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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1389 · सवैये

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अंग
1389
सवैये
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  1. काम क्रोध मद मतसर त्रिसना बिनसि जाहि हरि नामु उचारी ॥
  2. आवध कटिओ न जात प्रेम रस चरन कमल संगि ॥
  3. उदमु करि लागे बहु भाती बिचरहि अनिक सासत्र बहु खटूआ ॥
  4. सवईए महले पहिले के 1
  5. गावहि जनकादि जुगति जोगेसुर हरि रस पूरन सरब कला ॥
  6. गावहि कपिलादि आदि जोगेसुर अपरंपर अवतार वरो ॥

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

काम क्रोध मद मतसर त्रिसना बिनसि जाहि हरि नामु उचारी ॥

अंग 1388 से चला आ रहा अंश

काम क्रोध मद मतसर त्रिसना बिनसि जाहि हरि नामु उचारी ॥
इसनान दान तापन सुचि किरिआ चरण कमल हिरदै प्रभ धारी ॥
साजन मीत सखा हरि बंधप जीअ धान प्रभ प्रान अधारी ॥
ओट गही सुआमी समरथह नानक दास सदा बलिहारी ॥9॥

हिन्दी अर्थ: हरी-नाम को सिमरने से काम। क्रोध, अहंकार, ईष्या और तृष्णा, यह सब नाश हो जाते हैं। (तीर्थों के) स्नान करने। (वहाँ) दान करने, तप साधने और शारीरिक सुच के कर्म, (इन सब की जगह) हमने प्रभू के चरन हृदय में धार लिए हैं। हरी हमारा सज्जन है। मित्र है। सखा और सम्बन्धी है; हमारी जिंदगी का आसरा है और प्राणों का आधार है। हमने समर्थ मालिक की ओट पकड़ी है। नानक (उसका) दास उससे सदा सदके है। 9।

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

आवध कटिओ न जात प्रेम रस चरन कमल संगि ॥

आवध कटिओ न जात प्रेम रस चरन कमल संगि ॥
दावनि बंधिओ न जात बिधे मन दरस मगि ॥
पावक जरिओ न जात रहिओ जन धूरि लगि ॥
नीरु न साकसि बोरि चलहि हरि पंथि पगि ॥
नानक रोग दोख अघ मोह छिदे हरि नाम खगि ॥1॥10॥

हिन्दी अर्थ: (जिस मनुष्य ने) हरी के चरन-कमलों के साथ जुड़ के प्रेम का स्वाद (चखा है। वह) शस्त्रों से काटा नहीं जा सकता। (जिसका) मन (हरी के) दर्शन के राह में भेदा गया है। वह रस्सी से (किसी और तरफ) बाँधा नहीं जा सकता। (जो मनुष्य) संत जनों की चरन धूड़ से जुड़ा रहा है। (उसको) आग जला नहीं सकती; (जिसके) पैर ईश्वर के राह की ओर चलते हैं। उसको पानी डुबो नहीं सकता। हे नानक! (उस मनुष्य के) रोग, दोख, पाप और मोह, यह सारे ही हरी के नाम-रूपी तीर से काटे जाते हैं। 1। 10।

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

उदमु करि लागे बहु भाती बिचरहि अनिक सासत्र बहु खटूआ ॥

उदमु करि लागे बहु भाती बिचरहि अनिक सासत्र बहु खटूआ ॥
भसम लगाइ तीरथ बहु भ्रमते सूखम देह बंधहि बहु जटूआ ॥
बिनु हरि भजन सगल दुख पावत जिउ प्रेम बढाइ सूत के हटूआ ॥
पूजा चक्र करत सोमपाका अनिक भांति थाटहि करि थटूआ ॥2॥11॥20॥

हिन्दी अर्थ: अनेकों मनुष्य कई तरह के उद्यम कर रहे हैं। छे शास्त्र विचार रहे हैं; (शरीर पर) राख मल के बहुत सारे मनुष्य तीर्थों पर भटकते फिरते हैं। और कई बँदे शरीर को (तपों से) कमजोर कर चुके हैं और (सीस पर) जटाएं धार रहे हैं। हरी के नाम लेने के बिना। ये सारे लोग दुख पाते हैं (यह सारे आडंबर उनके लिए फसने के लिए जाल बन जाते हैं) जैसे (कहना) बड़े मजे से तारों का जाल तनता है (और आप ही उसमें फस के अपने बच्चों के हाथों मारा जाता है) कई मनुष्य पूजा करते हैं; शरीर पर चक्रों के चिन्ह लगाते हैं। (सॅुच की खातिर) अपने हाथों से रोटी तैयार करते हैं। व और अनेकों तरह की रचनाएं बनाते हैं। 2। 11। 20।

