कार्तिकेय और तारकासुर

कैलास पर उस दिन उजाला बर्फ़ से नहीं, बधाई से आया था। देवता एक बालक को लेकर पहुँचे थे, नन्हा सा धड़, उस पर छह मुख, और छहों पर एक साथ खिली हुई हँसी। भगवान् शंकर ने बाँहें पसारीं और उसे गोद में बैठा लिया। सोचिए ज़रा, जिनके कोप से लोक काँप उठते हैं, उन्हीं की गोद उस घड़ी पालना बन गयी।

यह प्रसंग नारदजी की जिज्ञासा से खुला था। उन्होंने ब्रह्माजी से पूछा था कि आत्माराम शिव का यह पुत्र कैसे उत्पन्न हुआ और तारकासुर का वध कैसे हुआ। तब ब्रह्माजी ने कथा सुनायी, कुमार कैसे प्रकट हुए, कैसे कृत्तिका आदि छह स्त्रियों ने उन्हें पाला, कैसे उन छहों की संतुष्टि के लिए उन्होंने छह मुख धारण किये और कृत्तिकाओं के पालने के कारण कार्तिकेय कहलाये, और कैसे देवता उन्हें शंकर तथा शिवा की सेवा में ले आये।

देवताओं ने उस बालक को नाना प्रकार के पदार्थ, विद्याएँ, शक्तियाँ और अस्त्र-शस्त्र भेंट किये। पार्वती के हृदय में प्रेम समाये नहीं समाता था, उन्होंने कुमार को चूमकर परमोत्तम ऐश्वर्य दिया और साथ ही चिरंजीवी भी बना दिया। लक्ष्मीजी ने एक विशाल मनोहर हार अर्पित किया, सावित्री ने सारी सिद्ध विद्याएँ दे दीं। कैलास पर महोत्सव मच गया, और शिव-पार्वती के आनन्द का कोई पार न था।

देवताओं की विनती और आकाशवाणी

उसी उत्सव के बीच देवताओं ने हाथ जोड़े, प्रभो! यह तारकासुर कुमार के ही हाथों मारा जाने वाला है, इसीलिए तो यह सारा उत्तम चरित घटा है, पार्वती से परिणय भी और कुमार की उत्पत्ति भी। हम सबके सुख के लिए इन्हें आज्ञा दीजिए, हम आज ही अस्त्र-शस्त्र से सज्जित होकर रण-यात्रा करेंगे।

यह सुनकर भगवान् शंकर का हृदय दया से आर्द्र हो गया। उन्होंने उसी क्षण तारक-वध के लिए अपना पुत्र देवताओं को सौंप दिया। फिर क्या था, ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवता गुह को आगे करके तुरंत उस पर्वत से चल पड़े, सबके मन में पूरा विश्वास कि ये अवश्य तारक का वध कर डालेंगे। उधर महाबली तारक ने यह युद्धोद्योग सुना तो वह भी विशाल सेना लेकर तत्काल चल पड़ा। उसकी उमड़ती वाहिनी देखकर देवता विस्मित हुए, फिर बल भरकर बारंबार सिंहनाद करने लगे। तभी भगवान् शंकर की प्रेरणा से आकाशवाणी हुई, देवगण! आप लोग कुमार को अपना नायक बनाकर लड़ने निकले हैं, इसी से इस संग्राम में दैत्यों को जीतकर विजयी होंगे। देवताओं का भय जाता रहा और वे कुमार को अग्रणी बनाकर बड़ी उतावली के साथ मही-सागर-संगम जा पहुँचे।

मही-सागर-संगम की रणभूमि

तारक भी बहुत बड़ी सेना के साथ शीघ्र वहीं आ धमका। उसके आगमन पर रणभेरियाँ प्रलयकाल के मेघों सी गरजीं, दैत्य ताल ठोंक-ठोंककर गरजने लगे, उनके पदाघात से पृथ्वी काँप उठी। पर उस भयंकर कोलाहल में भी देवता निर्भय रहे और मिलकर तारकासुर से लोहा लेने के लिए डट गये। देवराज इन्द्र कुमार को गजराज पर बैठाकर लोकपालों समेत सबसे आगे खड़े हुए। फिर कुमार ने वह गजराज महेन्द्र को ही लौटा दिया और स्वयं नाना रत्नों से दमकते एक परम आश्चर्यजनक विमान पर आरूढ़ हुए। उन पर प्रकाशमान चँवर डुलाये जा रहे थे, और शोभा ऐसी कि रण में भी आँखें उन्हीं पर टिकती थीं।

