अध्याय 6 · लाक्षागृह, हिडिम्ब-बक

महाभारत · आदि पर्व
लाक्षागृह का षड्यन्त्र और पाण्डवों का बच निकलना, हिडिम्ब और बक राक्षसों का वध।

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दुर्योधन नेत्रहीन वृद्ध राजा धृतराष्ट्र के कान के पास झुककर धीमे स्वर में कुछ कहता हुआ

हस्तिनापुर के अन्तःपुर में जो विष धीरे-धीरे पक रहा था, वह अब फूटने को था। दुर्योधन ने अपने पिता धृतराष्ट्र से एकान्त में कहा कि पाण्डवों को किसी चतुर उपाय से वारणावत नगर भेज दिया जाए, ताकि उनसे कोई भय न रहे। अन्धे राजा ने, जिनकी आँखें केवल ज्ञान ही थीं, पहले हिचक दिखाई, क्योंकि पाण्डु ने सदा उन्हीं के प्रति भक्ति रखी थी और प्रजा युधिष्ठिर से प्रेम करती थी। पर पुत्र के आग्रह ने और उनके अपने भीतर छिपे उसी विचार ने अन्ततः उन्हें झुका दिया। यही महाभारत का स्वभाव है, जहाँ अधर्म किसी एक के मन में नहीं पकता; वह तो कई हृदयों की चुप्पी और दुर्बलता में पकता है।

लाक्षागृह (लाख का घर) का षड्यन्त्र

दुर्योधन ने धृतराष्ट्र से कहा कि धन और सम्मान देकर प्रजा को अपनी ओर मिलाया जा सकता है, और कोष तथा मन्त्री इस समय उन्हीं के वश में हैं। इसलिए पाण्डवों को किसी कोमल बहाने से वारणावत भेज दिया जाए। राजा बोले कि भीष्म, द्रोण, विदुर अथवा कृप इस निर्वासन को कभी स्वीकार न करेंगे, क्योंकि उनकी दृष्टि में कौरव और पाण्डव समान हैं। दुर्योधन ने उत्तर दिया कि भीष्म तटस्थ रहेंगे, द्रोण के साथ उनका पुत्र अश्वत्थामा है, कृप द्रोण और अश्वत्थामा का पक्ष न छोड़ेंगे, और विदुर भले मन से पाण्डवों के साथ हों, पर अकेले कुछ न बिगाड़ सकेंगे।

सिंहासन पर बैठे धृतराष्ट्र पाण्डवों और कुंती को वारणावत जाने की आज्ञा देते हुए, दरबारी सुनते

तब दुर्योधन और उसके भाइयों ने धन और मान बाँटकर धीरे-धीरे प्रजा को अपनी ओर खींचना आरम्भ किया। धृतराष्ट्र के सिखाये कुछ चतुर मन्त्रियों ने भरी सभा में वारणावत नगर का बखान किया कि वहाँ पशुपति (शिव) का महोत्सव आरम्भ हुआ है और उसका जुलूस पृथ्वी पर देखे गए सब उत्सवों में परम मनोहर है। यह सुनकर पाण्डवों के मन में वहाँ जाने की उत्कण्ठा जागी। राजा ने जब यह कुतूहल भाँप लिया, तब उन्होंने कहा कि यदि वे चाहें तो अपने मित्रों और अनुचरों सहित वारणावत जाकर उस उत्सव का आनन्द लें, और कुछ काल वहाँ विहार कर पुनः हस्तिनापुर लौट आएँ।

युधिष्ठिर राजा का अभिप्राय भली-भाँति समझ गए। अपने को निर्बल और मित्रहीन जानकर उन्होंने केवल इतना कहा, “ऐसा ही हो।” फिर भीष्म, विदुर, द्रोण, बाह्लीक, सोमदत्त, कृप, अश्वत्थामा, भूरिश्रवा तथा गान्धारी आदि सब से विनयपूर्वक आशीर्वाद माँगते हुए वे चल पड़े। कौरव-वंश के बड़ों ने कहा, “हे पाण्डुपुत्रो, मार्ग में सब तत्त्व आपका कल्याण करें और आप पर रञ्चमात्र भी विपत्ति न आए।”

समझने की कुंजी (स्थान): वारणावत गंगा के तट पर बसा एक नगर था, हस्तिनापुर से दूर। आज जैसे किसी को मान-सम्मान के साथ दूरस्थ स्थान पर “विश्राम” के बहाने भेज दिया जाए, वैसा ही यह सुनियोजित निष्कासन था।

पुरोचन और लाख की हवेली

राजा के वचन से दुर्योधन अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसने एकान्त में अपने मन्त्री पुरोचन का दाहिना हाथ पकड़कर कहा, “हे पुरोचन, धन से भरा यह संसार मेरा है, पर जितना मेरा है उतना आपका भी। आपसे बढ़कर मेरा कोई विश्वासपात्र मन्त्री नहीं।” फिर उसने आज्ञा दी कि वह तेज़ खच्चरों वाले रथ पर तत्काल वारणावत जाए और शस्त्रागार के समीप एक चौकोर महल बनवाए। उस महल की दीवारों में सन (पटसन), राल (रेज़िन), घी, तेल, चर्बी और बहुत-सी लाख ऐसी कुशलता से लगाई जाए कि कोई परीक्षा करके भी न जान सके कि घर ज्वलनशील है। चारों ओर भी सन, तेल, घी, लाख और लकड़ी बिखेर दी जाए।

दुर्योधन ने कहा कि पाण्डवों को बड़े आदर से उस घर में कुन्ती और उनके मित्रों सहित ठहराया जाए, और उत्तम शय्या, आसन तथा वाहन वहाँ रखे जाएँ, ताकि धृतराष्ट्र को शिकायत का अवसर न मिले। फिर जब पाण्डव निर्भय होकर भीतर सो रहे हों, तब बाहरी द्वार से आग लगा दी जाए, और लोग समझें कि घर में आकस्मिक आग लगने से वे जल मरे। “ऐसा ही हो” कहकर पुरोचन तुरन्त वारणावत पहुँचा और दुर्योधन की हर आज्ञा का पालन कर डाला।

समझने की कुंजी (शब्द): लाख एक राल-जैसा ज्वलनशील पदार्थ है जो कीटों से बनता है; इसी से बने घर के कारण इस प्रसंग को “जतुगृह” अथवा “लाक्षागृह” (लाख का घर) कहते हैं। सन एक रेशेदार पौधा है जो शीघ्र आग पकड़ता है।

विदुर की गूढ़ चेतावनी

नगर से विदा होते पाँचों पाण्डव और कुंती, नागरिकों की भीड़ हाथ जोड़े मार्ग के दोनों ओर

पाण्डव अपने रथों में पवन-वेगी घोड़े जोतकर चले। प्रस्थान से पहले उन्होंने भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोण, कृप, विदुर तथा अन्य कुरुवृद्धों के चरण स्पर्श किए, समवयस्कों का आलिंगन किया और बालकों तथा घर की वृद्ध स्त्रियों से विदा ली। नगरवासी और कुरुवृद्ध भी कुछ दूर तक उनके पीछे-पीछे चले। कुछ नागरिक दुखी होकर कहने लगे कि धृतराष्ट्र की दृष्टि सम पर नहीं टिकती, और जो भीष्म इस निर्वासन को सह रहे हैं, वे इस अन्याय को कैसे अनुमति दे रहे हैं।

