सीता

लंका की धरती पर चिता जल रही है। रावण मारा जा चुका है, युद्ध जीता जा चुका है, और जिस स्त्री के लिए समुद्र पर सेतु बँधा, वह अपने ही स्वामी के कठोर वचन सुनकर अग्नि की ओर बढ़ रही है। न कोई विलाप, न कोई प्रश्न। वाल्मीकि की रामायण में सीता उस क्षण अग्नि से केवल इतना कहती हैं, और साइट का युद्धकाण्ड वाला पन्ना उनके शब्द ज्यों के त्यों रखता है, “जैसे मेरा हृदय कभी श्रीराम से विमुख नहीं होता, वैसे ही लोक का साक्षी अग्नि सब ओर से मेरी रक्षा करे।” फिर प्रदक्षिणा, और प्रज्वलित अग्नि में निःशंक प्रवेश। राक्षस और वानर एक साथ हाहाकार कर उठते हैं। अग्नि उन्हें अनछुआ लौटा देता है, क्योंकि जो भीतर से जल चुका हो, उसे बाहर की आग क्या जलाए।

सीता की कथा मिथिला के उत्सव से शुरू होती है। वाल्मीकि की रामायण में वे जनक को हल चलाते हुए भूमि से मिली थीं, इसीलिए सीता, हल की रेखा। बालकाण्ड में जनक का वह विषाद भी दर्ज है कि यह कन्या वीर्य की शुल्का है, शिव का धनुष जो उठा दे, वही इसे वरे। धनुष टूटा, विवाह हुआ, और अयोध्या की बहू बनकर भी सीता जनक की ही बेटी रहीं, वह विदुषी, जिसके तर्क के आगे राम को भी झुकना पड़ता था। वनवास का आदेश आया तो राम ने उन्हें महल में रहने को समझाया, और सीता ने उत्तर में वह कहा जो अयोध्याकाण्ड का सबसे चमकता पन्ना है, जहाँ आप, वहाँ हम। आगे चलकर पंचवटी में स्वर्ण-मृग की ज़िद भी उन्हीं की थी, और वाल्मीकि इतने ईमानदार कवि हैं कि अपनी नायिका की यह चूक भी दर्ज करते हैं। सीता कोई निर्दोष प्रतिमा नहीं, जीती हुई स्त्री हैं, जो चाहती हैं, चूकती हैं, और फिर अपने चुनाव का पूरा मोल चुकाती हैं।

अशोक की छाँव में अडिग

हरण के बाद की सीता को वाल्मीकि सुन्दरकाण्ड में दिखाते हैं, अशोक वाटिका में, राक्षसियों के घेरे में, एक वर्ष से एक ही वस्त्र में, शोक से क्षीण। पर देखिए कि इस दुर्बलतम क्षण में वे क्या करती हैं। रावण साम्राज्य का प्रलोभन देता है तो वे तिनके की ओट करके उत्तर देती हैं, तिनका बीच में रखकर, कि रावण उनकी सीधी दृष्टि के योग्य भी नहीं। धमकियों के बीच वे टूटती हैं, मरने तक की सोचती हैं, और तभी शिंशपा की डाल से राम की कथा उतरती है। हनुमान मिलते हैं, मुद्रिका मिलती है, और हनुमान जब कहते हैं कि आइए, हमारी पीठ पर बैठिए, अभी समुद्र पार करा दें, तो सीता मना कर देती हैं। कारण उनका अपना है, यश राम का है, तो उद्धार भी राम के हाथों होगा, और हम किसी पराए पुरुष का स्पर्श स्वेच्छा से स्वीकार नहीं करेंगी। बन्दिनी वह थी जो लंका में थी, पर शर्तें अब भी सीता की चल रही थीं।

