अन्धकासुर

मन्दराचल की पूर्व दिशा में महादेव विराजमान थे। विहार की इच्छा से वे अपने गणों के साथ कैलास से चलकर काशीपुरी आए थे, उस पुरी को अपनी राजधानी बनाया था और भैरव नामक वीर को उसका रक्षक नियुक्त किया था; वहाँ पार्वती के साथ रहते हुए उन्होंने भक्तों को सुख देने वाली अनेक लीलाएँ रचीं, फिर वे गणेश्वरों और पार्वती के संग मन्दराचल पर आकर तरह-तरह की क्रीड़ाएँ करने लगे थे। उसी क्रीड़ा के बीच एक दिन, हँसी-दिल्लगी में, गिरिजा ने पीछे से आकर मूँगे, सुवर्ण और कमल की शोभा वाले अपने दोनों करकमलों से शंकर के नेत्र मूँद लिए।

उन हथेलियों के स्पर्श से जो हुआ, वह किसी ने न सोचा था। नेत्रों के बंद होते ही तीनों लोकों में क्षणभर के लिए घोर अंधकार फैल गया। पार्वती के हाथों का स्पर्श पाकर महेश्वर के ललाट की अग्नि से पसीना फूट पड़ा और जल की बहुत-सी बूँदें टपकने लगीं। उन्हीं बूँदों ने एक गर्भ का रूप धारण किया, और उससे एक ऐसा जीव प्रकट हुआ जिसका मुख विकट था। वह अत्यन्त भयंकर, कोपी, जटाधारी, काले रंग का, मनुष्य से भिन्न और बेडौल था। उसके कण्ठ से घोर घर-घर शब्द निकल रहा था; वह कभी गाता, कभी हँसता, कभी रोने लगता और अपने जबड़ों को चाटते हुए नाचता था।

उस अद्भुत दृश्य को देखकर शिव मुसकराए और पार्वती से बोले, “प्रिये, मेरे नेत्रों को मूँदकर यह कर्म तो आपने ही किया है; फिर आप इससे भय क्यों करती हैं?” यह सुनकर गौरी हँस पड़ीं और उन्होंने अपने हाथ हटा लिए। फिर तो वहाँ प्रकाश छा गया, परन्तु उस प्राणी का रूप भयंकर ही बना रहा, और अंधकार से उत्पन्न होने के कारण उसके नेत्र भी अंधे थे। वैसे विचित्र प्राणी को देखकर गौरी ने कौतूहल से पूछा कि यह बेडौल जीव कौन है और किसका पुत्र है।

हिरण्याक्ष का पुत्र

शिव ने मुसकराते हुए गौरी को इसका मर्म सुनाया। उन्हीं दिनों कश्यपनन्दन हिरण्याक्ष, जिसे संतान के लिए तपस्या की प्रेरणा स्वयं शिव ने दी थी, पुत्र की कामना से घोर तप कर रहा था; महेश्वर के दर्शन की लालसा में वह क्रोध आदि दोषों को वश में करके ठूँठ की भाँति निश्चल होकर समाधि में बैठा था। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर पिनाकधारी महेश वहाँ पधारे और बोले, “दैत्यनाथ, अपना मनोरथ कहिए; मैं वरदाता शंकर हूँ, आपकी जो अभिलाषा हो, वह प्रदान करूँगा।” हिरण्याक्ष ने चरणों में नमस्कार करके देवकुल के योग्य एक उत्तम पुत्र की याचना की, और शिव ने अंधकार से जन्मे उसी विकट जीव को उसे पुत्र-रूप में सौंप दिया। दैत्य परम प्रसन्न हुआ, रुद्र की पूजा-प्रदक्षिणा करके उस शिशु को लेकर अपने राज्य लौट गया।

कालान्तर में वही प्रचण्ड पराक्रमी हिरण्याक्ष समस्त देवताओं को जीतकर पृथ्वी को रसातल में उठा ले गया; तब देवताओं और मुनियों की आराधना पर विष्णु ने विकराल वराह-रूप धारण किया, पाताल में घुसकर दाढ़ों और थूथुन से दैत्य-सेना को मथ डाला और करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान सुदर्शन चक्र से हिरण्याक्ष का प्रज्वलित सिर काट लिया। हिरण्याक्ष के मारे जाने पर देवराज इन्द्र ने उसी अंधे बालक अन्धक को असुर-राज्य के सिंहासन पर अभिषिक्त कर दिया।

