अध्याय 4 · मिथिला, शिव-धनुष-भंग, सीता-विवाह

वाल्मीकि रामायण · बालकाण्ड
मिथिला, शिव-धनुष-भंग, सीता-विवाह · सर्ग 50-73

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विश्वामित्र ऊँचे मार्ग से राम और लक्ष्मण को नीचे फैला यज्ञ-नगर दिखाते हुए, दूर मंडप और धूम्र उठता।

मार्ग की कथाएँ पीछे छूट गई थीं। अब विश्वामित्र (कुशिक-वंशी ऋषि, जो पहले राजा थे) राम और लक्ष्मण को आगे करके उस उत्तर-पूर्व दिशा की ओर बढ़े, जहाँ मिथिला के राजा जनक का महायज्ञ चल रहा था। यज्ञ-वाट (यज्ञ-भूमि, यज्ञ का परिसर) निकट आते ही राम ने मुनि से कहा, हे भगवन्, जनक के यज्ञ की तैयारी कैसी श्रेष्ठ है। यहाँ अनेक देशों से आए हज़ारों वेदपाठी ब्राह्मण दिखते हैं, और ऋषियों की कुटियाँ सैकड़ों गाड़ियों से भरी हुई हैं, जिनमें अग्निहोत्र (नित्य अग्नि में आहुति देने का अनुष्ठान) की सामग्री है। हमारे ठहरने के लिए कोई उपयुक्त, जल से युक्त स्थान चुन दीजिए। विश्वामित्र ने एक एकान्त, स्वच्छ, जलयुक्त स्थान पर डेरा डलवाया।

जनक का स्वागत और दो राजकुमारों की जिज्ञासा

मुकुटधारी राजा जनक झुककर मुनि विश्वामित्र को स्वर्ण पात्रों में पूजा-सामग्री अर्पित करते हुए, बीच में पुरोहित खड़े।

विश्वामित्र के आगमन का समाचार पाते ही राजा जनक, अपने कुलपुरोहित शतानन्द (गौतम के पुत्र) और यज्ञ के ऋत्विजों (यज्ञ कराने वाले पुरोहित) को आगे करके, अर्घ्य (अतिथि के हाथ धुलाने का जल) लेकर बड़ी विनयशीलता से उन्हें मिलने आए। उन्होंने मधुपर्क (दही, घी, जल, मधु और मिसरी से बना सत्कार-पेय) सहित शास्त्रोक्त सत्कार अर्पित किया। विश्वामित्र ने जनक का, यज्ञ का, साथ आए मुनियों, ऋत्विजों और शतानन्द का कुशल पूछा, और ज्येष्ठता के क्रम से सब ऋषियों को आदर से मिले। जनक ने हाथ जोड़कर निवेदन किया, हे भगवन्, आप इन मुनिवरों सहित मेरे दिए आसन पर विराजें। विश्वामित्र बैठ गए, और उनके चारों ओर शतानन्द, ऋत्विज तथा मन्त्रियों सहित जनक यथायोग्य आसनों पर बैठ गए।

जनक ने कहा, आज देवताओं की कृपा से मेरे यज्ञ की समृद्धि सफल हुई। आपके दर्शन-मात्र से ही यज्ञ का फल मुझे प्राप्त हो गया। मेरे विद्वान ऋत्विज कहते हैं कि मेरी यज्ञ-दीक्षा (व्रतसंकल्प) अभी 12 दिन और रहेगी। उसके अन्त में आप अपनी दिव्य-दृष्टि से उन देवताओं को देखेंगे, जो अपना भाग लेने स्वयं प्रकट होते हैं। फिर प्रसन्न मुख से जनक ने पूछा, ये दो वीर बालक कौन हैं, जिनका पराक्रम देवताओं के समान, चाल हाथी-सी, रूप शार्दूल और वृषभ-सा, नेत्र कमल-दल-से बड़े हैं, और जो तलवार, तरकश व धनुष धारण किए अश्विनी-कुमारों (देवताओं के युगल वैद्य, अपने सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध) के समान सुन्दर, युवावस्था की दहलीज़ पर खड़े हैं? ये पृथ्वी पर उतरे देवताओं-से लगते हैं। ये किसके पुत्र हैं, किस प्रयोजन से और किसके लिए यहाँ पैदल आए हैं?

आसन पर बैठे मुनि विश्वामित्र राजा जनक से संवाद करते हुए, पीछे तरकश बाँधे राम और लक्ष्मण खड़े।

विश्वामित्र ने उन्हें दशरथ के पुत्र बताया, और सिद्धाश्रम में राक्षसों के वध, विशाला में जाने, अहल्या के दर्शन व गौतम से उनके मिलन की, और अन्त में इस महान धनुष की जिज्ञासा से मिथिला आने की समस्त कथा कह सुनाई, फिर मौन हो गए।

सार: राम-लक्ष्मण मिथिला पहुँचते हैं; जनक उनके दिव्य रूप पर मोहित होकर परिचय पूछते हैं, और विश्वामित्र उनकी अब तक की यात्रा बता देते हैं।

शतानन्द की जिज्ञासा और विश्वामित्र-कथा का आरम्भ

विश्वामित्र की कथा सुनकर शतानन्द, गौतम के ज्येष्ठ पुत्र (अहल्या-पुत्र), जिनकी कान्ति तपस्या से दीप्त थी, राम के दर्शन से रोमांचित और विस्मित हो उठे। उन्होंने पूछा, हे मुनिश्रेष्ठ, क्या आपने मेरी यशस्विनी माता, जो दीर्घ तप कर रही थीं, राम को दिखाईं? क्या उन्होंने राम का वन्य-फलों से सत्कार किया? क्या आपने राम को मेरी माता के साथ हुए पुराने अनिष्ट की कथा सुनाई? क्या मेरी माता राम के दर्शन से मेरे पिता से पुनः मिल गईं?

ऊँचे आसन पर बैठे मुनि विश्वामित्र कथा कहते हुए, सामने हाथ जोड़े भावविभोर वृद्ध ब्राह्मण, पास बैठे युवा राजकुमार।

विश्वामित्र ने उत्तर दिया, जो करना था वह मैंने किया; कोई चूक नहीं हुई। जैसे रेणुका (परशुराम की माता) अपने पति जमदग्नि से पुनः मिलीं, वैसे ही अहल्या अपने पति गौतम से मिल गईं। यह सुनकर शतानन्द ने राम से कहा, हे नरश्रेष्ठ, आपका स्वागत है; आप विश्वामित्र को आगे करके यहाँ आए, यह हमारा सौभाग्य है। ये अचिन्त्य-कर्मा ब्रह्मर्षि अमित-प्रभा वाले हैं; मैं इन्हें परम-गति जानता हूँ। आपसे अधिक भाग्यशाली पृथ्वी पर कोई नहीं, जिनके रक्षक विश्वामित्र हैं। सुनिए, मैं इनके बल और तत्त्व का वर्णन करता हूँ।

एक उप-कथा: विश्वामित्र-वंश इस प्रकार है, ब्रह्मा का पुत्र राजा कुश, कुश का बलवान और धर्मात्मा पुत्र कुशनाभ, कुशनाभ का पुत्र गाधि, और गाधि के महातेजस्वी पुत्र विश्वामित्र। इसीलिए इन्हें कौशिक और गाधि-पुत्र भी कहा जाता है।

विश्वामित्र दीर्घकाल तक धर्मात्मा, शत्रु-दमनकारी और प्रजा-हितैषी राजा रहे। एक बार वे एक अक्षौहिणी सेना के साथ पृथ्वी की परिक्रमा पर निकले।

समझने की कुंजी (संख्या): एक अक्षौहिणी सेना = 21,870 हाथी, उतने ही रथ, 65,610 घोड़े और 1,09,350 पैदल सैनिक, अर्थात् एक पूर्ण विशाल चतुरंगिणी सेना।

नगरों, राष्ट्रों, नदियों, पर्वतों और आश्रमों को पार करते हुए राजा विश्वामित्र वसिष्ठ के आश्रम-स्थल पर पहुँचे, जो पुष्प-लता-वृक्षों से समृद्ध, सिद्धों-चारणों से सेवित, और ब्रह्मर्षियों, देवर्षियों तथा तपस्या से सिद्ध महात्माओं से भरा हुआ था। वहाँ जल पर, वायु पर या गिरे पत्तों पर जीने वाले संयमी ऋषि, जपहोम में लगे वालखिल्य (ब्रह्मा के रोम से उत्पन्न ऋषि) और वैखानस (ब्रह्मा के नखों से उत्पन्न ऋषि) निवास करते थे। वह स्थान मानो दूसरा ब्रह्मलोक था।

सार: अहल्या के पुत्र शतानन्द विश्वामित्र की महिमा सुनाने लगते हैं, जो कभी राजा थे और जिन्होंने राजर्षि से ब्रह्मर्षि तक की यात्रा तय की।

शबला, कामधेनु का विवाद

वसिष्ठ को देखकर परम प्रसन्न होकर वीर विश्वामित्र ने उन्हें प्रणाम किया। वसिष्ठ ने आश्रम में स्वागत किया, आसन दिया, और फल-मूल अर्पित किए। फिर ब्रह्म-पुत्र वसिष्ठ ने राजा से कुशल पूछा, क्या आप राजा के चौगुने आचरण से प्रजा का पालन करते हैं? क्या सेवक भली प्रकार पाले जाते हैं, शत्रु जीते गए हैं, सेना, कोश, मित्र, पुत्र-पौत्र सब कुशल हैं? विश्वामित्र ने सब ओर कुशल बताया। दोनों धर्मात्मा देर तक बातें कर परस्पर प्रसन्न हुए।

तब वसिष्ठ ने मानो हँसते हुए कहा, हे महाबल, मैं आपकी इस सेना का और आपका यथायोग्य आतिथ्य करना चाहता हूँ; इसे स्वीकार कीजिए। विश्वामित्र बोले, आपके सत्कार-वचनों से ही मेरा सम्मान हो गया; आपके आश्रम में जो फल-मूल हैं, पाद्यआचमन और आपका दर्शन, उन्हीं से मैं सत्कृत हो गया; अब मैं प्रस्थान करूँगा। परन्तु वसिष्ठ बार-बार आग्रह करते रहे। अन्ततः विश्वामित्र ने कहा, जैसी आपकी इच्छा, वैसा ही हो।

प्रसन्न वसिष्ठ ने अपनी कामधेनु को बुलाया, जिसका नाम शबला (चितकबरे रंग के कारण) था। उन्होंने कहा, शबले, शीघ्र आइए; मैं इस राजर्षि विश्वामित्र और इनकी सेना का सत्कार करना चाहता हूँ। आप छहों रसों वाले व्यंजन, खाद्य-पेय, चाटने-चूसने योग्य पदार्थ, सब प्रत्येक की इच्छानुसार उत्पन्न कर दीजिए।

समझने की कुंजी (अवधारणा): छह रस = तीखा, खट्टा, मीठा, नमकीन, कड़वा और कषैला; कामधेनु इन सबके भोजन इच्छानुसार प्रकट कर देती थी।

