बर्फ़से ढके कैलासके महलमें उस दिन एक छोटी-सी बात चली थी, और देखिए तो उसी बातसे विघ्नहर्ताका जन्म निकल आया। हुआ यों कि जगदम्बा पार्वतीके पास उनकी प्यारी सखियाँ जया और विजया आ बैठीं और धीरेसे एक बात छेड़ दी। कहने लगीं, सखी, ज़रा सोचिए तो, ये जितने गण हैं, सब-के-सब रुद्रके हैं। नन्दी और भृंगी, जो कहनेको हमारे हैं, वे भी शिवकी ही आज्ञामें लगे रहते हैं, और असंख्य प्रमथगणोंमें भी हमारा अपना कोई नहीं। यों तो वे हमारे भी हैं, पर सच पूछिए तो उनसे हमारा मन नहीं मिलता। आपको हमारे लिये भी एक गणकी रचना कर लेनी चाहिये।
पार्वतीजीको यह बात हितकर लगी, मनमें बैठ गयी। फिर एक दिन गाँठ पक्की हो गयी। देवी स्नान कर रही थीं कि सदाशिव नन्दीको डाँटते-धमकाते सीधे घरके भीतर चले आये। स्नान करती हुई जगज्जननी हड़बड़ाकर उठ खड़ी हुईं, बड़ी लज्जा हुई उन्हें। उसी घड़ी सखियोंका कहा हुआ लौट आया। उन्होंने मन-ही-मन ठान लिया, हमारा एक ऐसा सेवक होना ही चाहिये जो परम शुभ हो, काममें कुशल हो, और हमारी ही आज्ञामें तत्पर रहे, उससे रत्ती-भर भी न डिगे।
मैलसे गढ़ा बेटा
तब देवीने अपने शरीरकी मैलसे एक चेतन पुरुष गढ़ डाला। सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे युक्त, सारे अंग सुन्दर और निर्दोष, देह विशाल और परम शोभायमान, बल-पराक्रमसे भरपूर। देवीने उसे वस्त्र-आभूषण पहनाये, जी-भरकर आशीर्वाद दिये और कहा, आप हमारे पुत्र हैं, हमारे अपने। आप-सा प्यारा हमारा यहाँ और कोई नहीं।
बालकने हाथ जोड़कर पूछा, माँ, आज आपको कौन-सा काम आ पड़ा है? आप कहिए, हम उसे पूरा करेंगे। माता बोलीं, बेटा, सुनिए। आजसे आप हमारे द्वारपाल हुए। हमारी आज्ञाके बिना कोई भी हठ करके हमारे भवनके भीतर पाँव न रखने पाये, चाहे वह कहींसे आये, कोई भी हो। हमने आपसे बिलकुल सच कहा है।
यों कहकर देवीने बेटेके हाथमें एक सुदृढ़ छड़ी थमा दी, प्रेमपूर्वक उसका मुख चूमा, छातीसे लगाया, और दण्डधारी गणराजको द्वारपर बिठाकर आप सखियोंके साथ स्नान करने चली गयीं। उधर बालक छड़ी थामे पहरा देने लगा। माँकी आज्ञा जो ठहरी।
द्वारपर ठनी
अब सुनिए, उसी समय परम कौतुकी भगवान् शिव द्वारपर आ पहुँचे। बालक उन्हें पहचानता नहीं था। उसने छड़ी उठा ली और कहा, देव, माताकी आज्ञाके बिना आप अभी भीतर न जाइए। माता स्नान करने बैठी हैं। इस समय यहाँसे लौट जाइए।
शिवजी झिड़ककर बोले, अरे मूर्ख, यह किसे रोक रहा है? क्या यह हमें पहचानता नहीं? शिवके सिवा हम और कोई नहीं हैं। पर बालक टस-से-मस न हुआ। तब महेश्वरके गण उसे समझाने आये, सुनिए, हम मुख्य शिवगण हैं, यहाँके द्वारपाल, और सर्वव्यापी शंकरकी आज्ञासे आपको हटाने आये हैं। आपको भी गण समझकर अब तक हाथ नहीं उठाया, नहीं तो कबके मारे गये होते। भला इसीमें है कि आप स्वयं ही हट जाइए। व्यर्थ अपनी मृत्युको क्यों बुलाते हैं?