वरदान और अंधे गर्व

एक दिन अन्धक अपने भाइयों के साथ विहार में मग्न था। उसके काम में डूबे मदान्ध भाइयों ने उसे ताना मारा, “अरे अंधे! अब इस राज्य से आपका क्या नाता? हिरण्याक्ष भी मूर्ख निकला, जिसने इतना घोर तप करके शंकर को प्रसन्न किया और बदले में आप जैसा कुरूप, बेडौल और नेत्रहीन पुत्र पा लिया। भला, सोचिए तो, कहीं दूसरे से उत्पन्न हुआ पुत्र भी राज्य पाता है? सच पूछिए तो इस राज्य के भागी हमीं लोग हैं।”

यह सुनकर अन्धक दीन हो गया। वह रात के समय किसी निर्जन वन में चला गया और वहाँ हजारों वर्षों तक ऐसा घोर तप किया कि अपने शरीर को सुखा डाला। अन्त में जब वह उस शरीर को अग्नि में होम देना चाहता था, तब ब्रह्माजी ने उसे रोककर कहा, “दानव, ठहरिए। वर माँग लीजिए। संसार में जो दुर्लभ से दुर्लभ वस्तु आपको अभीष्ट हो, वह मुझसे ले लीजिए।”

अन्धक ने दीनता और नम्रता से कहा, “भगवन्, जिन निष्ठुरों ने मेरा राज्य छीना, वे सब मेरे सेवक हो जाएँ; मुझ अंधे को दिव्य दृष्टि मिले; इन्द्र आदि देवता मुझे कर दिया करें; और देवता, दैत्य, गंधर्व, यक्ष, नाग, मनुष्य, दैत्यों के शत्रु नारायण, सर्वमय शंकर तथा किसी भी अन्य प्राणी के हाथों मेरी मृत्यु कभी न हो।” ब्रह्माजी बोले, “दैत्येन्द्र, यह सब तो हो जाएगा, किन्तु अपने विनाश का कोई एक कारण आपको स्वीकार करना ही पड़ेगा।”

अन्धक ने कुछ सोचकर कहा, “प्रभो, तीनों कालों में जो उत्तम, मध्यम और नीच नारियाँ होती हैं, उन्हीं में कोई एक मेरी जननी भी होगी। वह मनुष्यलोक के लिए अजेय है, शरीर, मन और वचन से भी अगम्य। उसी माता के प्रति जिस दिन मेरे मन में काम-भावना जाग उठे, उसी दिन मेरी मृत्यु हो।” ऐसा विचित्र वरदान सुनकर स्वयम्भू ब्रह्माजी को बड़ा आश्चर्य हुआ; वे शंकरजी के चरणकमलों का स्मरण करने लगे, और शम्भु की आज्ञा पाकर उन्होंने वह वर दे दिया।

फिर अन्धक ने हाथ जोड़कर निवेदन किया कि विभो, जब इस शरीर में हड्डियाँ मात्र शेष रह गई हैं, तब इस देह से युद्ध कैसे होगा; आप अपने पवित्र हाथ से इसका स्पर्श कर दीजिए। ब्रह्माजी ने अपने हाथ से उसके शरीर का स्पर्श किया; वह सूखा शरीर भर-पूरा हो उठा, उसमें बल का संचार हुआ, नेत्र मिल गए और वह सुन्दर दीखने लगा। प्रह्लाद आदि श्रेष्ठ दानवों ने उसे वर पाकर लौटा जानकर सारा राज्य सौंप दिया और उसके सेवक हो गए। तब अन्धक अपनी सेना लेकर स्वर्ग पर चढ़ आया, संग्राम में समस्त देवताओं को पराजित करके वज्रधारी इन्द्र को अपना करद बना लिया, और नाग, सुपर्ण, राक्षस, गंधर्व, मनुष्य, बड़े-बड़े पर्वत, वृक्ष और सिंह आदि चौपायों तक को जीतकर चराचर त्रिलोकी अपने वश में कर ली। गर्व से उसकी बुद्धि ऐसी अंधी हो गई कि अब नेत्र तो मिल गए थे, पर देखना भूल गया था। न वेद का आदर, न देवता का, न ब्राह्मण का, न गुरु का; रसातल, भूतल और स्वर्ग की हजारों सुन्दरियों को साथ लेकर पर्वतों और नदियों के रमणीय तटों पर विहार करता हुआ वह स्वेच्छाचार में डूब गया, और यह भी न सोचा कि परलोक के लिए भी कुछ करना चाहिए।