शबला ने वैसा ही किया, गन्ना और उसके सब उत्पाद, अनेक प्रकार के मधु, खील, मैरेय (गुड़ आदि से बनी मदिरा) और उत्तम आसव, पर्वत-समान भात के ढेर, दूध में पकाए मीठे पकवान, दही की धाराएँ, और सहस्रों चाँदी के पात्र फलरसों से भरे हुए। विश्वामित्र की समस्त सेना, अन्तःपुर, ब्राह्मण, पुरोहित, मन्त्री और सेवक सब तृप्त और हर्षित हुए।

परम प्रसन्न होकर विश्वामित्र ने कहा, हे ब्रह्मन्, आपने मेरा सत्कार किया; अब मेरा एक निवेदन सुनिए। शबला को मुझे एक लाख गायों के बदले दे दीजिए, क्योंकि वह रत्न है और रत्न का अधिकारी राजा होता है। वसिष्ठ ने उत्तर दिया, मैं शबला को न एक लाख गायों के लिए, न सौ करोड़ गायों के लिए, न रजत-राशियों के लिए दूँगी। यह मुझसे अलग होने योग्य नहीं। इस पर हव्य (देवों का आहुति-भाग), कव्य (पितरों का श्राद्ध-भाग), मेरी प्राणयात्रा, अग्निहोत्र, बलि, स्वाहाकार-वषट्कार और विविध विद्याएँ, सब आश्रित हैं। यह मेरा सर्वस्व और मेरे आनन्द का स्रोत है; मैं सत्य कहता हूँ।

विश्वामित्र ने और भी अधिक आग्रह से कहा, मैं आपको सोने की जंजीरों और अंकुशों से सजे 14,000 हाथी, चार-चार श्वेत अश्वों से जुते 800 स्वर्ण-रथ, उत्तम कुल के 11,000 तेजस्वी घोड़े, और विविध रंगों की एक करोड़ युवा गायें दूँगा; केवल शबला दे दीजिए। जितने रत्न और स्वर्ण चाहें, सब दूँगा। पर वसिष्ठ अडिग रहे, मैं किसी भी कारण शबला को नहीं दूँगा। यही मेरा रत्न, धन, सर्वस्व और जीवन है। मेरे दर्श-पौर्णमास (अमावस्या और पूर्णिमा के यज्ञ), समस्त यज्ञ और क्रियाएँ इसी पर आधारित हैं; अधिक प्रलाप से क्या? मैं इस कामदोहिनी को नहीं दूँगा।

सार: राजा विश्वामित्र वसिष्ठ की कामधेनु शबला पर मोहित होकर उसे लाख गायों, हाथियों और रथों के बदले माँगते हैं, पर वसिष्ठ उसे अपना समस्त धर्म-आधार बताकर देने से इनकार कर देते हैं।

शबला बल उत्पन्न करती है

जब वसिष्ठ ने कामधेनु नहीं दी, तो विश्वामित्र उसे बलपूर्वक अपनी राजधानी ले जाने लगे। बलपूर्वक खींची जाती शबला दुःख और शोक से रोने लगी, उसने सोचा, क्या मुझ निरपराध और भक्त को देखकर भी धर्मात्मा वसिष्ठ ने मुझे त्याग दिया, जो राजसेवक मुझे इस दीन दशा में ले जा रहे हैं? बार-बार निःश्वास भरकर वह सैकड़ों सेवकों को झटककर वायु-वेग से वसिष्ठ के चरणों में दौड़ी आई।

मेघ-गर्जन-सी वाणी में रोती हुई वह बोली, हे ब्रह्म-पुत्र, क्या आपने मुझे त्याग दिया, जो राजभट मुझे आपके पास से ले जा रहे हैं? वसिष्ठ ने शोक-संतप्त शबला से, मानो दुःखी बहन से, कहा, मैं आपको नहीं त्याग रहा, न आपने मेरा कोई अपकार किया; मद में चूर यह महाबल राजा आपको बलपूर्वक ले जा रहा है। मेरा बल इसके समान नहीं, क्योंकि अतिथि होने से आज यह विशेष बलवान है; यह क्षत्रिय और पृथ्वी का स्वामी है। इसकी पूरी एक अक्षौहिणी सेना है, इसलिए यह अधिक बलवान है।

वचन समझने वाली शबला ने नम्रता से कहा, क्षत्रिय का बल कुछ नहीं माना जाता; ब्राह्मण अधिक बलवान होते हैं। हे ब्रह्मन्, ब्राह्मण का दिव्य ब्रह्म-बल क्षत्रिय-बल से श्रेष्ठ है। आपका बल अप्रमेय है; विश्वामित्र आपसे अधिक बलवान नहीं। मुझे आज्ञा दीजिए, मैं आपके ब्रह्म-बल से पुष्ट होकर इस दुरात्मा का दर्प, बल और प्रयत्न नष्ट कर दूँगी। वसिष्ठ ने कहा, शत्रु-सेना का नाश करने वाला बल उत्पन्न कीजिए।

शबला के हुंकार से सैकड़ों पह्लव योद्धा प्रकट हुए, जिन्होंने विश्वामित्र की सेना को नष्ट करना आरम्भ किया। क्रुद्ध विश्वामित्र ने अपने अस्त्रों से पह्लवों को मारा। तब शबला ने यवनों के समान भयंकर शक उत्पन्न किए, जो चम्पक-पुष्प के रंग के, तीक्ष्ण तलवार और पट्टिश (एक प्रकार का भाला) धारण किए, पीत वस्त्रों में थे। विश्वामित्र की समस्त सेना मानो प्रदीप्त अग्नि से भस्म होने लगी। तब विश्वामित्र ने अनेक अस्त्र छोड़े, जिनसे वे यवन, काम्बोज और बर्बर (म्लेच्छ-जातियाँ) विकल हो गए।

सार: वसिष्ठ की आज्ञा पाकर शबला अपने हुंकार और शरीर से अनेक योद्धा-जातियाँ उत्पन्न कर विश्वामित्र की सेना संहार देती है, यह ब्रह्म-बल की क्षत्रिय-बल पर पहली विजय है।

सौ पुत्रों का नाश और विश्वामित्र का तप-संकल्प

विश्वामित्र के अस्त्रों से योद्धा भ्रमित होकर भागते देखकर वसिष्ठ ने शबला को और योद्धा उत्पन्न करने को कहा। उसके हुंकार से सूर्य-समान काम्बोज, और थनों से अस्त्रधारी बर्बर निकले; गुप्तांग से यवन, मलद्वार से शक, और रोमकूपों से म्लेच्छ, हारीत और किरात उत्पन्न हुए। इन्होंने तत्क्षण विश्वामित्र की समस्त सेना मिटा दी।

अपनी सेना का संहार देखकर विश्वामित्र के सौ पुत्र अस्त्र लेकर वसिष्ठ पर टूट पड़े, पर महर्षि ने उन्हें केवल अपने हुंकार से अश्वों, रथों और पैदल सहित क्षण-भर में भस्म कर दिया। पुत्रों और सेना का नाश देखकर विश्वामित्र लज्जा और चिन्ता से भर उठे। वे शान्त हुए समुद्र, टूटे दाँत वाले सर्प और ग्रहण-ग्रस्त सूर्य के समान निस्तेज हो गए। कटे पंखों वाले पक्षी-से दीन होकर, अपने एकमात्र शेष पुत्र को राज्य पर बैठाकर, वे वन को चले गए।

हिमालय की ढलान पर, जो किन्नरों और नागों से सेवित थी, विश्वामित्र ने महादेव की प्रसन्नता के लिए तप किया। कुछ समय बाद वरदायी वृषभध्वज महादेव प्रकट हुए और बोले, हे राजन्, आप किसलिए तप करते हैं? जो वर चाहें, माँगें। विश्वामित्र ने प्रणाम कर कहा, हे महादेव, यदि आप प्रसन्न हैं, तो अंग-उपांग-उपनिषद सहित, रहस्यों समेत समस्त धनुर्वेद मुझे प्रदान कीजिए। देवों, दानवों, महर्षियों, गन्धर्वों, यक्षों और राक्षसों के जो भी अस्त्र हैं, सब मेरे मन में प्रकाशित हों। महादेव ने एवमस्तु कहकर प्रस्थान किया।

अस्त्र पाकर महाबल विश्वामित्र दर्प से भर उठे, और पर्व के समुद्र-से बढ़कर उन्होंने वसिष्ठ को मानो मृत मान लिया। वे आश्रम पहुँचकर अस्त्र छोड़ने लगे, जिनके तेज से तपोवन जलने लगा। भयभीत मुनि सैकड़ों दिशाओं में भागे, वसिष्ठ के शिष्य और पशु-पक्षी सहस्रों की संख्या में भाग खड़े हुए। आश्रम-स्थल मुहूर्त-भर में सूना और निःशब्द हो गया, यद्यपि वसिष्ठ बार-बार पुकारते रहे, मत डरो, मैं अभी गाधि-पुत्र को कोहरे को सूर्य की तरह नष्ट कर देता हूँ।

क्रुद्ध वसिष्ठ ने कहा, आपने चिर-पोषित आश्रम का नाश किया; आप मूढ़ और दुराचारी हैं, इसलिए अब आप वह नहीं रहेंगे जो हैं। यह कहकर परम क्रुद्ध वसिष्ठ ने यम-दण्ड-सा ब्रह्म-दण्ड (ब्राह्मण का दण्ड, उनका आध्यात्मिक तेज) उठाया और धूम-रहित प्रलय-अग्नि-से प्रज्वलित खड़े हो गए।

सार: सेना और सौ पुत्र खोकर विश्वामित्र वन जाते हैं, महादेव से समस्त अस्त्र पाकर लौटते हैं और वसिष्ठ के आश्रम पर अस्त्र चलाते हैं, पर वसिष्ठ केवल अपना ब्रह्म-दण्ड उठाकर सामने खड़े हो जाते हैं।

अस्त्रों का निष्फल होना और ब्रह्मत्व का संकल्प

विश्वामित्र ने आग्नेय-अस्त्र (अग्नि-देव का अस्त्र) उठाकर ललकारा, ठहरो, ठहरो। वसिष्ठ ने ब्रह्म-दण्ड उठाकर कहा, हे अधम क्षत्रिय, मैं यहाँ खड़ा हूँ; जो बल हो दिखाइए। मैं आज आपका और आपके अस्त्रों का दर्प चूर कर दूँगा। मेरे दिव्य ब्रह्म-बल को देखिए। गाधि-पुत्र का घोर आग्नेय-अस्त्र ब्रह्म-दण्ड से, जैसे अग्नि जल से शान्त होती है, शमित हो गया।

क्रुद्ध विश्वामित्र ने वारुण (वरुण का), रौद्र (रुद्र का), ऐन्द्र (इन्द्र का), पाशुपत और ऐषीक अस्त्र छोड़े। फिर मानव, मोहन, गान्धर्व, स्वापन, जृम्भण, मादन, संतापन, विलापन, शोषण, दारण, वज्र, ब्रह्म-पाश, काल-पाश, वरुण-पाश, पिनाक, सूखा और गीला अशनि, दण्ड, पैशाच, क्रौंच, धर्म-चक्र, काल-चक्र, विष्णु-चक्र, वायव्य, मथन, हयशिर, दो शक्ति-अस्त्र, कंकाल, मुसल, वैद्याधर महास्त्र, काल-अस्त्र, त्रिशूल, कपाल और कंकण, ये सब अस्त्र उन्होंने एक के बाद एक छोड़े। आश्चर्य यह कि ब्रह्म-पुत्र वसिष्ठ अपने एक दण्ड से ही उन सबको निगलते गए।

