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महला 5, गुरु अर्जन देव जी
1563-1606 · पाँचवें गुरु · आदि ग्रंथ के संकलनकर्ता · पहले शहीद · 2218 शबद
30 मई 1606, लाहौर। तपती गर्मी। मुग़ल बादशाह जहाँगीर ने गुरु अर्जन देव जी को पाँच दिनों तक यातना दी, तपते रेत पर बिठाना, उबलते पानी में डालना, गर्म तवा पर बैठाना। पाँचवें दिन उनको रावी नदी में ठंडे पानी से नहाने के लिए छोड़ा। वो उतरे, और लौटे नहीं। यही सिख परंपरा की पहली शहादत है।
उनकी ज़िंदगी के दो सबसे बड़े काम: (1) 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। (2) सुखमनी साहिब लिखी, 24 अष्टपदियाँ, अंग 262-296 पर। यह आज भी सिख परंपरा में सबसे ज़्यादा पढ़ा जाने वाला पाठ है।
आदि ग्रंथ में महला 5 के 2,218 शबद हैं, यानी पूरे ग्रंथ का लगभग एक-तिहाई। उनकी वाणी का फैलाव असाधारण है, दार्शनिक, भक्ति-भरी, गृहस्थी के रोज़मर्रा काम की, सब।
महला 5 की मुख्य रचनाएँ:
- सुखमनी साहिब (गउड़ी)अंग 262-296
- महला 5 बावन-अखरी (गउड़ी)अंग 250-262
- महला 5 की बारह-माहा (माझ)अंग 133-136
- महला 5 की वार-सोलहे (मारू)मारू में
- आरती शबद (धनासरी)अंग 663
आदि ग्रंथ में इनके शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, राग के अनुसार, ग्रंथ के क्रम में।
सलोक और अन्य वाणी (104)
- सैल पथर महि जंत उपाए ता का रिजकु आगै करि धरिआ ॥1॥अंग 10
- भई परापति मानुख देहुरीआ ॥अंग 12
- करउ बेनंती सुणहु मेरे मीता संत टहल की बेला ॥अंग 13
- कतंच माता कतंच पिता कतंच बनिता बिनोद सुतह ॥अंग 1353
- ध्रिगंत मात पिता सनेहं ध्रिग सनेहं भ्रात बांधवह ॥अंग 1354
- मिथ्यंत देहं खीणंत बलनं ॥अंग 1354
- काच कोटं रचंति तोयं लेपनं रकत चरमणह ॥अंग 1354
- सुभंत तुयं अचुत गुणग्यं पूरनं बहुलो क्रिपाला ॥अंग 1354
- म्रिगी पेखंत बधिक प्रहारेण लख्य आवधह ॥अंग 1354
- सबदं रतं हितं मइआ कीरतं कली करम क्रितुआ ॥अंग 1354
- घटंत रूपं घटंत दीपं घटंत रवि ससीअर नख्यत्र गगनं ॥अंग 1354
- नह बिलंब धरमं बिलंब पापं ॥अंग 1354
- मिरत मोहं अलप बुध्यं रचंति बनिता बिनोद साहं ॥अंग 1354
- जनमं त मरणं हरखं त सोगं भोगं त रोगं ॥अंग 1354
- किरपंत हरीअं मति ततु गिआनं ॥अंग 1355
- कहंत बेदा गुणंत गुनीआ सुणंत बाला बहु बिधि प्रकारा ॥अंग 1355
- नह चिंता मात पित भ्रातह नह चिंता कछु लोक कह ॥अंग 1355
- अनित्य वितं अनित्य चितं अनित्य आसा बहु बिधि प्रकारं ॥अंग 1355
- गिरंत गिरि पतित पातालं जलंत देदीप्य बैस्वांतरह ॥अंग 1355
- घोर दुख्यं अनिक हत्यं जनम दारिद्रं महा बिख्यादं ॥अंग 1355
- अंधकार सिमरत प्रकासं गुण रमंत अघ खंडनह ॥अंग 1355
- पाछं करोति अग्रणीवह निरासं आस पूरनह ॥अंग 1355
- अधरं धरं धारणह निरधनं धन नाम नरहरह ॥अंग 1355
- नह समरथं नह सेवकं नह प्रीति परम पुरखोतमं ॥अंग 1356
- भरण पोखण करंत जीआ बिस्राम छादन देवंत दानं ॥अंग 1356
- दानं परा पूरबेण भुंचंते महीपते ॥अंग 1356
- रमणं केवलं कीरतनं सुधरमं देह धारणह ॥अंग 1356
- तिरसकार नह भवंति नह भवंति मान भंगनह ॥अंग 1356
- सैना साध समूह सूर अजितं संनाहं तनि निंम्रताह ॥अंग 1356
- म्रिग त्रिसना गंधरब नगरं द्रुम छाया रचि दुरमतिह ॥अंग 1356
- कंठ रमणीय राम राम माला हसत ऊच प्रेम धारणी ॥अंग 1356
- गुर मंत्र हीणस्य जो प्राणी ध्रिगंत जनम भ्रसटणह ॥अंग 1356
- चरणारबिंद भजनं रिदयं नाम धारणह ॥अंग 1356
- नच दुरलभं धनं रूपं नच दुरलभं स्वरग राजनह ॥अंग 1357
- जत कतह ततह द्रिसटं स्वरग मरत पयाल लोकह ॥अंग 1357
- बिखया भयंति अंम्रितं द्रुसटां सखा स्वजनह ॥अंग 1357
- सरब सील ममं सीलं सरब पावन मम पावनह ॥अंग 1357
- नह सीतलं चंद्र देवह नह सीतलं बावन चंदनह ॥अंग 1357
- मंत्रं राम राम नामं ध्यानं सरबत्र पूरनह ॥अंग 1357
- अजा भोगंत कंद मूलं बसंते समीपि केहरह ॥अंग 1357
- छलं छिद्रं कोटि बिघनं अपराधं किलबिख मलं ॥अंग 1357
- तरण सरण सुआमी रमण सील परमेसुरह ॥अंग 1357
- दुरगम सथान सुगमं महा दूख सरब सूखणह ॥अंग 1357
- हे अजित सूर संग्रामं अति बलना बहु मरदनह ॥अंग 1358
- हे कामं नरक बिस्रामं बहु जोनी भ्रमावणह ॥अंग 1358
- हे कलि मूल क्रोधं कदंच करुणा न उपरजते ॥अंग 1358
- हे लोभा लंपट संग सिरमोरह अनिक लहरी कलोलते ॥अंग 1358
- हे जनम मरण मूलं अहंकारं पापातमा ॥अंग 1358
- हे प्राण नाथ गोबिंदह क्रिपा निधान जगद गुरो ॥अंग 1358
- चरण कमल सरणं रमणं गोपाल कीरतनह ॥अंग 1358
- सिर मस्तक रख्या पारब्रहमं हस्त काया रख्या परमेस्वरह ॥अंग 1358
- जेन कला धारिओ आकासं बैसंतरं कासट बेसटं ॥अंग 1358
