पार्वती ने तप के बल पर जब महादेव को पा लिया, तब भी वे उनका हाथ थामकर सीधे कैलास को चल देने पर राज़ी न हुईं। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “नाथ! आप मेरे पिता हिमवान् के पास याचक बनकर पधारिए और विधि के अनुसार मेरी याचना कीजिए। ऐसा करने पर ही लोक में यह विवाह विख्यात होगा।” शिव मुसकराए। भक्तवत्सल ने उनकी बात रख ली और सप्तर्षियों को, अरुन्धती के साथ, हिमालय के घर भेज दिया।
सप्तर्षियों का प्रस्ताव
गिरिराज ने उन तपोधन ऋषियों की विधिवत् पूजा की और हाथ जोड़कर पूछा कि किस कार्य से पधारे हैं। सप्तर्षियों ने शिव का माहात्म्य सुनाया: ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र, ये तीनों उन्हीं परम शिव की विभूतियाँ हैं; और जो सती दक्ष के यज्ञ में देह त्यागकर आपके तथा मेना के घर पार्वती हुई हैं, वे जन्म-जन्म में शिव की ही पत्नी रही हैं। “गिरिराज! आप अपनी कन्या रुद्र के हाथ में दे दीजिए,” उन्होंने कहा, और मार्गशीर्ष का वह श्रेष्ठ मुहूर्त भी बता दिया जब चन्द्रमा रोहिणी के साथ रहेंगे और सारे शुभ ग्रह लग्न पर दृष्टि रखेंगे। मेरु आदि पर्वतों ने भी यही कहा, और अरुन्धती ने अनेक पुरानी कथाएँ सुनाकर मेना को समझा लिया। तब हिमालय का सारा संदेह जाता रहा और उन्होंने प्रसन्न होकर कहा, “अब मेरा शरीर, मेरी पत्नी मेना, मेरे पुत्र-पुत्री और सारी ऋद्धि-सिद्धि भगवान् शिव की ही हैं।” यों उन्होंने पार्वती का वाग्दान कर दिया।
सप्तर्षि लौटकर कैलास पहुँचे और शिव से बोले कि वाग्दान हो चुका है, अब वैदिक रीति से पाणिग्रहण के लिए चलिए। लोकाचार का अनुसरण करते हुए शिव हँसकर बोले, “विवाह तो हमने न कभी देखा है, न सुना; उसकी विधि आप ही बताइए।” ऋषि हँस पड़े और बोले, “पहले विष्णु को उनके पार्षदों सहित, ब्रह्मा को पुत्रों सहित, तथा इन्द्र, समस्त ऋषि, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध और अप्सराओं को आदरपूर्वक बुला लीजिए। वे सब मिलकर आपका कार्य सिद्ध कर देंगे।” इतना कहकर वे अपने धाम को लौट गए।
तैयारियाँ और विश्वकर्मा का मण्डप
इधर हिमालय ने पुरोहित गर्ग से लग्नपत्रिका लिखवाकर कैलास भेज दी और विवाह की सामग्री जुटाने लगे। चावल, गुड़, शक्कर, आटा, दूध, दही, घी और नाना पकवान इतने एकत्र हुए कि सूखे पदार्थों के पहाड़ खड़े हो गए और द्रव पदार्थों की बावड़ियाँ बन गईं। शिव के गणों और देवताओं के लिए बहुमूल्य वस्त्र, सोना, चाँदी और मणि-रत्न रखे गए। निमन्त्रण पाकर पर्वत दिव्य रूप धारण कर अपनी स्त्रियों सहित आए, और गोदावरी, यमुना, सरस्वती, गंगा तथा नर्मदा आदि नदियाँ भी दिव्य नर-नारियों का रूप धरकर विवाह देखने पधारीं। पुरी ध्वजा-पताकाओं, वन्दनवारों और चँदोवों से ऐसी भर गई कि सूर्य का दर्शन ही कठिन हो गया।
तब विश्वकर्मा ने एक अद्भुत मण्डप रचा। उसकी भूमि ऐसी जल-सी जान पड़ती थी कि चतुर मनुष्य भी न पहचान पाता कि कहाँ जल है और कहाँ थल। कहीं कृत्रिम सिंह, कहीं सारसों की पंक्तियाँ, कहीं बनावटी मोर और नाचती हुई स्त्रियाँ थीं, जो देखने वालों का मन मोह लेती थीं। द्वार पर महालक्ष्मी और स्फटिक-सा उज्ज्वल कृत्रिम नन्दी खड़ा था। विश्वकर्मा ने विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र आदि की ऐसी सजीव मूर्तियाँ गढ़ीं कि देवता भी भ्रम में पड़ जाएँ। फिर उन्होंने अतिथि-देवताओं के निवास के लिए दिव्य लोक भी बना डाले: ब्रह्मा के लिए सत्यलोक, विष्णु के लिए वैकुण्ठ, इन्द्र के लिए ऐश्वर्यपूर्ण भवन और शिव के चिह्नों से युक्त एक सुन्दर गृह।