जब नागरिक पीछे रह गए, तब धर्म के सब रहस्यों के ज्ञाता विदुर ने युधिष्ठिर को सावधान करने के लिए म्लेच्छ-भाषा में, जिसे और कोई न समझ सके, कुछ कहा। उन्होंने कहा, “जो शत्रुओं की योजनाओं को राजनीति-शास्त्र के अनुसार जान लेता है, वह जानकर ऐसा आचरण करे कि सब संकट टल जाएँ। जो जानता है कि बिना इस्पात के भी शरीर काटने वाले तीक्ष्ण शस्त्र होते हैं, और उन्हें रोकने का उपाय भी जानता है, उसे शत्रु कभी हानि नहीं पहुँचा सकते। वही जीता है जो यह जानकर अपनी रक्षा करता है कि न तो तृण-काष्ठ को भस्म करने वाली अग्नि और न ओस सुखाने वाला सूर्य, गहन वन में बिल के भीतर रहने वालों को जला पाता है। जो शस्त्र इस्पात का नहीं (अर्थात् ज्वलनशील घर), यदि शत्रु उसे दे दें, तो उससे बचा जा सकता है यदि अपना निवास सियार के बिल के समान (अनेक निकास वाला) बना लिया जाए।”

नगर द्वार पर विदुर झुककर यात्रा पर निकलते युधिष्ठिर को गुप्त संकेतों में चेतावनी देते हुए

युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, “मैं आपको समझ गया।” विदुर पाण्डवों को यह उपदेश देकर, उनकी परिक्रमा कर, विदा लेकर अपने घर लौट आए। तब कुन्ती ने युधिष्ठिर के पास आकर पूछा कि विदुर ने भीड़ में जो ऐसे अस्पष्ट वचन कहे और आपने जो वैसे ही उत्तर दिया, वह उनकी समझ में नहीं आया। युधिष्ठिर बोले कि विदुर ने यह बताया कि वारणावत का महल ज्वलनशील पदार्थों से बना है, और यह भी कि बचने का मार्ग उनसे अज्ञात न रहेगा, तथा जो इन्द्रियों को वश में रखते हैं वे समस्त पृथ्वी का राज्य पा सकते हैं। पाण्डव फाल्गुन मास के आठवें दिन, रोहिणी नक्षत्र के उदय होने पर, चलकर वारणावत पहुँचे और नगर तथा जनों को देखा।

समझने की कुंजी (शब्द): म्लेच्छ-भाषा से अभिप्राय उस समय की अपरिचित, सीमान्त बोली से है, जिसे विदुर और युधिष्ठिर दोनों जानते थे, पर सभा के अन्य लोग नहीं। यह एक प्रकार की गुप्त संकेत-भाषा का कार्य कर गई।

सार: षड्यन्त्र पूरा रचा जा चुका, और पाण्डव जानबूझकर उसमें प्रवेश कर रहे हैं, क्योंकि वे निर्बल और मित्रहीन हैं। विदुर की गूढ़ चेतावनी ही उनका एकमात्र कवच है।

सुरंग खोदने वाला और एक वर्ष का छल

लाक्षागृह के भीतर युधिष्ठिर दीवार सूँघकर लाख और घी की गंध पहचानता हुआ, भाई और कुंती चिंतित

वारणावत के नागरिक हज़ारों वाहनों में मंगल-सामग्री लेकर पाण्डवों के स्वागत को आए और “जय” कहकर उन्हें घेरकर खड़े हो गए। पाण्डव उनका अभिनन्दन करते हुए नगर में प्रविष्ट हुए। युधिष्ठिर ने महल की परीक्षा कर ली और मन ही मन सोचा कि यदि पुरोचन हमारे मुख से भाँप ले कि हमने उसकी चाल समझ ली है, तो वह उतावली में हमें तुरन्त जला सकता है; अतः उन्होंने भीतर ही भीतर बचाव के सब उपाय करते हुए, ऊपर से सन्तोष और विश्वास का दिखावा बनाए रखने का निश्चय किया, ताकि न पुरोचन और न कोई नागरिक उनकी मनसा जान सके।

तभी विदुर का एक मित्र, खनन-कार्य (सुरंग खोदने) में निपुण, गुप्त रूप से पाण्डवों के पास आया और बोला, “मुझे विदुर ने भेजा है, मैं कुशल खनक हूँ और पाण्डवों की सेवा को आया हूँ।” अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए उसने बताया कि पुरोचन इस कृष्ण पक्ष की चौदहवीं रात को घर के द्वार में आग लगाएगा, और यह भी कि विदुर ने मार्ग में म्लेच्छ-भाषा में जो कहा था और युधिष्ठिर ने उसी भाषा में जो उत्तर दिया था, वही उसका परिचय-चिह्न है। यह सुनकर युधिष्ठिर ने उसे विदुर का परम विश्वासपात्र मित्र मानकर कहा, “आप हमारी रक्षा वैसे ही करें जैसे विद्वान् विदुर सदा करते हैं। मैं जानता हूँ कि यह ज्वलनशील घर मेरे लिए दुर्योधन की आज्ञा से बनाया गया है। थोड़े-से प्रयत्न से, पुरोचन की जानकारी के बिना, हमें इस आने वाली अग्नि से बचाइए।”

ऊपर कक्ष में पुरोचन पहरा देता हुआ, नीचे दीपक के उजाले में एक कारीगर गुप्त सुरंग खोदता

खनक ने “ऐसा ही हो” कहकर सावधानी से एक बड़ी भूमिगत सुरंग खोद डाली। उसका मुख घर के मध्य में, भूमि के तल के बराबर बनाया गया और तख़्तों से ढक दिया गया, ताकि द्वार पर निरन्तर पहरा देने वाला पुरोचन उसे न देख सके। पाण्डव अपने कक्षों में शस्त्र तैयार रखकर सोते और दिन में वन-वन शिकार खेलते, पुरोचन को विश्वास और सन्तोष का दिखावा देकर छलते रहे, जबकि भीतर से वे अविश्वासी और असन्तुष्ट थे। एक वर्ष तक पाण्डवों को निश्चिन्त और निःशंक देखकर पुरोचन अत्यन्त प्रसन्न हो गया।

सार: विदुर की दूरदर्शिता ने सुरंग के रूप में बचाव का मार्ग पहले ही रच दिया। पाण्डव धैर्यपूर्वक एक वर्ष तक छल को छल से काटते रहे, यही उनकी विजय का बीज था।

लाख के घर में आग और पुरोचन का अन्त

भीम जलती मशाल से लाक्षागृह की दीवार में आग लगाता हुआ, पीछे कुंती और भाई सुरंग की ओर

पुरोचन को भली-भाँति छला हुआ देखकर युधिष्ठिर ने भीम, अर्जुन तथा नकुल-सहदेव से कहा, “यह क्रूर हृदय वाला अच्छी तरह ठगा जा चुका। मेरे विचार से निकलने का समय आ गया। शस्त्रागार में आग लगाकर, पुरोचन को जलाकर और उसका शव यहीं छोड़कर, हम छहों किसी की दृष्टि में आए बिना यहाँ से भाग चलें।”

तब एक रात कुन्ती ने दान के अवसर पर बहुत-से ब्राह्मणों को भोजन कराया। बहुत-सी स्त्रियाँ भी आईं, जो खा-पीकर अपनी इच्छानुसार आनन्द कर, कुन्ती से विदा लेकर अपने-अपने घर लौट गईं। भोजन की इच्छा से, मानो भाग्य से प्रेरित होकर, घूमती हुई एक निषाद स्त्री अपने पाँच पुत्रों सहित उस भोज में आ पहुँची। वह और उसके पुत्र पी गई मदिरा से उन्मत्त होकर निश्चेष्ट हो गए और चेतना खोकर, मृतप्राय अवस्था में, उसी महल में सोने लगे। जब घर के सब लोग सो गए, तब रात में प्रचण्ड वायु बहने लगी। भीम ने ठीक उसी स्थान पर आग लगाई जहाँ पुरोचन सो रहा था, फिर लाख के घर के द्वार में, और फिर महल के चारों ओर कई स्थानों पर आग लगा दी।