फिर देवताओं और दैत्यों में घमासान छिड़ गया, क्षण भर में सारी रणभूमि रुण्ड-मुण्डों से पट गयी। तारकासुर वेग से आगे बढ़ा तो इन्द्र आदि देवता उसके सामने आ डटे। इसी समय भगवान् शिव के कोप से उत्पन्न वीरभद्र कुपित होकर महाबली प्रमथगणों के साथ आगे आये और समस्त देवताओं को पीछे करके स्वयं तारक के सम्मुख डट गये। प्रमथों और असुरों में गुत्थमगुत्था होने लगी और वीरभद्र से तारक का भयानक युद्ध हुआ। बीच में असुर सेना रण छोड़कर भाग चली। अपनी सेना को तितर-बितर होते देख तारक ने क्रोध में दस हज़ार भुजाएँ धारण कर लीं और देवों तथा प्रमथगणों को मार-मारकर गिराने लगा। तब वीरभद्र ने शिव-चरणों का ध्यान करके ऐसा श्रेष्ठ त्रिशूल उठाया जिसके तेज से दिशाएँ और आकाश जगमगा उठे।

और यहीं इस कथा की एक अनोखी करवट सुनिए। ठीक अवसर पर महान् कौतुक दिखाने वाले स्वामी कार्तिक ने वीरबाहु से कहलवाकर वह युद्ध रुकवा दिया, और स्वामी की आज्ञा से वीरभद्र रण से हट गये। अब तारक और भड़क उठा। वह नाना अस्त्रों का जानकार था, देवताओं पर बाणों की वृष्टि करने लगा और ऐसा पराक्रम कर दिखाया कि सारे देवता मिलकर भी सामना न कर सके। यह देखकर भगवान् अच्युत को क्रोध आया। श्रीहरि सुदर्शन चक्र और शार्ङ्ग धनुष लेकर महादैत्य तारक पर टूट पड़े, सबके देखते-देखते दोनों में रोमांचकारी महायुद्ध हुआ। अच्युत ने सिंहनाद करके धधकती ज्वालाओं जैसा प्रकाशमान चक्र दैत्यराज पर दे मारा, चोट खाकर तारक पृथ्वी पर गिर पड़ा। पर वह बल का पहाड़ तुरंत उठा और उसने अपनी शक्ति से उस चक्र के टुकड़े-टुकड़े कर दिये। दोनों बलवान् रणभूमि में परस्पर जूझने लगे।

ब्रह्माजी की आज्ञा और तारक-वध

तब ब्रह्माजी ने कहा, शंकर-सुवन स्वामी कार्तिक! आप तो देवाधिदेव हैं। विष्णु और तारकासुर का यह व्यर्थ युद्ध शोभा नहीं देता, क्योंकि विष्णु के हाथों इसकी मृत्यु नहीं होगी। यह हमसे वरदान पाकर अत्यन्त बलवान् हुआ है, और आपके अतिरिक्त इस पापी को मारने वाला दूसरा कोई नहीं। पार्वती-पुत्र! शीघ्र तैयार हो जाइए, तारक के संहार के निमित्त ही तो आप शंकर से उत्पन्न हुए हैं।

यह सुनकर कुमार कार्तिकेय ठहाका मारकर हँस पड़े और प्रसन्नता से बोले, तथास्तु, ऐसा ही होगा। फिर वे तारक-वध का निश्चय करके विमान से उतर पड़े और पैदल ही हो लिये। महाबली शिव-पुत्र जब अपनी चमकीली शक्ति हाथ में लेकर पैदल दौड़े, तो वह शक्ति बिजली सी दमकती कोई बड़ी उल्का जान पड़ती थी। मन में तनिक भी व्याकुलता नहीं, बल ऐसा जिसकी थाह नहीं।

उन षण्मुख को आते देखकर तारक बोला, क्या शत्रुओं का संहार करने वाला कुमार यही है? मैं अकेला इससे युद्ध करूँगा, और समस्त वीरों, प्रमथगणों, लोकपालों और श्रीहरि जिनके नायक हैं उन देवों को भी मैं ही मार डालूँगा। फिर दुर्वचन कहकर वह असुर भीषण युद्ध करने लगा। कुमार ने शिवजी के चरण-कमलों का स्मरण करके तारक के वध का विचार किया और रोषावेश में गर्जना करते हुए युद्ध के लिए डट गये। देवताओं ने जय-जयकार किया, देवर्षि स्तुति करने लगे।

तब वह संग्राम प्रारम्भ हुआ जो अत्यन्त दुस्सह, महाभयंकर और सम्पूर्ण प्राणियों को भयभीत करने वाला था। दोनों शक्ति-युद्ध में परम प्रवीण, पैंतरे बदलते, गरजते, अनेक दाँव-पेंच से एक दूसरे पर आघात करते रहे। देवता, गन्धर्व और किन्नर चुपचाप खड़े देखते रह गये। विस्मय ऐसा छाया कि वायु का चलना बंद हो गया, सूर्य की प्रभा फीकी पड़ गयी, वन-काननों समेत सारी पृथ्वी और पर्वत काँप उठे। इसी अवसर पर हिमालय आदि पर्वत स्नेह से विह्वल होकर कुमार की रक्षा के लिए वहाँ चले आये। शंकर-गिरिजा के पुत्र ने उन्हें सान्त्वना दी, महाभाग पर्वतो! खेद मत कीजिए, चिन्ता की कोई बात नहीं। हम आज आप सबकी आँखों के सामने ही इस पापी का काम तमाम कर देंगे।