तब गाधि-पुत्र ने ब्रह्मास्त्र छोड़ा। उसे उद्यत देखकर अग्नि-देव सहित देव, देवर्षि, गन्धर्व और नाग सम्भ्रान्त हो गए; तीनों लोक त्रस्त हुए। पर वसिष्ठ ने अपने ब्रह्म-दण्ड और ब्रह्म-तेज से उस घोर ब्रह्मास्त्र को भी समूल निगल लिया। ब्रह्मास्त्र को ग्रसते समय वसिष्ठ का रूप त्रैलोक्य-मोहन और अति-भयंकर हो गया; उनके रोमकूपों से धूम-युक्त अग्नि-शिखाएँ किरणों-सी फूटने लगीं, और हाथ में उठा ब्रह्म-दण्ड प्रलय-अग्नि-सा दहकने लगा।

तब मुनिगण वसिष्ठ की स्तुति करने लगे, आपका बल अमोघ है; अपने तेज से अपने और दण्ड के तेज को शान्त कीजिए। विश्वामित्र पराजित हो गए हैं; लोक व्यथा-मुक्त हों। प्रार्थना सुनकर वसिष्ठ शान्त हुए। पराजित विश्वामित्र गहरी साँस लेकर बोले, धिक्कार है क्षत्रिय-बल को; ब्राह्मण के तेज से उत्पन्न बल ही सच्चा बल है। मेरे समस्त अस्त्र एक ब्रह्म-दण्ड से नष्ट हो गए। इस श्रेष्ठता को समझकर अब मैं शान्त इन्द्रिय-मन से वह महान तप करूँगा, जो मुझे इसी जन्म में ब्रह्मत्व दिला सके।

सार: विश्वामित्र के सब अस्त्र, यहाँ तक कि ब्रह्मास्त्र भी, वसिष्ठ के एक ब्रह्म-दण्ड से निष्फल हो जाते हैं; पराजित होकर विश्वामित्र क्षत्रिय-बल को धिक्कारते हैं और ब्राह्मणत्व पाने का संकल्प लेते हैं।

त्रिशंकु का स्वर्ग-अभिलाष

बार-बार निःश्वास भरते हुए, वसिष्ठ से अपनी हार के दुःख में विश्वामित्र दक्षिण दिशा को गए और अपनी मुख्य रानी के साथ घोर तप में लग गए। फल-मूल पर जीते, संयमी विश्वामित्र को तप-काल में चार पुत्र हुए, हविष्पन्द, मधुष्पन्द, दृढ़नेत्र और महारथ। एक सहस्र वर्ष पूरे होने पर ब्रह्मा प्रकट हुए और बोले, राजर्षियों के लोक आपने तप से जीत लिए हैं; हम आपको राजर्षि मानते हैं। यह कहकर ब्रह्मा देवों सहित लौट गए।

विश्वामित्र लज्जा और खेद से बोले, मैंने इतना घोर तप किया, फिर भी देव और ऋषिगण मुझे केवल राजर्षि मानते हैं, ब्राह्मण नहीं; तो ब्रह्मत्व मेरे तप का फल नहीं। यह सोचकर उन्होंने फिर तप आरम्भ किया।

इसी समय इक्ष्वाकु-वंश का यशस्वी राजा त्रिशंकु, जो सत्यवादी और जितेन्द्रिय था, यह इच्छा करने लगा कि वह सशरीर स्वर्ग जाए। उसने वसिष्ठ को बुलाकर अपना मनोरथ कहा, पर वसिष्ठ ने इसे असम्भव बताकर मना कर दिया। त्रिशंकु दक्षिण दिशा को गया, जहाँ वसिष्ठ के सौ पुत्र तप कर रहे थे। नम्रता से प्रणाम कर उसने कहा, गुरु ने मुझे ठुकरा दिया; मैं आप सबकी शरण आया हूँ। मैं सशरीर स्वर्ग जाने के लिए महायज्ञ करना चाहता हूँ; आप मुझे अनुमति देकर यज्ञ करा दीजिए। इक्ष्वाकुओं के लिए पुरोहित परम-गति हैं; उनके बाद आप ही मेरे देव हैं।

सार: विश्वामित्र को राजर्षि का पद मिलता है पर वे असन्तुष्ट होकर तप जारी रखते हैं; उसी समय अयोध्या-वंश का राजा त्रिशंकु सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा से पहले वसिष्ठ और फिर उनके पुत्रों के पास पहुँचता है।

त्रिशंकु का शाप और विश्वामित्र की शरण

क्रोध से भरे वसिष्ठ के सौ पुत्रों ने कहा, हे नरश्रेष्ठ, आप अभी बालबुद्धि हैं; अपनी राजधानी लौट जाइए। सत्यवादी गुरु वसिष्ठ ने आपको ठुकराया है; उन्हें लाँघकर आप दूसरे पुरोहित के पास कैसे आए? वसिष्ठ तीनों लोकों का यज्ञ कराने में समर्थ हैं; जिसे उन्होंने असम्भव कहा, उसे हम कैसे करें? आप लौट जाइए। यह सुनकर त्रिशंकु ने फिर कहा, मुझे गुरु और गुरु-पुत्रों ने ठुकराया; अब मैं अन्य गति ढूँढ़ूँगा; आपका कल्याण हो। अति क्रुद्ध पुत्रों ने उसे शाप दिया, आप चाण्डाल बन जाएँगे, और अपने-अपने आश्रम चले गए।

रात बीतते ही राजा चाण्डाल बन गया, काला, नीले वस्त्र पहने, बाल झड़े हुए, श्मशान-माला और भस्म से लिपा, लोहे के आभरण पहने। उसे चाण्डाल-रूप में देखकर सब मन्त्री और अनुगामी नागरिक उसे छोड़कर भाग गए; केवल वही धीरजवान राजा, दिन-रात संताप में जलता, अकेला तपोधन विश्वामित्र के पास गया। उसे विफल और चाण्डाल बना देखकर विश्वामित्र को करुणा हुई। उन्होंने पूछा, हे अयोध्या-नरेश, आप किस प्रयोजन से आए हैं, शाप से चाण्डाल बने हुए?

त्रिशंकु ने हाथ जोड़कर कहा, मुझे गुरु और गुरु-पुत्रों ने ठुकराया, और मनोरथ पाने के पहले ही विपरीत फल मिल गया। मैंने सशरीर स्वर्ग जाने के लिए सौ यज्ञ करने चाहे, पर न वह सिद्ध हुआ, न फल मिला। मैंने कभी असत्य नहीं कहा, न कहूँगा; मैं क्षत्रिय-धर्म की शपथ खाता हूँ। मैंने विविध यज्ञों से देव-पूजन किया और धर्म से प्रजा पाली; गुरुजन मेरे शील-आचरण से संतुष्ट थे; फिर भी धर्म में लगे रहते हुए मेरा यज्ञ-प्रयास सफल न हुआ। इसलिए मैं दैव को ही परम मानता हूँ, पुरुषार्थ को निरर्थक। हे सौम्य, दैव से सब आक्रान्त है; दैव ही परम-गति है। मुझ अति-आर्त पर, जिसका कर्म दैव से हत हुआ, कृपा कीजिए। मैं किसी अन्य की शरण नहीं जाऊँगा; आप अपने पुरुषार्थ से मेरे दुर्भाग्य को पलट दीजिए।

समझने की कुंजी (अवधारणा): चाण्डाल यहाँ निम्नतम बहिष्कृत वर्ण को कहते हैं; पाठ यह दर्शाता है कि वर्ण-परिवर्तन केवल कर्म-वेश से नहीं, अपितु किसी प्रबल आत्मा के संकल्प या अपने कर्म से होता है, और शरीर के घटक भी बदल जाते हैं।

सार: वसिष्ठ-पुत्रों के शाप से त्रिशंकु चाण्डाल बन जाता है, सब उसे त्याग देते हैं; अकेला वह विश्वामित्र की शरण जाता है और दैव से पराजित अपने पुरुषार्थ को लौटाने की प्रार्थना करता है।

विश्वामित्र का आश्वासन और महोदय व वसिष्ठ-पुत्रों को शाप

विश्वामित्र ने मधुर वचन से चाण्डाल बने राजा से कहा, हे इक्ष्वाकु-वत्स, स्वागत है; मैं आपको परम धर्मात्मा जानता हूँ। मत डरिए, मैं आपको शरण दूँगा। मैं समस्त पुण्य-कर्मा महर्षियों को यज्ञ कराने के लिए बुलाऊँगा; आप निश्चिन्त होकर यज्ञ करेंगे। आप इसी रूप में, जो गुरु-शाप से आप पर आया है, सशरीर स्वर्ग जाएँगे। आप मेरी शरण आए, इसलिए मैं स्वर्ग को आपके हाथ में आया-सा मानता हूँ।

विश्वामित्र ने अपने पुत्रों और शिष्यों को आज्ञा दी कि वे सब ऋषियों को, वसिष्ठ-पुत्रों सहित, यज्ञ के लिए बुलाएँ; और जो कोई अनादर-वचन कहे, वह सब उन्हें बताया जाए। शिष्य दिशाओं में गए। सब देशों से ब्रह्मवादी आने लगे। शिष्यों ने लौटकर बताया कि महोदय और वसिष्ठ के सौ पुत्रों को छोड़ सब आ रहे हैं। उन सबने क्रुद्ध होकर कहा था, जिस यजमान का यज्ञ क्षत्रिय करा रहा हो, उसमें देव हव्य कैसे ग्रहण करें, और चाण्डाल का यज्ञ तो और भी अधिक त्याज्य है? चाण्डाल का भोजन खाकर ब्राह्मण स्वर्ग कैसे जाएँगे?

