कवि कीरत जो संत चरन मुड़ि लागहि तिन॑ काम क्रोध जम को नही त्रासु ॥ जिव अंगदु अंगि संगि नानक गुर तिव गुर अमरदास कै गुरु रामदासु ॥1॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।
हिन्दी अर्थ: हे कवि कीरत ! जो मनुष्य उस संत (गुरू रामदास जी) के चरणों में लगते हैं। उनको काम। क्रोध और जमों का डर नहीं रहता। जैसे (गुरू) अंगद (साहिब जी) सदा गुरू नानक देव जी के साथ (रहे। भाव। सदा गुरू नानक देव जी की हजूरी में रहे)। वैसे (ही) गुरू रामदास (जी) गुरू अमरदास (जी) के (साथ रहे)। 1।
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।
हिन्दी अर्थ: जिस (गुरू रामदास जी) ने सतिगुरू (अमरदास जी) को सिमर के नाम पदार्थ पाया है। और आठों पहर जिसका हरी के चरणों में निवास रहता है। उस (गुरू रामदास जी) से बेअंत संगतें प्रेम में (मस्त हो के) भउ मनाती हैं (और कहती हैं) – (“हे गुरू रामदास जी !) आप प्रत्यक्ष रूप से चँदन सी मीठी वासना वाले हैं। ” नाम सिमर के ध्रुपव। प्रहलाद। कबीर और त्रिलोचन को जो रौशनी (दिखी थी) और जिसको देख-देख के मन में बड़ा आनंद होता है। वह संतों का आसरा गुरू रामदास ही है। 2।
नानकि नामु निरंजन जान्यउ कीनी भगति प्रेम लिव लाई ॥ ता ते अंगदु अंग संगि भयो साइरु तिनि सबद सुरति की नीव रखाई ॥ गुर अमरदास की अकथ कथा है इक जीह कछु कही न जाई ॥ सोढी स्रिस्टि सकल तारण कउ अब गुर रामदास कउ मिली बडाई ॥3॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।
हिन्दी अर्थ: (गुरू) नानक (देव जी) ने निरंजन का नाम पहचाना। प्रेम से बिरती जोड़ के भगती की। उनसे समुंद्र-रूप गुरू अंगद देव जी (हुए। जो) सदा उनकी हजूरी में टिके और जिन्होंने ‘शबद सुरति’ की बरखा की (भाव। शबद के ध्यान की खुली बाँट बाँटी)। गुरू अमरदास जी की कथा कथन से परे है। (गुरू अमरदास जी की ऊँची आत्मिक अवस्था बयान नहीं की जा सकती)। मेरी एक जीभ है। इससे कुछ कही नहीं जा सकती। अब (गुरू अमरदास जी से) सारी सृष्टि को तैराने के लिए सोढी गुरू रामदास (जी) को वडिआई मिली है। 3।
हम अवगुणि भरे एकु गुणु नाही अंम्रितु छाडि बिखै बिखु खाई ॥ माया मोह भरम पै भूले सुत दारा सिउ प्रीति लगाई ॥ इकु उतम पंथु सुनिओ गुर संगति तिह मिलंत जम त्रास मिटाई ॥ इक अरदासि भाट कीरति की गुर रामदास राखहु सरणाई ॥4॥58॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।
हिन्दी अर्थ: हम अवगुणों से भरे पड़े हैं। (हमारे में) एक भी गुण नहीं। अमृत (-नाम) को छोड़ के हमने सिर्फ जहर ही खाया है। माया के मोह में और भरमों में पड़ कर हम (सही जीवन-राह से) भूले हुए हैं। और स्त्री-पुत्र से हमने प्यार डाला हुआ है। हमने सतिगुरू की संगति वाला एक उक्तम राह सुना है। उसमें मिल के हमने जमों का त्रास मिटा लिया है। कीरत’ भॅट की अब एक विनती है कि हे गुरू रामदास जी ! अपनी शरण में रखो। 4। 58।
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।
हिन्दी अर्थ: (हे गुरू रामदास जी !) आप ने ‘मोह’ को मसल के काबू में कर लिया है। और ‘काम’ को केसों से पकड़ के जमीन पर दे पटका है। (आपने) ‘क्रोध’ को (अपने) तेज-प्रताप से टुकड़े-टुकड़े कर दिया है। और ‘लोभ’ को आप ने निरादरी से परे दुत्कारा है। जनम’ और ‘मरन’ हाथ जोड़ के आप का जो हुकम होता है उसको मानते हैं। आप ने संसार-समुंद्र को बाँध दिया है। और आप ने। जो सदा प्रसन्न रहने वाले हैं। सिख (इस संसार-समुंद्र से) तैरा लिए हैं। (आप के) सिर पर छत्र है। (आप का) तख़्त सदा स्थिर है। आप राज और जोग दोनों भोगते हैं। और बली हैं। हे सॅल् कवि ! आप सच कह “हे गुरू रामदास ! आप अटल राज वाला और (दैवी संपती रूप) ना नाश होने वाली फौज वाला है”। 1।
तू सतिगुरु चहु जुगी आपि आपे परमेसरु ॥ सुरि नर साधिक सिध सिख सेवंत धुरह धुरु ॥ आदि जुगादि अनादि कला धारी त्रिहु लोअह ॥ अगम निगम उधरण जरा जंमिहि आरोअह ॥ गुर अमरदासि थिरु थपिअउ परगामी तारण तरण ॥ अघ अंतक बदै न सल्य कवि गुर रामदास तेरी सरण ॥2॥60॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।
हिन्दी अर्थ: हे गुरू रामदास ! आप चारों जुगों में ही स्थिर गुरू है। (मेरी नज़रों में तो) आप ही परमेश्वर है। देवता। मनुष्य। साधक। सिद्ध और सिख। आदि से ही आपको सेवते आए हैं। (आप) आदि से हैं। जुगादि से हैं। और अनादि हो। तीनों लोकों में ही (आप ने अपनी) सक्ता धारी हुई है। (मेरे लिए तो आप ही हैं जिसने) वेद-शास्त्रों को बचाया था (वराह-रूप हैं के)। आप बुढ़ापे और जमों पर सवार हैं (भाव। आप को इनका डर नहीं है)। (आप को) गुरू अमरदास (जी) ने अटल कर दिया है। आप मुक्त हैं और औरों के उद्धार के लिए जहाज़ हैं। हे गुरू रामदास ! सॅल् कवि (कहता है) – जो मनुष्य आपकी शरण आया है। वह पापों और जमों की परवाह नहीं करता (से नहीं डरता)। 2। 60।
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।
हिन्दी अर्थ: गुरू अरजन साहिब जी की उस्तति में उचारे हुए सवईए। वह परब्रह्मा केवल एक (ओंकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है। मैं उस अविनाशी और अटल अकाल-पुरख को सिमरता हूँ। जिसका सिमरन करने से दुर्मति की मैल दूर हो जाती है। मैं सतिगुरू के कँवलों जैसे चरन हृदय में टिकाता हूँ।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
इस संग्रह की रचनाओं की संख्या कम है, मगर हर एक में एक भीतरी अनुशासन झलकता है। आदि ग्रंथ के 1604 के संकलन में इन्हें संग्रहित किया गया।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे कवि कीरत ! जो मनुष्य उस संत (गुरू रामदास जी) के चरणों में लगते हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।