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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

वाणी: ग्यारह भट्ट

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वाणी

ग्यारह भट्ट

गुरु अर्जन देव जी के दरबार में आए राज-कवि · 16वीं सदी · 123 सवैये

1604, अमृतसर। गुरु अर्जन देव जी का दरबार। उनके आदि ग्रंथ संकलन का काम अंतिम चरण में था। उत्तर भारत के 11 अलग-अलग क्षेत्रों से 14 भट्ट (राज-कवि) आए, अपना शास्त्रीय काव्य-कौशल ले कर। सवैया संस्कृत से निकला एक ख़ास छंद है, 4-4 पंक्तियाँ, वर्णों की सख़्त गिनती। मुग़ल दरबारों की फ़ारसी दरबारी शायरी के जोड़ का।

भट्टों ने उस ढाँचे को भक्ति की बात कहने के लिए ढाला। हर सवैया किसी एक गुरु पर केंद्रित है, पहले महला 1 (नानक) से महला 5 (अर्जन) तक। यह दरबारी स्तुति की परंपरा थी, मगर भीतर का सार पूरा भक्ति-भरा समर्पण।

गुरु अर्जन ने सबको साथ लेने वाली दृष्टि दिखाई, बाहर के रचनाकारों की रचनाएँ प्रामाणिक ग्रंथ में रखीं। 14 नाम हैं, गिनती "ग्यारह" की है (कुछ नाम एक ही नाम के दूसरे रूप हैं)। आदि ग्रंथ अंग 1385-1409 में पूरा सवैया-खण्ड।

आदि ग्रंथ में इनके शबद

हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, राग के अनुसार, ग्रंथ के क्रम में।