धधकते लाक्षागृह के नीचे बनी सुरंग से बाहर निकलते कुंती और पाँचों पाण्डव

जब पाण्डवों को विश्वास हो गया कि घर कई जगह से जल उठा है, तब वे शत्रुदमनकारी अपनी माता सहित, बिना समय गँवाए, भूमिगत सुरंग में प्रविष्ट हो गए। आग की लपटों की गर्मी और गर्जना तीव्र होकर नगरवासियों को जगा गई। घर को जलते देख दुखी नागरिक कहने लगे कि नीच पुरोचन ने दुर्योधन की आज्ञा से अपने स्वामी के सम्बन्धियों के नाश हेतु यह घर बनाया और स्वयं ही आग लगाई; धिक्कार है धृतराष्ट्र के पक्षपाती हृदय को, जिसने पाण्डु के निर्दोष उत्तराधिकारियों को शत्रु की भाँति जला डाला; और वह पापी पुरोचन भी भाग्यवश स्वयं जलकर मर गया।

एक उप-कथा: इस प्रसंग की नैतिक छाया गहरी है। बचने के लिए पाण्डवों ने जान-बूझकर पुरोचन को उसी की आग में छोड़ा, और उस अनजान निषाद स्त्री तथा उसके पाँच पुत्रों के जले शव ही बाद में नगरवासियों को यह विश्वास दिलाने में सहायक हुए कि कुन्ती और पाँच पाण्डव जल मरे। व्यास की कथा इन निर्दोष मृत्यु को छिपाती नहीं, अपितु छल और उत्तरजीविता की कीमत को सामने रखती है।

भीम का भार उठाना और गंगा-पार नौका

चाँदनी रात के घने वन में भीम कुंती को कंधे पर और चारों भाइयों को गोद में उठाए चलता हुआ

नगरवासी सारी रात उस घर को घेरकर शोक करते रहे, जबकि पाण्डव अपनी माता सहित सुरंग से निकलकर किसी की दृष्टि में आए बिना शीघ्रता से भाग निकले। पर निद्रा और भय से वे तेज़ी से चल न सके। तब भयानक पराक्रम और वेग वाले भीमसेन ने अपने सब भाइयों और माता को अपने शरीर पर ले लिया। माता को कन्धे पर, जुड़वाँ भाइयों को दोनों बग़ल में, और युधिष्ठिर तथा अर्जुन को दोनों भुजाओं पर बैठाकर वृकोदर पवन के वेग से चल पड़े, अपने वक्ष से वृक्षों को तोड़ते और पैरों की धमक से धरती को दबाते हुए।

इसी बीच विदुर ने उन वनों में अपना एक पवित्र आचरण वाला विश्वासपात्र पुरुष भेजा था। उसने पाण्डवों को गंगा के पवित्र तट पर एक नौका दिखाई, जो यन्त्रों और ध्वजाओं से युक्त, कुशल कारीगरों द्वारा बनाई गई, और पवन-तरंग सहने में तथा आँधी या मन के वेग जैसी गति में समर्थ थी। अपनी प्रामाणिकता दिखाने के लिए उसने वही वचन दोहराए जो विदुर ने कहे थे: “न तृण-काष्ठ का भक्षक और न ओस का शोषक, वन के बिल के निवासियों को जलाता है; जो यह जानकर अपनी रक्षा करता है, वह मृत्यु से बच जाता है।” फिर उसने जोड़ा कि विदुर ने कहा है, “हे कुन्तीपुत्र, आप युद्ध में कर्ण, दुर्योधन और उसके भाइयों तथा शकुनि को अवश्य पराजित करेंगे।”

उस पुरुष ने उन वीर राजकुमारों को उनकी माता सहित नौका में बैठाया और स्वयं भी साथ चला। उसने कहा कि विदुर ने मन ही मन आपके मस्तकों को सूँघकर और आलिंगन कर यह कहा है कि अपनी मंगलमय यात्रा आरम्भ करते और अकेले जाते समय आप कभी असावधान न हों। गंगा के उस पार उतारकर, सबको सकुशल देखकर, उसने उनकी सफलता के लिए “जय” शब्द उच्चारित किया और लौट गया। पाण्डवों ने उसके द्वारा विदुर को सन्देश भेजा और गंगा पार कर बड़ी गोपनीयता से शीघ्रता से आगे बढ़े।

सार: भीम का अतुल बल और विदुर का अदृश्य संरक्षण, ये दो शक्तियाँ मिलकर पाण्डवों को अग्नि और जल दोनों से पार ले गईं। हस्तिनापुर के लिए वे “मृत” हो गए, पर वस्तुतः वे स्वतन्त्र हो गए।

धृतराष्ट्र का शोक और छली विश्वास

जले हुए लाक्षागृह के मलबे में झुलसे शव, वारणावत के नागरिक हाथ जोड़े विलाप करते हुए

रात बीतने पर नगरवासियों की बड़ी भीड़ पाण्डवों को देखने आई। आग बुझाकर उन्होंने देखा कि जला हुआ घर लाख की सामग्री से बना था और दुर्योधन का मन्त्री पुरोचन जलकर मर चुका है। लोग ऊँचे स्वर में विलाप करने लगे कि यह सब पापी दुर्योधन ने पाण्डवों के नाश हेतु रचा था, और निःसन्देह धृतराष्ट्र की जानकारी में ही उसने पाण्डु के उत्तराधिकारियों को जलाया, अन्यथा पिता उसे रोक देते। फिर पाण्डवों का कोई चिह्न पाने के लिए राख हटाते हुए उन्होंने उस निर्दोष निषाद स्त्री और उसके पाँच पुत्रों के जले शव देखे। विदुर के भेजे खनक ने राख से अपनी खोदी सुरंग का मुख ऐसे ढक दिया कि वह किसी की दृष्टि में न आया।

नागरिकों ने धृतराष्ट्र को सन्देश भेजा कि पाण्डव और पुरोचन जलकर मर गए। यह दुःसंवाद सुनकर राजा बहुत शोक से रोए और बोले, “मेरे महायशस्वी भाई राजा पाण्डु आज सचमुच मर गए, क्योंकि उनके वीर पुत्र अपनी माता सहित जल गए। आप लोग शीघ्र वारणावत जाकर उन वीरों और कुन्तिराज की कन्या के अन्त्येष्टिसंस्कार कराइए।” फिर अम्बिका-पुत्र धृतराष्ट्र ने अपने सम्बन्धियों सहित पाण्डवों को जल की अञ्जलि दी। सब अत्यन्त शोक से “हे युधिष्ठिर! हे भीम! हे फाल्गुन! हे जुड़वाँ भाइयो! हे कुन्ती!” पुकारते हुए विलाप करने लगे। नागरिक भी रोए, पर विदुर अधिक नहीं रोए, क्योंकि वे सत्य जानते थे।

घने वन में भीम का विलाप

उधर पाण्डव अपनी माता सहित छह जनों का दल बनकर गंगा के दक्षिण की ओर बढ़े, तारों के प्रकाश से अन्धकार में मार्ग खोजते हुए, और बहुत कष्ट सहकर अन्ततः एक घने वन में पहुँचे। वे थके और प्यासे थे, और हर क्षण निद्रा उनकी आँखें बन्द कर रही थी। तब युधिष्ठिर ने भीम से कहा, “इससे अधिक पीड़ादायक क्या होगा? हम गहन वन में हैं, दिशा का बोध नहीं, और आगे चल भी नहीं सकते। हे भारत, हमें फिर पहले की भाँति अपने ऊपर उठाकर चलिए, क्योंकि हम सबमें केवल आप ही पवन के समान बलवान् और वेगवान् हैं।”