अग्नि-परीक्षा के बाद अयोध्या लौटीं, राज्याभिषेक हुआ, और लगा कि कथा सुख में ठहर गई। पर वाल्मीकि का उत्तरकाण्ड सबसे कठोर सत्य लेकर आता है। नगर में अपवाद उठा, और राम ने गर्भवती सीता को वाल्मीकि के आश्रम के पास छुड़वा दिया, वह भी बिना बताए, तीर्थ-दर्शन के बहाने। जिस स्त्री ने अग्नि से प्रमाण दिलवाया था, उसे फिर संदेह मिला। आश्रम में लव-कुश जन्मे, वहीं पले, और वहीं वह रामायण सीखी जो उनके ही माता-पिता की कथा थी। बरसों बाद अश्वमेध के मंच पर दोनों बालकों ने वह गान सुनाया, और तब राम ने सीता को बुलवाया, एक और शपथ के लिए।

और यहाँ सीता वह करती हैं जो पूरी रामायण में कोई नहीं कर सका, वे राम को मना कर देती हैं। शपथ वे लेती हैं, पर लौटने के लिए नहीं। साइट का उत्तरकाण्ड वाला पन्ना उनके अन्तिम शब्द सहेजे है, “जैसे मैंने मन से भी राघव के सिवा किसी अन्य का चिन्तन नहीं किया, वैसे ही देवी माधवी मुझे समाने को स्थान दें।” धरती फटती है, नागों के सिरों पर धरा दिव्य सिंहासन उठता है, और धरती-माता अपनी बेटी को भुजाओं में लेकर बिठा लेती हैं। पुष्प बरसते हैं, देवता साधु-साधु कहते हैं, और राम देखते रह जाते हैं। जो भूमि से आई थी, वह भूमि में लौट गई, अपनी शर्तों पर, अपने चुने हुए क्षण में।

उनकी राह

मिथिला और शिव-धनुष-भंग · जनक की यज्ञ-भूमि, टूटता धनुष, और वह विवाह जिस पर दो कुल नहीं, दो युग जुड़े।

वन-गमन · अयोध्या रोती रही, और सीता ने महलों के ऊपर वन का साथ चुन लिया।

स्वर्ण-मृग और सीता-हरण · एक चाह, एक भिक्षु-वेश में आया छल, और पंचवटी का सूना पड़ जाना।

अशोक-वाटिका और मुद्रिका · घेरे में बैठी अडिग सीता, और शिंशपा से उतरता भरोसे का पहला स्वर।

अग्नि-परीक्षा और अयोध्या-वापसी · लपटों के बीच से अनछुई लौटती सीता, और लंका से अयोध्या तक की उड़ान।

सीता-निर्वासन · राम-राज्य की छाया में सबसे अन्यायी निर्णय, और गंगा-पार छूटती रघुकुल-वधू।

वाल्मीकि-आश्रम और लव-कुश · कुटिया में पलते दो स्वर, जो एक दिन अपने ही पिता को उन्हीं की कथा सुनाएँगे।

सीता का धरती-प्रवेश · अन्तिम शपथ, खुलती धरती, और अपनी शर्तों पर विदा होती जनक-नन्दिनी।

जो झुकी नहीं

सीता को अक्सर सहनशीलता की मूर्ति कहकर छोटा कर दिया जाता है, पर वाल्मीकि की सीता को ध्यान से पढ़िए तो वे निर्णयों की एक शृंखला हैं। वन जाने का निर्णय उनका था, राम का नहीं। रावण को तिनके की ओट से तौलना उनका था। हनुमान की पीठ पर बैठकर सरल छुटकारा ठुकराना उनका था। और अन्त में धरती में समा जाना, वह भी उनका। हर बार उन्होंने वही चुना जो कठिन था पर उनके अपने माप का था। भय पर उनकी सीख यह है कि घेर लिए जाने और हार जाने में अन्तर होता है, लंका उन्हें बन्दी बना सकी, विवश नहीं। और मर्यादा पर उनकी सीख उससे भी गहरी है, प्रेम में सब कुछ सहा जा सकता है, पर बार बार प्रमाण माँगा जाए तो प्रेम का धर्म है कि वह उठकर विदा ले ले। सीता की अन्तिम मनाही कोई रूठना नहीं, एक पूर्ण विचारित उत्तर है, और रामायण उसे इतना सम्मान देती है कि धरती स्वयं उठकर उन्हें लेने आती है। जो अपनी सीमा जानता है, संसार देर-सबेर उसकी सीमा का मान रखता ही है।