सलोक और अन्य वाणी (116)
  1. इक मनि पुरखु धिआइ बरदाता ॥अंग 1389
  2. गावहि जनकादि जुगति जोगेसुर हरि रस पूरन सरब कला ॥अंग 1389
  3. गावहि कपिलादि आदि जोगेसुर अपरंपर अवतार वरो ॥अंग 1389
  4. गावहि गुण बरन चारि खट दरसन ब्रहमादिक सिमरंथि गुना ॥अंग 1390
  5. राजु जोगु माणिओ बसिओ निरवैरु रिदंतरि ॥अंग 1390
  6. सतजुगि तै माणिओ छलिओ बलि बावन भाइओ ॥अंग 1390
  7. गुण गावै रविदासु भगतु जैदेव त्रिलोचन ॥अंग 1390
  8. गुण गावहि पायालि भगत नागादि भुयंगम ॥अंग 1390
  9. गुण गावहि नव नाथ धंनि गुरु साचि समाइओ ॥अंग 1390
  10. सोई पुरखु धंनु करता कारण करतारु करण समरथो ॥अंग 1391
  11. जा की द्रिसटि अंम्रित धार कालुख खनि उतार तिमर अग्यान जाहि दरस दुआर ॥अंग 1391
  12. तै तउ द्रिड़िओ नामु अपारु बिमल जासु बिथारु साधिक सिध सुजन जीआ को अधारु ॥अंग 1391
  13. तै ता हदरथि पाइओ मानु सेविआ गुरु परवानु साधि अजगरु जिनि कीआ उनमानु ॥अंग 1391
  14. द्रिसटि धरत तम हरन दहन अघ पाप प्रनासन ॥अंग 1391
  15. सदा अकल लिव रहै करन सिउ इछा चारह ॥अंग 1392
  16. मनि बिसासु पाइओ गहरि गहु हदरथि दीओ ॥अंग 1392
  17. नामु अवखधु नामु आधारु अरु नामु समाधि सुखु सदा नाम नीसाणु सोहै ॥अंग 1392
  18. सचु तीरथु सचु इसनानु अरु भोजनु भाउ सचु सदा सचु भाखंतु सोहै ॥अंग 1392
  19. अमिअ द्रिसटि सुभ करै हरै अघ पाप सकल मल ॥अंग 1392
  20. सोई पुरखु सिवरि साचा जा का इकु नामु अछलु संसारे ॥अंग 1392
  21. सिमरहि सोई नामु जख्य अरु किंनर साधिक सिध समाधि हरा ॥अंग 1393
  22. सोई नामु सिवरि नव नाथ निरंजनु सिव सनकादि समुधरिआ ॥अंग 1393
  23. तितु नामि लागि तेतीस धिआवहि जती तपीसुर मनि वसिआ ॥अंग 1393
  24. नाम किति संसारि किरणि रवि सुरतर साखह ॥अंग 1393
  25. नामु धिआवहि देव तेतीस अरु साधिक सिध नर नामि खंड ब्रहमंड धारे ॥अंग 1393
  26. सति सूरउ सीलि बलवंतु सत भाइ संगति सघन गरूअ मति निरवैरि लीणा ॥अंग 1393
  27. धनि सतिगुरु सेविओ जिसु पसाइ गति अगम जाणी ॥अंग 1393
  28. बारिजु करि दाहिणै सिधि सनमुख मुखु जोवै ॥अंग 1394
  29. चरण त पर सकयथ चरण गुर अमर पवलि रय ॥अंग 1394
  30. ति नर दुख नह भुख ति नर निधन नहु कहीअहि ॥अंग 1394
  31. तै पढिअउ इकु मनि धरिअउ इकु करि इकु पछाणिओ ॥अंग 1394
  32. जि मति गही जैदेवि जि मति नामै संमाणी ॥अंग 1394
  33. गुरु अमरदासु परसीऐ पुहमि पातिक बिनासहि ॥अंग 1394
  34. सचु नामु करतारु सु द्रिड़ु नानकि संग्रहिअउ ॥अंग 1395
  35. आपि नराइणु कला धारि जग महि परवरियउ ॥अंग 1395
  36. जपु तपु सतु संतोखु पिखि दरसनु गुर सिखह ॥अंग 1395
  37. चिति चितवउ अरदासि कहउ परु कहि भि न सकउ ॥अंग 1395
  38. भिखे के ॥अंग 1395
  39. रहिओ संत हउ टोलि साध बहुतेरे डिठे ॥अंग 1395
  40. पहिरि समाधि सनाहु गिआनि है आसणि चड़िअउ ॥अंग 1396
  41. घनहर बूंद बसुअ रोमावलि कुसम बसंत गनंत न आवै ॥अंग 1396
  42. इक मनि पुरखु निरंजनु धिआवउ ॥अंग 1396
  43. छुटत परवाह अमिअ अमरा पद अंम्रित सरोवर सद भरिआ ॥अंग 1396
  44. सतगुर मति गूड़॑ बिमल सतसंगति आतमु रंगि चलूलु भया ॥अंग 1396
  45. अनभउ उनमानि अकल लिव लागी पारसु भेटिआ सहज घरे ॥अंग 1397
  46. अभर भरे पायउ अपारु रिद अंतरि धारिओ ॥अंग 1397
  47. संतोख सरोवरि बसै अमिअ रसु रसन प्रकासै ॥अंग 1397
  48. जगु जितउ सतिगुर प्रमाणि मनि एकु धिआयउ ॥अंग 1397
  49. प्रेम भगति परवाह प्रीति पुबली न हुटइ ॥अंग 1397
  50. जगत उधारणु नव निधानु भगतह भव तारणु ॥अंग 1397
  51. सेज सधा सहजु छावाणु संतोखु सराइचउ सदा सील संनाहु सोहै ॥अंग 1398
  52. गुरु जिन॑ कउ सुप्रसंनु नामु हरि रिदै निवासै ॥अंग 1398
  53. सतिगुरि खेमा ताणिआ जुग जूथ समाणे ॥अंग 1398
  54. जनकु सोइ जिनि जाणिआ उनमनि रथु धरिआ ॥अंग 1398
  55. धरम करम पूरै सतिगुरु पाई है ॥अंग 1398
  56. हउ बलि बलि जाउ सतिगुर साचे नाम पर ॥अंग 1398
  57. राजु जोगु तखतु दीअनु गुर रामदास ॥अंग 1399
  58. जिसहि धार्यिउ धरति अरु विउमु अरु पवणु ते नीर सर अवर अनल अनादि कीअउ ॥अंग 1399
  59. कचहु कंचनु भइअउ सबदु गुर स्रवणहि सुणिओ ॥अंग 1399