यों ढाढ़स बँधाकर कुमार ने गिरिजा और शम्भु को प्रणाम किया और अपनी कान्तिमती शक्ति हाथ में उठा ली, उस घड़ी उनकी शोभा अद्भुत थी। तदनन्तर शंकरजी के तेज से सम्पन्न कुमार ने समस्त लोकों को कष्ट देने वाले तारकासुर पर उस शक्ति का प्रहार कर दिया। आघात से तारक के सभी अंग छिन्न-भिन्न हो गये और असुरगणों का वह अधिपति सहसा धराशायी हो गया। सबके देखते-देखते उसके प्राण-पखेरू उड़ गये। और यह भी सुनते जाइए, प्राणरहित गिरे हुए उस वीर पर वीरवर कुमार ने दुबारा वार नहीं किया।

दैत्यराज के मरते ही देवताओं ने बहुत से असुरों को मौत के घाट उतार दिया। हज़ारों दैत्य मृत्यु के अतिथि बने, कितने ही शरणार्थी अंजलि बाँधकर पाहि-पाहि, रक्षा कीजिए पुकारते हुए कुमार की ही शरण में आ गये, और कितने जीवन की आशा में पाताल जा घुसे। सारी दैत्यसेना नष्ट हो गयी, और उस दुरात्मा के मारे जाने से सभी लोक निष्कण्टक हो गये।

विजय, वरदान और कैलास वापसी

विजय का समाचार पाकर भगवान् शंकर प्रसन्न होकर पार्वतीजी और गणों के साथ वहीं पधारे। पार्वतीजी के हृदय में स्नेह समाता न था, उन्होंने सूर्य के समान तेजस्वी अपने पुत्र को गोद में लेकर लाड़-प्यार किया। हिमालय ने बन्धु-बान्धवों समेत शम्भु, पार्वती और गुह का स्तवन किया। देवगण, मुनि, सिद्ध और चारण स्तुति करने लगे, पुष्पों की वर्षा हुई, सब प्रकार के बाजे बज उठे, जयकार गूँजने लगी, और वहाँ ऐसा विजयोत्सव मना कि वह स्थान गान और ब्रह्मघोष से भर गया। तत्पश्चात् भगवान् रुद्र जगज्जननी भवानी के साथ कैलास चले गये।

इधर तारक-वध देखकर सभी प्राणियों के चेहरों पर हँसी खिल उठी। विष्णु आदि देवता भक्तिपूर्वक कुमार की स्तुति करने लगे, देव! दानवश्रेष्ठ तारक का हनन करने वाले आप ही हैं, आपको नमस्कार है। तब कुमार ने प्रसन्न होकर देवों को क्रमशः नये-नये वर दिये, और स्तुति करते पर्वतों से बोले, भूधरो! आप सभी तपस्वियों के लिए पूजनीय तथा कर्मठ और ज्ञानियों के लिए सेवनीय होंगे, और ये जो हमारे मातामह पर्वतश्रेष्ठ हिमवान् हैं, ये आज से तपस्वियों के लिए फलदाता होंगे।

तब देवता बोले, कुमार! असुरराज को मारकर आपने समस्त चराचर जगत् को सुखी कर दिया, अब आप अपने माता-पिता के पास, शिव के निवासभूत कैलास पर चलिए। तदनन्तर सब देवताओं के साथ विमान पर चढ़कर कुमार स्कन्द कैलास पहुँचे। शिव और शिवा ने बड़ा आनन्द मनाया, देवताओं को वरदान और अभयदान देकर विदा किया, और वे शिव, पार्वती तथा कुमार के रमणीय यश का बखान करते अपने-अपने लोकों को चले गये। परमेश्वर शिव भी शिवा, कुमार और गणों के साथ आनन्दपूर्वक कैलास पर निवास करने लगे। ब्रह्माजी ने नारदजी से कहा, शिव-भक्ति से ओतप्रोत, सुखदायक और दिव्य, कुमार का यह सारा चरित्र हमने आपसे कह सुनाया।

लोक-प्रचलित कथाओं में तारक-वध सीधे कुमार के हाथों होता है, पर शिवपुराण उससे पहले वीरभद्र और स्वयं श्रीहरि के तारक से भिड़ने का प्रसंग भी रखता है, वही क्रम यहाँ रखा गया है।

आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), रुद्रसंहिता (कुमार खण्ड)