अनोखी बारात
कैलास पर देवता एकत्र हुए। मातृकाएँ शिव को आभूषण पहनाने लगीं, किन्तु उनका सहज रूप ही आभूषण बन गया: चन्द्रमा मुकुट के स्थान पर जा बैठे, ललाट का तीसरा नेत्र शुभ तिलक बन गया, कानों के सर्प रत्नमय कुण्डल हो गए, देह पर लगी भस्म चन्दन-सी सुगन्धित हो उठी और गजचर्म दिव्य दुकूल बन गया। ऋषियों ने वेदमन्त्रों से मंगलाचार और ग्रहपूजन किया, और बारात चल पड़ी।
शिव ने कुछ गणों को पीछे रखकर शेष को साथ लिया। शंखकर्ण, कपाल, महाकाल और भृंगिरिटि आदि गणेश्वर, नन्दी और भैरव करोड़ों भूत-प्रेतों के साथ चले। इनमें कोई बहुतेरे मुखोंवाला था, कोई बहुत भुजाओंवाला; किसी के मुँह ही न था, किसी के मुँह पीठ की ओर लगे थे; कोई नेत्रहीन तो कोई बहुनेत्र, कोई बिना सिर के। सब जटा-मुकुट धारण किए, भस्म रमाए हुए थे। बीच में गरुड़ पर विष्णु थे, ऊपर छत्र तना, दोनों ओर चँवर डुलते; वेदों सहित ब्रह्मा, ऐरावत पर इन्द्र, और तुम्बुरु, नारद, हाहा तथा हूहू आदि गन्धर्व बाजे बजाते चले। गायत्री, सावित्री और लक्ष्मी आदि जगन्माताएँ भी संग थीं। चण्डिका बहिन बनकर नृत्य करती चलीं, और दुन्दुभियों का महान् नाद जगत् का मंगल करता हुआ गूँज रहा था।
मेना का भय
हिमवान् ने बारात की अगवानी की और वृषभ पर सवार शिव को, तथा विष्णु और ब्रह्मा को प्रणाम किया। ऊपर अपने भवन में मेना ने नारदजी को बुलाकर वर का परिचय पूछा। एक-से-एक सुन्दर गण निकलते गए और मेना पूछतीं, “क्या यही शिव हैं?” नारद कहते, “यह तो सेवक है।” मेना मन-ही-मन प्रसन्न होतीं कि जब सेवक ही इतने सुन्दर हैं, तब स्वामी न जाने कैसे होंगे। पीताम्बरधारी विष्णु को देखकर तो उन्होंने निश्चय ही वर समझ लिया। तभी नारद ने उँगली से भयंकर गणों के बीच खड़े साक्षात् शिव को दिखाया: पाँच मुख, प्रत्येक में तीन नेत्र, दस भुजाएँ, एक हाथ में कपाल, सिर पर जटा और चन्द्रमा, व्याघ्रचर्म और सारे अंगों पर सर्प। यह देखते ही शिव की सास का हृदय शोक से भर गया और वे कटी हुई लता के समान भूमि पर गिर पड़ीं। “यह कैसा दृश्य है! मैं दुराग्रह में पड़कर ठगी गई,” यों कहकर मेना मूर्च्छित हो गईं।
होश में आकर वे विलाप करने लगीं। पहले उन्होंने नारद और अरुन्धती को कोसा, फिर अपनी बेटी की ओर देखकर बोलीं, “हाय! इस मूढ़ बालिका ने सोना देकर काँच खरीदा, हंस उड़ाकर पिंजरे में कौआ पाला, और सूर्य को छोड़कर जुगनू पकड़ा।” वे कहने लगीं कि वे पार्वती को पर्वत की चोटी से गिरा देंगी या समुद्र में डुबा देंगी, पर इस रूपधारी को न देंगी; और यदि दी तो अपनी देह त्याग देंगी। तब पार्वती ने शान्त भाव से कहा, “माँ! ये रुद्रदेव सबकी उत्पत्ति के कारण, साक्षात् ईश्वर हैं; इनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं। विष्णु और ब्रह्मा इनकी सेवा करते हैं। मैंने मन, वाणी और क्रिया से हर का ही वरण किया है; अब दूसरे किसी वर का वरण न करूँगी। जैसी आपकी इच्छा हो, वैसा कीजिए।” देवताओं ने, फिर हिमालय ने, और अन्त में स्वयं विष्णु ने मेना को समझाया कि शिव निर्गुण भी हैं और सगुण भी, कुरूप भी और सुरूप भी; ब्रह्मा से लेकर कीट तक जो कुछ दिखाई देता है, सब उन्हीं का रूप है। मेना का मन कुछ कोमल हुआ, पर उन्होंने हठ न छोड़ा: “यदि भगवान् शिव सुन्दर शरीर धारण कर लें, तभी मैं अपनी पुत्री दूँगी।”