यह सुनकर विश्वामित्र क्रोध से रक्त-नेत्र हो बोले, ये निरपराध मुझ तपस्वी की निन्दा करते हैं, इसलिए ये दुर्बुद्धि आज ही भस्म होकर काल-पाश से यम-लोक पहुँचें। ये 700 जन्मों तक निर्दय मुष्टिक (चाण्डालों की एक उपजाति, जो शव का वस्त्र हर ले और कुत्ते का मांस खाए) बनकर विकृत-रूप में पृथ्वी पर भटकें। दुर्बुद्धि महोदय भी, जिसने मुझ निर्दोष की निन्दा की, समस्त लोकों में निन्दित होकर निषाद-योनि (बहिष्कृत जाति) पाए, प्राण-हिंसा में रत रहकर निर्दय बने और दीर्घकाल दुर्गति भोगे। यह शाप देकर महातपा विश्वामित्र चुप हो गए।

सार: विश्वामित्र त्रिशंकु को शरण देकर यज्ञ के लिए ऋषियों को बुलाते हैं; जब वसिष्ठ-पुत्र और महोदय चाण्डाल के यज्ञ की निन्दा करते हैं, तो विश्वामित्र उन्हें भयानक शाप दे देते हैं।

त्रिशंकु का स्वर्ग, इन्द्र का निषेध और त्रिशंकु-स्वर्ग की रचना

अपने तप-बल से वसिष्ठ-पुत्रों और महोदय का नाश जानकर विश्वामित्र ने ऋषियों के बीच कहा, यह इक्ष्वाकु-वंशी त्रिशंकु धर्मात्मा और उदार है, और मेरी शरण आया है; इसे सशरीर देवलोक जाने के लिए हम सब मिलकर यज्ञ करें। धर्मज्ञ ऋषियों ने कहा, विश्वामित्र अति-क्रोधी हैं; जो वे कहें, अवश्य किया जाए, अन्यथा वे शाप दे देंगे। इसलिए यज्ञ आरम्भ हो। सब ऋषियों ने अपने-अपने ऋत्विक-कर्म सँभाले। विश्वामित्र स्वयं यज्ञ के मुख्य अध्वर्यु बने। ऋत्विजों ने विधिवत् सब कर्म किए। विश्वामित्र ने देवों को भाग लेने के लिए आहूत किया, पर कोई देव प्रकट न हुआ।

क्रोध से भरकर विश्वामित्र ने स्रुव (आहुति-चमचा) उठाकर त्रिशंकु से कहा, हे नरेश्वर, मेरे स्वार्जित तप का वीर्य देखिए; मैं आपको सशरीर स्वर्ग भेजता हूँ। मेरे तप का जो कुछ फल हो, उसके बल से आप सशरीर स्वर्ग जाइए। उनके कहते ही त्रिशंकु ऋषियों के देखते-देखते सशरीर स्वर्ग चढ़ गया। उसे स्वर्ग पहुँचा देखकर इन्द्र ने देवों सहित कहा, त्रिशंकु, लौटिए; स्वर्ग में आपका कोई स्थान अर्जित नहीं। गुरु-शाप से हत हे मूढ़, सिर के बल पृथ्वी पर गिरिए। इन्द्र के कहते ही त्रिशंकु, बचाओ-बचाओ पुकारता, नीचे गिरने लगा।

उसकी पुकार सुनकर विश्वामित्र क्रोध से, ठहरो-ठहरो कहते हुए, दूसरे ब्रह्मा-से तेजस्वी होकर ऋषियों के बीच बैठे रहे। उन्होंने दक्षिण दिशा में दूसरे सप्तर्षि, और 27 नक्षत्रों का दूसरा मण्डल रचा। फिर वे दूसरा इन्द्र, या इन्द्र-रहित देव-समूह भी रचने को उद्यत हुए। सम्भ्रान्त देव-असुर और ऋषि-संघ ने विनय से कहा, हे महात्मा, गुरु-शाप से क्षीण-पुण्य यह राजा सशरीर स्वर्ग जाने योग्य नहीं।

विश्वामित्र ने कहा, मैंने त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग चढ़ाने की प्रतिज्ञा की है; मैं इसे असत्य नहीं कर सकता। त्रिशंकु को सशरीर शाश्वत स्वर्ग प्राप्त हो, और मेरे रचे नक्षत्र ध्रुव रहें। जब तक लोक रहें, ये सब टिके रहें; आप अनुमति दीजिए। देवों ने कहा, एवमस्तु; ये सब टिके रहें। वैश्वानर-पथ के बाहर आकाश में अनेक नक्षत्र चमकते रहेंगे, और त्रिशंकु सिर के बल लटका, देव-सा प्रसन्न, उन तारों के बीच चमकता रहेगा; ये तारे उसकी परिक्रमा करेंगे। विश्वामित्र ने बाढ़म् कहा। यज्ञ के अन्त में देव और ऋषि लौट गए।

सार: विश्वामित्र अपने तप-बल से त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेजते हैं; इन्द्र उसे गिरा देता है, पर विश्वामित्र उसे आकाश में रोककर एक नया दक्षिणी नक्षत्र-मण्डल और त्रिशंकु-स्वर्ग रच डालते हैं, और देवों को समझौता करना पड़ता है।

शुनःशेप, अम्बरीष का यज्ञ-पशु

प्रस्थान करते ऋषियों को देखकर विश्वामित्र ने कहा, त्रिशंकु के कारण दक्षिण दिशा में महान विघ्न उत्पन्न हुआ; हम पश्चिम के पुष्कर-तीर्थ की ओर चलकर वहाँ तप करें। वहाँ जाकर उन्होंने फल-मूल पर जीते हुए घोर, दुराधर्ष तप आरम्भ किया।

इसी समय अयोध्या के महान राजा अम्बरीष ने अश्वमेध यज्ञ आरम्भ किया। यज्ञ चलते समय इन्द्र ने यज्ञ-पशु चुरा लिया। पशु लुप्त होने पर ऋत्विज ने राजा से कहा, हे राजन्, आपकी असावधानी से पशु लुप्त हुआ; अरक्षित यज्ञ का दोष राजा को नष्ट करता है। इसलिए शीघ्र खोया पशु, या उसके स्थान पर कोई मनुष्य-पशु, यज्ञ-कर्म से पहले ले आइए; यही इस पाप का मुख्य प्रायश्चित्त है।

समझने की कुंजी (अनुष्ठान): प्रायश्चित्त = प्रायः अर्थात् पाप, और चित्त अर्थात् उसका शोधन; अश्वमेध में अश्व के लौटने तक यज्ञ-कर्म रुका रहता है, और पशु खोने पर शास्त्र मनुष्य-पशु को विकल्प बताते हैं।

राजा सहस्रों गायें लेकर मनुष्य-पशु ढूँढ़ने अनेक देशों, नगरों, वनों और आश्रमों में भटकता रहा। भृगुतुंग पर्वत पर उसने ऋषि ऋचीक को पुत्रों और पत्नी सहित बैठा देखा। प्रणाम कर कुशल पूछकर उसने कहा, हे भाग्यवान, यदि आप एक लाख गायों के बदले अपना कोई पुत्र यज्ञ-पशु के लिए दे दें, तो मैं कृतकृत्य हो जाऊँ; मैंने सब देश छान डाले, पर यज्ञ-अश्व नहीं मिला; एक पुत्र मूल्य लेकर मुझे दे दीजिए।

ऋचीक ने कहा, मैं अपना ज्येष्ठ पुत्र किसी भी प्रकार नहीं बेचूँगा। तब उन उच्च-कुल के बालकों की माता बोली, भगवान ऋचीक ज्येष्ठ को अविक्रेय कहते हैं; मेरा कनिष्ठ शुनक भी मुझे प्रिय है, इसलिए मैं उसे नहीं दूँगी; प्रायः ज्येष्ठ पुत्र पिता के और कनिष्ठ माता के प्रिय होते हैं। तब मध्यम पुत्र शुनःशेप ने स्वयं कहा, पिता ज्येष्ठ को और माता कनिष्ठ को अविक्रेय कहती हैं; मध्यम मैं ही विक्रेय हूँ; हे राजपुत्र, मुझे ले जाइए।

ब्रह्मवादी बालक के वचन के अन्त में राजा अम्बरीष ने करोड़ों स्वर्ण-रजत मुद्राएँ, रत्न-राशियाँ और एक लाख गायें देकर शुनःशेप को ले लिया, और परम प्रसन्न होकर उसे रथ पर बैठाकर शीघ्र अपनी राजधानी को लौट चला।

सार: अम्बरीष का यज्ञ-पशु इन्द्र चुरा लेता है; विकल्प में राजा ऋषि ऋचीक के मध्यम पुत्र शुनःशेप को, जो स्वयं प्रस्तुत होता है, लाख गायों और धन के बदले खरीद लेता है।

शुनःशेप की रक्षा और विश्वामित्र-पुत्रों को शाप

शुनःशेप को लेकर अम्बरीष दोपहर में पुष्कर पर विश्राम करने लगा। तभी शुनःशेप ज्येष्ठ पुष्कर पर ऋषियों संग तप करते अपने मामा विश्वामित्र के पास पहुँचा।

एक उप-कथा: विश्वामित्र की बहन सत्यवती का विवाह ऋचीक से हुआ था; उसी सत्यवती से शुनःशेप का जन्म माना जाता है, इसलिए विश्वामित्र उसके मामा थे। (बाद की परम्परा में गोविन्दराज नामक टीकाकार अम्बरीष को राजा हरिश्चन्द्र ही मानते हैं, जिनकी ऐसी ही कथा बह्वृच-ब्राह्मण में मिलती है।)

थका-प्यासा, उदास बालक मुनि की गोद में गिर पड़ा और बोला, मेरे न माता है, न पिता; फिर कुटुम्बी कहाँ? हे धर्मात्मा, धर्म के नाते मेरी रक्षा कीजिए; आप ही सबके रक्षक और हितैषी हैं। ऐसा कीजिए कि राजा अम्बरीष का यज्ञ-फल भी सिद्ध हो और मैं भी मृत्यु से बचकर, दीर्घायु पाकर, तप करके स्वर्ग जाऊँ। मुझ अनाथ के नाथ बनिए; जैसे पिता पुत्र की रक्षा करता है, वैसे ही पाप-जनित विपत्ति से मेरी रक्षा कीजिए।

विश्वामित्र ने सान्त्वना देकर अपने पुत्रों से कहा, पिता पुत्रों को इसीलिए जन्म देते हैं कि परलोक का हित सधे; वह समय आ गया है। यह मुनि-पुत्र बालक मुझसे शरण चाहता है; आपमें से कोई अपना जीवन देकर इसका प्रिय करे, अम्बरीष के यज्ञ में पशु बनकर अग्नि को तृप्त करे। ऐसा करने से शुनःशेप को रक्षक मिलेगा, यज्ञ निर्विघ्न होगा, देव तृप्त होंगे और मेरा वचन भी पूरा होगा। यह सुनकर मधुच्छन्द आदि पुत्र अभिमान से, हँसी-सी उड़ाते हुए बोले, आप अपने पुत्रों को छोड़कर दूसरे का पुत्र कैसे बचाते हैं? यह तो कुत्ते का मांस भोजन में मिलाने-सा अकार्य लगता है।

क्रोध से रक्त-नेत्र होकर विश्वामित्र बोले, यह उत्तर निःशंक, धर्म-विरुद्ध, कठोर और रोमांचक है। मेरे वचन को लाँघने के कारण आप सब वसिष्ठ-पुत्रों के समान निम्न-जातियों में जन्म लेकर, कुत्ते का मांस खाते, पूरे एक सहस्र वर्ष पृथ्वी पर भटकेंगे। फिर उन्होंने आर्त शुनःशेप को मन्त्रों से रोग-रहित रक्षा प्रदान कर कहा, जब आप पवित्र पाशों से बँधे, लाल माला और लाल चन्दन से सजे, वैष्णव यूप (यज्ञ-स्तम्भ) के पास पहुँचें, तो अग्नि के माध्यम से इन्द्र और विष्णु की स्तुति करना। ये दो दिव्य गाथाएँ गाना; इन्हीं से अम्बरीष के यज्ञ में आपको सिद्धि मिलेगी।

दोनों गाथाएँ एकाग्र मन से सीखकर शुनःशेप ने अम्बरीष से कहा, हे राजसिंह, शीघ्र चलें; दीक्षा लेकर निर्विघ्न यज्ञ पूरा कीजिए। राजा शीघ्र यज्ञ-वाट पहुँचा। सदस्यों की अनुमति से पवित्र-चिह्नित, लाल-वस्त्र पहना पशु शुनःशेप को यूप से बाँध दिया। बँधे हुए मुनि-पुत्र ने उत्तम स्तुतियों से इन्द्र और उनके अनुज विष्णु (वामन-रूप) की स्तुति की। प्रसन्न सहस्राक्ष इन्द्र ने शुनःशेप को तत्क्षण दीर्घायु का वर दिया, और राजा अम्बरीष को भी यज्ञ का बहु-गुण फल मिला। धर्मात्मा विश्वामित्र ने पुष्कर में और एक हज़ार वर्ष तप किया।