भीम कुन्ती और अपने भाइयों को शरीर पर उठाकर बड़े वेग से चले। उनके वक्ष से टकराकर सारा वन अपने वृक्षों और शाखाओं सहित काँपता जान पड़ता था; उनकी जाँघों की गति ज्येष्ठ और आषाढ़ मास की आँधी-सी वायु उठाती थी। वे फूलों-फलों सहित बड़े वृक्षों और लताओं को तोड़ते हुए अपना मार्ग बनाते चले, मानो साठ वर्ष का मतवाला गजराज वन को रौंदता निकल रहा हो। सन्ध्या होते-होते वे एक भयानक वन में पहुँचे, जहाँ फल, मूल और जल दुर्लभ थे और जो पक्षियों-पशुओं की भयंकर ध्वनियों से गूँज रहा था।

कुन्ती प्यास से व्याकुल होकर बार-बार बोलीं, “मैं पाँच पाण्डवों की माता हूँ और इस समय उनके बीच हूँ, फिर भी प्यास से जल रही हूँ!” माता के प्रति स्नेह से भीम का हृदय करुणा से भर उठा और उन्होंने फिर चलने का निश्चय किया। उन्हें जलपक्षियों की मधुर बोली सुनाई दी, और यह सोचकर कि वहाँ कोई बड़ा सरोवर होगा, उन्होंने अपने भाइयों और माता को एक विशाल वटवृक्ष के नीचे विश्राम कराया और जल लाने उस ओर चले। सरोवर पर पहुँचकर उन्होंने स्नान कर अपनी प्यास बुझाई और भाइयों के लिए अपने उत्तरीय को जल में भिगोकर जल भर लाए।

लौटकर अपनी माता और भाइयों को खुली भूमि पर सोते देख भीम सर्प की भाँति लम्बी साँसें लेकर रोने लगे: “धिक् मुझ पर, जो अपने भाइयों को नंगी धरती पर सोते देखता हूँ! जो कुन्ती वसुदेव की बहन, कुन्तिराज की पुत्री, विचित्रवीर्य की पुत्रवधू, यशस्वी पाण्डु की पत्नी और हम पाँचों की माता हैं, जो कभी महलों में कोमलतम शय्या पर सोती थीं, वे आज थककर खुली भूमि पर सोई हैं! जो तीनों लोकों के राज्य के योग्य धर्मात्मा युधिष्ठिर हैं, वे साधारण मनुष्य की भाँति भूमि पर सोते हैं! नीली बदली-सी कान्ति वाले अर्जुन भी, और दिव्य अश्विनीकुमारों जैसे जुड़वाँ भी, सामान्य प्राणियों की तरह धरती पर सोते हैं!”

क्रोध से भरकर भीम ने अपनी हथेलियाँ मसलीं और मन ही मन कहा, “हे दुर्योधन, आपके और आपके भाइयों, कर्ण तथा शकुनि के प्रति मैं इसी समय यमलोक भेजने का क्रोध रखता हूँ, पर क्या करूँ, क्योंकि धर्मात्मा युधिष्ठिर अभी आप पर कुपित नहीं हुए और मुझे आज्ञा नहीं देते।” फिर यह सोचकर कि निकट कोई नगर होगा और जागकर भाइयों की प्यास बुझा सकूँगा, भीम पहरा देते हुए जागते बैठे रहे।

सार: भीम का यह विलाप उनके दो रूप एक साथ दिखाता है, सिंह-सा प्रचण्ड बल और माता-भाइयों के प्रति कोमल स्नेह। उनका क्रोध बँधा हुआ है, क्योंकि वे युधिष्ठिर की आज्ञा के अधीन हैं, यही पाण्डव-धर्म का अनुशासन है।

हिडिम्बा का प्रेम और हिडिम्ब राक्षस

जहाँ पाण्डव सोए थे, उससे थोड़ी दूर एक साल वृक्ष पर हिडिम्ब नामक राक्षस रहता था। तीक्ष्ण और लम्बे दाँतों से उसका मुख विकराल था; भूखा और मनुष्य-मांस का लोभी वह राक्षस लाल आँखों और मेघ-सी काली देह वाला था। मनुष्य की गन्ध पाकर उसने अपनी बहन से कहा, “हे बहन, बहुत समय बाद ऐसा रुचिकर भोजन मेरे पास आया है। जाओ, देखो कि ये वन में सोए हुए कौन हैं। इन्हें मारकर मेरे पास लाओ, फिर हम मिलकर इनका मांस खाएँगे और अनेक तालों पर नाचेंगे।”

भाई की आज्ञा से हिडिम्बा वहाँ गई और उसने पाण्डवों को माता सहित सोते तथा अजेय भीमसेन को जागते देखा। सोने-सी कान्ति, सिंह-से कन्धों, शंख-सी तीन रेखाओं वाले कण्ठ और कमल-दल जैसे नेत्रों वाले भीम को देखकर वह राक्षसी तत्काल उन पर मोहित हो गई और मन ही मन सोचा, “यह मेरे पति होने योग्य है। मैं अपने भाई की क्रूर आज्ञा न मानूँगी; स्त्री का अपने पति के प्रति प्रेम भाई के स्नेह से प्रबल होता है। यदि मैं इसे मार दूँ, तो भाई का और मेरा सन्तोष क्षणिक होगा; पर यदि न मारूँ, तो इसके साथ चिरकाल आनन्द भोग सकूँगी।”

सुंदर रूप धरे हिडिम्बा वन में अलाव के पास बैठे भीम के निकट आती हुई, पीछे कुंती और भाई सोए

इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ उस राक्षसी ने एक सुन्दर मानव-रूप धारण किया और दिव्य आभूषणों से सजकर, मुख पर मुस्कान और लज्जाशील चाल लिए, भीम के पास आकर बोली, “हे पुरुषश्रेष्ठ, आप कौन हैं और यहाँ कहाँ से आए? ये दिव्य कान्ति वाले कौन सोए हैं? क्या आप नहीं जानते कि यह वन हिडिम्ब नामक दुष्ट राक्षस का निवास है? उसी मेरे भाई ने मुझे आप सबको मारकर भोजन के लिए लाने भेजा है। पर आपको देवता-सा देदीप्यमान देखकर मैं आपके सिवा किसी और को पति न बनाऊँगी। मेरा हृदय और शरीर कामदेव के बाणों से बिंध गया है; आप मुझे स्वीकार कीजिए। मैं आपको इस मनुष्यभक्षी राक्षस से बचा लूँगी और हम साधारण मनुष्यों के लिए अगम्य पर्वत-शिखरों पर साथ रहेंगे।”

भीम ने उत्तर दिया, “हे राक्षसी, मुनि की भाँति इन्द्रियों को वश में रखने वाला कौन ऐसा पुरुष होगा जो सोई हुई माता और भाइयों को राक्षस का भोजन छोड़कर अपनी कामना तृप्त करने चला जाए? मैं भय से अपने सुख से सोते भाइयों और माता को न जगाऊँगा। हे सुनयने, राक्षस मेरी भुजाओं का बल सहने में समर्थ नहीं, और न मनुष्य, न गन्धर्व, न यक्ष। आप चाहें ठहरें या जाएँ, अथवा अपने भाई को ही भेज दें, मुझे चिन्ता नहीं।”

