हिमालय का वह शिखर, जहाँ बर्फ़ भी जैसे साँस रोककर बैठती है। वहाँ योगीश्वर शिव उत्तम तपस्या में लीन थे, और गिरिराजनन्दिनी पार्वती पिता की आज्ञा पाकर अपनी दो सखियों के साथ प्रतिदिन उनकी सेवा में आती थीं। तीनों लोकों की सबसे सुन्दरी कन्या रोज़ सामने खड़ी पूजा करती थी, और ध्यानमग्न महेश्वर उस ओर देखने का विचार तक मन में नहीं लाते थे। उधर स्वर्ग में हाहाकार था। तारकासुर की एक ही मृत्यु बतायी गयी थी, शिव के वीर्य से उत्पन्न बालक के हाथ से। पर जो स्वयं कामनाओं के पार बैठे हों, उनके घर पुत्र आये तो कैसे?
देवराज की गुहार
ब्रह्माजी नारद से कहते हैं, सुनिए। देवताओं के अपने-अपने स्थान को चले जाने पर तारक दैत्य से पीड़ित इन्द्र ने कामदेव का स्मरण किया। स्मरण करते ही मदन आ पहुँचा। इन्द्र ने कहा, “मित्र! काल के फेर से हम पर एक असाध्य दुःख आ पड़ा है, जिसे आपके बिना कोई दूर नहीं कर सकता। दानी की परीक्षा अकाल में होती है, शूरवीर की रणभूमि में, और मित्र की परीक्षा विपत्ति के दिन। सो आज आपकी परीक्षा हो जायेगी। और यह काम अकेले हमारा नहीं, समस्त देवताओं का है।”
कामदेव मुस्कुराया, फिर प्रेम भरी गम्भीर वाणी में बोला, “देवराज! आप यह कैसी बातें कह रहे हैं? उपकारी मित्र कहने की वस्तु नहीं, स्वयं देखने की वस्तु है। जो आपका इन्द्रासन छीनने के लिये दारुण तपस्या कर रहा हो, आपके उस शत्रु को हम तपस्या से सर्वथा भ्रष्ट कर देंगे। बुद्धिमान वही है जो जिस काम को जिससे बने, उसे उसी में लगाये। सो हमारे योग्य जो कार्य हो, वह सब हमारे ज़िम्मे कीजिये।”
इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए। बोले, “तात मनोभव! हमने जो कार्य ठाना है, उसे सिद्ध करने में केवल आप ही समर्थ हैं। तारक नाम का महान दैत्य ब्रह्माजी का अद्भुत वर पाकर अजेय हो गया है और सारे संसार को पीड़ा दे रहा है। देवताओं के सारे अस्त्र-शस्त्र उस पर निष्फल हो गये, वरुण का पाश टूट गया, श्रीविष्णु का सुदर्शन तक उसके कण्ठ पर कुण्ठित हो गया। ब्रह्माजी ने बताया है कि उसकी मृत्यु भगवान शम्भु के वीर्य से उत्पन्न बालक के हाथ से होगी। भगवान शम्भु गिरिराज हिमालय पर तपस्या में लगे हैं। वे हमारे भी प्रभु हैं, कामना के वश में नहीं, स्वतन्त्र परमेश्वर हैं। पार्वती अपनी दो सखियों समेत उनके समीप रहकर सेवा करती हैं, और उनका यह यत्न महादेवजी को पति रूप में पाने के लिये ही है। पर शिव अपने मन को संयम से वश में रखते हैं। मार! जैसे भी उनकी अत्यन्त रुचि पार्वती में जग जाये, आप वैसा ही यत्न कीजिये। यही करके आप कृतार्थ होंगे, हमारा सारा दुःख मिटेगा, और लोक में आपका स्थायी प्रताप फैल जायेगा।”
सुनते ही कामदेव का मुखारविन्द खिल उठा। “यह कार्य हम करेंगे, इसमें संशय नहीं।” ब्रह्माजी कहते हैं कि शिव की माया से मोहित हुए काम ने वह भार तुरन्त उठा लिया। जिसने बड़े-बड़ों को गिराया था, वह यह भी न देख सका कि इस बार निशाना किस पर है। अपनी पत्नी रति और साथी वसन्त को लेकर वह प्रसन्नता के साथ वहाँ जा पहुँचा, जहाँ योगीश्वर शिव तपस्या कर रहे थे।
तीसरे नेत्र की आग
वहाँ पहुँचकर काम ने भगवान शिव पर अपने बाण चलाये। और सुनिए, असर हुआ। शंकरजी के मन में पार्वती के प्रति आकर्षण होने लगा, उनका धैर्य छूटने लगा। लोक में यह कथा प्रायः यों चलती है कि महादेव पर बाण का असर ही नहीं हुआ, पर शिवपुराण साफ़ कहता है कि पहले महायोगी का धैर्य डिगा। अपने धैर्य का यह ह्रास देखकर वे स्वयं अत्यन्त विस्मित हो उठे और मन ही मन विचारने लगे, हम तो उत्तम तपस्या कर रहे थे, इसमें यह विकार आया कहाँ से? किस कुकर्मी ने हमारे चित्त में यह क्षोभ उत्पन्न कर दिया?
