फुनि बेद बिरंचि बिचारि रहिओ हरि जापु न छाड्यिउ एक घरी ॥
मथुरा जन को प्रभु दीन दयालु है संगति स्रिस्टि निहालु करी ॥
रामदासि गुरू जग तारन कउ गुर जोति अरजुन माहि धरी ॥४॥
तिन के दुख कोटिक दूरि गए मथुरा जिन॑ अंम्रित नामु पीअउ ॥
इह पधति ते मत चूकहि रे मन भेदु बिभेदु न जान बीअउ ॥
परतछि रिदै गुर अरजुन कै हरि पूरन ब्रहमि निवासु लीअउ ॥५॥
कलि घोर समुद्र मै बूडत थे कबहू मिटि है नही रे पछुतायउ ॥
ततु बिचारु यहै मथुरा जग तारन कउ अवतारु बनायउ ॥
जप्यउ जिन॑ अरजुन देव गुरू फिरि संकट जोनि गरभ न आयउ ॥६॥
बसहि संत जिसु रिदै दुख दारिद्र निवारनु ॥
निरमल भेख अपार तासु बिनु अवरु न कोई ॥
मन बच जिनि जाणिअउ भयउ तिह समसरि सोई ॥
धरनि गगन नव खंड महि जोति स्वरूपी रहिओ भरि ॥
भनि मथुरा कछु भेदु नही गुरु अरजुनु परतख्य हरि ॥७॥१९॥
नित पुराण बाचीअहि बेद ब्रहमा मुखि गावै ॥
अजै चवरु सिरि ढुलै नामु अंम्रितु मुखि लीअउ ॥
गुर अरजुन सिरि छत्रु आपि परमेसरि दीअउ ॥
मिलि नानक अंगद अमर गुर गुरु रामदासु हरि पहि गयउ ॥
हरिबंस जगति जसु संचर्यउ सु कवणु कहै स्री गुरु मुयउ ॥१॥
हरि सिंघासणु दीअउ सिरी गुरु तह बैठायउ ॥
रहसु कीअउ सुर देव तोहि जसु जय जय जंपहि ॥
असुर गए ते भागि पाप तिन॑ भीतरि कंपहि ॥
काटे सु पाप तिन॑ नरहु के गुरु रामदासु जिन॑ पाइयउ ॥
छत्रु सिंघासनु पिरथमी गुर अरजुन कउ दे आइअउ ॥२॥२१॥९॥११॥१०॥१०॥२२॥६०॥१४३॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “इन्द्र और शिव जी ने जोग-साधना की।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।