समझने की कुंजी (अवधारणा): राक्षस यहाँ केवल “दानव” नहीं, अपितु वन में रहने वाली, इच्छानुसार रूप बदलने में समर्थ एक जाति है। हिडिम्बा का अपने भाई की आज्ञा को ठुकराकर प्रेम चुनना दिखाता है कि कथा में राक्षसों के भीतर भी विवेक और धर्म-बोध है।

भीम और हिडिम्ब का द्वन्द्व

बहन को लौटने में देर होती देख हिडिम्ब वृक्ष से उतरकर शीघ्र वहाँ आया। लाल आँखों, खड़े बालों, मेघ-सी देह और लम्बे तीक्ष्ण दाँतों वाला वह भयानक था। भाई को विकराल रूप में उतरते देख हिडिम्बा भयभीत होकर भीम से बोली कि वह उसे और उसके भाइयों को अपनी पीठ पर बैठाकर आकाश-मार्ग से ले चले। भीम ने कहा, “हे सुश्रोणि, भय मत कीजिए। जब तक मैं यहाँ हूँ, कोई राक्षस इनको हानि नहीं पहुँचा सकता। मैं इसे आपकी आँखों के सामने मारूँगा। मेरी ये भुजाएँ गज की सूँड़-सी, ये जाँघें लौह-गदा-सी, और यह वक्ष वज्र-सा दृढ़ है। मुझे मनुष्य समझकर तिरस्कार न कीजिए।”

हिडिम्ब ने अपनी बहन को मानव-रूप में, फूलों के हार और पूर्ण चन्द्र-से मुख से सजी देखा, तो समझ गया कि वह काम-वासना से प्रेरित होकर उसके मार्ग में बाधा डाल रही है। क्रोध से आँखें फैलाकर वह बोला, “हे अकुलीन स्त्री, आप अपने राक्षस पूर्वजों का यश और मान बेचने को तत्पर हैं! जिनके सहारे आप मुझे यह हानि पहुँचाना चाहती हैं, उन्हें भी मैं आपके साथ अभी मार डालूँगा।” दाँत पीसते हुए वह बहन को मारने दौड़ा। पर भीम ने उसे रोककर कहा, “रुकिए, रुकिए! हे दुष्ट राक्षस, स्त्री को मारना आपको शोभा नहीं देता, विशेषकर जब उसका कोई दोष नहीं। इस कन्या ने जो मुझसे प्रेम किया, वह कामदेव की प्रेरणा से किया, जो हर प्राणी में व्याप्त है। आप मेरे होते इस स्त्री को न मारेंगे। मेरे साथ आकर अकेले युद्ध कीजिए; मैं अकेला ही आपको आज यमलोक भेज दूँगा।”

वन में भीम और राक्षस हिडिम्ब हाथ गूँथकर मल्ल-युद्ध करते हुए, कुंती और भाई देखते

हिडिम्ब ने ललकारकर कहा कि पहले यह सब करके दिखाए, फिर डींग हाँके; आज वह उसके रक्त का पान करके पहले उसी को मारेगा। यह कहकर भुजाएँ फैलाए वह भीम पर झपटा। भीम ने मानो खेल-खेल में उसकी फैली भुजाओं को बड़े बल से पकड़ लिया और सिंह जैसे छोटे पशु को घसीटता है, वैसे उसे बत्तीस हाथ दूर तक घसीट ले गया। राक्षस ने क्रुद्ध होकर भयंकर गर्जना की। भीम उसे और दूर घसीट ले गए, ताकि उसकी चीख़ें सोते भाइयों को न जगाएँ। दोनों दो मतवाले गजराजों की भाँति लड़ते हुए वृक्षों और लताओं को तोड़ने लगे, और उन्हीं ध्वनियों से पाण्डव अपनी माता सहित जाग पड़े और हिडिम्बा को अपने सामने बैठे देखा।

एक उप-कथा: ध्यान दीजिए कि भीम राक्षस को मारने से पहले एक स्त्री की रक्षा का धर्म स्थापित करते हैं, चाहे वह स्त्री शत्रु के कुल की ही क्यों न हो। महाभारत में बल और धर्म एक साथ चलते हैं; पराक्रमी भी पहले यह देखता है कि किसे मारना उचित है और किसे नहीं।

हिडिम्ब का वध

निद्रा से जागे पाण्डव और कुन्ती हिडिम्बा का अद्भुत सौन्दर्य देखकर विस्मित हुए। कुन्ती ने स्नेह से पूछा कि वह कौन है और किस प्रयोजन से आई है। हिडिम्बा ने सब सच बताया कि वह हिडिम्ब राक्षस की बहन है, भाई की आज्ञा से उन्हें मारने आई थी, पर भीम को देखकर कामदेव के वश में होकर उसने मन से उन्हीं को पति चुन लिया, और अब उसका भाई और उसका पति दोनों आपस में जूझ रहे हैं।

यह सुनकर युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल और सहदेव उठ खड़े हुए और उन्होंने भीम तथा राक्षस को दो सिंहों की भाँति एक-दूसरे को घसीटते देखा। उनके पैरों से उठी धूल वन-दावानल के धुएँ-सी प्रतीत होती थी। भीम को कुछ पीड़ित देख अर्जुन ने मुस्कुराते हुए कहा, “हे महाबाहु भीम, भय मत कीजिए; मैं इस राक्षस को मारूँ और नकुल-सहदेव माता की रक्षा करें।” भीम बोले, “हे भाई, आप दर्शक की भाँति देखिए, चिन्ता न कीजिए; जो मेरी भुजाओं की पकड़ में आ गया, वह जीवित न बचेगा।” अर्जुन ने पुनः कहा, “इसे अधिक समय जीवित रखकर क्या लाभ? पूर्व-दिशा लाल हो रही है, प्रातः की सन्ध्या निकट है; दोनों सन्ध्याओं में राक्षस अपनी माया-शक्ति बढ़ा लेते हैं, अतः शीघ्र करें, खेल छोड़कर इस भयंकर राक्षस को तुरन्त मारिए।”

अर्जुन के इन वचनों से भीम क्रोध से प्रज्वलित हो उठे और प्रलयकाल में पवन (अपने पिता वायु) के बल को स्मरण कर उन्होंने मेघ-सी नीली देह वाले राक्षस को आकाश में ऊँचा उठाकर सौ बार घुमाया। फिर बोले, “हे राक्षस, आपकी बुद्धि और आपका यह अपवित्र मांस से बढ़ा शरीर व्यर्थ हुआ; आप अपवित्र मृत्यु के योग्य हैं, और आज मैं इस वन को काँटों-रहित वन-सा मंगलमय बना दूँगा।” अर्जुन के पुनः सहायता के प्रस्ताव पर भीम और क्रुद्ध होकर राक्षस को पूरे बल से धरती पर पटककर, मानो किसी पशु को मारते हों, वैसे मार डाला। मरते समय राक्षस ने भीगे ढोल-सी गहरी, भयंकर चीख़ निकाली। फिर भीम ने उसके शरीर को हाथों से पकड़कर बीच से तोड़कर दुहरा कर दिया।

हिडिम्ब को मरा देख भाइयों ने प्रसन्न होकर भीम को बधाई दी। अर्जुन ने पूज्य भीम का अभिनन्दन कर कहा कि इस वन से दूर कोई नगर है, अतः शीघ्र चलें कि दुर्योधन उनका पता न पा सके। तब सब वीर “ऐसा ही हो” कहकर माता सहित चल पड़े, और हिडिम्बा राक्षसी उनके पीछे-पीछे चली।

हिडिम्बा का वरण और घटोत्कच का जन्म

हिडिम्बा को साथ आते देख भीम ने कहा कि राक्षस छल से बदला लेते हैं, अतः वह अपने भाई के मार्ग पर चली जाए। पर युधिष्ठिर ने भीम को क्रोध में देख कहा, “हे भीम, हे पुरुषश्रेष्ठ, कितने ही क्रुद्ध हों, स्त्री का वध न कीजिए। धर्म का पालन प्राण-रक्षा से बड़ा कर्तव्य है। जो हिडिम्ब हमें मारने आया था, उसे आप मार चुके; यह तो उसकी बहन है, क्रुद्ध होकर भी हमारा क्या बिगाड़ेगी?”

