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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1409 · सवैये

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अंग
1409
सवैये
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  1. अंतु न पावत देव सबै मुनि इंद्र महा सिव जोग करी ॥
  2. जग अउरु न याहि महा तम मै अवतारु उजागरु आनि कीअउ ॥
  3. जब लउ नही भाग लिलार उदै तब लउ भ्रमते फिरते बहु धायउ ॥
  4. कलि समुद्र भए रूप प्रगटि हरि नाम उधारनु ॥
  5. अजै गंग जलु अटलु सिख संगति सभ नावै ॥
  6. देव पुरी महि गयउ आपि परमेस्वर भायउ ॥

भट्ट मथुरा · सवैया

अंतु न पावत देव सबै मुनि इंद्र महा सिव जोग करी ॥

अंतु न पावत देव सबै मुनि इंद्र महा सिव जोग करी ॥
फुनि बेद बिरंचि बिचारि रहिओ हरि जापु न छाड्यिउ एक घरी ॥
मथुरा जन को प्रभु दीन दयालु है संगति स्रिस्टि निहालु करी ॥
रामदासि गुरू जग तारन कउ गुर जोति अरजुन माहि धरी ॥4॥

हिन्दी अर्थ: इन्द्र और शिव जी ने जोग-साधना की। पर इन सभी देवताओं और मुनियों ने (गुरू अरजुन का) अंत नहीं पाया। ब्रहमा बेद विचार के थक गया। उसने हरी का जाप एक घड़ी ना छोड़ा। दास मथुरा का प्रभू (गुरू अरजुन) दीनों पर दया करने वाला है। आपने संगत को और सृष्टि को निहाल किया है। गुरू रामदास जी ने जगत के उद्धार के लिए गुरू वाली जोति गुरू अरजुन में रख दी। 4।

भट्ट मथुरा · सवैया

जग अउरु न याहि महा तम मै अवतारु उजागरु आनि कीअउ ॥

जग अउरु न याहि महा तम मै अवतारु उजागरु आनि कीअउ ॥
तिन के दुख कोटिक दूरि गए मथुरा जिन॑ अंम्रित नामु पीअउ ॥
इह पधति ते मत चूकहि रे मन भेदु बिभेदु न जान बीअउ ॥
परतछि रिदै गुर अरजुन कै हरि पूरन ब्रहमि निवासु लीअउ ॥5॥

हिन्दी अर्थ: जगत के इस घोर अंधेरे में (गुरू अरजुन के बिना) कोई और (रखवाला) नहीं। उसी को (हरी ने) ला के उजागर अवतार बनाया है। हे मथुरा! जिन्होंने (उससे) नाम-अमृत पिया है उनके करोड़ों दुख दूर हो गए हैं। हे मेरे मन! कहीं इस राह से भटक ना जाना। कहीं ये दूरी ना समझना। कि गुरू अरजुन (हरी से अलग) दूसरा है। पूरन ब्रहम हरी ने गुरू अरजन के हृदय में प्रत्यक्ष तौर पर निवास किया है। 5।

भट्ट मथुरा · सवैया

जब लउ नही भाग लिलार उदै तब लउ भ्रमते फिरते बहु धायउ ॥

जब लउ नही भाग लिलार उदै तब लउ भ्रमते फिरते बहु धायउ ॥
कलि घोर समुद्र मै बूडत थे कबहू मिटि है नही रे पछुतायउ ॥
ततु बिचारु यहै मथुरा जग तारन कउ अवतारु बनायउ ॥
जप्यउ जिन॑ अरजुन देव गुरू फिरि संकट जोनि गरभ न आयउ ॥6॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई! जब तक माथे के भाग्य नहीं थे जागे, तब तक बहुत भटकते फिरते और भागते फिरते थे। पछतावा किसी भी वक्त नहीं मिटता था। पर, हे मथुरा! अब सच्ची विचार ये है कि जगत के उद्धार के लिए (हरी ने गुरू अरजुन) अवतार बनाया है। जिन्होंने गुरू अरजुन देव (जी) को जपा है। वे पलट के गर्भ जोनि और दुखों में नहीं आए। 6।

भट्ट मथुरा · सवैया

कलि समुद्र भए रूप प्रगटि हरि नाम उधारनु ॥

कलि समुद्र भए रूप प्रगटि हरि नाम उधारनु ॥
बसहि संत जिसु रिदै दुख दारिद्र निवारनु ॥
निरमल भेख अपार तासु बिनु अवरु न कोई ॥
मन बच जिनि जाणिअउ भयउ तिह समसरि सोई ॥
धरनि गगन नव खंड महि जोति स्वरूपी रहिओ भरि ॥
भनि मथुरा कछु भेदु नही गुरु अरजुनु परतख्य हरि ॥7॥19॥