सार: विश्वामित्र शुनःशेप को इन्द्र और विष्णु की गुप्त स्तुतियाँ सिखाकर बचा लेते हैं, जिससे बालक भी जीवित रहता है और यज्ञ भी सफल होता है; आज्ञा न मानने वाले अपने पुत्रों को वे शाप दे देते हैं।

मेनका, ऋषि-पद और महर्षि-पद

एक हज़ार वर्ष पूरे होने पर ब्रह्मा देवों सहित आए और बोले, हे विश्वामित्र, आप अपने पुण्य-कर्मों से अब ऋषि बन गए। यह कहकर ब्रह्मा लौट गए, और विश्वामित्र ने फिर घोर तप आरम्भ किया। कुछ काल बाद परम-अप्सरा मेनका पुष्कर में स्नान करने आई। उसे बादल में बिजली-सी अनुपम रूपवती देखकर, काम-दर्प के वश होकर मुनि बोले, हे अप्सरा, आपका स्वागत है; मेरे आश्रम में रहिए; मैं मदन से मोहित हूँ, मुझ पर कृपा कीजिए। वह सुन्दरी वहीं रहने लगी।

यह उनके तप में बड़ा विघ्न था। उसके साथ रहते हुए दस वर्ष सुखपूर्वक बीत गए। समय बीतने पर विश्वामित्र मानो लज्जित होकर चिन्ता और शोक में डूब गए; उन्हें आक्रोश के साथ बोध हुआ कि यह सब देवों की उनके तप को हरने की चाल थी। उन्होंने सोचा, दस वर्ष काम-मोह में मुझे एक दिन-रात-से बीत गए; यह तो विघ्न है। गहरी साँस भरकर वे पश्चात्ताप से दुःखी हुए।

हाथ जोड़े काँपती, भयभीत मेनका को देखकर मुनि ने उसे मधुर वचनों से विदा किया और उत्तर-पर्वत हिमालय को गए। आजीवन ब्रह्मचर्य का दृढ़ संकल्प कर, काम को जीतने को, वे कौशिकी नदी के तीर पर दुराधर्ष तप करने लगे।

एक उप-कथा: विश्वामित्र की बड़ी बहन सत्यवती अपने स्वर्गीय पति का अनुगमन कर स्वर्ग गईं और फिर नदी रूप में बदल गईं; वही बिहार में आज भी कौशिकी (आधुनिक कोसी) नाम से बहती हैं।

देवों को भय हुआ। ब्रह्मा से ऋषि-संघ सहित सब देवों ने प्रार्थना की, कुशिक-पुत्र को महर्षि की उपाधि मिले। ब्रह्मा ने आकर विश्वामित्र से कहा, हे महर्षि, आपके उग्र तप से प्रसन्न होकर मैं आपको ऋषि-मुख्यता और महत्त्व देता हूँ। विश्वामित्र ने हाथ जोड़कर कहा, हे भगवन्, यदि आप मुझे अतुलनीय ब्रह्मर्षि-शब्द से सम्बोधित करें, तभी मैं स्वयं को जितेन्द्रिय मानूँ। ब्रह्मा बोले, अभी आप जितेन्द्रिय नहीं हुए; और प्रयत्न कीजिए, यह कहकर स्वर्ग चले गए।

देवों के जाने पर विश्वामित्र भुजाएँ ऊपर किए, निराधार, वायु-भक्षी होकर, ग्रीष्म में चारों ओर चार अग्नियों और ऊपर सूर्य, इन पाँच अग्नियों के बीच, वर्षा में खुले आकाश में, और शिशिर में रात-दिन जल में खड़े होकर, एक सहस्र वर्ष घोर तप करते रहे।

सार: विश्वामित्र को पहले ऋषि और फिर महर्षि का पद मिलता है, पर मेनका के साथ दस वर्ष भटककर वे फिर हिमालय और कौशिकी-तीर पर पंचाग्नि-तप करते हैं, क्योंकि उन्हें ब्रह्मर्षि से कम स्वीकार नहीं।

रम्भा का शाप और मौन-व्रत

इन्द्र ने मरुद्गणों सहित अप्सरा रम्भा को बुलाकर कहा, हे रम्भा, देवों का यह महान कार्य आपको करना है, विश्वामित्र को काम-मोह से लुभाना। रम्भा भयभीत होकर बोली, हे सुरपति, यह उग्र मुनि मुझे घोर शाप दे देगा; मुझ पर कृपा कीजिए। इन्द्र ने कहा, मत डरिए; मैं कन्दर्प (काम-देव) सहित कोयल बनकर, चित्त को हरने वाली मधुर तानों में, वसन्त में आपके पास रहूँगा; आप अति-सुन्दर रूप धरकर उस तपस्वी का मन भटका दीजिए। बिखरी मुस्कान वाली रम्भा विश्वामित्र को लुभाने लगी।

कोयल की मधुर तान सुनकर मुनि हर्षित मन से रम्भा को देखने लगे। उस अद्भुत स्वर-गीत और रम्भा के दर्शन से मुनि को सन्देह हुआ (कि यह स्वयं आई या इन्द्र ने भेजी)। सब इन्द्र का कृत्य जानकर क्रुद्ध विश्वामित्र ने शाप दिया, हे रम्भा, आपने मुझ काम-क्रोध-विजय-अभिलाषी को लुभाया, इसलिए आप दस हज़ार वर्ष पत्थर बनकर खड़ी रहेंगी, हे अभागिनी। एक महातेजस्वी ब्राह्मण (अर्थात् ब्रह्मा-पुत्र वसिष्ठ) आपको मेरे क्रोध से इस दण्ड से मुक्त करेगा।

उस घोर शाप से रम्भा तत्क्षण शिला बन गई; शाप सुनकर काम और इन्द्र खिसक गए। क्रोध से तप का पुण्य फिर क्षीण हो गया, और अजित-इन्द्रिय विश्वामित्र को शान्ति न मिली। उन्होंने सोचा, अब मैं न क्रोध करूँगा, न बोलूँगा; सैकड़ों वर्ष साँस तक न लूँगा; जब तक तप से ब्राह्मणत्व न मिले, तब तक अनेक वर्ष बिना श्वास और अन्न के खड़ा रहूँगा; तप करते मेरे अंग क्षीण न होंगे। यह असाधारण प्रतिज्ञा करके वे एक सहस्र वर्ष का व्रत-संकल्प लेकर बैठ गए।

सार: इन्द्र की भेजी रम्भा को विश्वामित्र शाप देकर शिला बना देते हैं, पर क्रोध से फिर तप-पुण्य क्षीण होने पर वे क्रोध और बोलने का त्याग कर, बिना श्वास-अन्न के सहस्र-वर्षीय मौन-व्रत लेते हैं।

अन्तिम तप और ब्रह्मर्षि-पद

उत्तर दिशा छोड़कर विश्वामित्र पूर्व दिशा में जाकर अति-घोर तप करने लगे। एक सहस्र वर्ष का परम-कठिन मौन-व्रत लेकर वे काष्ठ-समान निश्चल रहे; अनेक विघ्नों के बीच भी एक सहस्र वर्ष क्रोध उन्हें छू न सका। व्रत पूरा होने पर वे भोजन करने को उद्यत हुए। तभी इन्द्र ब्राह्मण-वेश में आकर पका भोजन माँगने लगा। विश्वामित्र ने बिना झिझक सारा भोजन ब्राह्मण को दे दिया, स्वयं भूखे रहे, और मौन-व्रत में स्थित रहकर एक शब्द भी न बोले; फिर वैसे ही मौन होकर श्वास भी रोक लिया।

एक हज़ार वर्ष और श्वास न लेने पर उनके सिर से धूम निकलने लगा, जिससे तीनों लोक आक्रान्त और संतप्त हो गए। उनके तप और तेज से मोहित होकर देव, ऋषि, गन्धर्व, नाग और राक्षस ब्रह्मा के पास गए और बोले, अनेक प्रकार से लुभाए और क्रुद्ध किए जाने पर भी विश्वामित्र तप से और-और ऊँचे उठ रहे हैं; इनमें सूक्ष्म-सा भी दोष नहीं दिखता। यदि इनकी इच्छा पूरी न हुई, तो ये तीनों लोकों को भस्म कर देंगे। समुद्र क्षुब्ध हैं, पर्वत फट रहे हैं, पृथ्वी काँप रही है, वायु प्रचण्ड बह रही है। सूर्य इनके तेज से निष्प्रभ है। नाश की बुद्धि करने से पहले इन्हें प्रसन्न कीजिए; भले ये देवराज्य ही माँगें, वह दे दीजिए।

तब ब्रह्मा सहित सब देव आकर बोले, हे ब्रह्मर्षि, आपका स्वागत है; आपके तप से हम संतुष्ट हैं। हे कुशिक-पुत्र, आपने उग्र तप से ब्राह्मणत्व पा लिया; मैं आपको दीर्घायु भी देता हूँ। प्रसन्न होकर विश्वामित्र ने प्रणाम कर कहा, यदि मुझे ब्राह्मणत्व और दीर्घायु मिले, तो ओंकार, वषट्कार और वेद मुझे स्वयं वरण करें; और क्षत्र-विद्या तथा ब्रह्म-विद्या दोनों के श्रेष्ठ ब्रह्म-पुत्र वसिष्ठ मुझे ब्राह्मण कहें; यदि मेरी यह परम-कामना पूरी हो, तो आप जाइए।

देवों द्वारा मनाए जाने पर वसिष्ठ ने आकर विश्वामित्र से मैत्री की और कहा, एवमस्तु; आप निःसन्देह ब्रह्मर्षि हैं; आपकी हर कामना पूरी हुई। यह कहकर देव लौट गए। धर्मात्मा विश्वामित्र ने भी उत्तम ब्राह्मणत्व पाकर वसिष्ठ का सम्मान किया। इस प्रकार, हे राम, उच्च-आत्मा विश्वामित्र ने इसी जन्म में, बिना शरीर बदले, ब्राह्मणत्व प्राप्त किया। यही मुनिश्रेष्ठ हैं, यही तप-मूर्ति, यही परम धर्म और पराक्रम के नित्य आश्रय हैं।

यह कहकर शतानन्द मौन हो गए। उनकी कथा सुनकर जनक ने हाथ जोड़कर विश्वामित्र से कहा, मैं धन्य हूँ; आपने राम-लक्ष्मण सहित मेरे यज्ञ में पधारकर मुझे कृतार्थ किया; आपके दर्शन से मैं पावन हुआ। आपके महान तप और गुणों की विस्तृत कथा मैंने और राम ने सुनी; मेरी तृप्ति नहीं होती। पर सन्ध्या-कर्म का समय निकट है, सूर्य अस्त हो रहा है; कल प्रातः फिर दर्शन दीजिए; अब अनुमति दीजिए। विश्वामित्र ने जनक की प्रशंसा कर उसे विदा किया। जनक पुरोहित और बन्धुओं सहित प्रदक्षिणा कर लौटे; विश्वामित्र राम-लक्ष्मण सहित, महात्माओं से पूजित होते हुए, अपने डेरे को गए।