पार्वती के द्वार पर

एक दिन उसके मंत्रियों ने मन्दराचल से लौटकर एक दृश्य का वर्णन किया, एक महान तपस्वी का, जिसका गौर शरीर भस्म से लिपा था, जिसकी चार भुजाएँ और लंबी जटाएँ थीं, जो त्रिशूल, खट्वांग और लकुट धारण किए था; पास ही एक बैल बैठा था, और एक विकराल वानर-सा भयंकर वीर सब आयुध लिए उस तपस्वी की रक्षा में तत्पर था। उस तपस्वी के पास एक ऐसी सुलक्षणा नारी थी, जिसका रूप इतना मनोहर था कि जो उसे एक बार देख ले, वह फिर अपने नेत्र न हटा सके।

उस नारी की चर्चा सुनते ही वह कामान्ध राक्षस मोहित हो गया। उसे यह न सूझा, या उस वरदान ने ही उसे स्मरण न होने दिया, कि वह तो तीनों लोकों की जननी हैं, वही गौरी, जिनकी लीला से कभी वह स्वयं जन्मा था। विशाल सेना लेकर वह मन्दराचल पर जा चढ़ा और नन्दीश्वर से जा भिड़ा। बड़ा भयानक युद्ध हुआ; रणभूमि में चर्बी, मज्जा और रक्त की कीच मच गई, सिर कटे धड़ नाचने लगे और मांसभक्षी जीव मँडराने लगे। थोड़ी ही देर में दैत्य भाग खड़े हुए।

तब पिनाकधारी शिव ने पार्वती को धीरज बँधाते हुए कहा, “प्रिये, पहले मैंने जो पाशुपत-व्रत आरंभ किया था, उसमें यह विघ्न आ पड़ा है। अमर प्राणियों पर यह आक्रमण मानो पुण्य का नाश करने वाला कोई ग्रह है। मैं फिर किसी निर्जन वन में जाकर उस कठिन व्रत की दीक्षा लूँगा; आपका शोक और भय दूर हो जाए।” इतना कहकर वे अपना शृंग बजाकर एक भयंकर वन में चले गए और एक हजार वर्षों के लिए उस व्रत में लीन हो गए, जिसका निबाहना देवों और असुरों की शक्ति के बाहर है।

इधर पार्वती मन्दराचल पर ही शिव के लौटने की प्रतीक्षा करती रहीं; वीरगण रक्षा में तत्पर थे, फिर भी गुफा में अकेली रहने के कारण वे भयभीत रहतीं। इसी बीच काम के बाणों से फिर उन्मत्त हुआ अन्धक अपने प्रधान वीरों को लेकर लौट आया। पाँच दिन और रात युद्ध चलता रहा। अन्त में दैत्यों के छूटे हुए आयुधों के प्रहार से नन्दीश्वर का शरीर चूर हो गया; वे गुफा के द्वार पर ही गिरकर मूर्च्छित हो गए, और उनके गिरने से सारा द्वार ऐसा ढक गया कि उसका खुलना असम्भव हो गया। जब दैत्यों ने समस्त वीरगण को अपने अस्त्रों से ढक दिया, तब पार्वती ने विष्णु और ब्रह्मा का स्मरण किया।