गिरिजानन्दन निर्भय खड़े रहे, गणोंको फटकारा और दरवाज़ा नहीं छोड़ा। गणोंने लौटकर सारा हाल कहा तो अद्भुत लीलाधारी महेश्वर उलटे उन्हींपर बरस पड़े, यह कौन है जो शत्रुकी भाँति इतना बढ़-चढ़कर बोल रहा है? उस नये द्वारपालको दूर भगाया जाये, खड़े-खड़े उसका वृत्तान्त सुनानेसे क्या होगा? गण लौटे, बालकने फिर रोका। पता लगवानेपर मालूम हुआ कि ये श्रीगिरिजाके पुत्र हैं, द्वारपाल नियुक्त हुए हैं। अब शंकरने एक विचित्र लीला ठानी, साथमें अपने गणोंका गर्व भी गलाना था। गणों और देवताओंको बुलाकर भीषण संग्राम छिड़ गया, पर कोई भी गणेशको पराजित न कर सका। अन्तमें स्वयं शूलपाणि महेश्वर आगे आये, और उन्हींके त्रिशूलसे गणेशजीका सिर कटकर गिर पड़ा। माँकी आज्ञाका पहरा देते-देते बालकने प्राण दे दिये, पर द्वार नहीं छोड़ा।
ब्रह्माजी नारदसे कहते हैं कि शनिकी दृष्टिसे मस्तक कटनेवाली कथा किसी और कल्पकी है; इस कल्पमें शिवने ही यह लीला रची।
माँका कोप
समाचार पार्वतीजीतक पहुँचा तो वे क्रोधसे भर उठीं। उन्होंने बहुत-सी शक्तियाँ उत्पन्न कीं और आज्ञा दे दी कि बिना विचारे प्रलय मचा दिया जाये। फिर क्या था, शक्तियाँ टूट पड़ीं। उनका जाज्वल्यमान तेज दिशाओंको झुलसाने लगा। शिवगण भयभीत होकर भागे और दूर जा खड़े हुए।
उसी घड़ी देवर्षि नारद वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने और देवताओंने शंकरको प्रणाम करके यही ठहराया कि इस विपत्तिपर सब मिलकर विचार करें। निश्चय हुआ कि जबतक गिरिजादेवी कृपा नहीं करेंगी, तबतक सुखकी कोई राह नहीं। तब सब देवता और ऋषि भगवती गिरिजाके पास गये और हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे, शिवपत्नी, आपको प्रणाम है। चण्डिके, अम्बे, आप ही आदिशक्ति हैं, आप ही सृष्टिकी रचनेवाली, पालनेवाली और संहार करनेवाली हैं। देवेशि, आपके कोपसे सारी त्रिलोकी विकल हो रही है। अब प्रसन्न होइए, क्रोधको शान्त कीजिए।
परादेवीने बस क्रोधभरी दृष्टिसे उनकी ओर देखा, कहा कुछ नहीं। ऋषि फिर चरणोंमें झुके, देवि, अब तो संहार होने ही वाला है, क्षमा कीजिए, क्षमा कीजिए। अम्बिके, आपके स्वामी शिव भी यहीं खड़े हैं, तनिक उनकी ओर तो देखिए। ये ब्रह्मा-विष्णु आदि देवता और सारी प्रजा आपके ही हैं, व्याकुल अंजलि बाँधे खड़े हैं। परमेश्वरि, इन सबका अपराध क्षमा कीजिए, इन्हें शान्ति दीजिए।
इस दीन विनयसे चण्डिकाका हृदय पसीज गया, भीतर करुणा उमड़ आयी। बोलीं, यदि हमारा पुत्र जी उठे और आप सब लोगोंके बीच पूजनीय मान लिया जाये, तो संहार नहीं होगा। जिस दिन आप लोग उसे सबके अध्यक्षका पद देंगे, उसी दिन लोकोंमें शान्ति होगी, अन्यथा सुख नहीं मिलेगा।