हिन्दी अर्थ: कलजुग के समुंद्र से तैराने के लिए गुरू अरजुन देव जी हरी का नाम-रूप प्रकट हुए हैं। आप के हृदय में संत (शांति के श्रोत प्रभू जी) बसते हैं। आप दुखों-दरिद्रों के दूर करने वाले हैं। उस (गुरू अरजुन) के बिना और कोई नहीं। आप अपार हरी का निर्मल रूप हैं। जिस (मनुष्य) ने मन और वचनों से हरी को पहचाना है। वह हरी जैसा ही हो गया है। (गुरू अरजुन ही) जोति-रूप हो के धरती आकाश और नौ-खण्डों में व्याप रहा है। हे मथुरा! कहें: गुरू अरजुन साक्षात अकाल पुरख है। कोई फर्क नहीं। 7। 19।

भट्ट हरबंस · सवैया

अजै गंग जलु अटलु सिख संगति सभ नावै ॥

अजै गंग जलु अटलु सिख संगति सभ नावै ॥
नित पुराण बाचीअहि बेद ब्रहमा मुखि गावै ॥
अजै चवरु सिरि ढुलै नामु अंम्रितु मुखि लीअउ ॥
गुर अरजुन सिरि छत्रु आपि परमेसरि दीअउ ॥
मिलि नानक अंगद अमर गुर गुरु रामदासु हरि पहि गयउ ॥
हरिबंस जगति जसु संचर्यउ सु कवणु कहै स्री गुरु मुयउ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: (गुरू अरजुन देव जी की दरगाह में) कभी ना खत्म होने वाला (नाम-रूप) गंगा जल (बह रहा है। जिसमें) सारी संगति स्नान करती है। (आपकी हजूरी में इतने महा ऋषि ब्यास की लिखी हुई धर्म पुस्तकें) पुराण सदा पढ़े जाते हैं और ब्रहमा (भी आपकी हजूरी में) मुँह से वेदों को गा रहा है (भाव, ब्यास और ब्रहमा जैसे बड़े-बड़े देवते और विद्वान ऋषि भी गुरू अरजुन के दर पर हाजिर रहने में अपने अच्छे भाग्य समझते हैं। मेरे लिए तो गुरू की बाणी ही पुराण और वेद है)। (आप के) सिर पर ईश्वरीय चवर झूल रहा है। आप ने आत्मिक जीवन देने वाला नाम मुँह से (सदा) उचारा है। गुरू अरजन देव जी के सिर पर यह छत्र परमेश्वर ने स्वयं बख्शा है। गुरू नानक। गुरू अंगद और गुरू अमरदास जी को मिल के, गुरू रामदास जी हरी में लीन हो गए हैं। हे हरिबंस! जगत में सतिगुरू जी की शोभा पसर रही है। कौन कहता है। कि गुरू रामदास जी मर गए हैं।

भट्ट हरबंस · सवैया

देव पुरी महि गयउ आपि परमेस्वर भायउ ॥

देव पुरी महि गयउ आपि परमेस्वर भायउ ॥
हरि सिंघासणु दीअउ सिरी गुरु तह बैठायउ ॥
रहसु कीअउ सुर देव तोहि जसु जय जय जंपहि ॥
असुर गए ते भागि पाप तिन॑ भीतरि कंपहि ॥
काटे सु पाप तिन॑ नरहु के गुरु रामदासु जिन॑ पाइयउ ॥
छत्रु सिंघासनु पिरथमी गुर अरजुन कउ दे आइअउ ॥2॥21॥9॥11॥10॥10॥22॥60॥143॥

हिन्दी अर्थ: (गुरू रामदास) सचखण्ड में गए हैं हरी को यही रज़ा ठीक लगी है। हरी ने (आप को) तख्त दिया है और उस पर श्री गुरू (रामदास जी) को बैठाया है। देवताओं ने मंगलचार किया है। आपका यश और जय-जयकार कर रहे हैं। वह (सारे) दैत्य (वहाँ से) भाग गए हैं। (उनके अपने) पाप उनके अंदर काँप रहे हैं। उन मनुष्यों के पाप कट गए हैं। जिन को गुरू रामदास मिल गया है। गुरू रामदास धरती का छत्र और सिंहासन गुरू अरजुन साहिब जी को दे आया है। 2। 21।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: भट्ट हरबंस; भट्ट मथुरा।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1409 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।