सार: विश्वामित्र अन्ततः बिना शरीर बदले इसी जन्म में ब्रह्मर्षि बन जाते हैं, और स्वयं वसिष्ठ उन्हें वैसा स्वीकार करते हैं; यहीं शतानन्द की कथा समाप्त होती है और जनक संध्या से पूर्व लौट जाते हैं।

धनुष की कथा और सीता का जन्म

स्वच्छ प्रभात में नित्य-कर्म पूरा कर जनक ने विश्वामित्र को राम-लक्ष्मण सहित बुलाया। शास्त्रोक्त विधि से उनका सत्कार कर जनक से विश्वामित्र ने कहा, हे राजन्, दशरथ के ये दो लोक-विख्यात क्षत्रिय राजकुमार आपके पास रखे उस श्रेष्ठ धनुष को देखना चाहते हैं; इसे दिखाइए। ये दर्शन कर अपनी इच्छा पूरी कर लौट जाएँगे।

राजा जनक हाथ फैलाकर शिव-धनुष की कथा सुनाते हुए, ऊपर धनुष थामे शिव का दिव्य रूप, सामने राम-लक्ष्मण बैठे।

जनक ने कहा, सुनिए, यह धनुष किसलिए यहाँ है। निमि के ज्येष्ठ पुत्र राजा देवरात के हाथों यह धनुष देवों ने धरोहर रखा था। पूर्वकाल में दक्ष-यज्ञ के नाश के समय वीर रुद्र ने क्रोध से इसी धनुष की डोरी खींचकर देवों से कहा था, आपने मुझे यज्ञ-भाग नहीं दिया, इसलिए मैं इस धनुष से आपके श्रेष्ठ अंग काट दूँगा। विकल देवों ने शंकर को मनाया, और प्रसन्न होकर शिव ने यह धनुष देवों को दे दिया। देवों ने इसे हमारे पूर्वज देवरात के पास धरोहर रखा।

एक उप-कथा: संस्कृत में सीता शब्द का मूल अर्थ हल की रेखा (फाल का खण्ड) है। यज्ञ-भूमि जोतते समय हल की रेखा से एक कन्या प्रकट हुई, इसीलिए वह सीता नाम से विख्यात हुई।

हल से खिंची रेखा में फूलों के बीच लेटी तेजोमय कन्या सीता की ओर राजा जनक हाथ बढ़ाते हुए।

जनक बोले, यज्ञ के लिए खेत जोतते समय हल की रेखा से एक कन्या प्रकट हुई, जो सीता नाम से जानी गई; भूमि से उत्पन्न मेरी वह पुत्री असाधारण गति से बढ़ी। यह अयोनिजा कन्या मैंने वीर्य-शुल्क (पराक्रम ही जिसका मूल्य हो) के रूप में रखी, अर्थात् जो पराक्रम से इसे जीते, उसी को दूँगा। अनेक राजा माँगने आए, पर मैंने सबको मना कर दिया कि यह केवल पराक्रम से जीती जा सकती है। तब राजा मिथिला आकर पराक्रम का मानदण्ड पूछने लगे, और उनके सामने शिव-धनुष रखा गया। वे उसे उठाना तो दूर, सरकाकर तौल भी न सके।

अपने को अपमानित मानकर वे क्रुद्ध राजा मिथिला पर चढ़ आए और एक वर्ष तक नगरी को घेरे रहे, जिससे मेरे सब साधन क्षीण हो गए और मैं अति-दुःखी हुआ। तब मैंने तप से देवों को प्रसन्न किया; प्रसन्न देवों ने मुझे चतुरंगिणी सेना दी, और उस सेना से वे निर्बल, पराक्रम-संदिग्ध, पापी राजा भागकर तितर-बितर हो गए। हे मुनिश्रेष्ठ, मैं यही परम-तेजस्वी धनुष राम-लक्ष्मण को दिखाऊँगा; यदि राम इसे चढ़ा दें, तो मैं अपनी अयोनिजा पुत्री सीता दशरथ-पुत्र को दे दूँगा।

सार: जनक धनुष की कथा (दक्ष-यज्ञ का शिव-धनुष, देवरात की धरोहर) और हल-रेखा से उत्पन्न अयोनिजा सीता का परिचय देकर प्रतिज्ञा दोहराते हैं, जो धनुष चढ़ाएगा, उसी को सीता मिलेगी।

शिव-धनुष-भंग

मालाओं से सजी पहिएदार लोहे की पेटी में रखा विशाल धनुष रस्सों से खींचते बलिष्ठ पुरुष, पास राजा जनक।

जनक की कथा सुनकर विश्वामित्र ने कहा, राम को धनुष दिखाइए। जनक ने मन्त्रियों को आज्ञा दी कि गन्ध-माला से सज्जित दिव्य धनुष लाया जाए। मन्त्री नगर में जाकर आठ पहियों वाली एक पेटी में धनुष को आगे रखकर बाहर लाए, जिसे पाँच हज़ार ऊँचे और बलिष्ठ पुरुष किसी प्रकार खींच लाए।

उस लोहे की सुन्दर पेटी को लाकर मन्त्रियों ने जनक से कहा, हे राजेन्द्र, यह श्रेष्ठ धनुष, जो सब राजाओं द्वारा पूजित है, आपकी इच्छा हो तो इन दोनों राजकुमारों को दिखाया जाए। जनक ने हाथ जोड़कर विश्वामित्र और दोनों कुमारों से कहा, हे ब्रह्मन्, यह श्रेष्ठ धनुष जनकों द्वारा पूजित और महाबली राजाओं द्वारा भी न चढ़ाया जा सका। देव, असुर, राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर और महानाग भी इसे नहीं चढ़ा सके; तो मनुष्यों में इसे चढ़ाने, डोरी जोड़ने, बाण लगाने या तौलने की सामर्थ्य कहाँ? यह धनुषों में श्रेष्ठ धनुष इन राजकुमारों को दिखाइए।

विश्वामित्र ने राम से कहा, हे वत्स राम, धनुष देखो। राम ने पेटी खोलकर धनुष देखा और बोले, मैं इस श्रेष्ठ दिव्य धनुष को हाथ से छूता हूँ; इसे तौलने और चढ़ाने का यत्न करूँगा। राजा और मुनि ने कहा, बाढ़म्। मुनि के कहने पर राम ने लीला से धनुष को बीच से पकड़ लिया। अनेक सहस्र मनुष्यों के देखते-देखते धर्मात्मा राम ने मानो खेल-खेल में उस धनुष को चढ़ा दिया, डोरी जोड़कर खींचा, और वह धनुष बीच से टूट गया।

प्रत्यंचा चढ़ाते ही शिव-धनुष चिनगारियों के साथ टूटता हुआ, गर्जना से सभासद भूमि पर गिर पड़े, राम बीच में खड़े।

वज्र-गर्जन-सा महान शब्द हुआ, और मानो पर्वत फटने पर हो वैसा प्रचण्ड भूकम्प आया। उस शब्द से मुनिवर, राजा और दोनों राघवों को छोड़कर सब लोग मूर्छित होकर गिर पड़े। लोगों के सँभलने पर निःशंक जनक ने हाथ जोड़कर विश्वामित्र से कहा, हे भगवन्, दशरथ-पुत्र राम का पराक्रम मैंने देखा; यह अति-अद्भुत, अचिन्तनीय और अकल्पनीय है। राम को पति पाकर मेरी पुत्री सीता जनक-कुल का यश बढ़ाएगी। मेरी वीर्य-शुल्क की प्रतिज्ञा आज सत्य हुई; प्राणों से प्रिय सीता अब राम को देनी है। आपकी अनुमति से मेरे मन्त्री शीघ्र रथों से अयोध्या जाएँ, और विनम्र वचनों से सम्राट को यहाँ लाएँ; उन्हें बताएँ कि वीर्य-शुल्क से जीती सीता का राम से विवाह होगा, और दोनों कुमार मुनि-संरक्षण में सुरक्षित हैं। विश्वामित्र ने एवमस्तु कहा, और जनक ने मन्त्रियों को सब वृत्तान्त सुनाकर सम्राट को लाने भेज दिया।

सार: राम लीला-मात्र से शिव-धनुष चढ़ाकर बीच से तोड़ देते हैं; वज्र-सा शब्द और भूकम्प होता है; जनक प्रतिज्ञा-पूर्ति में सीता का राम से विवाह निश्चित कर दशरथ को बुलाने मन्त्री भेजते हैं।

अयोध्या में निमन्त्रण

सिंहासन पर बैठे वृद्ध राजा दशरथ हाथ बढ़ाकर सम्मुख हाथ जोड़े खड़े मिथिला के दूतों की बात सुनते हुए।

जनक के भेजे मन्त्री, थके अश्वों के कारण मार्ग में तीन रात रुककर, अयोध्या पहुँचे और राजाज्ञा से दरबार में देव-समान वृद्ध राजा दशरथ के सामने पहुँचे। दशरथ की सौम्य दृष्टि से निर्भय होकर उन्होंने हाथ जोड़कर मधुर वचन कहे, हे महाराज, अग्निहोत्र को आगे रखकर मिथिला-नरेश जनक ने स्नेह-भरी वाणी में आपके, आपके पुरोहित और सेवकों के अविनाशी कुशल की बार-बार पृच्छा की है; विश्वामित्र की सहमति से उन्होंने यह सन्देश भेजा है।

सन्देश यह था, मेरी पुत्री वीर्य-शुल्क रूप में रखी थी, यह आप जानते हैं; जो दुर्बल राजा परीक्षा में असफल रहे, वे ठुकराए गए, यद्यपि उन्होंने इसका बुरा माना। हे महाराज, सौभाग्य से विश्वामित्र को आगे रखकर आए आपके पुत्र राम ने मेरी पुत्री को जीत लिया; उन्होंने जन-समूह के बीच शिव का वह दिव्य धनुष बीच से तोड़ दिया। वीर्य से जीती सीता अब मुझे राम को देनी है; इस प्रतिज्ञा-पूर्ति की अनुमति दीजिए। आप पुरोहित और गुरु को आगे रखकर शीघ्र आइए और अपने पुत्रों के दर्शन कीजिए; इससे आप दोनों पुत्रों का हर्ष देखेंगे। यह जनक ने विश्वामित्र की सहमति और शतानन्द के परामर्श से कहा है।

छत्र के नीचे सिंहासन पर बैठे राजा दशरथ श्वेत वस्त्रधारी वृद्ध मुनि और सभासदों से मंत्रणा करते हुए।

दूतों का सन्देश सुनकर परम-हर्षित दशरथ ने वसिष्ठ, वामदेव और मन्त्रियों से कहा, विश्वामित्र के संरक्षण में राम और लक्ष्मण विदेह-राज्य में हैं; जनक ने राम के पराक्रम से प्रभावित होकर सीता देने की इच्छा की है। यदि जनक का कुल और आचरण आपको रुचे, तो हम शीघ्र मिथिला चलें; समय व्यर्थ न जाए। मन्त्रियों और महर्षियों ने बाढ़म् कहा; प्रसन्न दशरथ ने कहा, कल प्रातः यात्रा आरम्भ हो। सम्मानित दूत उस रात अयोध्या में सुखपूर्वक रहे।

सार: जनक के मन्त्री अयोध्या पहुँचकर दशरथ को धनुष-भंग और सीता-विजय की कथा सुनाकर विवाह का निमन्त्रण देते हैं, और दशरथ वसिष्ठ-वामदेव से परामर्श कर अगले प्रातः मिथिला प्रस्थान निश्चित करते हैं।

