़ थी।

देवता प्राण लेकर भागे, ऋषि वेदियों के पीछे जा छिपे।

और दक्ष? जिस सिर को इतना ऊँचा करके उन्होंने अपनी बेटी को और उसके स्वामी को धिक्कारा था, वीरभद्र ने वही सिर धड़ से अलग कर दिया।

Painterly classical-Indian color illustration: revived Daksha, now bearing a goat's head upon his body, kneeling with bowed head and folded hands in humble praise of Shiva; Brahma and the gods stand by, the pacified Shiva nearby; the rebuilt yajna fire burning with Sri Hari as the worshipped deity; restored calm hall, warm gold and serene blue palette.

बाद में ब्रह्मा बीच में आए और देवताओं को लेकर शिव के पास गए, उन्हें मनाया। शिव का क्रोध शांत हुआ। दक्ष के कटे धड़ पर एक बकरे का सिर जोड़ दिया गया, ठीक वैसा ही जैसा नन्दीश्वर ने उस भरी सभा में शाप दिया था, और वे फिर जीवित हो उठे। जब उनकी आँख खुली और उन्होंने पहली बार उस मुख से शिव की ओर देखा जो अब बकरे का था, तो उनके स्वर की वह सारी अकड़ कहीं नहीं बची थी। वही दक्ष, जो झुके हुए सिर गिनते थे, अब स्वयं सिर झुकाए शिव की स्तुति कर रहे थे। यज्ञ दोबारा पूरा हुआ, और उसमें उपास्यदेव श्रीहरि ही थे।

शिव सती की राख की ओर बहुत देर देखते रहे, फिर हिमालय की ओर लौट गए।

आगे चलकर वही सती हिमालय के घर जन्मीं, और एक बार फिर उसी शिव की संगिनी बनीं।

मन्थन

परीक्षित् देर तक कुछ न बोल सके।

फिर उन्होंने धीरे से पूछा, ”भगवन्, सती लौट सकती थीं। चुपचाप उठकर कैलास जा सकती थीं। उन्होंने वही देह क्यों चुना, जो उन्हें अत्यन्त प्यारा था?”

शुकदेव कुछ देर मौन रहे, जैसे उत्तर को जल्दी न देना चाहते हों। ”राजन्, दक्ष के पास विद्या थी, तप था, धन था, ऊँचा कुल था। ये सब सत्पुरुषों के गुण हैं। पर इन्हीं में अभिमान आ बैठे तो ये अवगुण हो जाते हैं, और तब आँख दोष-ही-दोष देखती है। दक्ष को हर ओर अपना घटता मान दिखता रहा, यहाँ तक कि उस मौन में भी, जिसके आगे सारी सृष्टि नमती थी।”

”और सती?” शुकदेव की वाणी धीमी हुई। ”जिस मन में किसी का नाम इतना गहरा बैठ जाए कि वह नाम ही उसके देह से बड़ा हो जाए, वह मन उस देह को ढोना नहीं चाहता जिसका रक्त उस नाम की निंदा सुनकर भी बहता रहा हो। सती ने अपने देह को दंड नहीं दिया, राजन्। उन्होंने उसे लौटा दिया, उसी को जिसने वह दी थी, जैसे कोई उधार चुका देता है।”

परीक्षित् की साँस एक पल को रुकी। ”और वह आग, मुनिवर? बाहर की किसी चिता की नहीं थी।”

”नहीं,” शुकदेव बोले। ”वह आग किसी अरणि से, किसी चकमक से नहीं जली। वह उनके अपने ध्यान से जगी, उस ध्यान से जिसमें वे अपने स्वामी के चरण निहारते-निहारते स्वयं को भूल गई थीं। जिस प्रेम की जड़ इतनी नीचे तक उतर गई हो, उसे राख कर देना किसी के बस में नहीं। दक्ष ने सोचा था कि उन्होंने अपनी बेटी को यज्ञ से बाहर कर दिया। पर हिमालय की उस गोद में, जहाँ वे फिर जन्मीं, उस बेटी ने पिता को छोड़ा था, उस नाम को नहीं।”

परीक्षित् कुछ देर मौन रहे। उनके पास का एक दिन और बीत चुका था।

साहित्यिक-संदर्भ

दक्ष-यज्ञ-विध्वंस और सती के देह-त्याग की कथा श्रीमद्भागवत के चतुर्थ स्कन्ध, अध्याय 2 से 7 तक वर्णित है। गीता प्रेस के पाठ में नन्दीश्वर के शाप के उत्तर में भृगु ऋषि शिव-भक्तों को पाखंडी होने का प्रति-शाप देते हैं; सती भगवान् के वाहन वृषभराज पर सवार होकर, हज़ारों पार्षदों और यक्षों के साथ छत्र-चँवर-शंख आदि सहित पिता के यज्ञ में जाती हैं; और वहाँ अपनी ही योग-समाधि की अग्नि से देह का त्याग करती हैं। वीरभद्र की उत्पत्ति तथा दक्ष को बकरे का सिर लगाया जाना उसी क्रम में आता है।

आगे की शाक्त-परम्परा में इसी कथा से सती के अंगों के गिरने वाली शक्ति-पीठों की कथा-श्रृंखला विकसित हुई, पर वह विस्तार भागवत का नहीं, परवर्ती पुराणों का है।

साथ ले जाने को

यज्ञ की राख ठंडी हो गई। पर हिमालय की एक गोद में, बहुत दूर, एक बच्ची के मुख से किसी दिन फिर वही दो अक्षर निकलेंगे, जिन्हें उसने किसी से सीखा न होगा।