- गुसांई गरिस्ट रूपेण सिमरणं सरबत्र जीवणह ॥अंग 1359
- मसकं भगनंत सैलं करदमं तरंत पपीलकह ॥अंग 1359
- तिलक हीणं जथा बिप्रा अमर हीणं जथा राजनह ॥अंग 1359
- न संखं न चक्रं न गदा न सिआमं ॥अंग 1359
- उदिआन बसनं संसारं सनबंधी स्वान सिआल खरह ॥अंग 1359
- क्रिपा करंत गोबिंद गोपालह सगल्यं रोग खंडणह ॥अंग 1359
- अचेत मूड़ा न जाणंत घटंत सासा नित प्रते ॥अंग 1359
- हे जिहबे हे रसगे मधुर प्रिअ तुयं ॥अंग 1359
- गरबंति नारी मदोन मतं ॥अंग 1359
- त्रिणं त मेरं सहकं त हरीअं ॥अंग 1359
- ब्रहमणह संगि उधरणं ब्रहम करम जि पूरणह ॥अंग 1360
- पर दरब हिरणं बहु विघन करणं उचरणं सरब जीअ कह ॥अंग 1360
- मते समेव चरणं उधरणं भै दुतरह ॥अंग 1360
- करपूर पुहप सुगंधा परस मानुख्य देहं मलीणं ॥अंग 1360
- हाथि कलंम अगंम मसतकि लेखावती ॥अंग 1361
- संमन जउ इस प्रेम की दम क्यिहु होती साट ॥अंग 1363
- कबीर कूकरु भउकना करंग पिछै उठि धाइ ॥अंग 1375
- कबीर धरती साध की तसकर बैसहि गाहि ॥अंग 1375
- कबीर चावल कारने तुख कउ मुहली लाइ ॥अंग 1375
- कबीरा हमरा को नही हम किस हू के नाहि ॥अंग 1376
- कबीर रामु न चेतिओ फिरिआ लालच माहि ॥अंग 1376
- फरीदा खालकु खलक महि खलक वसै रब माहि ॥अंग 1381
- फरीदा भूमि रंगावली मंझि विसूला बाग ॥अंग 1382
- फरीदा उमर सुहावड़ी संगि सुवंनड़ी देह ॥अंग 1382
- फरीदा गरबु जिन॑ा वडिआईआ धनि जोबनि आगाह ॥अंग 1383
- फरीदा कंतु रंगावला वडा वेमुहताजु ॥अंग 1383
- फरीदा दुखु सुखु इकु करि दिल ते लाहि विकारु ॥अंग 1383
- फरीदा दुनी वजाई वजदी तूं भी वजहि नालि ॥अंग 1383
- फरीदा दिलु रता इसु दुनी सिउ दुनी न कितै कंमि ॥अंग 1383
- आदि पुरख करतार करण कारण सभ आपे ॥अंग 1385
- अंम्रित प्रवाह सरि अतुल भंडार भरि परै ही ते परै अपर अपार परि ॥अंग 1385
- सगल भवन धारे एक थें कीए बिसथारे पूरि रहिओ स्रब महि आपि है निरारे ॥अंग 1385
- सरब गुण निधानं कीमति न ग्यानं ध्यानं ऊचे ते ऊचौ जानीजै प्रभ तेरो थानं ॥अंग 1386
- निरंकारु आकार अछल पूरन अबिनासी ॥अंग 1386
- सति सति हरि सति सति सते सति भणीऐ ॥अंग 1386
- सचु सभा दीबाणु सचु सचे पहि धरिओ ॥अंग 1386
- कवनु जोगु कउनु ग्यानु ध्यानु कवन बिधि उस्तति करीऐ ॥अंग 1386
- प्रभ दातउ दातार पर्यिउ जाचकु इकु सरना ॥अंग 1386
- काची देह मोह फुनि बांधी सठ कठोर कुचील कुगिआनी ॥अंग 1387
- कीरति करन सरन मनमोहन जोहन पाप बिदारन कउ ॥अंग 1387
- रंचक रेत खेत तनि निरमित दुरलभ देह सवारि धरी ॥अंग 1387
- रे मन मूस बिला महि गरबत करतब करत महां मुघनां ॥अंग 1387
- देह न गेह न नेह न नीता माइआ मत कहा लउ गारहु ॥अंग 1388
- प्रान मान दान मग जोहन हीतु चीतु दे ले ले पारी ॥अंग 1388
- ब्रहमादिक सिव छंद मुनीसुर रसकि रसकि ठाकुर गुन गावत ॥अंग 1388
- माइआ रंग बिरंग करत भ्रम मोह कै कूपि गुबारि परिओ है ॥अंग 1388
- गुण समूह फल सगल मनोरथ पूरन होई आस हमारी ॥अंग 1388
- आवध कटिओ न जात प्रेम रस चरन कमल संगि ॥अंग 1389
- उदमु करि लागे बहु भाती बिचरहि अनिक सासत्र बहु खटूआ ॥अंग 1389
- रते सेई जि मुखु न मोड़ंनि॑ जिन॑ी सिञाता साई ॥अंग 1425
- थाल विचि तिंनि वसतू पईओ सतु संतोखु वीचारो ॥अंग 1429
- तेरा कीता जातो नाही मैनो जोगु कीतोई ॥अंग 1429
सिरी राग (45)
- किआ तू रता देखि कै पुत्र कलत्र सीगार ॥अंग 42
- मनि बिलासु बहु रंगु घणा द्रिसटि भूलि खुसीआ ॥अंग 42
- भलके उठि पपोलीऐ विणु बुझे मुगध अजाणि ॥अंग 43
- घड़ी मुहत का पाहुणा काज सवारणहारु ॥अंग 43
- सभे गला विसरनु इको विसरि न जाउ ॥अंग 43
- सभे थोक परापते जे आवै इकु हथि ॥अंग 44
- सोई धिआईऐ जीअड़े सिरि साहां पातिसाहु ॥अंग 44
- नामु धिआए सो सुखी तिसु मुखु ऊजलु होइ ॥अंग 44
- इकु पछाणू जीअ का इको रखणहारु ॥अंग 45
- जिना सतिगुर सिउ चितु लाइआ से पूरे परधान ॥अंग 45
- मिलि सतिगुर सभु दुखु गइआ हरि सुखु वसिआ मनि आइ ॥अंग 46
- पूरा सतिगुरु जे मिलै पाईऐ सबदु निधानु ॥अंग 46
- प्रीति लगी तिसु सच सिउ मरै न आवै जाइ ॥अंग 46
- मनु तनु धनु जिनि प्रभि दीआ रखिआ सहजि सवारि ॥अंग 47
- मेरा तनु अरु धनु मेरा राज रूप मै देसु ॥अंग 47
- सरणि पए प्रभ आपणे गुरु होआ किरपालु ॥अंग 48
- उदमु करि हरि जापणा वडभागी धनु खाटि ॥अंग 48
- सोई सासतु सउणु सोइ जितु जपीऐ हरि नाउ ॥अंग 48
- रसना सचा सिमरीऐ मनु तनु निरमलु होइ ॥अंग 49
- संत जनहु मिलि भाईहो सचा नामु समालि ॥अंग 49
- मिठा करि कै खाइआ कउड़ा उपजिआ सादु ॥अंग 50
- गोइलि आइआ गोइली किआ तिसु डंफु पसारु ॥अंग 50
- तिचरु वसहि सुहेलड़ी जिचरु साथी नालि ॥अंग 50
- करण कारण एकु ओही जिनि कीआ आकारु ॥अंग 51