हिडिम्बा हाथ जोड़कर कुंती के आगे झुकी हुई, भीम गदा लिए और भाई पास बैठे

तब हिडिम्बा ने कुन्ती और युधिष्ठिर को प्रणाम कर हाथ जोड़कर कहा, “हे आदरणीया, आप जानती हैं कि कामदेव के हाथों स्त्रियाँ कैसी पीड़ा सहती हैं। मैंने अपने मित्रों, सम्बन्धियों और अपनी जाति की रीति को त्यागकर आपके इस पुत्र को पति चुना है। यदि यह वीर अथवा आप मुझे त्याग देंगी, तो मैं प्राण न रखूँगी। मुझे अपनी दासी या मूढ़ा समझकर भी इन्हें मुझसे मिला दीजिए। मैं इन्हें जहाँ चाहूँ ले जाकर पुनः आपके पास लौटा लाऊँगी; जब-जब आप स्मरण करेंगी, मैं तुरन्त आकर आपको दुर्गम स्थानों से पार ले जाऊँगी और सब संकटों से बचाऊँगी।”

उसने यह भी कहा कि विपत्ति-काल में मनुष्य को हर सम्भव उपाय से अपने प्राण रक्षित करने चाहिए, और जो विपत्ति में भी धर्म पर टिका रहता है वही श्रेष्ठ धर्मात्मा है। युधिष्ठिर ने कहा, “हे क्षीणकटि, ऐसा ही है, इसमें सन्देह नहीं; पर आप वैसा ही करें जैसा कहा। भीम स्नान कर, प्रार्थना और प्रायश्चित्त-कर्म कर, सूर्यास्त तक आपके साथ रहेंगे; दिन में आप उनके साथ इच्छानुसार विहार करें, पर प्रतिदिन रात्रि होने से पहले भीम को यहाँ लौटा लाइए।” भीम ने सहमत होकर हिडिम्बा से कहा, “हे सुश्रोणि, मैं आपसे यह वचन देता हूँ कि जब तक आपको पुत्र न प्राप्त हो जाए, तब तक मैं आपके साथ रहूँगा।”

हिडिम्बा भीम को कंधों पर बिठाए पर्वतों, झरनों और वन के ऊपर आकाश-मार्ग से उड़ती हुई

हिडिम्बा “ऐसा ही हो” कहकर भीम को अपने ऊपर बैठाकर रमणीय पर्वत-शिखरों, देव-तीर्थों, कमल-कुसुमित सरोवरों और हिमालय की कन्दराओं में, स्वयं परम सुन्दर रूप धरकर, मधुर स्वर गाते हुए विहार कराती रही। समय आने पर उसने भीम से एक महाबली पुत्र को जन्म दिया, जो भयंकर नेत्रों, बड़े मुख, सीधे बाण-से कानों और ताम्र-से अधरों वाला, विकराल पर अद्भुत था। राक्षसी-स्त्रियाँ जिस दिन गर्भ धारण करती हैं उसी दिन प्रसव कर देती हैं, अतः वह बालक जन्म के क्षण ही युवा हो गया और शीघ्र ही समस्त शस्त्रों में निपुण हो गया। उसका सिर घड़े (घट) के समान गञ्जा था, इसीलिए माता-पिता ने उसका नाम घटोत्कच रखा। पाण्डवों के प्रति अत्यन्त भक्त घटोत्कच उनका प्रिय बन गया, मानो उन्हीं में से एक हो।

फिर हिडिम्बा, अपने साथ रहने का काल पूर्ण जानकर, पाण्डवों को प्रणाम कर तथा पुनर्मिलन की प्रतिज्ञा कर अपनी इच्छित दिशा को चली गई, और घटोत्कच भी आवश्यकता पड़ने पर आने का वचन देकर उत्तर दिशा को गया। वस्तुतः उस घटोत्कच को इन्द्र ने अपने ही अंश से कर्ण के योग्य प्रतिद्वन्द्वी के रूप में रचा था, क्योंकि इन्द्र ने कर्ण को वह शक्ति-अस्त्र दिया था जो जिस पर चलाया जाए उसे मारे बिना न छोड़ता।

बालक घटोत्कच आकाश की ओर संकेत कर कुंती और पाण्डवों को स्मरण करते ही आने का वचन देता हुआ

समझने की कुंजी (वंश): घटोत्कच भीम और हिडिम्बा का पुत्र, अर्थात् पाण्डवों का राक्षस-वंशी भतीजा है। आगे महायुद्ध में यही घटोत्कच कर्ण की उस अमोघ शक्ति को अपने ऊपर लेकर अर्जुन के प्राण बचाएगा, जिसकी ओर यहाँ संकेत है।

सार: हिडिम्ब-वध केवल एक राक्षस का अन्त नहीं, अपितु एक नए सम्बन्ध और एक भावी महावीर का आरम्भ भी है। शत्रु-कुल की स्त्री को भी पाण्डव धर्मपूर्वक स्थान देते हैं, और उसी से युद्ध-काल का एक रक्षक जन्म लेता है।

व्यास का मिलन और एकचक्रा-प्रवेश

वे महारथी पाण्डव वन-वन घूमते, मृग आदि का आखेट करते हुए मत्स्य, त्रिगर्त, पञ्चाल और कीचक देशों तथा अनेक मनोहर वनों-सरोवरों को देखते रहे। उनके सिरों पर जटाएँ थीं और वे वल्कल तथा मृगचर्म धारण किए तपस्वियों के वेश में थे; कभी माता को पीठ पर उठाकर शीघ्रता से चलते, कभी वेश बदलकर। मार्ग में ऋक् आदि वेदों, वेदांगों तथा नीति-शास्त्र का अध्ययन करते हुए वे एक दिन अपने पितामह कृष्णद्वैपायन व्यास से मिले और माता सहित हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हुए।

व्यास बोले, “हे भरतवंशियो, धृतराष्ट्र-पुत्र द्वारा रचे इस छली निर्वासन को मैं पहले से जानता था और आपके हित हेतु ही आया हूँ। शोक मत कीजिए, यह सब आपके कल्याण के लिए है। मेरी दृष्टि में धृतराष्ट्र के पुत्र और आप समान हैं, पर मनुष्य का स्नेह विपत्ति में पड़े और कोमल वय वालों की ओर अधिक झुकता है, इसीलिए इस समय मेरा प्रेम आप पर अधिक है। यहाँ से कुछ ही दूर एक रमणीय नगर है जहाँ आप पर कोई संकट न आएगा; वहाँ वेश बदलकर मेरी प्रतीक्षा कीजिए।”

व्यास ने पाण्डवों को सान्त्वना देकर एकचक्रा नगर में पहुँचाया और कुन्ती से कहा, “हे पुत्री, सत्यनिष्ठ युधिष्ठिर अपने न्याय से समस्त पृथ्वी जीतकर अन्य राजाओं पर शासन करेंगे; भीम और अर्जुन के पराक्रम से समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी जीतकर वे राजसूय और अश्वमेध जैसे यज्ञ करेंगे और अपने सम्बन्धियों को सुख-समृद्धि में रखेंगे।” फिर व्यास ने उन्हें एक ब्राह्मण के घर में ठहराकर, “मैं फिर लौटूँगा, देश और काल के अनुकूल रहकर आप सुखी रहेंगे” कहकर विदा ली और जहाँ से आए थे वहीं चले गए।