दशरथ की मिथिला-यात्रा

रात बीतने पर हर्षित दशरथ ने सुमन्त्र को बुलाकर कहा, आज सब कोषाध्यक्ष प्रचुर धन और विविध रत्न लेकर, सशस्त्र रक्षकों संग, आगे चलें। चतुरंगिणी सेना भी आज्ञा पाते ही शीघ्र निकले, और पालकी आदि उत्तम वाहन भी। वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, कश्यप, दीर्घायु मार्कण्डेय और कात्यायन, ये ब्राह्मण आगे चलें; मेरा रथ जोड़ो, ताकि विलम्ब न हो; दूत मुझे जल्दी कर रहे हैं।

राजा दशरथ और राजा जनक नगर-द्वार पर एक-दूसरे को गले लगाते हुए, पीछे सजे हाथी-घोड़े और भीड़।

राजाज्ञा से चतुरंगिणी सेना राजा के पीछे चली, जो ऋषियों संग अपने रथ पर चल रहे थे। चार दिन की यात्रा कर वे विदेह-राज्य में पहुँचे। दशरथ के आगमन का समाचार पाते ही श्रीमान जनक उनके स्वागत की तैयारी करने लगे। वृद्ध दशरथ के पास आकर जनक परम हर्ष से भर गए। उन्होंने कहा, हे नरश्रेष्ठ, आपका स्वागत है; आपका आना मेरा सौभाग्य है। आप पराक्रम से जीते अपने दोनों पुत्रों का हर्ष देखेंगे। सौभाग्य से महातेजस्वी वसिष्ठ समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणों संग, इन्द्र-से, पधारे हैं। सौभाग्य से मेरे विघ्न नष्ट हुए और मेरा कुल पूजित हुआ; महाबली राघवों से सम्बन्ध जुड़ा। हे नरश्रेष्ठ, कल प्रातः, यज्ञ के अन्त में, श्रेष्ठ मुनियों की सहायता से विवाह सम्पन्न कीजिए।

दशरथ ने उत्तर दिया, हे धर्मज्ञ, दान दाता के अधीन होता है, यह मैंने सुना है; आप जैसा कहेंगे, वैसा ही हम करेंगे। इस धर्मिष्ठ, यश-कारक वचन से जनक अति-विस्मित हुए। सब मुनिगण परस्पर मिलन के हर्ष से वह रात सुखपूर्वक रहे। राम लक्ष्मण सहित विश्वामित्र को आगे कर पिता के चरण छूने गए; अपने दोनों पुत्रों को देखकर और जनक से पूजित होकर दशरथ परम हर्ष से रात बिताने गए। जनक भी यज्ञ और अपनी दोनों पुत्रियों सीता-ऊर्मिला के लिए धर्म-कर्म पूरे कर रात्रि-विश्राम को गए।

सार: दशरथ सेना, कोश और छह ऋषियों सहित चार दिन की यात्रा कर मिथिला पहुँचते हैं; जनक उनका हर्ष से स्वागत कर अगले प्रातः विवाह की बात करते हैं, और दशरथ दान दाता के अधीन कहकर सहमत हो जाते हैं।

कुशध्वज का आगमन और इक्ष्वाकु-वंश का गान

प्रातः यज्ञ-कर्म पूरा कर जनक ने पुरोहित शतानन्द से कहा, मेरा महातेजस्वी, वीर, अति-धर्मात्मा छोटा भाई कुशध्वज सांकाश्या नगरी में रहता है, जो स्वर्ग-सी और पुष्पक-विमान-सी विशाल है, जिसकी सीमाएँ यन्त्र-युक्त प्राचीर से अंकित हैं और जो इक्षुमती नदी का जल पीती है। वह मेरे यज्ञ का रक्षक है; मैं उसे देखना चाहता हूँ; वह भी मेरे साथ यह विवाह-हर्ष भोगेगा। शीघ्रगामी दूत तीव्र अश्वों पर सांकाश्या गए, मानो इन्द्र की आज्ञा से उपेन्द्र को लाने जा रहे हों, और सब वृत्तान्त सुनाकर कुशध्वज को ले आए।

एक मुकुटधारी राजा हाथ जोड़े झुककर आसनों पर बैठे राजा जनक और वृद्ध सभासद का अभिवादन करते हुए।

कुशध्वज ने धर्मवत्सल जनक और शतानन्द को प्रणाम कर राजोचित दिव्य आसन ग्रहण किया। दोनों भाइयों ने अपने श्रेष्ठ मन्त्री सुदामन को भेजा कि वे इक्ष्वाकु-वंशी दशरथ को पुत्रों और मन्त्रियों सहित ले आएँ। सुदामन ने दशरथ के डेरे जाकर, सिर झुकाकर कहा, हे अयोध्या-नरेश, मिथिला-पति जनक आपको पुरोहित-गुरु सहित देखना चाहते हैं। दशरथ ऋषि-गणों, मन्त्रियों और बन्धुओं सहित जनक के पास गए।

दशरथ ने जनक से कहा, हे महाराज, इक्ष्वाकुओं के पूज्य महाशक्तिशाली वसिष्ठ ही सब कार्यों में हमारे प्रवक्ता हैं; ये विश्वामित्र की सहमति से मेरा वंश क्रम से सुनाएँगे। दशरथ के मौन होने पर वसिष्ठ ने जनक और शतानन्द से वंश कहा।

एक उप-कथा (इक्ष्वाकु-वंश): अव्यक्त प्रकृति से जन्मे शाश्वत ब्रह्मा से मरीचि, मरीचि से कश्यप, कश्यप से विवस्वान (सूर्य), विवस्वान से मनु; मनु से प्रजापति इक्ष्वाकु, अयोध्या के प्रथम राजा। फिर कुक्षि, विकुक्षि, बाण, अनरण्य, पृथु, त्रिशंकु, धुन्धुमार, युवनाश्व, मान्धाता, सुसन्धि, ध्रुवसन्धि, भरत, असित, सगर, असमंज, अंशुमान, दिलीप, भगीरथ, ककुत्स्थ, रघु, प्रवृद्ध (कल्माषपाद), शंखण, सुदर्शन, अग्निवर्ण, शीघ्रग, मरु, प्रशुश्रुक, अम्बरीष, नहुष, ययाति, नाभाग, अज, और अज से दशरथ; इसी दशरथ से राम-लक्ष्मण (तथा भरत-शत्रुघ्न) जन्मे।

एक उप-कथा (सगर का जन्म): राजा असित शत्रुओं से हारकर हिमालय में दो गर्भिणी रानियों संग गया और वहीं मरा। एक रानी ने सौत के गर्भ नष्ट करने को उसे विष-मिश्रित भोजन दिया। पद्म-नेत्री कालिन्दी ने भृगु-वंशी ऋषि च्यवन से उत्तम पुत्र की कामना की; ऋषि ने आशीर्वाद दिया। वह विष (गर) के साथ जन्मने के कारण सगर कहलाया।

समझने की कुंजी (संख्या): वसिष्ठ ब्रह्मा को दो परार्ध आयु वाला कहते हैं, अर्थात् लगभग 31,10,40,00,00,00,000 मानव-वर्ष, एक अकल्पनीय रूप से दीर्घ काल-मान।

श्वेत वस्त्रधारी वृद्ध मुनि हाथ जोड़े आसन पर बैठे राजा जनक से निवेदन करते हुए, चारों ओर दरबारी बैठे।

वंश सुनाकर वसिष्ठ ने कहा, हे नरेन्द्र, सदा-पवित्र इक्ष्वाकु-कुल में जन्मे, सत्यवादी, वीर राम और लक्ष्मण के लिए मैं दशरथ की ओर से आपकी दो पुत्रियाँ माँगता हूँ; इन योग्य कुमारों को अपनी योग्य पुत्रियाँ दीजिए।

सार: जनक अपने भाई कुशध्वज को बुलाते हैं, दशरथ ऋषियों सहित जनक से मिलते हैं, और वसिष्ठ ब्रह्मा से दशरथ तक इक्ष्वाकु-वंश सुनाकर राम-लक्ष्मण के लिए जनक की दो पुत्रियाँ माँगते हैं।

विदेह-वंश का गान और कन्या-दान का संकल्प

जनक ने हाथ जोड़कर कहा, हे ज्ञानी मुनिश्रेष्ठ, कन्या-दान के अवसर पर श्रेष्ठ-कुल वाले को अपना वंश पूरा सुनाना चाहिए; मेरा वंश सुनिए।

एक उप-कथा (विदेह-वंश): परम धर्मात्मा राजा निमि से मिथि, मिथि से जनक (प्रथम जनक-नामधारी), उससे उदावसु, फिर नन्दिवर्धन, सुकेतु, देवरात, बृहद्रथ, महावीर, सुधृति, धृष्टकेतु, हर्यश्व, मरु, प्रतीन्धक, कीर्तिरथ, देवमीढ, विबुध, महीध्रक, कीर्तिरात, महारोमा, स्वर्णरोमा, और ह्रस्वरोमा। ह्रस्वरोमा के दो पुत्र, ज्येष्ठ मैं स्वयं जनक, और कनिष्ठ वीर कुशध्वज।

जनक ने कहा, वृद्ध पिता मुझे राज्य पर बैठाकर, कुशध्वज को मेरे भरोसे सौंपकर, वन चले गए। पिता के स्वर्गवास पर मैंने धर्म से राज्य-भार सँभाला और स्नेह से देव-समान कुशध्वज की देखभाल की। कुछ काल बाद सांकाश्या से बलवान राजा सुधन्वा आकर मिथिला घेरने लगा। उसने सन्देश भेजा कि शिव का श्रेष्ठ धनुष और मेरी पद्म-नेत्री पुत्री सीता मुझे दे दो। मना करने पर युद्ध हुआ, और मैंने सम्मुख युद्ध में सुधन्वा को मार डाला। फिर मैंने अपने वीर भाई कुशध्वज को सांकाश्या में राज्याभिषिक्त किया।

जनक बोले, हे मुनिपुंगव, मैं ज्येष्ठ हूँ, यह मेरा कनिष्ठ भाई है; परम प्रसन्न होकर मैं आपकी पुत्र-वधुएँ देता हूँ, राम को सीता और लक्ष्मण को ऊर्मिला। मैं तीन बार कहता हूँ, निःसन्देह, मैं राम द्वारा वीर्य से जीती देव-कन्या-सी सीता और अपनी दूसरी पुत्री ऊर्मिला पुत्र-वधू रूप में देता हूँ। (दशरथ से) हे राजन्, राम-लक्ष्मण का गोदान-समावर्तन (शिक्षा-पूर्ति पर केश-मुण्डन सहित गृह-वापसी का संस्कार) कराइए और नान्दीश्राद्ध (पूर्वजों की प्रसन्नता का विवाह-पूर्व अनुष्ठान) कीजिए। आज मघा नक्षत्र है; तीसरे दिन, जब उत्तरा फाल्गुनी आए, उस दिन विवाह कीजिए; राम-लक्ष्मण के कल्याणार्थ सुखकर दान कीजिए।