- संचि हरि धनु पूजि सतिगुरु छोडि सगल विकार ॥अंग 51
- दुक्रित सुक्रित मंधे संसारु सगलाणा ॥अंग 51
- तेरै भरोसै पिआरे मै लाड लडाइआ ॥अंग 51
- संत जना मिलि भाईआ कटिअड़ा जमकालु ॥अंग 52
- गुरु परमेसुरु पूजीऐ मनि तनि लाइ पिआरु ॥अंग 52
- संत जनहु सुणि भाईहो छूटनु साचै नाइ ॥अंग 52
- जा कउ मुसकलु अति बणै ढोई कोइ न देइ ॥अंग 70
- जानउ नही भावै कवन बाता ॥अंग 71
- गोसाई मिहंडा इठड़ा ॥अंग 73
- पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा धरि पाइता उदरै माहि ॥अंग 77
- मन पिआरिआ जी मित्रा हरि निबहै तेरै नाले ॥अंग 79
- हठ मझाहू मा पिरी पसे किउ दीदार ॥अंग 80
- दासा नह भावए बिनु दरसावए इक खिनु धीरजु किउ करै ॥अंग 80
- सोहंदड़ो हभ ठाइ कोइ न दिसै डूजड़ो ॥अंग 80
- किउ मनहु बेसारीऐ निमख नही टारीऐ गुणवंत प्रान हमारे ॥अंग 80
- धूड़ी मजनु साध खे साई थीए क्रिपाल ॥अंग 80
- जो तउ कीने आपणे तिना कूं मिलिओहि ॥अंग 81
- हरि कंठि लगि सोहिआ दोख सभि जोहिआ भगति लख्यण करि वसि भए ॥अंग 81
- साई नामु अमोलु कीम न कोई जाणदो ॥अंग 81
- ब्रहमु बीचारिआ जनमु सवारिआ पूरन किरपा प्रभि करी ॥अंग 81
- मुंढहु भुली नानका फिरि फिरि जनमि मुईआसु ॥अंग 89
माझ (50)
- मेरा मनु लोचै गुर दरसन ताई ॥अंग 96
- सा रुति सुहावी जितु तुधु समाली ॥अंग 97
- अनहदु वाजै सहजि सुहेला ॥अंग 97
- जितु घरि पिरि सोहागु बणाइआ ॥अंग 97
- खोजत खोजत दरसन चाहे ॥अंग 98
- पारब्रहम अपरंपर देवा ॥अंग 98
- कहिआ करणा दिता लैणा ॥अंग 98
- दुखु तदे जा विसरि जावै ॥अंग 98
- लाल गोपाल दइआल रंगीले ॥अंग 99
- धंनु सु वेला जितु मै सतिगुरु मिलिआ ॥अंग 99
- सगल संतन पहि वसतु इक मांगउ ॥अंग 99
- विसरु नाही एवड दाते ॥अंग 100
- सिफति सालाहणु तेरा हुकमु रजाई ॥अंग 100
- तूं जलनिधि हम मीन तुमारे ॥अंग 100
- अंम्रित नामु सदा निरमलीआ ॥अंग 100
- निधि सिधि रिधि हरि हरि हरि मेरै ॥अंग 101
- प्रभ किरपा ते हरि हरि धिआवउ ॥अंग 101
- ओति पोति सेवक संगि राता ॥अंग 101
- सभ किछु घर महि बाहरि नाही ॥अंग 102
- तिसु बलिहारी जिनि रसना भणिआ ॥अंग 102
- तूं पेडु साख तेरी फूली ॥अंग 102
- गुर परसादि किनै विरलै जाणी ॥अंग 103
- सुणि सुणि होवै परम गति मेरी ॥अंग 103
- तूं मेरा पिता तूंहै मेरा माता ॥अंग 103
- जीअ प्राण प्रभ मनहि अधारा ॥अंग 103
- सुणि सुणि जीवा सोइ तुमारी ॥अंग 104
- हुकमी वरसण लागे मेहा ॥अंग 104
- आउ साजन संत मीत पिआरे ॥अंग 104
- भए क्रिपाल गोविंद गुसाई ॥अंग 105
- जिथै नामु जपीऐ प्रभ पिआरे ॥अंग 105
- चरण ठाकुर के रिदै समाणे ॥अंग 105
- मीहु पइआ परमेसरि पाइआ ॥अंग 105
- मनु तनु तेरा धनु भी तेरा ॥अंग 106
- पारब्रहमि प्रभि मेघु पठाइआ ॥अंग 106
- सभे सुख भए प्रभ तुठे ॥अंग 106
- कीनी दइआ गोपाल गुसाई ॥अंग 107
- सो सचु मंदरु जितु सचु धिआईऐ ॥अंग 107
- रैणि सुहावड़ी दिनसु सुहेला ॥अंग 107
- ऐथै तूंहै आगै आपे ॥अंग 107
- मनु तनु रता राम पिआरे ॥अंग 108
- सिमरत नामु रिदै सुखु पाइआ ॥अंग 108
- सोई करणा जि आपि कराए ॥अंग 108
- झूठा मंगणु जे कोई मागै ॥अंग 109
- अंतरि अलखु न जाई लखिआ ॥अंग 130
- कउणु सु मुकता कउणु सु जुगता ॥अंग 131
- प्रभु अबिनासी ता किआ काड़ा ॥अंग 131
- नित नित दयु समालीऐ ॥अंग 132
- हरि जपि जपे मनु धीरे ॥1॥ रहाउ ॥अंग 132
- किरति करम के वीछुड़े करि किरपा मेलहु राम ॥अंग 133
- सेवी सतिगुरु आपणा हरि सिमरी दिन सभि रैण ॥अंग 136
गउड़ी (624)
- किन बिधि कुसलु होत मेरे भाई ॥अंग 175
- किउ भ्रमीऐ भ्रमु किस का होई ॥अंग 176
- कई जनम भए कीट पतंगा ॥अंग 176
- करम भूमि महि बोअहु नामु ॥अंग 176
- गुर का बचनु सदा अबिनासी ॥अंग 177
- जिनि कीता माटी ते रतनु ॥अंग 177
- तिस की सरणि नाही भउ सोगु ॥अंग 177
- सुणि हरि कथा उतारी मैलु ॥अंग 178
- अगले मुए सि पाछै परे ॥अंग 178
- अनिक जतन नही होत छुटारा ॥अंग 178
- बहुतु दरबु करि मनु न अघाना ॥अंग 179
- बहु रंग माइआ बहु बिधि पेखी ॥अंग 179
- तउ किरपा ते मारगु पाईऐ ॥अंग 180
- आन रसा जेते तै चाखे ॥अंग 180
- मनु मंदरु तनु साजी बारि ॥अंग 180
- रैणि दिनसु रहै इक रंगा ॥अंग 181
- तूं मेरा सखा तूंही मेरा मीतु ॥अंग 181
- नैनहु नीद पर द्रिसटि विकार ॥अंग 182
- जा कै वसि खान सुलतान ॥अंग 182
- सतिगुर दरसनि अगनि निवारी ॥अंग 183
- साधसंगि जपिओ भगवंतु ॥अंग 183
- बंधन तोड़ि बोलावै रामु ॥अंग 183
- जिसु मनि वसै तरै जनु सोइ ॥अंग 184
- जीअ जुगति जा कै है हाथ ॥अंग 184
- गुर परसादि नामि मनु लागा ॥अंग 184
- हसत पुनीत होहि ततकाल ॥अंग 185
- जो पराइओ सोई अपना ॥अंग 185
- कलिजुग महि मिलि आए संजोग ॥अंग 185