ब्राह्मण-परिवार का शोक

एकचक्रा में पाण्डव उस ब्राह्मण के घर भिक्षावृत्ति से रहते रहे और अपने गुणों से नगरवासियों के प्रिय बन गए। सन्ध्या को वे भिक्षा में मिला सब कुन्ती के सामने रख देते, जिसका आधा भाग कुन्ती शेष चार भाइयों सहित स्वयं लेतीं और शेष आधा अकेला भीम। एक दिन जब अन्य भाई भिक्षा को बाहर थे और भीम माता के पास घर पर थे, तब कुन्ती ने ब्राह्मण के भीतरी कक्ष से हृदय-विदारक विलाप सुना। करुणा से भरकर उन्होंने भीम से कहा कि हमने इस ब्राह्मण के घर में सुख से, सम्मान पाकर और धृतराष्ट्र-पुत्र से अज्ञात रहकर निवास किया है; इस उपकारी के किसी संकट में सहायक होना हमारा कर्तव्य है। भीम ने कहा कि माता ब्राह्मण के दुःख का स्वरूप जान लें, वे उसे चाहे जितना कठिन हो, दूर करेंगे।

एकचक्रा के ब्राह्मण परिवार का घर में विलाप, द्वार पर खड़ी कुंती चिंतित होकर सुनती हुई

कुन्ती भीतर गईं तो ब्राह्मण को अपनी पत्नी, पुत्र और पुत्री सहित शोकमग्न बैठे और विलाप करते सुना। ब्राह्मण कह रहा था कि इस संसार-जीवन पर धिक्कार है, जो खोखला और दुःख से भरा है; न मुझे संकट से बचने का उपाय सूझता है, न अपनी पत्नी सहित किसी निरापद स्थान भागने का। उसने पत्नी को स्मरण कराया कि उसने कई बार अन्यत्र जाने को कहा था, पर वह “यहीं जन्मी, यहीं वृद्ध हुई, यह पैतृक घर है” कहकर न मानी। अब वह न पत्नी को त्याग सकता है, जो उसकी सब शुभ कर्मों की सहायिका है; न कोमल वय के पुत्र को बलि कर सकता है; न उस कन्या को, जिसे विधाता ने पति को सौंपने हेतु धरोहर-सी उसके हाथ में रखा है। और यदि वह स्वयं को बलि कर दे, तो उसके बिना ये तीनों जल बिना मछली-से नष्ट हो जाएँगे।

समझने की कुंजी (अवधारणा): ब्राह्मण का यह संकट धर्म-संकट है, जहाँ हर विकल्प में किसी न किसी प्रियजन का बलिदान है। महाभारत बार-बार ऐसे क्षण रचता है जहाँ सीधा सही उत्तर नहीं होता, और मनुष्य को न्यूनतम अधर्म वाला मार्ग चुनना पड़ता है।

कौन बक के पास जाए

ब्राह्मणी ने कहा कि वह साधारण मनुष्य की भाँति शोक न करे, स्त्री-पुत्र-पुत्री सब अपने ही लिए होते हैं; वह स्वयं जाएगी, क्योंकि अपने प्राण देकर पति का कल्याण करना ही स्त्री का परम और शाश्वत धर्म है। उसने कहा कि वह पुत्र-पुत्री को जन्म देकर अपना ऋण चुका चुकी है, पर पति के बिना इन बच्चों का पालन वह न कर सकेगी; पति-रहित स्त्री को कौवे माँस-पिण्ड की भाँति घेर लेते हैं। अतः उचित है कि पति उसी का त्याग कर बच्चों को पाले। फिर कन्या ने आगे आकर कहा कि उसे ही बक के पास भेज दिया जाए, क्योंकि एक न एक दिन तो पिता को उसे त्यागना ही है; पुत्र को “पुत्र” इसीलिए कहते हैं कि वह माता-पिता का उद्धार करता है, अतः वह स्वयं उद्धार-नौका बने।

उनके इस विलाप पर तीनों फिर साथ रोने लगे। तभी कोमल वय का पुत्र, आँखें हर्ष से फैलाए, तोतली बोली में बोला, “रोइए मत, हे पिता, हे माता, हे बहन!” और एक घास का तिनका उठाकर मुस्कुराते हुए कहा, “इसी से मैं उस मनुष्यभक्षी राक्षस को मार डालूँगा!” बालक की यह मधुर बात सुनकर सबके मुख पर हर्ष की एक रेखा आ गई। तब कुन्ती ने उचित अवसर जानकर आगे बढ़कर कहा कि वे इस शोक का कारण जानना चाहती हैं और यदि सम्भव हो तो दूर करेंगी।

ब्राह्मण ने कहा कि यह दुःख किसी मनुष्य से दूर होने योग्य नहीं। इस नगर से कुछ दूर बक नामक राक्षस रहता है, जो इस देश और नगर का स्वामी है; वह मनुष्य-मांस पर पलता है, पर अपने बल से नगर की बाहरी शत्रुओं से रक्षा भी करता है। उसके भोजन का नियम यह है कि प्रत्येक गृहस्थ को बारी-बारी एक गाड़ी भर चावल, दो भैंसे और उन्हें ले जाने वाला एक मनुष्य भेजना पड़ता है। जो टालता है, उसे राक्षस सपरिवार खा जाता है। राजा वेत्रकीय में रहता है, जो राज-नीति से अनभिज्ञ और मन्दबुद्धि है। अब वह घातक बारी ब्राह्मण के घर आ पड़ी है; न उसके पास मनुष्य खरीदने को धन है, न वह परिवार के किसी जन को दे सकता है, अतः वह आज सपरिवार जाकर राक्षस का ग्रास बनने को तैयार है।

समझने की कुंजी (संख्या-आधुनिक-समतुल्य): “एक गाड़ी भर चावल और दो भैंसे” आज के अनुमान से किसी एक बस्ती का कई दिनों का अन्न-भण्डार है, अर्थात् एक पूरे परिवार की पूरी सम्पदा एक ही बार में चुक जाती थी, और साथ में एक प्राण भी। यह बक की क्रूर “कर”-व्यवस्था थी।

कुन्ती का निश्चय और युधिष्ठिर की शंका

कुन्ती ने कहा कि ब्राह्मण शोक न करे, उसे इस संकट से बचाने का उपाय उन्हें दिखता है: उसके तो एक ही पुत्र, एक ही कन्या है, अतः इनमें से कोई या स्वयं ब्राह्मण-दम्पती न जाएँ; उनके पाँच पुत्र हैं, उनमें से एक राक्षस का कर लेकर जाएगा। ब्राह्मण ने कहा कि अपने प्राण बचाने के लिए वह किसी ब्राह्मण या अतिथि का प्राण कदापि न लेगा, क्योंकि ब्रह्म-हत्या परम पाप है और उसका कोई प्रायश्चित्त नहीं। कुन्ती ने उत्तर दिया कि वे भी ब्राह्मणों की रक्षा को परम धर्म मानती हैं, पर उनका एक पुत्र महान् पराक्रमी और मन्त्र-विद्या में निपुण है; वह राक्षस को भोजन सौंपकर भी स्वयं को बचा लेगा, क्योंकि उन्होंने पहले भी उसे अनेक विशाल राक्षसों से जूझते और उन्हें मारते देखा है। पर यह बात किसी से न कही जाए।

