ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।
हिन्दी अर्थ: हरी-नाम को सिमरने से काम। क्रोध। अहंकार। ईष्या और तृष्णा- यह सब नाश हो जाते हैं। (तीर्थों के) स्नान करने। (वहाँ) दान करने। तप साधने और शारीरिक सुच के कर्म- (इन सब की जगह) हमने प्रभू के चरन हृदय में धार लिए हैं। हरी हमारा सज्जन है। मित्र है। सखा और सम्बन्धी है; हमारी जिंदगी का आसरा है और प्राणों का आधार है। हमने समर्थ मालिक की ओट पकड़ी है। नानक (उसका) दास उससे सदा सदके है। 9।
आवध कटिओ न जात प्रेम रस चरन कमल संगि ॥ दावनि बंधिओ न जात बिधे मन दरस मगि ॥ पावक जरिओ न जात रहिओ जन धूरि लगि ॥ नीरु न साकसि बोरि चलहि हरि पंथि पगि ॥ नानक रोग दोख अघ मोह छिदे हरि नाम खगि ॥1॥10॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।
हिन्दी अर्थ: (जिस मनुष्य ने) हरी के चरन-कमलों के साथ जुड़ के प्रेम का स्वाद (चखा है। वह) शस्त्रों से काटा नहीं जा सकता। (जिसका) मन (हरी के) दर्शन के राह में भेदा गया है। वह रस्सी से (किसी और तरफ) बाँधा नहीं जा सकता। (जो मनुष्य) संत जनों की चरन धूड़ से जुड़ा रहा है। (उसको) आग जला नहीं सकती; (जिसके) पैर ईश्वर के राह की ओर चलते हैं।उसको पानी डुबो नहीं सकता। हे नानक ! (उस मनुष्य के) रोग। दोख। पाप और मोह -यह सारे ही हरी के नाम-रूपी तीर से काटे जाते हैं। 1। 10।
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।
हिन्दी अर्थ: अनेकों मनुष्य कई तरह के उद्यम कर रहे हैं। छे शास्त्र विचार रहे हैं; (शरीर पर) राख मल के बहुत सारे मनुष्य तीर्थों पर भटकते फिरते हैं। और कई बँदे शरीर को (तपों से) कमजोर कर चुके हैं और (सीस पर) जटाएं धार रहे हैं। हरी के नाम लेने के बिना। ये सारे लोग दुख पाते हैं (यह सारे आडंबर उनके लिए फसने के लिए जाल बन जाते हैं) जैसे (कहना) बड़े मजे से तारों का जाल तनता है (और आप ही उसमें फस के अपने बच्चों के हाथों मारा जाता है) कई मनुष्य पूजा करते हैं; शरीर पर चक्रों के चिन्ह लगाते हैं। (सॅुच की खातिर) अपने हाथों से रोटी तैयार करते हैं। व और अनेकों तरह की रचनाएं बनाते हैं। 2। 11। 20।
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।
हिन्दी अर्थ: गुरू नानक साहिब की उस्तति में उचारे हुए सवईऐ। वह परब्रह्मा केवल एक (ओंकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है। उस अकाल-पुरख को एकाग्र मन से सिमर के। जो बख्शिशें करने वाला है। जो संतों का आसरा है और जो सदा हाज़र-नाजर है। मैं उसके चरन अपने हृदय में बसाता हूँ। (और इनकी बरकति से) परम सतिगुरू नानक देव जी के गुणों को गाता हूँ। 1। मैं उस परम गुरू नानक देव जी के गुण गाता हूँ। जो पापों को दूर करने वाला है और जो बाणी का श्रोत है। (गुरू नानक को) जोगी। जंगम ध्यान धर के गाते हैं। और वह लोग गाते हैं जो गंभीर हैं। जो धैर्यवान हैं और जो ऊँची मति वाले हैं। जिस गुरू नानक ने आत्मिक आनंद जाना है। उसको इन्द्र आदिक और प्रहलाद आदि भगत गाते हैं। कल्’ कवि (कहता है)। -मैं उस गुरू नानक देव जी के सुंदर गुण गाता हूँ जिसने राज और जोग पाया है (भाव। जो गृहस्ती भी है और साथ ही माया से उपराम हो के हरी के साथ जुड़ा हुआ है)। 2।
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।
हिन्दी अर्थ: जो गुरू नानक हरी के रस में भीगा हुआ है। जो गुरू नानक हर प्रकार की सक्तिया (शक्ति) वाला है। उसको जनक आदि बड़े-बड़े जोगियों समेत गाते हैं। जिस गुरू नानक को माया नहीं छल सकी। उसको ऋषि गाते हैं। सनक आदिक साध और सिद्ध आदि गाते हैं। जिस गुरू नानक ने भगती वाले भाव द्वारा (हरी के मिलाप का) आनंद जाना है। उसके गुणों को धोमु ऋषि गाता है। ध्रुव भगत गाता है। कल् कवि (कहता है) – ‘मैं उस गुरू नानक के सुंदर गुण गाता हूँ जिस ने राज और जोग पाया है’। 3।
गावहि कपिलादि आदि जोगेसुर अपरंपर अवतार वरो ॥ गावै जमदगनि परसरामेसुर कर कुठारु रघु तेजु हरिओ ॥ उधौ अक्रूरु बिदरु गुण गावै सरबातमु जिनि जाणिओ ॥ कबि कल सुजसु गावउ गुर नानक राजु जोगु जिनि माणिओ ॥4॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।
हिन्दी अर्थ: कपिल आदि ऋषि और पुरातन बड़े-बड़े जोगी-जन परमात्मा के शिरोमणि अवतार गुरू नानक को गाते हैं। (गुरू नानक के यश को) जमदगनि का पुत्र परशुराम भी गा रहा है। जिस के हाथ का कुहाड़ा और जिसका प्रताप श्री राम चंद्र जी ने छीन लिया था। जिस गुरू नानक ने सर्व-व्यापक हरी को जान लिया (गहरी सांझ डाली हुई थी)। उस के गुण ऊधव गाता है। अक्रूर गाता है। बिदर भगत गाता है। कल् कवि (कहता है) – ‘मैं उस गुरू नानक का सुंदर यश गाता हूं। जिसने राज और जोग दोनों माणें हैं’। 4।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।