- हम धनवंत भागठ सच नाइ ॥अंग 185
- डरि डरि मरते जब जानीऐ दूरि ॥अंग 186
- जा का मीतु साजनु है समीआ ॥अंग 186
- जा कै दुखु सुखु सम करि जापै ॥अंग 186
- अगम रूप का मन महि थाना ॥अंग 186
- कवन रूपु तेरा आराधउ ॥अंग 186
- आपन तनु नही जा को गरबा ॥अंग 187
- गुर के चरण ऊपरि मेरे माथे ॥अंग 187
- रे मन मेरे तूं ता कउ आहि ॥ जा कै ऊणा कछहू नाहि ॥1॥अंग 187
- मीतु करै सोई हम माना ॥अंग 187
- जा कउ तुम भए समरथ अंगा ॥अंग 188
- दुलभ देह पाई वडभागी ॥अंग 188
- का की माई का को बाप ॥अंग 188
- वडे वडे जो दीसहि लोग ॥अंग 188
- पूरा मारगु पूरा इसनानु ॥अंग 188
- संत की धूरि मिटे अघ कोट ॥अंग 188
- हरि गुण जपत कमलु परगासै ॥अंग 189
- एकसु सिउ जा का मनु राता ॥अंग 189
- नामु भगत कै प्रान अधारु ॥अंग 189
- संत प्रसादि हरि नामु धिआइआ ॥अंग 189
- कर करि टहल रसना गुण गावउ ॥अंग 189
- जा कउ अपनी किरपा धारै ॥अंग 190
- छाडि सिआनप बहु चतुराई ॥अंग 190
- राखि लीआ गुरि पूरै आपि ॥अंग 190
- अनिक रसा खाए जैसे ढोर ॥अंग 190
- साधसंगि ता की सरनी परहु ॥अंग 191
- सूके हरे कीए खिन माहे ॥अंग 191
- ताप गए पाई प्रभि सांति ॥अंग 191
- भले दिनस भले संजोग ॥अंग 191
- गुर का सबदु राखु मन माहि ॥अंग 192
- जिसु सिमरत दूखु सभु जाइ ॥अंग 192
- भै महि रचिओ सभु संसारा ॥अंग 192
- तुमरी क्रिपा ते जपीऐ नाउ ॥अंग 192
- कण बिना जैसे थोथर तुखा ॥अंग 192
- तूं समरथु तूंहै मेरा सुआमी ॥अंग 193
- ता का दरसु पाईऐ वडभागी ॥अंग 193
- हरि सिमरत तेरी जाइ बलाइ ॥अंग 193
- हिरदै चरन कमल प्रभ धारे ॥अंग 193
- गुर जी के दरसन कउ बलि जाउ ॥अंग 193
- करै दुहकरम दिखावै होरु ॥अंग 194
- राम रंगु कदे उतरि न जाइ ॥अंग 194
- सिमरत सुआमी किलविख नासे ॥अंग 194
- हरि चरणी जा का मनु लागा ॥अंग 194
- हरि सिमरत सभि मिटहि कलेस ॥अंग 194
- जिस का दीआ पैनै खाइ ॥अंग 195
- प्रभ के चरन मन माहि धिआनु ॥अंग 195
- खादा पैनदा मूकरि पाइ ॥अंग 195
- अपने लोभ कउ कीनो मीतु ॥अंग 195
- कोटि बिघन हिरे खिन माहि ॥अंग 195
- करि किरपा भेटे गुर सोई ॥अंग 196
- बिखै राज ते अंधुला भारी ॥अंग 196
- आठ पहर संगी बटवारे ॥अंग 196
- थाती पाई हरि को नाम ॥अंग 196
- जलि थलि महीअलि पूरन हरि मीत ॥अंग 196
- हरि हरि नामि मजनु करि सूचे ॥अंग 197
- पउ सरणाई जिनि हरि जाते ॥अंग 197
- बाहरि राखिओ रिदै समालि ॥अंग 197
- धंनु इहु थानु गोविंद गुण गाए ॥अंग 197
- जो प्राणी गोविंदु धिआवै ॥अंग 197
- हरि के दास सिउ साकत नही संगु ॥अंग 198
- सा मति निरमल कहीअत धीर ॥अंग 198
- ऐसी प्रीति गोविंद सिउ लागी ॥अंग 198
- राम रसाइणि जो जन गीधे ॥अंग 198
- नितप्रति नावणु राम सरि कीजै ॥अंग 198
- सो किछु करि जितु मैलु न लागै ॥अंग 199
- जीवत छाडि जाहि देवाने ॥अंग 199
- गरीबा उपरि जि खिंजै दाड़ी ॥अंग 199
- महजरु झूठा कीतोनु आपि ॥अंग 199
- जन की धूरि मन मीठ खटानी ॥अंग 199
- जीवन पदवी हरि के दास ॥अंग 200
- सांति भई गुर गोबिदि पाई ॥अंग 200
- नेत्र प्रगासु कीआ गुरदेव ॥अंग 200
- धनु ओहु मसतकु धनु तेरे नेत ॥अंग 200
- तूंहै मसलति तूंहै नालि ॥अंग 200
- सतिगुरु पूरा भइआ क्रिपालु ॥अंग 200
- धोती खोलि विछाए हेठि ॥अंग 201
- थिरु घरि बैसहु हरि जन पिआरे ॥अंग 201
- हरि संगि राते भाहि न जलै ॥अंग 201
- उदमु करत सीतल मन भए ॥अंग 201
- कोटि मजन कीनो इसनान ॥अंग 202
- सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पाइआ ॥अंग 202
- अपने सेवक कउ आपि सहाई ॥अंग 202
- राम को बलु पूरन भाई ॥अंग 202
- भुज बल बीर ब्रहम सुख सागर गरत परत गहि लेहु अंगुरीआ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 203
- तुझ बिनु घरी न जीवना ध्रिगु रहणा संसारि ॥अंग 203
- है कोई राम पिआरो गावै ॥अंग 203
- कवन गुन प्रानपति मिलउ मेरी माई ॥1॥ रहाउ ॥अंग 204
- प्रभ मिलबे कउ प्रीति मनि लागी ॥अंग 204
- निकसु रे पंखी सिमरि हरि पांख ॥अंग 204
- हरि पेखन कउ सिमरत मनु मेरा ॥अंग 204
- किन बिधि मिलै गुसाई मेरे राम राइ ॥अंग 204
- ऐसो परचउ पाइओ ॥अंग 205
- अउध घटै दिनसु रैनारे ॥अंग 205
- राखु पिता प्रभ मेरे ॥अंग 205
- ओहु अबिनासी राइआ ॥अंग 206
- छोडि छोडि रे बिखिआ के रसूआ ॥अंग 206
- तुझ बिनु कवनु हमारा ॥अंग 206
- तुझ बिनु कवनु रीझावै तोही ॥अंग 207
- मिलहु पिआरे जीआ ॥अंग 207
- हउ ता कै बलिहारी ॥अंग 207
- जोग जुगति सुनि आइओ गुर ते ॥अंग 208
- अनूप पदारथु नामु सुनहु सगल धिआइले मीता ॥अंग 208
- दइआ मइआ करि प्रानपति मोरे मोहि अनाथ सरणि प्रभ तोरी ॥अंग 208
- तुम हरि सेती राते संतहु ॥अंग 209
- सहजि समाइओ देव ॥अंग 209