सुन्दर रूप और विवाह
तब शिव ने अपना परम सुन्दर दिव्य रूप प्रकट किया। गंगा और यमुना चँवर डुलाने लगीं, आठों सिद्धियाँ आगे नाचने लगीं। उस रूप को देखकर मेना क्षणभर के लिए चित्रलिखित-सी रह गईं, फिर प्रसन्न होकर अपनी पहली निन्दा के लिए क्षमा माँगने लगीं। पुरवासिनी स्त्रियाँ काम छोड़कर दौड़ आईं और उस मनोहर रूप के दर्शन से अपना जन्म सफल मानने लगीं। द्वार पर मेना ने वर की आरती उतारी।
विवाह के समय जब हिमालय ने वर का गोत्र और कुल पूछा, तब नारद ने वीणा बजाकर कहा कि शिव का न गोत्र है, न कुल, न नाम; वे नादमय हैं और नाद ही उनका कुल है। संतुष्ट होकर गिरिराज ने कन्यादान का यह मन्त्र पढ़ा: “इमां कन्यां तुभ्यमहं ददामि परमेश्वर। भार्यार्थं परिगृह्णीष्व प्रसीद सकलेश्वर॥” और शिवा का हाथ शिव के हाथ में दे दिया। महादेव ने वेदमन्त्र पढ़ते हुए गिरिजा का करकमल अपने हाथ में लिया। तीनों लोकों में जय-जयकार गूँज उठा, गन्धर्व गाने लगे और अप्सराएँ नाचने लगीं। ब्रह्मा की आज्ञा से अग्नि की स्थापना हुई; पार्वती के भाई मैनाक ने अपनी बहिन की अंजलि में लावा दिया; वर-वधू ने आहुति देकर अग्नि की परिक्रमा की। शिव ने ब्रह्मा को पूर्णपात्र, आचार्यों को गोदान और ब्राह्मणों को स्वर्ण तथा रत्न बाँटे।
कोहबर में स्त्रियों ने गँठजोड़ की गाँठ खोली, और सरस्वती, लक्ष्मी, अरुन्धती तथा रति आदि सोलह दिव्य नारियाँ नवदम्पति को देखने आईं। तभी रति ने कामदेव की भस्म शिव के सामने रखकर रोते हुए प्रार्थना की कि जिस पति को आपने भस्म कर डाला, उसे जीवन दीजिए। दयार्द्र होकर शिव ने कामदेव को जिला दिया और प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा; काम ने शिव के जनों के प्रति प्रेम और उनके चरणों में भक्ति माँगी। फिर वर-वधू ने एक-दूसरे को मिष्टान्न खिलाया।
विदाई
बारात कई दिन ठहरी। चौथे दिन विधिपूर्वक चतुर्थीकर्म हुआ, जिसके बिना विवाह-यज्ञ अधूरा रहता है। हिमालय बार-बार आग्रह करके देवताओं को रोकते रहे, पर अन्त में सप्तर्षियों के समझाने पर बारात को विदा करने को राज़ी हो गए। जब देवसमाज सहित शिव कैलास की यात्रा के लिए उद्यत हुए, तब मेना ऊँचे स्वर से रोने लगीं और उन करुणानिधान से बोलीं, “करुणानिधे! मेरी शिवा का भलीभाँति लालन-पालन कीजिएगा; इसके अपराधों को भी क्षमा कीजिएगा। यह बालिका जन्म-जन्म में आपके चरणों की भक्त रही है; अपने स्वामी महादेव के सिवा इसे और कुछ नहीं भाता। आपके प्रति भक्ति की बात सुनते ही इसकी आँखें भर आती हैं, और आपकी निन्दा सुनकर यह ऐसा मौन साध लेती है मानो मर ही गई हो।” यों कहकर मेना ने अपनी बेटी शिव को सौंप दी और मूर्च्छित हो गईं। महादेव ने उन्हें सान्त्वना दी। फिर देवताओं और देवकन्याओं सहित वह महान् यात्रा कैलास की ओर चल पड़ी, और सबके मन शिव के चिन्तन में लगे थे। गिरिराज हिमवान् दूर तक बारात के साथ गए, फिर हाथ जोड़कर विदा ली और अपने घर लौट आए। इस प्रकार पर्वतराज की कन्या पर्वतवासी शंकर की अपनी हो गईं।
आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), रुद्रसंहिता (पार्वतीखण्ड)