सार: जनक निमि से अपने तक का विदेह-वंश और सुधन्वा-वध की कथा सुनाकर सीता राम को और ऊर्मिला लक्ष्मण को देने का संकल्प करते हैं, और तीसरे दिन उत्तरा फाल्गुनी में विवाह का मुहूर्त बताते हैं।

कुशध्वज की पुत्रियाँ, भरत-शत्रुघ्न के लिए

मुनि विश्वामित्र और श्वेत वस्त्रधारी वृद्ध मुनि आसनों पर बैठे दो मुकुटधारी राजाओं से संवाद करते हुए।

जनक के कहने पर विश्वामित्र ने वसिष्ठ सहित कहा, हे नरश्रेष्ठ, इक्ष्वाकु और विदेह के कुल अचिन्त्य और अप्रमेय हैं; इनके समान कोई नहीं। राम-लक्ष्मण के साथ सीता-ऊर्मिला का सम्बन्ध धर्म और रूप-सम्पदा में सर्वथा सुयोग्य है। अब एक बात और सुनिए। यहाँ आपका धर्मज्ञ छोटा भाई कुशध्वज है; इसकी दो पुत्रियाँ, जो रूप में पृथ्वी पर अनुपम हैं, हम दशरथ के अन्य दो पुत्रों, भरत और बुद्धिमान शत्रुघ्न, के लिए माँगते हैं। दशरथ के चारों पुत्र रूप-यौवन-सम्पन्न, देव-समान पराक्रमी और लोकपालों-से हैं। इन दोनों जोड़ों के विवाह से इक्ष्वाकु-कुल प्रेम-बन्धन में बँध जाए; हे पुण्य-कर्मा राजन्, एक साथ चौगुने सम्बन्ध में संकोच न कीजिए।

जनक ने हाथ जोड़कर कहा, यह सुयोग्य कुल-सम्बन्ध जो आप स्वयं आदेश दे रहे हैं, इससे मेरा वंश धन्य हुआ। एवमस्तु; आपका कल्याण हो; कुशध्वज की दोनों पुत्रियों को सदा साथ रहने वाले शत्रुघ्न और भरत पत्नी रूप में स्वीकार करें। हे महामुने, चारों राजकुमार एक ही दिन चारों राजकन्याओं का पाणिग्रहण करें। विद्वान उत्तर फाल्गुनी के दिन को, जिसके अधिष्ठाता प्रजापति भग हैं, विवाह के लिए श्रेष्ठ मानते हैं।

यह कहकर आसन से उठकर हाथ जोड़े जनक ने दोनों मुनियों से कहा, आपने मुझे कन्या-दान का परम धर्म दिया; मैं दशरथ के समान आपका सेवक हूँ; आप दोनों इन श्रेष्ठ आसनों पर विराजें। जैसे यह नगरी दशरथ की है, वैसे अयोध्या मेरी; यहाँ निःसन्देह आपका अधिकार है; जो उचित हो, कीजिए। तब दशरथ ने हर्षित होकर जनक से कहा, आप दोनों मिथिला-नरेश भाई असंख्य गुणों वाले हैं; आपने अनेक बार ऋषियों और राजाओं का सत्कार किया है। आपका कल्याण हो; अब हम अपने डेरे जाकर विधिवत् श्राद्ध-कर्म करेंगे।

वृद्ध राजा दशरथ शिविर में ब्राह्मणों को स्वर्ण-पात्र और मालाओं से सजी गायें दान करते हुए, पीछे राजकुमार खड़े।

जनक से विदा लेकर दशरथ दोनों महामुनियों को आगे कर शीघ्र अपने डेरे गए। श्राद्ध विधिवत् कर, प्रातः उठकर उन्होंने चारों पुत्रों का उत्तम गोदान-समावर्तन संस्कार किया। पुत्र-वत्सल दशरथ ने प्रत्येक पुत्र के लिए एक-एक लाख गायें, अर्थात् कुल चार लाख स्वर्ण-शृंग वाली, बछड़ों सहित, कांस्य-दोहन-पात्र वाली गायें, और प्रचुर धन ब्राह्मणों को दान दिया। मुण्डित-केश और गोदान कर चुके पुत्रों से घिरे दशरथ लोकपालों से घिरे ब्रह्मा-से सुशोभित हुए।

समझने की कुंजी (संख्या): चार लाख गायों का दान, प्रत्येक पुत्र के लिए एक लाख, यज्ञ-काल की राजसी उदारता का परिमाण दर्शाता है; गोदान शब्द का अर्थ केश-मुण्डन भी है, इसलिए यह समावर्तन-संस्कार का अंग है।

सार: विश्वामित्र-वसिष्ठ कुशध्वज की दो पुत्रियाँ भरत-शत्रुघ्न के लिए माँगते हैं; चारों जोड़ों का विवाह उत्तरा फाल्गुनी में तय होता है, और दशरथ चारों पुत्रों का समावर्तन कर चार लाख गायों का दान करते हैं।

चारों विवाह

जिस दिन दशरथ ने भव्य गोदान किया, उसी दिन भरत के मामा, कैकेय-नरेश के पुत्र वीर युधाजित मिथिला आ पहुँचे। दशरथ का कुशल पूछकर बोले, मेरे पिता कैकेय-नरेश ने स्नेह से आपका कुशल पूछा है और कहा है कि जिनका कुशल आप चाहते हैं, वे सब कुशल हैं। मेरे पिता मेरी बहन के पुत्र भरत को देखना चाहते हैं; इसी से मैं अयोध्या गया, पर वहाँ सुना कि आप राम के विवाह के लिए पुत्रों सहित मिथिला आए हैं, तो भानजे को देखने शीघ्र यहाँ आया। दशरथ ने इस प्रिय अतिथि का परम सत्कार किया। पुत्रों संग रात बिताकर, प्रातः नित्य-कर्म पूरा कर, राजा ऋषियों को आगे कर यज्ञ-वाट पहुँचे।

विजय नामक शुभ मुहूर्त में, सब आभूषणों से सज्जित और मंगल-कौतुक वाले राम तीनों भाइयों सहित, वसिष्ठ और अन्य महर्षियों को आगे कर, यज्ञ-वाट पहुँचे। भगवान वसिष्ठ ने जनक से कहा, हे राजन्, उत्सव-वेश में सज्जित पुत्रों सहित नरश्रेष्ठ दशरथ दाता की प्रतीक्षा कर रहे हैं; दान दाता और ग्रहीता दोनों के सहयोग से ही होता है। इसलिए उत्तम विवाह-कर्म करके अपना धर्म पूरा कीजिए। जनक ने कहा, द्वार पर मुझे रोकने वाला कौन प्रतिहारी खड़ा है, और सम्राट किसकी अनुमति की प्रतीक्षा कर रहे हैं? अपने ही घर में संकोच कैसा? यह राज्य जितना मेरा, उतना आपका भी। मेरी कन्याएँ सब मंगल-संस्कार कर, प्रज्वलित अग्नि-शिखाओं-सी, वेदी के पास आ गई हैं। मैं इस वेदी पर बैठा आपकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ; सब निर्विघ्न हो, विलम्ब क्यों?

दशरथ पुत्रों और ऋषि-गणों सहित यज्ञ-वाट में आ गए। तब जनक ने वसिष्ठ से कहा, हे धार्मिक ऋषि, अन्य ऋषियों सहित लोक-रमणीय राम का विवाह-कर्म सम्पन्न कीजिए। वसिष्ठ ने एवमस्तु कहा, और विश्वामित्र तथा धार्मिक शतानन्द को आगे कर, मण्डप के बीच विधिवत् वेदी बनाई, उसे चारों ओर गन्ध-पुष्प से सजाया। उन्होंने वेदी पर स्वर्ण-पात्र, अंकुर वाले रंगीन कलश, अंकुर-भरे शराव (मिट्टी के पात्र), धूप-पात्र, शंख-पात्र, स्रुक और स्रुवा (आहुति-चमचे), अर्घ्य-जल के पात्र, खील-भरे पात्र, और हल्दी से रँगे अक्षत वाले पात्र रखे। समान कुश बिछाकर, मन्त्रोच्चार के साथ विधिवत् अग्नि स्थापित कर, वसिष्ठ ने मन्त्र-पूर्वक अग्नि में आहुति दी।

राजा जनक अग्नि के सामने राम की हथेली पर जल छोड़कर कन्यादान करते हुए, पास वधू-वेश में सीता खड़ी।

तब सब आभूषणों से सज्जित सीता को लाकर, अग्नि के सामने राम के सम्मुख बैठाकर, जनक ने कहा, यह मेरी पुत्री सीता आपकी सहधर्मचारिणी होगी। इसे स्वीकार कीजिए; अपने हाथ से इसका हाथ ग्रहण कीजिए। आपका कल्याण हो; यह महाभाग्यवती पतिव्रता छाया-सी सदा आपका अनुगमन करेगी। यह कहकर जनक ने मन्त्र-पवित्र जल राम के हाथ में डाल दिया। उसी क्षण देव-दुन्दुभियाँ बजीं और देवों-ऋषियों ने साधु-साधु कहते हुए पुष्प-वृष्टि की। फिर हर्ष से भरे जनक ने कहा, हे लक्ष्मण, आओ; मेरी दी ऊर्मिला को स्वीकार करो; इसका हाथ अपने हाथ से ग्रहण करो, विलम्ब न हो। फिर भरत से कहा, हे रघुनन्दन, माण्डवी का हाथ अपने हाथ से ग्रहण करो। धर्मात्मा मिथिला-नरेश ने शत्रुघ्न से कहा, हे महाबाहु, श्रुतकीर्ति का हाथ अपने हाथ में लो। आप सब सौम्य और सुव्रती हैं; पत्नियों सहित हों, हे काकुत्स्थो, विलम्ब न हो।

जनक के वचन सुनकर चारों राजकुमारों ने वसिष्ठ की विधि से चारों राजकन्याओं के हाथ अपने हाथों में ग्रहण किए। अग्नि, वेदी, जनक और ऋषियों की प्रदक्षिणा कर, अपनी-अपनी वधुओं सहित महात्मा राघवों ने शास्त्रोक्त विधि से विवाह सम्पन्न किया। आकाश से दुन्दुभियों के गम्भीर घोष और वाद्य-गीत के स्वर के साथ प्रचुर, उज्ज्वल पुष्प-वृष्टि हुई। अप्सरा-समूह नाचने लगे और गन्धर्व मधुर गाने लगे; रघु-कुल के श्रेष्ठ पुरुषों के विवाह में यह अद्भुत दृश्य देखा गया। ऐसी दिव्य ध्वनि के बीच उन महातेजस्वियों ने अग्नि की तीन बार प्रदक्षिणा कर अपनी-अपनी वधू का वरण किया। फिर वधुओं सहित वे राघव अपने डेरों को गए, और सम्राट भी ऋषि-संघ और बन्धुओं सहित, हर्ष से वर-वधुओं को देखते हुए, उनके पीछे गए।

सार: विवाह-दिन भरत के मामा युधाजित आते हैं; वसिष्ठ वेदी रचकर विधिवत् हवन करते हैं, और राम-सीता, लक्ष्मण-ऊर्मिला, भरत-माण्डवी, शत्रुघ्न-श्रुतकीर्ति का पाणिग्रहण होता है, जिस पर देव दुन्दुभि और पुष्प-वृष्टि से उत्सव मनाते हैं।

मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, बालकाण्ड, सर्ग 50-73 (गीता प्रेस गोरखपुर)।