- पारब्रहम पूरन परमेसुर मन ता की ओट गहीजै रे ॥अंग 209
- हरि हरि कबहू न मनहु बिसारे ॥अंग 210
- सुखु नाही रे हरि भगति बिना ॥अंग 210
- मन धर तरबे हरि नाम नो ॥अंग 210
- दीबानु हमारो तुही एक ॥अंग 210
- जीअरे ओल॑ा नाम का ॥अंग 211
- बारनै बलिहारनै लख बरीआ ॥अंग 211
- हरि हरि हरि आराधीऐ ॥अंग 211
- मन राम नाम गुन गाईऐ ॥अंग 211
- रसना जपीऐ एकु नाम ॥अंग 211
- जा कउ बिसरै राम नाम ताहू कउ पीर ॥अंग 212
- गरबु बडो मूलु इतनो ॥अंग 212
- मोहि दासरो ठाकुर को ॥अंग 212
- है कोई ऐसा हउमै तोरै ॥अंग 212
- चिंतामणि करुणा मए ॥1॥ रहाउ ॥अंग 212
- मेरे मन सरणि प्रभू सुख पाए ॥अंग 212
- मेरे मन गुरु गुरु गुरु सद करीऐ ॥अंग 213
- त्रिसना बिरले ही की बुझी हे ॥1॥ रहाउ ॥अंग 213
- सभहू को रसु हरि हो ॥1॥ रहाउ ॥अंग 213
- गुन कीरति निधि मोरी ॥1॥ रहाउ ॥अंग 213
- मातो हरि रंगि मातो ॥1॥ रहाउ ॥अंग 214
- हरि नामु लेहु मीता लेहु आगै बिखम पंथु भैआन ॥1॥ रहाउ ॥अंग 214
- पाइओ बाल बुधि सुखु रे ॥अंग 214
- भावनु तिआगिओ री तिआगिओ ॥अंग 214
- पाइआ लालु रतनु मनि पाइआ ॥अंग 215
- उबरत राजा राम की सरणी ॥अंग 215
- मो कउ इह बिधि को समझावै ॥अंग 215
- हरि बिनु अवर क्रिआ बिरथे ॥अंग 216
- गउड़ी माला 5 ॥अंग 216
- तूं मेरा बहु माणु करते तूं मेरा बहु माणु ॥अंग 217
- दुख भंजनु तेरा नामु जी दुख भंजनु तेरा नामु ॥अंग 218
- हरि राम राम राम रामा ॥अंग 218
- मीठे हरि गुण गाउ जिंदू तूं मीठे हरि गुण गाउ ॥अंग 218
- जब इहु मन महि करत गुमाना ॥अंग 235
- गुर सेवा ते नामे लागा ॥अंग 236
- गुर का सबदु रिद अंतरि धारै ॥अंग 236
- प्रथमे गरभ वास ते टरिआ ॥अंग 237
- जो इसु मारे सोई सूरा ॥अंग 237
- हरि सिउ जुरै त सभु को मीतु ॥अंग 238
- बिनु सिमरन जैसे सरप आरजारी ॥अंग 239
- गुर कै बचनि मोहि परम गति पाई ॥अंग 239
- तिसु गुर कउ सिमरउ सासि सासि ॥अंग 239
- मिलु मेरे गोबिंद अपना नामु देहु ॥अंग 240
- आदि मधि जो अंति निबाहै ॥ सो साजनु मेरा मनु चाहै ॥1॥अंग 240
- खोजत फिरे असंख अंतु न पारीआ ॥अंग 240
- नाराइण हरि रंग रंगो ॥अंग 241
- हरि हरि गुरु गुरु करत भरम गए ॥अंग 241
- रंग संगि बिखिआ के भोगा इन संगि अंध न जानी ॥1॥अंग 242
- पुरखो बिधाता एकु स्रीधरु किउ मिलह तुझै उडीणीआ ॥अंग 247
- मोहन तेरे ऊचे मंदर महल अपारा ॥अंग 248
- पतित असंख पुनीत करि पुनह पुनह बलिहार ॥अंग 248
- जपि मना तूं राम नराइणु गोविंदा हरि माधो ॥अंग 248
- सुणि सखीए मिलि उदमु करेहा मनाइ लैहि हरि कंतै ॥अंग 249
- गुरदेव माता गुरदेव पिता गुरदेव सुआमी परमेसुरा ॥अंग 250
- आपहि कीआ कराइआ आपहि करनै जोगु ॥अंग 250
- ओअं साध सतिगुर नमसकारं ॥अंग 250
- निरंकार आकार आपि निरगुन सरगुन एक ॥अंग 250
- ओअं गुरमुखि कीओ अकारा ॥अंग 250
- सेई साह भगवंत से सचु संपै हरि रासि ॥अंग 250
- ससा सति सति सति सोऊ ॥अंग 250
- धनु धनु कहा पुकारते माइआ मोह सभ कूर ॥अंग 250
- धधा धूरि पुनीत तेरे जनूआ ॥अंग 251
- अनिक भेख अरु ङिआन धिआन मनहठि मिलिअउ न कोइ ॥अंग 251
- ङंङा ङिआनु नही मुख बातउ ॥अंग 251
- आवन आए स्रिसटि महि बिनु बूझे पसु ढोर ॥अंग 251
- या जुग महि एकहि कउ आइआ ॥अंग 251
- आवत हुकमि बिनास हुकमि आगिआ भिंन न कोइ ॥अंग 251
- एऊ जीअ बहुतु ग्रभ वासे ॥अंग 251
- किरत कमावन सुभ असुभ कीने तिनि प्रभि आपि ॥अंग 251
- एकहि आपि करावनहारा ॥अंग 251
- राचि रहे बनिता बिनोद कुसम रंग बिख सोर ॥अंग 251
- रे मन बिनु हरि जह रचहु तह तह बंधन पाहि ॥अंग 252
- टूटे बंधन जासु के होआ साधू संगु ॥अंग 252
- रारा रंगहु इआ मनु अपना ॥अंग 252
- लालच झूठ बिकार मोह बिआपत मूड़े अंध ॥अंग 252
- लला लपटि बिखै रस राते ॥अंग 252
- लाल गुपाल गोबिंद प्रभ गहिर गंभीर अथाह ॥अंग 252
- लला ता कै लवै न कोऊ ॥अंग 252
- आतम रसु जिह जानिआ हरि रंग सहजे माणु ॥अंग 252
- आइआ सफल ताहू को गनीऐ ॥अंग 252
- यासु जपत मनि होइ अनंदु बिनसै दूजा भाउ ॥ दूख दरद त्रिसना बुझै नानक नामि समाउ ॥1॥अंग 252
- यया जारउ दुरमति दोऊ ॥अंग 253
- अंतरि मन तन बसि रहे ईत ऊत के मीत ॥अंग 253
- अनदिनु सिमरहु तासु कउ जो अंति सहाई होइ ॥अंग 253
- अति सुंदर कुलीन चतुर मुखि ङिआनी धनवंत ॥अंग 253
- ङंङा खटु सासत्र होइ ङिआता ॥अंग 253
- कुंट चारि दह दिसि भ्रमे करम किरति की रेख ॥अंग 253
- कका कारन करता सोऊ ॥अंग 253
- खात खरचत बिलछत रहे टूटि न जाहि भंडार ॥अंग 253
- खखा खूना कछु नही तिसु संम्रथ कै पाहि ॥अंग 253
- गनि मिनि देखहु मनै माहि सरपर चलनो लोग ॥अंग 254
- गगा गोबिद गुण रवहु सासि सासि जपि नीत ॥अंग 254
- घोखे सासत्र बेद सभ आन न कथतउ कोइ ॥अंग 254