उत्तर दिशाका पहला जीव
ऋषियोंने यह शर्त देवताओंको सुनायी और देवताओंने शिवजीको। शिवजी बोले, ठीक है, वही कीजिए जिससे सारी त्रिलोकीको सुख मिले। उत्तर दिशाकी ओर जाइए, और जो जीव सबसे पहले मिले, उसका सिर काटकर इस बालकके धड़से जोड़ दीजिए।
देवताओंने शिशु-शरीरको धो-पोंछकर पूजा की और उत्तरकी राह ली। सबसे पहले उन्हें एक हाथी मिला, एक दाँतवाला। वे उसीका मस्तक ले आये और बालकके धड़से जोड़ दिया। फिर ब्रह्मा-विष्णु आदि सब देवोंने निर्गुणस्वरूप शंकरसे हाथ जोड़कर कहा, स्वामिन्, हम सब आपके जिस तेजसे उत्पन्न हुए हैं, आपका वही तेज इस बालकमें प्रवेश करे। सबने मिलकर वेदमन्त्रोंसे जलको अभिमन्त्रित किया, शिवका स्मरण किया और वह जल बालकके शरीरपर छिड़क दिया। स्पर्श होते ही बालक चेतनासे भर उठा और ऐसे उठ बैठा जैसे कोई सोकर जागा हो।
गजका-सा मुख, दमकती देह, चेहरेपर खेलती प्रसन्नता, कमनीय आकृति और चारों ओर फैलती सुन्दर प्रभा। जो जहाँ था, आनन्दमग्न हो गया, सारा दुख पलमें विलीन हो गया। हर्ष-विभोर देवता बालकको पार्वतीजीके पास ले गये। अपने पुत्रको जीवित देखकर माँ निहाल हो उठीं।
अग्रपूजाका वरदान
फिर गजाननका अभिषेक हुआ। पार्वतीजीने हर्षके अतिरेकमें बेटेको दोनों हाथोंसे पकड़कर छातीसे लगा लिया और अनेक वस्त्राभूषण दिये। सिद्धियोंने विधि-विधानसे उनका पूजन किया और माताने अपने सर्वदुःखहारी हाथसे उनके अंगोंको सहलाया। मुख चूमकर वरदान दिया, बेटा, इस बार आपने बड़ा कष्ट झेला, पर अब आप कृतकृत्य हैं, धन्य हैं। आजसे सम्पूर्ण देवताओंमें आपकी अग्रपूजा होगी, आपको कभी दुख नहीं देखना पड़ेगा। इस समय आपके मुखपर सिन्दूर दमक रहा है, इसलिये मनुष्य सदा सिन्दूरसे आपकी पूजा करें। जो पुष्प, चन्दन, सुगन्ध, नैवेद्य, रमणीय आरती, ताम्बूल, दान, परिक्रमा और नमस्कारसे विधिपूर्वक आपको पूजेंगे, उनकी सब सिद्धियाँ सधेंगी और सारे विघ्न कट जायेंगे, इसमें संदेह नहीं।
तब इन्द्र आदि देवता त्रिलोकीके कल्याणकी कामनासे उस बालकको ले चले और शिवजीकी गोदमें बैठा दिया। शिवजीने बालकके मस्तकपर करकमल फेरा और बोले, यह हमारा दूसरा पुत्र है। गणेशने उठकर शिवजीके चरणोंमें प्रणाम किया, फिर पार्वती, ब्रह्मा, विष्णु और नारद आदि सबको प्रणाम करके विनयसे कहा, अभिमान करना मनुष्यका स्वभाव ही है, अतः आप सब हमारा अपराध क्षमा करें। तब ब्रह्मा, विष्णु और शंकरने एक साथ प्रेमपूर्वक वर दिया, जैसे त्रिलोकीमें हम तीनों देवोंकी पूजा होती है, वैसे ही सब लोग इन गणेशका भी पूजन करें। मनुष्य पहले इनकी पूजा करें, फिर हमारी, तभी हमारा पूजन पूरा होगा। जिसने इनकी पूजा पहले किये बिना किसी और देवताका पूजन किया, उसके पूजनका फल नष्ट हो जायेगा।
