दक्ष और सती
दक्ष ब्रह्मा के बेटों में से एक थे। प्रजापति। बहुत बड़े यज्ञ-कर्ता।
उनकी एक बेटी थी, सती। बहुत सुन्दर, बहुत devoted।
सती को बचपन से शिव से प्रेम था। उन्होंने तपस्या की। शिव से विवाह माँगा।
शिव मान गए। दोनों का विवाह हुआ।
मगर दक्ष को यह नहीं पसंद आया।
क्यों? कई कारण।
एक, शिव कैलाश पर रहते थे। एक श्मशान-तपस्वी। बाल खुले। शरीर पर भस्म। सर्प गले में।
दक्ष को लगता था, उनकी बेटी एक राजकुमारी जैसी थी। और शिव एक भिखारी जैसा।
दूसरा कारण, एक बार दक्ष एक बड़ी सभा में आए। सब देवों ने उठकर उनका सत्कार किया। शिव बैठे रहे।
शिव ने जान-बूझकर नहीं किया। बस उनका attention कहीं और था। पर दक्ष ने इसे personal insult माना।
उन्होंने सोचा, ”मेरा दामाद मुझे insult करता है। ठीक है, मैं देखता हूँ।”
दक्ष ने एक बड़ा यज्ञ planned किया। बहुत बड़ा। सब देव बुलाए गए। सब ऋषि।
बस दो लोगों को नहीं बुलाया। शिव। और इसलिए सती को भी नहीं।
सती को पता चला।
उन्हें बहुत बुरा लगा। ”मेरे पिता मेरे पति को नहीं बुला रहे? और मुझे भी नहीं?”
उन्होंने शिव से बात की।
”स्वामी, मैं अपने पिता के यज्ञ में जाना चाहती हूँ।”
शिव ने रोका।
”सती, मत जा। तेरे पिता ने हमें invite नहीं किया। बिना invitation के जाना मान-हानि है।”
”पर वो मेरे पिता हैं। मैं उनके यहाँ बिना invitation के भी जा सकती हूँ। यह मेरा अधिकार है।”
”ठीक है, जा। पर बात बढ़ेगी।”
सती निकलीं। एक रथ में।
जब वो दक्ष के यज्ञ-स्थल पहुँचीं, तब वो वहाँ का माहौल देखकर समझ गईं।
उनका कोई स्वागत नहीं। उनकी बहनें भी मुँह छुपा रही थीं।
उन्होंने अपने पिता को देखा। ”पिताजी।”
दक्ष ने मुँह फेर लिया।
”क्या? आज मेरी बेटी, उस संन्यासी की पत्नी, आई है। मेरे यज्ञ में।”
उनकी आवाज़ ज़ोर से। ताकि सब सुनें।
”तू ने मेरा नाम मिटा दिया। एक श्मशानी से विवाह करके। और तेरे पति ने मुझे sabhā में अपमान किया।”
”अब तू यहाँ से जा। मेरे यज्ञ में तेरी जगह नहीं।”
सती ने एक पल को रुककर पिता को देखा।
उनकी आँखें भर आईं। पर वो रोई नहीं।
उन्होंने अपने पिता से जो कहा, वो भागवतम् में बहुत powerful है।
”पिताजी, आप ने मेरा अपमान नहीं किया। आप ने मेरे पति का किया। और जो पत्नी अपने पति के अपमान को बर्दाश्त करती है, वो पत्नी नहीं।”
”अब मेरे पास दो रास्ते हैं। एक, यहाँ से वापस लौटूँ। मगर इस अपमान के साथ लौटना मुश्किल है।”
”दूसरा, यह शरीर त्याग दूँ। जो शरीर आप ने मुझे दिया, वही अपराधी है।”
स्वामीप्रसादैन्यं न शक्यते सोढुम् ॥
मैं इस शरीर को त्यागती हूँ, जो योग-अग्नि से जल रहा है। मेरे स्वामी के अपमान को मैं सह नहीं सकती।
और सती ने तीसरा काम नहीं चुना।
वो यज्ञ-कुण्ड के पास गईं। उसमें आग थी। बड़ी।
उन्होंने आँखें मूँदीं। अपने भीतर के योग-अग्नि को जगाया। (यह योग की एक तकनीक है, जिसमें साधक अपनी ख़ुद की शरीर-अग्नि से ख़ुद को जला सकता है।)
और उन्होंने ख़ुद को जला लिया।
दक्ष देख रहे थे। सब देव देख रहे थे।
सती की देह जल रही थी। पर एक dignity के साथ।
थोड़ी देर में, वो ख़त्म।
एक sannāṭā।
ख़बर तुरंत शिव तक पहुँची।
शिव क्रोध में।
उन्होंने अपने सिर के एक बाल को उठाया। ज़मीन पर पटका।
उससे एक भयानक रूप निकला। वीरभद्र।
वीरभद्र अपनी सेना के साथ दक्ष के यज्ञ पर पहुँचा। पूरे यज्ञ-स्थल को नष्ट किया।
देव भागे। ऋषि छुपे।
और दक्ष? वीरभद्र ने उनका सिर काटा।
बाद में, ब्रह्मा ने बीच में आकर शान्ति लाई। दक्ष को एक बकरी का सिर दिया। यज्ञ फिर शुरू हुआ। पर अब दक्ष विनम्र थे।
शिव ने सती की राख इकट्ठी की। उसे हिमालय ले गए।
और सती अगले जन्म में पार्वती बनीं। फिर से शिव की पत्नी।
यह एक loop है। एक प्रेम जो जन्म-जन्म चलता है।
दक्ष-सती की कथा भागवतम् के सबसे तीखे moments में से है।
एक पिता ने अपनी बेटी को इतना hurt किया कि उसने अपनी जान दे दी।
और इस कथा में कोई clean villain नहीं है। दक्ष ख़राब थे, मगर उनके अपने कारण थे। उन्हें लग रहा था उनकी respect कम हुई है।
सती सही थीं, पर वो भी कुछ choice थीं। शायद वो वापस लौट सकती थीं।
शिव ने भी, बाद में, अपना ग़ुस्सा दिखाया। वीरभद्र, पूरे यज्ञ का विनाश।
कोई एक side नहीं।
यह कथा हमें कुछ बताती है। बार-बार छोटे-छोटे अहंकार बड़े disasters में बदलते हैं।
दक्ष का अहंकार उन्हें खा गया। फिर उन्होंने अपनी बेटी खोई।
शिव का अहंकार (बैठे रहना) उसके पीछे था।
अहंकार बहुत महंगा होता है। और ज़्यादातर बार वो हमारी ख़ुद की चीज़ें मार देता है।
और एक बात। सती ने मरकर भी प्रेम नहीं छोड़ा। अगले जन्म में पार्वती बनकर वापस आईं। यह भागवतम् कह रहा है, सच्चा प्रेम ख़त्म नहीं होता। बस रूप बदलता है।