- घघा घालहु मनहि एह बिनु हरि दूसर नाहि ॥अंग 254
- ङणि घाले सभ दिवस सास नह बढन घटन तिलु सार ॥अंग 254
- ङंङा ङ्रासै कालु तिह जो साकत प्रभि कीन ॥अंग 254
- चिति चितवउ चरणारबिंद ऊध कवल बिगसांत ॥अंग 254
- चचा चरन कमल गुर लागा ॥ धनि धनि उआ दिन संजोग सभागा ॥अंग 254
- छाती सीतल मनु सुखी छंत गोबिद गुन गाइ ॥अंग 254
- छछा छोहरे दास तुमारे ॥अंग 254
- जोर जुलम फूलहि घनो काची देह बिकार ॥अंग 255
- जजा जानै हउ कछु हूआ ॥अंग 255
- झालाघे उठि नामु जपि निसि बासुर आराधि ॥अंग 255
- झझा झूरनु मिटै तुमारो ॥अंग 255
- ञतन करहु तुम अनिक बिधि रहनु न पावहु मीत ॥अंग 255
- ञंञा ञाणहु द्रिड़ु सही बिनसि जात एह हेत ॥अंग 255
- टूटे बंधन जनम मरन साध सेव सुखु पाइ ॥अंग 255
- टहल करहु तउ एक की जा ते ब्रिथा न कोइ ॥अंग 255
- ठाक न होती तिनहु दरि जिह होवहु सुप्रसंन ॥अंग 255
- ठठा मनूआ ठाहहि नाही ॥ जो सगल तिआगि एकहि लपटाही ॥अंग 256
- डंडउति बंदन अनिक बार सरब कला समरथ ॥अंग 256
- डडा डेरा इहु नही जह डेरा तह जानु ॥अंग 256
- ढाहन लागे धरम राइ किनहि न घालिओ बंध ॥अंग 256
- ढढा ढूढत कह फिरहु ढूढनु इआ मन माहि ॥अंग 256
- जह साधू गोबिद भजनु कीरतनु नानक नीत ॥अंग 256
- णाणा रण ते सीझीऐ आतम जीतै कोइ ॥अंग 256
- तनु मनु धनु अरपउ तिसै प्रभू मिलावै मोहि ॥अंग 256
- तता ता सिउ प्रीति करि गुण निधि गोबिद राइ ॥अंग 256
- थाके बहु बिधि घालते त्रिपति न त्रिसना लाथ ॥अंग 257
- थथा थिरु कोऊ नही काइ पसारहु पाव ॥अंग 257
- दासह एकु निहारिआ सभु कछु देवनहार ॥अंग 257
- ददा दाता एकु है सभ कउ देवनहार ॥अंग 257
- धर जीअरे इक टेक तू लाहि बिडानी आस ॥अंग 257
- धधा धावत तउ मिटै संतसंगि होइ बासु ॥अंग 257
- नानक नामु नामु जपु जपिआ अंतरि बाहरि रंगि ॥अंग 257
- नंना नरकि परहि ते नाही ॥ जा कै मनि तनि नामु बसाही ॥अंग 257
- पति राखी गुरि पारब्रहम तजि परपंच मोह बिकार ॥अंग 258
- पपा परमिति पारु न पाइआ ॥अंग 258
- फाहे काटे मिटे गवन फतिह भई मनि जीत ॥अंग 258
- फफा फिरत फिरत तू आइआ ॥अंग 258
- बिनउ सुनहु तुम पारब्रहम दीन दइआल गुपाल ॥अंग 258
- बबा ब्रहमु जानत ते ब्रहमा ॥अंग 258
- भै भंजन अघ दूख नास मनहि अराधि हरे ॥अंग 258
- भभा भरमु मिटावहु अपना ॥अंग 258
- माइआ डोलै बहु बिधी मनु लपटिओ तिह संग ॥अंग 258
- ममा मागनहार इआना ॥अंग 258
- मति पूरी परधान ते गुर पूरे मन मंत ॥अंग 259
- ममा जाहू मरमु पछाना ॥ भेटत साधसंग पतीआना ॥अंग 259
- यार मीत सुनि साजनहु बिनु हरि छूटनु नाहि ॥अंग 259
- यया जतन करत बहु बिधीआ ॥अंग 259
- रोसु न काहू संग करहु आपन आपु बीचारि ॥अंग 259
- रारा रेन होत सभ जा की ॥अंग 259
- लालच झूठ बिखै बिआधि इआ देही महि बास ॥अंग 259
- लला लावउ अउखध जाहू ॥अंग 259
- वासुदेव सरबत्र मै ऊन न कतहू ठाइ ॥अंग 259
- ववा वैरु न करीऐ काहू ॥अंग 259
- हउ हउ करत बिहानीआ साकत मुगध अजान ॥अंग 260
- ड़ाड़ा ड़ाड़ि मिटै संगि साधू ॥अंग 260
- साधू की मन ओट गहु उकति सिआनप तिआगु ॥अंग 260
- ससा सरनि परे अब हारे ॥ सासत्र सिम्रिति बेद पूकारे ॥अंग 260
- खुदी मिटी तब सुख भए मन तन भए अरोग ॥अंग 260
- खखा खरा सराहउ ताहू ॥अंग 260
- सति कहउ सुनि मन मेरे सरनि परहु हरि राइ ॥अंग 260
- ससा सिआनप छाडु इआना ॥अंग 260
- हरि हरि मुख ते बोलना मनि वूठै सुखु होइ ॥अंग 260
- हेरउ घटि घटि सगल कै पूरि रहे भगवान ॥अंग 260
- लेखै कतहि न छूटीऐ खिनु खिनु भूलनहार ॥अंग 261
- लूण हरामी गुनहगार बेगाना अलप मति ॥अंग 261
- खात पीत खेलत हसत भरमे जनम अनेक ॥अंग 261
- खेलत खेलत आइओ अनिक जोनि दुख पाइ ॥अंग 261
- आए प्रभ सरनागती किरपा निधि दइआल ॥अंग 261
- अखर महि त्रिभवन प्रभि धारे ॥अंग 261
- हथि कलंम अगंम मसतकि लिखावती ॥अंग 261
- हे अचुत हे पारब्रहम अबिनासी अघनास ॥अंग 261
- गुरदेव माता गुरदेव पिता गुरदेव सुआमी परमेसुरा ॥अंग 262
- आदि गुरए नमह ॥अंग 262
- सिमरउ सिमरि सिमरि सुखु पावउ ॥अंग 262
- सुखमनी सुख अंम्रित प्रभ नामु ॥अंग 262
- प्रभ कै सिमरनि रिधि सिधि नउ निधि ॥अंग 262
- प्रभ का सिमरनु सभ ते ऊचा ॥अंग 263
- प्रभ कउ सिमरहि से धनवंते ॥अंग 263
- प्रभ कउ सिमरहि से परउपकारी ॥अंग 263
- प्रभ कै सिमरनि कारज पूरे ॥अंग 263
- हरि सिमरनु करि भगत प्रगटाए ॥अंग 263
- दीन दरद दुख भंजना घटि घटि नाथ अनाथ ॥अंग 263
- जह मात पिता सुत मीत न भाई ॥अंग 264
- सगल स्रिसटि को राजा दुखीआ ॥अंग 264
- छूटत नही कोटि लख बाही ॥अंग 264
- जिह मारग के गने जाहि न कोसा ॥अंग 264
- भगत जना की बरतनि नामु ॥अंग 264
- हरि का नामु जन कउ मुकति जुगति ॥अंग 264