फिर शिवजीने गिरिजानन्दनसे कहा, निस्संदेह हम आपपर परम प्रसन्न हैं, और हमारे प्रसन्न होनेपर सारा जगत् प्रसन्न हुआ समझिए। अब कोई आपका विरोध नहीं कर सकता। आप शक्तिके पुत्र हैं, इसलिये अत्यन्त तेजस्वी हैं। बालक होकर भी आपने महान् पराक्रम कर दिखाया, इसलिये सदा सुखी रहेंगे। विघ्न मिटानेके कामोंमें आपका नाम सबसे ऊपर रहेगा। आप सबके पूज्य हैं, अतः अब हमारे सम्पूर्ण गणोंके अध्यक्ष हो जाइए।
बड़े स्नेहसे उन्होंने एक वर और जोड़ा। जिस घड़ी गिरिजाके सुन्दर चित्तमें इनका रूप प्रकट हुआ, उस समय भाद्रपदके कृष्णपक्षकी चतुर्थी थी, चन्द्रमाका शुभ उदय था और रात्रिका पहला पहर बीत रहा था। अतः उसी तिथिको इनका उत्तम व्रत किया जाये, वह परम शोभन और सम्पूर्ण सिद्धियोंका देनेवाला होगा। फिर उन्होंने व्रतकी पूरी विधि कह सुनायी, मार्गशीर्षकी कृष्ण चतुर्थीको धातु, मूँगे या श्वेत मदारकी मूर्ति बनाकर उसकी प्राण-प्रतिष्ठा, गन्ध-चन्दन-पुष्पसे पूजन, रात्रिका पहला पहर बीतनेपर बारह अंगुल लम्बी और तीन गाँठोंवाली एक सौ एक या इक्कीस दूर्वाओंसे अर्चन, धूप-दीप-नैवेद्य और ताम्बूल, फिर बालचन्द्रका पूजन, ब्राह्मणोंको मीठा भोजन और स्वयं बिना नमकका मीठा प्रसाद, और वर्ष पूरा होनेपर बारह ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उद्यापन। यह भी कहा कि सब वर्णोंके लोग, विशेषकर स्त्रियाँ, और अभ्युदय चाहनेवाले राजा यह व्रत अवश्य करें; व्रती जिस वस्तुकी कामना करेगा, वह उसे निश्चय मिलेगी।
सब देवताओं, ऋषियों और शिवके प्यारे गणोंने तथास्तु कहकर इसका समर्थन किया और बड़े विधानसे गणाधीशका पूजन किया। ब्रह्माजी कहते हैं, उस समय गिरिजादेवीको जो आनन्द मिला, उसका वर्णन हमारे चारों मुखोंसे भी नहीं हो सकता। दुन्दुभियाँ बज उठीं, अप्सराएँ नाचने लगीं, गन्धर्व गा उठे और फूल बरसने लगे। गणाधीश-पदकी इस प्रतिष्ठापर महान् उत्सव मना, सारे जगत्में शान्ति छा गयी, सारा दुख जाता रहा। देवता और ऋषि अपने-अपने लोकोंको लौटे तो राह-भर आपसमें यही कहते जाते थे, कैसा अद्भुत युद्ध हुआ! उधर गिरिजाका क्रोध शान्त हुआ, शिवजी पहलेकी भाँति लोकहितके सुखदायक काम करने लगे, और वह बालक अब सबका अग्रपूज्य गणाधीश हो गया, जिसकी पहली पूजाके बिना किसी पूजाका फल पूरा नहीं होता।
कहते हैं, जो इस परम मांगलिक आख्यानको जितेन्द्रिय होकर सुनता है, वह सब मंगलोंका भागी होता है। पुत्रहीनको पुत्र, निर्धनको धन और रोगीको आरोग्य मिलता है, और शोकके सागरमें डूबा मनुष्य श्रवणमात्रसे शोकरहित हो जाता है।
आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), रुद्रसंहिता (कुमार खण्ड)