यों विचारकर महेश्वर दिशाओं की ओर देखने लगे। इतने में वाम भाग पर दृष्टि पड़ी, जहाँ बाण खींचे मदन खड़ा था। वह मृत्युचित्त मदन अपनी शक्ति के घमंड में फिर से बाण छोड़ना ही चाहता था। दृष्टि पड़ते ही गिरीश को तत्काल रोष चढ़ आया। उधर काम ने शंकरजी पर अपना अमोघ अस्त्र छोड़ दिया, जिसका निवारण अत्यन्त कठिन माना जाता था। पर शिव पर वह अमोघ भी मोघ हो गया, कुपित परमेश्वर के पास पहुँचते ही शान्त। भगवान मृत्युंजय को सामने देखकर मन्मथ काँप उठा और इन्द्र आदि देवताओं का स्मरण करने लगा। स्मरण करते ही सब देवता आ पहुँचे और शम्भु को प्रणाम करके स्तुति करने लगे।
देवता स्तुति कर ही रहे थे कि कुपित भगवान हर के ललाट के मध्य स्थित तृतीय नेत्र से बड़ी भारी आग तत्काल प्रकट हुई। ज्वालाएँ ऊपर की ओर उठ रही थीं, वह धू-धू करके जल रही थी, उसकी प्रभा प्रलय की अग्नि जैसी जान पड़ती थी। वह आग आकाश में उछली, पृथ्वी पर गिरी, फिर चारों ओर चक्कर काटती हुई फैल गयी। देवताओं के मुख से “भगवन्! क्षमा कीजिये, क्षमा कीजिये” निकल भी न पाया था कि उस आग ने कामदेव को जलाकर भस्म कर दिया। देवता व्याकुल हो उठे और हाय, यह क्या हुआ, कहते हुए चीत्कार करके रोने-बिलखने लगे। और उस घड़ी पार्वती की क्या दशा हुई, सो भी सुन लीजिये। उनका सारा शरीर सफ़ेद पड़ गया, काटो तो खून नहीं। वे सखियों को साथ लेकर अपने भवन को लौट गयीं।
रति का विलाप
कामदेव के जल जाने पर रति वहीं क्षण भर अचेत पड़ी रही, मानो मर ही गयी हो। होश आया तो विलाप फूट पड़ा, “हाय! हम क्या करें? कहाँ जायें? देवताओं ने यह क्या किया? हमारे उद्दण्ड स्वामी को नष्ट करा दिया। हा नाथ! हा स्मर! हा प्राणप्रिय! यह यहाँ क्या हो गया?” वह हाथ-पैर पटकती, सिर के बाल नोचती। उसका विलाप सुनकर वहाँ के वनवासी ही नहीं, वृक्ष जैसे स्थावर प्राणी तक दुखी हो गये।
तब देवता महादेवजी का स्मरण करते हुए रति के पास आये और बोले, “आप काम के शरीर की थोड़ी-सी भस्म यत्नपूर्वक रख लीजिये और शोक छोड़िये। हम सबके स्वामी महादेवजी कामदेव को फिर जीवित कर देंगे और आप अपने प्रियतम को पा लेंगी। न कोई किसी को सुख देने वाला है, न कोई दुःख देने वाला। सब अपनी-अपनी करनी का फल भोगते हैं। देवताओं को दोष देकर आप व्यर्थ ही शोक करती हैं।”