- हरि हरि जन कै मालु खजीना ॥अंग 265
- पारजातु इहु हरि को नाम ॥अंग 265
- बहु सासत्र बहु सिम्रिती पेखे सरब ढढोलि ॥अंग 265
- जाप ताप गिआन सभि धिआन ॥अंग 265
- नउ खंड प्रिथमी फिरै चिरु जीवै ॥अंग 265
- मन कामना तीरथ देह छुटै ॥अंग 265
- बहुतु सिआणप जम का भउ बिआपै ॥अंग 265
- चारि पदारथ जे को मागै ॥अंग 266
- सगल पुरख महि पुरखु प्रधानु ॥अंग 266
- निरधन कउ धनु तेरो नाउ ॥अंग 266
- सरब धरम महि स्रेसट धरमु ॥अंग 266
- निरगुनीआर इआनिआ सो प्रभु सदा समालि ॥अंग 266
- रमईआ के गुन चेति परानी ॥अंग 266
- जिह प्रसादि धर ऊपरि सुखि बसहि ॥अंग 267
- आदि अंति जो राखनहारु ॥अंग 267
- रतनु तिआगि कउडी संगि रचै ॥अंग 267
- करतूति पसू की मानस जाति ॥अंग 267
- सुनि अंधा कैसे मारगु पावै ॥अंग 267
- संगि सहाई सु आवै न चीति ॥अंग 267
- तू ठाकुरु तुम पहि अरदासि ॥अंग 268
- देनहारु प्रभ छोडि कै लागहि आन सुआइ ॥अंग 268
- दस बसतू ले पाछै पावै ॥अंग 268
- अगनत साहु अपनी दे रासि ॥अंग 268
- अनिक भाति माइआ के हेत ॥ सरपर होवत जानु अनेत ॥अंग 268
- मिथिआ तनु धनु कुटंबु सबाइआ ॥अंग 268
- मिथिआ स्रवन पर निंदा सुनहि ॥अंग 268
- बिरथी साकत की आरजा ॥अंग 269
- रहत अवर कछु अवर कमावत ॥अंग 269
- करउ बेनती पारब्रहमु सभु जानै ॥अंग 269
- काम क्रोध अरु लोभ मोह बिनसि जाइ अहंमेव ॥अंग 269
- जिह प्रसादि छतीह अंम्रित खाहि ॥अंग 269
- जिह प्रसादि पाट पटंबर हढावहि ॥अंग 269
- जिह प्रसादि आरोग कंचन देही ॥अंग 270
- जिह प्रसादि आभूखन पहिरीजै ॥अंग 270
- जिह प्रसादि करहि पुंन बहु दान ॥अंग 270
- जिह प्रसादि सुनहि करन नाद ॥अंग 270
- जिह प्रसादि तूं प्रगटु संसारि ॥अंग 270
- आपि जपाए जपै सो नाउ ॥अंग 270
- अगम अगाधि पारब्रहमु सोइ ॥अंग 271
- साध कै संगि मुख ऊजल होत ॥अंग 271
- साध कै संगि अगोचरु मिलै ॥अंग 271
- साधसंगि दुसमन सभि मीत ॥अंग 271
- साध कै संगि न कबहू धावै ॥अंग 271
- साध कै संगि सभ कुल उधारै ॥अंग 271
- साध कै संगि नही कछु घाल ॥अंग 272
- साध कै संगि सुनउ हरि नाउ ॥अंग 272
- साध की महिमा बेद न जानहि ॥अंग 272
- मनि साचा मुखि साचा सोइ ॥अंग 272
- ब्रहम गिआनी सदा निरलेप ॥अंग 272
- ब्रहम गिआनी निरमल ते निरमला ॥अंग 272
- ब्रहम गिआनी सगल की रीना ॥अंग 272
- ब्रहम गिआनी एक ऊपरि आस ॥अंग 273
- ब्रहम गिआनी कै एकै रंग ॥अंग 273
- ब्रहम गिआनी ब्रहम का बेता ॥अंग 273
- ब्रहम गिआनी की कीमति नाहि ॥अंग 273
- ब्रहम गिआनी सभ स्रिसटि का करता ॥अंग 273
- उरि धारै जो अंतरि नामु ॥अंग 274
- मिथिआ नाही रसना परस ॥अंग 274
- बैसनो सो जिसु ऊपरि सुप्रसंन ॥अंग 274
- भगउती भगवंत भगति का रंगु ॥अंग 274
- सो पंडितु जो मनु परबोधै ॥अंग 274
- बीज मंत्रु सरब को गिआनु ॥अंग 274
- जिस कै मनि पारब्रहम का निवासु ॥अंग 274
- प्रभ की आगिआ आतम हितावै ॥अंग 275
- पारब्रहम के सगले ठाउ ॥अंग 275
- उसतति करहि अनेक जन अंतु न पारावार ॥अंग 275
- कई कोटि होए पूजारी ॥अंग 275
- कई कोटि भए अभिमानी ॥अंग 275
- कई कोटि सिध जती जोगी ॥अंग 275
- कई कोटि राजस तामस सातक ॥अंग 276
- कई कोटि पाताल के वासी ॥अंग 276
- कई कोटि भए बैरागी ॥अंग 276
- कई कोटि खाणी अरु खंड ॥अंग 276
- कई कोटि पारब्रहम के दास ॥अंग 276
- करण कारण प्रभु एकु है दूसर नाही कोइ ॥अंग 276
- करन करावन करनै जोगु ॥अंग 276
- प्रभ भावै मानुख गति पावै ॥अंग 277
- कहु मानुख ते किआ होइ आवै ॥अंग 277
- खिन महि नीच कीट कउ राज ॥अंग 277
- इस का बलु नाही इसु हाथ ॥अंग 277
- कबहू निरति करै बहु भाति ॥अंग 277
- कबहू होइ पंडितु करे बख्यानु ॥अंग 277
- कबहू साधसंगति इहु पावै ॥अंग 278
- सुखी बसै मसकीनीआ आपु निवारि तले ॥अंग 278
- जिस कै अंतरि राज अभिमानु ॥अंग 278
- धनवंता होइ करि गरबावै ॥अंग 278
- कोटि करम करै हउ धारे ॥अंग 278
- जब लगु जानै मुझ ते कछु होइ ॥अंग 278
- सहस खटे लख कउ उठि धावै ॥अंग 278
- करन करावन करनैहारु ॥अंग 279
- आपि उपदेसै समझै आपि ॥अंग 279
- सति सति सति प्रभु सुआमी ॥अंग 279
- संत सरनि जो जनु परै सो जनु उधरनहार ॥अंग 279
- संत कै दूखनि आरजा घटै ॥अंग 279
- संत के दूखन ते मुखु भवै ॥अंग 279
- संत का निंदकु महा अतताई ॥अंग 280
- संत का दोखी सदा अपवितु ॥अंग 280
- संत का दोखी अध बीच ते टूटै ॥अंग 280
- संत का दोखी इउ बिललाइ ॥अंग 280
- संत का दोखी बिगड़ रूपु होइ जाइ ॥अंग 280
- सभ घट तिस के ओहु करनैहारु ॥अंग 280
- तजहु सिआनप सुरि जनहु सिमरहु हरि हरि राइ ॥अंग 281
- मानुख की टेक ब्रिथी सभ जानु ॥अंग 281
- उसतति मन महि करि निरंकार ॥अंग 281
- बडभागी ते जन जग माहि ॥अंग 281