स्मरण करते ही ब्राह्मी, नारायणी, ऐन्द्री, वैश्वानरी, याम्या, नैर्ऋति, वारुणी, वायवी, कौबेरी और गौरी आदि देवियों के रूप में समस्त देवता, यक्ष, सिद्ध और गुह्यक, अपने-अपने वाहनों पर सवार, शस्त्रास्त्रों से सज्जित होकर पार्वती के पास आ पहुँचे और राक्षसों से भिड़ गए। कुछ समय बाद भगवान शिव भी लौट आए और युद्ध फिर छिड़ गया। जब शुक्राचार्य संजीवनी विद्या से मरे हुए दैत्यों को जिला रहे थे, तब भूतनाथ ने उन्हें ही निगल लिया, जिससे दैत्य ढीले पड़ गए।

त्रिशूल पर

अन्धक का शरीर अस्त्रों की चोटों से जर्जर हो चुका था, फिर भी उसने दूसरी माया रचकर प्रलयकाल की अग्नि के समान एक शरीर धारण कर लिया। भूतनाथ त्रिपुरारि शंकर ने उसे त्रिशूल से बेध डाला। परन्तु उसके रक्त की जो बूँद भूमि पर गिरती, उससे वैसा ही एक और अन्धक प्रकट हो जाता, और थोड़ी ही देर में विकराल मुख वाले असंख्य अन्धक सारी रणभूमि में फैल गए। तब शिव की प्रेरणा से विष्णु ने एक अत्यन्त विकराल, कंकालमात्र स्त्री-रूप धारण किया; रणभूमि में उन देवी के चरण पड़ते ही सब देवता उनकी स्तुति करने लगे; फिर भगवान की प्रेरणा पाकर वे क्षुधार्त हो उन सैनिकों और दैत्यराज के शरीर से निकलते गरम रक्त का पान करने लगीं। इससे राक्षसों का उत्पन्न होना बंद हो गया और एकमात्र अन्धक ही शेष रह गया।

यद्यपि उसके शरीर का रक्त सूख गया था, तथापि अपने कुल के सनातन क्षात्र-धर्म का स्मरण करके वह थप्पड़ों, वज्र-सदृश मुक्कों, चरणों और वज्राकार नखों से भगवान शंकर के साथ जूझता ही रहा। तब प्रमथनाथ शिव ने रणभूमि में उसका हृदय विदीर्ण करके उसे शान्त कर दिया और त्रिशूल में पिरोकर स्थाणु के समान ऊपर उठा लिया। उसका जर्जर शरीर नीचे को लटक रहा था; सूर्य की किरणों ने उसे झुलसा दिया, मेघों ने मूसलाधार जल बरसाकर उसे भिगो दिया, हिमखण्ड-सी शीतल चन्द्रमा की किरणों ने उसे चीर दिया। फिर भी उस दैत्य ने प्राण नहीं छोड़े; वह गहरे भाव से शिव की स्तुति करने लगा। करुणा के अगाध सागर शम्भु प्रसन्न हो गए और उन्होंने उस दैत्य को प्रेमपूर्वक गणाध्यक्ष का पद प्रदान कर दिया।

युद्ध समाप्त हुआ। लोकपालों ने विधिपूर्वक शिव की अर्चना की, ब्रह्मा और विष्णु आदि देवों ने सिर झुकाकर उत्तमोत्तम स्तुतियाँ कीं और सब जय-जयकार करते हुए आनन्द मनाने लगे। फिर शिव उन सबको साथ लेकर आनन्दपूर्वक गिरिराज की गुफा में लौट आए; वहाँ अपने ही अंशभूत पूजनीय देवताओं को नाना प्रकार की भेंट समर्पित करके उन्हें विदा किया और प्रमुदित गिरिजा के साथ फिर से उत्तम लीलाएँ करने लगे। जो हँसी-हँसी में मूँदे गए नेत्रों के अंधकार से जन्मा था, जन्म से अंधा और वरदान के गर्व से और भी अंधा, उसने अन्त में त्रिशूल की नोक पर वह दृष्टि पा ली, जो उसके पास कभी सचमुच थी ही नहीं।

आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), रुद्रसंहिता (युद्धखण्ड)