फिर वे भगवान शिव के पास आये और भक्तिभाव से उन्हें प्रसन्न करके बोले, “भगवन्! शरणागतवत्सल महेश्वर! काम ने जो किया, उसमें उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं था। दुष्ट तारकासुर से पीड़ित होकर हम सब देवताओं ने ही मिलकर उससे यह काम कराया है। नाथ! शंकर! इसे अन्यथा न समझिये। सती-साध्वी रति अकेली अति दुखी होकर विलाप कर रही है, उसे सान्त्वना दीजिये। और महेश्वर! यदि इस क्रोध से आपने कामदेव को सचमुच मार ही डाला, तो हम यही समझेंगे कि आप देवताओं सहित समस्त प्राणियों का अभी संहार कर डालना चाहते हैं।”
प्रद्युम्न का वचन
देवताओं का यह वचन सुनकर भगवान शिव प्रसन्न होकर बोले, “देवताओ और ऋषियो! हमारे क्रोध से जो हो गया, वह अन्यथा नहीं हो सकता। तथापि रति का शक्तिशाली पति काम तभी तक अनङ्ग रहेगा, बिना शरीर का, जब तक धरती पर रुक्मिणीपति श्रीकृष्ण का अवतार नहीं हो जाता। जब श्रीकृष्ण द्वारका में रहकर पुत्र उत्पन्न करेंगे, तब रुक्मिणी के गर्भ से काम भी जन्म लेगा। उस समय उसका नाम प्रद्युम्न होगा, इसमें संशय नहीं। जन्म लेते ही शाम्बरासुर उस शिशु को हर लेगा, समुद्र में डाल देगा, फिर उसे मरा समझकर अपने नगर को लौट जायेगा। रते! उस समय तक आप शाम्बरासुर के नगर में सुखपूर्वक निवास कीजिये। वहीं आपको अपने पति प्रद्युम्न की प्राप्ति होगी। वहाँ आपसे मिलकर काम युद्ध में शाम्बरासुर का वध करेगा, और आपको तथा उस असुर के धन को लेकर फिर अपने नगर को जायेगा। हमारा यह कथन सर्वथा सत्य होगा।”
यह सुनकर देवताओं के चित्त में कुछ उल्लास हुआ। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर विनती की, “देवदेव! महादेव! करुणासागर! प्रभो! आप कामदेव को शीघ्र जीवन-दान दें और रति के प्राणों की रक्षा करें।” तब करुणासागर परमेश्वर शिव पुनः प्रसन्न होकर बोले, “देवताओ! हम बहुत प्रसन्न हैं। हम काम को सबके हृदय में जीवित कर देंगे। वह सदा हमारा गण होकर विहार करेगा। अब आप सब अपने स्थान को जाइये, हम आपके दुःख का सर्वथा नाश करेंगे।” इतना कहकर रुद्रदेव देवताओं के देखते-देखते अन्तर्धान हो गये।
देवताओं का विस्मय दूर हो गया और वे सब के सब प्रसन्न हो गये। रुद्र की बात पर भरोसा करके उन्होंने रति को उनका कथन सुनाकर धीरज बँधाया और अपने-अपने स्थान को चले गये। और कामपत्नी रति? वह शिव के बताये हुए शाम्बरनगर को चली गयी, और रुद्रदेव ने जो समय बताया था, उसकी प्रतीक्षा करने लगी। देखिए तो, जिस नेत्र की आग ने काम का शरीर छीन लिया, उसी के वचन ने उसे सबके हृदय में बसा दिया। अनङ्ग होकर काम मिटा नहीं, और भी व्यापक हो गया।
आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), रुद्रसंहिता (पार्वती खण्ड)