  60. जामि गुरू होइ वलि धनहि किआ गारवु दिजइ ॥अंग 1399
  61. गुर बिनु घोरु अंधारु गुरू बिनु समझ न आवै ॥अंग 1399
  62. गुरू गुरू गुरु करु मन मेरे ॥अंग 1399
  63. गुरू मुखु देखि गरू सुखु पायउ ॥अंग 1400
  64. समरथ गुरू सिरि हथु धर्यउ ॥अंग 1400
  65. अब राखहु दास भाट की लाज ॥अंग 1400
  66. गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु प्रानीअहु ॥अंग 1400
  67. गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपि सति करि ॥अंग 1400
  68. गुरू गुरु गुरु करहु गुरू हरि पाईऐ ॥अंग 1401
  69. गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु मंन रे ॥अंग 1401
  70. सिरी गुरू साहिबु सभ ऊपरि ॥अंग 1401
  71. आनंदु नित मंगलु गुर दरसनु सफलु संसारि ॥अंग 1401
  72. संसारु अगम सागरु तुलहा हरि नामु गुरू मुखि पाया ॥अंग 1402
  73. परतापु सदा गुर का घटि घटि परगासु भया जसु जन कै ॥अंग 1402
  74. जिनहु बात निस्चल ध्रूअ जानी तेई जीव काल ते बचा ॥अंग 1402
  75. सेवक कै भरपूर जुगु जुगु वाहगुरू तेरा सभु सदका ॥अंग 1403
  76. वाहु वाहु का बडा तमासा ॥अंग 1403
  77. कीआ खेलु बड मेलु तमासा वाहिगुरू तेरी सभ रचना ॥अंग 1403
  78. अगमु अनंतु अनादि आदि जिसु कोइ न जाणै ॥अंग 1404
  79. गुरू समरथु गहि करीआ ध्रुव बुधि सुमति सम्हारन कउ ॥अंग 1404
  80. संतत ही सतसंगति संग सुरंग रते जसु गावत है ॥अंग 1404
  81. निरमल नामु सुधा परपूरन सबद तरंग प्रगटित दिन आगरु ॥अंग 1404
  82. जा कउ मुनि ध्यानु धरै फिरत सगल जुग कबहु क कोऊ पावै आतम प्रगास कउ ॥अंग 1404
  83. नामु निधानु धिआन अंतरगति तेज पुंज तिहु लोग प्रगासे ॥अंग 1404
  84. तार्यउ संसारु माया मद मोहित अंम्रित नामु दीअउ समरथु ॥अंग 1405
  85. तीनि भवन भरपूरि रहिओ सोई ॥अंग 1405
  86. सतिगुरि नानकि भगति करी इक मनि तनु मनु धनु गोबिंद दीअउ ॥अंग 1405
  87. नारदु ध्रू प्रहलादु सुदामा पुब भगत हरि के जु गणं ॥अंग 1405
  88. मनसा करि सिमरंत तुझै नर कामु क्रोधु मिटिअउ जु तिणं ॥अंग 1405
  89. जिह सतिगुर सिमरंत नयन के तिमर मिटहि खिनु ॥अंग 1405
  90. जिनि सबदु कमाइ परम पदु पाइओ सेवा करत न छोडिओ पासु ॥अंग 1405
  91. जिनि सतिगुरु सेवि पदारथु पायउ निसि बासुर हरि चरन निवासु ॥अंग 1406
  92. नानकि नामु निरंजन जान्यउ कीनी भगति प्रेम लिव लाई ॥अंग 1406
  93. हम अवगुणि भरे एकु गुणु नाही अंम्रितु छाडि बिखै बिखु खाई ॥अंग 1406
  94. मोहु मलि बिवसि कीअउ कामु गहि केस पछाड़्यउ ॥अंग 1406
  95. तू सतिगुरु चहु जुगी आपि आपे परमेसरु ॥अंग 1406
  96. सिमरं सोई पुरखु अचलु अबिनासी ॥अंग 1406
  97. बडभागी उनमानिअउ रिदि सबदु बसायउ ॥अंग 1407
  98. जनक राजु बरताइआ सतजुगु आलीणा ॥अंग 1407
  99. खेलु गूड़॑उ कीअउ हरि राइ संतोखि समाचर्यिओ बिमल बुधि सतिगुरि समाणउ ॥अंग 1407
  100. सद जीवणु अरजुनु अमोलु आजोनी संभउ ॥अंग 1407
  101. जै जै कारु जासु जग अंदरि मंदरि भागु जुगति सिव रहता ॥अंग 1407
  102. ध्रंम धीरु गुरमति गभीरु पर दुख बिसारणु ॥अंग 1407
  103. भै निरभउ माणिअउ लाख महि अलखु लखायउ ॥अंग 1408
  104. अमिउ रसना बदनि बर दाति अलख अपार गुर सूर सबदि हउमै निवार्यउ ॥अंग 1408
  105. गुरु अरजुनु पुरखु प्रमाणु पारथउ चालै नही ॥अंग 1408
  106. भवजलु साइरु सेतु नामु हरी का बोहिथा ॥अंग 1408
  107. जगत उधारणु नामु सतिगुर तुठै पाइअउ ॥अंग 1408
  108. जोति रूपि हरि आपि गुरू नानकु कहायउ ॥अंग 1408
  109. सति रूपु सति नामु सतु संतोखु धरिओ उरि ॥अंग 1408
  110. तिह जन जाचहु जगत्र पर जानीअतु बासुर रयनि बासु जा को हितु नाम सिउ ॥अंग 1408
  111. अंतु न पावत देव सबै मुनि इंद्र महा सिव जोग करी ॥अंग 1409
  112. जग अउरु न याहि महा तम मै अवतारु उजागरु आनि कीअउ ॥अंग 1409
  113. जब लउ नही भाग लिलार उदै तब लउ भ्रमते फिरते बहु धायउ ॥अंग 1409
  114. कलि समुद्र भए रूप प्रगटि हरि नाम उधारनु ॥अंग 1409
  115. अजै गंग जलु अटलु सिख संगति सभ नावै ॥अंग 1409
  116. देव पुरी महि गयउ आपि परमेस्वर भायउ ॥अंग 1409