ब्राह्मण-दम्पती प्रसन्न होकर सहमत हुए। कुन्ती ने वायुपुत्र भीम के पास जाकर यह कार्य करने को कहा, और भीम ने “ऐसा ही हो” कहकर स्वीकार किया। संध्या को जब अन्य पाण्डव भिक्षा लेकर लौटे, तो युधिष्ठिर ने भीम के मुख से ही उनके स्वीकृत कार्य को भाँप लिया और एकान्त में माता से पूछा कि यह कैसा कार्य है और भीम इसे माता की आज्ञा से कर रहे हैं या स्वयं। कुन्ती ने सब बताया।

युधिष्ठिर बोले, “हे माता, आपने यह कैसा साहसिक कर्म किया, जो आत्म-हत्या-सा कठिन है? विद्वान् कभी अपने पुत्र के त्याग की प्रशंसा नहीं करते। जिस भीम के बाहुबल के भरोसे हम रात में निश्चिन्त सोते और खोया राज्य पुनः पाने की आशा रखते हैं, जिसने पुरोचन का अन्त किया और लाख के घर से तथा अन्य संकटों से हमारी रक्षा की, उसी को आपने दूसरे के लिए दे देने का निश्चय कैसे किया? क्या विपत्तियों ने आपकी बुद्धि को धुँधला दिया है?” कुन्ती ने कहा कि वृकोदर के लिए चिन्ता न करें; यह निश्चय किसी दुर्बलता से नहीं, अपितु ब्राह्मण के उपकार का प्रत्युपकार और परम धर्म-लाभ, इन दोनों उद्देश्यों से किया है। भीम के बाहुओं में दस सहस्र हाथियों का बल है; जन्म के समय वह उनकी गोद से गिरा तो जिस शिला पर गिरा वह चूर-चूर हो गई थी, तभी से वे उसका बल जानती हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि व्यास ने बहुत पहले उन्हें बताया था कि जो क्षत्रिय ब्राह्मण की सहायता करता है वह परलोक में मंगलमय लोक पाता है; जो क्षत्रिय किसी क्षत्रिय या वैश्य की रक्षा करता है उसे यश मिलता है; और जो शूद्र की भी शरण-रक्षा करता है, वह अगले जन्म में राजकुल में जन्म लेता है। युधिष्ठिर ने माता का यह करुणा-प्रेरित निश्चय श्रेष्ठ मानकर कहा कि भीम राक्षस को मारकर अवश्य जीवित लौटेंगे, पर ब्राह्मण से यह वचन ले लिया जाए कि वह यह बात नगर में किसी पर प्रकट न करे।

सार: कुन्ती का निर्णय भीम के बल और धर्म-लाभ की गणना पर टिका है, युधिष्ठिर की शंका एक भाई की प्रीति और सावधानी पर। दोनों दृष्टियाँ सच्ची हैं; महाभारत किसी एक को सपाट रूप से सही नहीं ठहराता।

बक राक्षस का वध

भीम उलटे छकड़े के पास बैठा बकासुर का भोजन खाता हुआ, क्रोधित राक्षस उस पर झपटता

रात बीतने पर भीम राक्षस का भोजन लेकर उस वन की ओर चले जहाँ बक रहता था। राक्षस के स्थान के निकट पहुँचकर वे स्वयं ही वह भोजन खाने लगे और राक्षस को ऊँचे स्वर से नाम लेकर पुकारने लगे। भीम के शब्दों से क्रुद्ध होकर बक बाहर निकल आया। विशाल देह, लाल आँखों, लाल दाढ़ी और लाल बालों वाला वह राक्षस भयानक था; उसका मुख कान से कान तक फटा हुआ और माथे पर तीन रेखाएँ थीं। भीम को अपना भोजन खाते देख वह बोला, “यह मूढ़ कौन है, जो यमलोक जाने की इच्छा से मेरे ही सामने मेरा भोजन खा रहा है?” भीम ने तिरस्कार से मुस्कुराकर, राक्षस की उपेक्षा करते हुए, मुख फेरकर खाना जारी रखा।

राक्षस ने भयंकर गर्जना कर, दोनों भुजाएँ उठाकर भीम को मारने को दौड़कर, पीछे से उनकी पीठ पर भारी प्रहार किया। पर भीम ने उसकी ओर देखा तक नहीं और पहले की भाँति खाते रहे। तब राक्षस ने एक वृक्ष उखाड़कर फेंका, जिसे भीम ने बाएँ हाथ से पकड़ लिया। राक्षस और वृक्ष उखाड़-उखाड़कर फेंकने लगा, और भीम भी वैसे ही फेंकने लगे, यहाँ तक कि वह प्रदेश वृक्षहीन हो गया। तब बक “मैं ही बक हूँ” कहता हुआ भीम पर कूदा और उन्हें भुजाओं में जकड़ लिया। भीम ने भी उसे अपनी दृढ़ भुजाओं में कसकर बल से घसीटना आरम्भ किया। घसीटते-घसीटते राक्षस थक गया; उनके बल से धरती काँप उठी और बड़े वृक्ष टूट गए।

राक्षस को थका देख भीम ने उसे घुटनों से धरती पर दबाकर बल से पीटा; फिर एक घुटना उसकी पीठ के मध्य रखकर, दाहिने हाथ से उसकी गर्दन और बाएँ हाथ से उसकी कमर का वस्त्र पकड़कर, उसे बल से बीच से दुहरा कर तोड़ डाला। राक्षस भयंकर गर्जना करता हुआ रक्त वमन करने लगा और पर्वत-सा विशाल बक भीम के घुटने पर टूटकर मर गया।

इन ध्वनियों से भयभीत बक के सम्बन्धी अपने अनुचरों सहित बाहर आए। भीम ने उन्हें सान्त्वना देकर यह वचन लिया कि वे फिर कभी मनुष्यों का वध न करेंगे, अन्यथा बक की भाँति मारे जाएँगे। उन्होंने “ऐसा ही हो” कहकर वचन दिया, और उस दिन से उस प्रदेश के राक्षस मनुष्यों के प्रति शान्त देखे गए। फिर भीम मृत राक्षस को घसीटकर नगर के एक द्वार पर रख आए और किसी की दृष्टि में आए बिना लौट आए, तथा युधिष्ठिर को सब विस्तार से बताया।

प्रातः नगरवासियों ने रक्त से सने, पर्वत-शिला-से विशाल बक को मरा देखा तो उनके रोम खड़े हो गए। एकचक्रा में समाचार पहुँचा और सहस्रों नर-नारी, वृद्ध-बालक उसे देखने आए और उस अलौकिक पराक्रम पर विस्मित होकर अपने देवताओं की स्तुति करने लगे। फिर उन्होंने हिसाब लगाया कि कल किसकी बारी थी, और उस ब्राह्मण के पास जाकर पूछा। पाण्डवों को छिपाने की इच्छा से ब्राह्मण ने कहा कि मन्त्र-निपुण किसी उच्च-आत्मा ब्राह्मण ने उसे शोक में देखकर स्वयं वह भोजन ले जाने का बीड़ा उठाया था और यही उपकार उसने किया। यह सुनकर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सब हर्षित हुए और उन्होंने उस ब्राह्मण की पूजा को प्रधान मानकर एक उत्सव की स्थापना की। तत्पश्चात् नागरिक अपने-अपने घर लौट गए और पाण्डव पूर्ववत् एकचक्रा में रहने लगे।

सार: बक-वध से भीम ने एक उपकारी ब्राह्मण के परिवार की और पूरे एकचक्रा की रक्षा की, और अपना नाम भी गुप्त रखा। अग्नि से बचकर निकले पाण्डव अब छद्म-वेश में रहते हुए भी अपने धर्म और पराक्रम से जन-जन के रक्षक बन रहे हैं, यही उनके भावी राज्य की नींव है।

मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), आदि पर्व; गीता प्रेस गोरखपुर परम्परा।