भट्ट कल · सवैया

सवईए महले पहिले के 1

सवईए महले पहिले के 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
इक मनि पुरखु धिआइ बरदाता ॥
संत सहारु सदा बिखिआता ॥
तासु चरन ले रिदै बसावउ ॥
तउ परम गुरू नानक गुन गावउ ॥1॥
गावउ गुन परम गुरू सुख सागर दुरत निवारण सबद सरे ॥
गावहि गंभीर धीर मति सागर जोगी जंगम धिआनु धरे ॥
गावहि इंद्रादि भगत प्रहिलादिक आतम रसु जिनि जाणिओ ॥
कबि कल सुजसु गावउ गुर नानक राजु जोगु जिनि माणिओ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: गुरू नानक साहिब की उस्तति में उचारे हुए सवईऐ। ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। उस अकाल-पुरख को एकाग्र मन से सिमर के, जो बख्शिशें करने वाला है। जो संतों का आसरा है और जो सदा हाज़र-नाजर है। मैं उसके चरन अपने हृदय में बसाता हूँ। (और इनकी बरकति से) परम सतिगुरू नानक देव जी के गुणों को गाता हूँ। 1। मैं उस परम गुरू नानक देव जी के गुण गाता हूँ। जो पापों को दूर करने वाला है और जो बाणी का श्रोत है। (गुरू नानक को) जोगी। जंगम ध्यान धर के गाते हैं। और वह लोग गाते हैं जो गंभीर हैं। जो धैर्यवान हैं और जो ऊँची मति वाले हैं। जिस गुरू नानक ने आत्मिक आनंद जाना है। उसको इन्द्र आदिक और प्रहलाद आदि भगत गाते हैं। कल्' कवि (कहता है)। -मैं उस गुरू नानक देव जी के सुंदर गुण गाता हूँ जिसने राज और जोग पाया है (भाव, जो गृहस्ती भी है और साथ ही माया से उपराम हो के हरी के साथ जुड़ा हुआ है)। 2।

भट्ट कल · सवैया

गावहि जनकादि जुगति जोगेसुर हरि रस पूरन सरब कला ॥

गावहि जनकादि जुगति जोगेसुर हरि रस पूरन सरब कला ॥
गावहि सनकादि साध सिधादिक मुनि जन गावहि अछल छला ॥
गावै गुण धोमु अटल मंडलवै भगति भाइ रसु जाणिओ ॥
कबि कल सुजसु गावउ गुर नानक राजु जोगु जिनि माणिओ ॥3॥

हिन्दी अर्थ: जो गुरू नानक हरी के रस में भीगा हुआ है। जो गुरू नानक हर प्रकार की सक्तिया (शक्ति) वाला है। उसको जनक आदि बड़े-बड़े जोगियों समेत गाते हैं। जिस गुरू नानक को माया नहीं छल सकी। उसको ऋषि गाते हैं। सनक आदिक साध और सिद्ध आदि गाते हैं। जिस गुरू नानक ने भगती वाले भाव द्वारा (हरी के मिलाप का) आनंद जाना है। उसके गुणों को धोमु ऋषि गाता है। ध्रुव भगत गाता है। कल् कवि (कहता है): 'मैं उस गुरू नानक के सुंदर गुण गाता हूँ जिस ने राज और जोग पाया है'। 3।

भट्ट कल · सवैया

गावहि कपिलादि आदि जोगेसुर अपरंपर अवतार वरो ॥

गावहि कपिलादि आदि जोगेसुर अपरंपर अवतार वरो ॥
गावै जमदगनि परसरामेसुर कर कुठारु रघु तेजु हरिओ ॥
उधौ अक्रूरु बिदरु गुण गावै सरबातमु जिनि जाणिओ ॥
कबि कल सुजसु गावउ गुर नानक राजु जोगु जिनि माणिओ ॥4॥

हिन्दी अर्थ: कपिल आदि ऋषि और पुरातन बड़े-बड़े जोगी-जन परमात्मा के शिरोमणि अवतार गुरू नानक को गाते हैं। (गुरू नानक के यश को) जमदगनि का पुत्र परशुराम भी गा रहा है। जिस के हाथ का कुहाड़ा और जिसका प्रताप श्री राम चंद्र जी ने छीन लिया था। जिस गुरू नानक ने सर्व-व्यापक हरी को जान लिया (गहरी सांझ डाली हुई थी)। उस के गुण ऊधव गाता है। अक्रूर गाता है। बिदर भगत गाता है। कल् कवि (कहता है): 'मैं उस गुरू नानक का सुंदर यश गाता हूं। जिसने राज और जोग दोनों माणें हैं'। 4।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी; भट्ट कल।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1389 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।