- गुर प्रसादि आपन आपु सुझै ॥अंग 281
- जिस कउ हरि प्रभु मनि चिति आवै ॥अंग 281
- नह किछु जनमै नह किछु मरै ॥अंग 281
- जिन प्रभु जाता सु सोभावंत ॥अंग 282
- जो किछु करै सु प्रभ कै रंगि ॥अंग 282
- सरब कला भरपूर प्रभ बिरथा जाननहार ॥अंग 282
- टूटी गाढनहार गोुपाल ॥अंग 282
- रूपवंतु होइ नाही मोहै ॥अंग 282
- जिउ मंदर कउ थामै थंमनु ॥अंग 282
- मन मूरख काहे बिललाईऐ ॥अंग 282
- जिसु वखर कउ लैनि तू आइआ ॥अंग 283
- चरन साध के धोइ धोइ पीउ ॥अंग 283
- मिरतक कउ जीवालनहार ॥अंग 283
- जा कै मनि गुर की परतीति ॥अंग 283
- रूपु न रेख न रंगु किछु त्रिहु गुण ते प्रभ भिंन ॥अंग 283
- अबिनासी प्रभु मन महि राखु ॥अंग 283
- मनसा पूरन सरना जोग ॥अंग 284
- जा की लीला की मिति नाहि ॥अंग 284
- नाना रूप नाना जा के रंग ॥अंग 284
- नाम के धारे सगले जंत ॥अंग 284
- रूपु सति जा का सति असथानु ॥अंग 284
- सति बचन साधू उपदेस ॥अंग 284
- बिसमन बिसम भए बिसमाद ॥अंग 285
- आदि सचु जुगादि सचु ॥अंग 285
- चरन सति सति परसनहार ॥अंग 285
- सति सरूपु रिदै जिनि मानिआ ॥अंग 285
- ठाकुर का सेवकु आगिआकारी ॥अंग 285
- अपुने जन का परदा ढाकै ॥अंग 285
- नीकी कीरी महि कल राखै ॥अंग 285
- बारं बार बार प्रभु जपीऐ ॥अंग 286
- बोलहु जसु जिहबा दिनु राति ॥अंग 286
- मन मेरे तिन की ओट लेहि ॥अंग 286
- सति पुरखु जिनि जानिआ सतिगुरु तिस का नाउ ॥अंग 286
- सतिगुरु सिख की करै प्रतिपाल ॥अंग 286
- गुर कै ग्रिहि सेवकु जो रहै ॥अंग 286
- बीस बिसवे गुर का मनु मानै ॥अंग 287
- सफल दरसनु पेखत पुनीत ॥अंग 287
- जिहबा एक उसतति अनेक ॥अंग 287
- इहु हरि रसु पावै जनु कोइ ॥अंग 287
- तपति माहि ठाढि वरताई ॥अंग 287
- निरगुनु आपि सरगुनु भी ओही ॥अंग 287
- साथि न चालै बिनु भजन बिखिआ सगली छारु ॥अंग 288
- संत जना मिलि करहु बीचारु ॥अंग 288
- जिसु धन कउ चारि कुंट उठि धावहि ॥अंग 288
- मनु परबोधहु हरि कै नाइ ॥अंग 288
- ततु बीचारु कहै जनु साचा ॥अंग 288
- संगि न चालसि तेरै धना ॥अंग 288
- गुर की मति तूं लेहि इआने ॥अंग 288
- गुन गावत तेरी उतरसि मैलु ॥अंग 289
- एको जपि एको सालाहि ॥अंग 289
- फिरत फिरत प्रभ आइआ परिआ तउ सरनाइ ॥अंग 289
- जाचक जनु जाचै प्रभ दानु ॥अंग 289
- प्रभ की द्रिसटि महा सुखु होइ ॥अंग 289
- सेवक की मनसा पूरी भई ॥अंग 289
- सो किउ बिसरै जि घाल न भानै ॥अंग 289
- साजन संत करहु इहु कामु ॥अंग 290
- उपजी प्रीति प्रेम रसु चाउ ॥अंग 290
- प्रभ बखसंद दीन दइआल ॥अंग 290
- सरब बैकुंठ मुकति मोख पाए ॥अंग 290
- सरगुन निरगुन निरंकार सुंन समाधी आपि ॥अंग 290
- जब अकारु इहु कछु न द्रिसटेता ॥अंग 290
- जब होवत प्रभ केवल धनी ॥अंग 291
- अबिनासी सुख आपन आसन ॥अंग 291
- जह निरमल पुरखु पुरख पति होता ॥अंग 291
- जब अपनी सोभा आपन संगि बनाई ॥अंग 291
- जह अछल अछेद अभेद समाइआ ॥अंग 291
- जह आपि रचिओ परपंचु अकारु ॥अंग 291
- जह अबिगतु भगतु तह आपि ॥अंग 292
- जीअ जंत के ठाकुरा आपे वरतणहार ॥अंग 292
- आपि कथै आपि सुननैहारु ॥अंग 292
- जीअ जंत्र सभ ता कै हाथ ॥अंग 292
- पूरन पूरि रहे दइआल ॥अंग 292
- जनु लागा हरि एकै नाइ ॥अंग 292
- साधसंगि मिलि करहु अनंद ॥अंग 293
- हलतु पलतु दुइ लेहु सवारि ॥अंग 293
- तिस ते दूरि कहा को जाइ ॥अंग 293
- मति पूरी अंम्रितु जा की द्रिसटि ॥अंग 293
- गिआन अंजनु गुरि दीआ अगिआन अंधेर बिनासु ॥अंग 293
- संतसंगि अंतरि प्रभु डीठा ॥अंग 293
- सो अंतरि सो बाहरि अनंत ॥अंग 293
- बेद पुरान सिंम्रिति महि देखु ॥अंग 294
- संत जना का पेखनु सभु ब्रहम ॥अंग 294
- आपि सति कीआ सभु सति ॥अंग 294
- सरब भूत आपि वरतारा ॥अंग 294
- इस ते होइ सु नाही बुरा ॥अंग 294
- जो जानै तिसु सदा सुखु होइ ॥अंग 294
- पूरा प्रभु आराधिआ पूरा जा का नाउ ॥अंग 295
- पूरे गुर का सुनि उपदेसु ॥अंग 295
- खेम कुसल सहज आनंद ॥अंग 295
- उतम सलोक साध के बचन ॥अंग 295
- सरनि जोगु सुनि सरनी आए ॥अंग 295
- प्रभ की उसतति करहु संत मीत ॥अंग 295
- खेम सांति रिधि नव निधि ॥अंग 295
- इहु निधानु जपै मनि कोइ ॥अंग 296
- जिसु मनि बसै सुनै लाइ प्रीति ॥अंग 296
- जलि थलि महीअलि पूरिआ सुआमी सिरजनहारु ॥अंग 296
- एकम एकंकारु प्रभु करउ बंदना धिआइ ॥अंग 296
- करउ बंदना अनिक वार सरनि परउ हरि राइ ॥अंग 296
- दुतीआ दुरमति दूरि करि गुर सेवा करि नीत ॥अंग 296
- तीनि बिआपहि जगत कउ तुरीआ पावै कोइ ॥अंग 297
- त्रितीआ त्रै गुण बिखै फल कब उतम कब नीचु ॥अंग 297
- चतुर सिआणा सुघड़ु सोइ जिनि तजिआ अभिमानु ॥अंग 297
- चतुरथि चारे बेद सुणि सोधिओ ततु बीचारु ॥अंग 297
- पंच बिकार मन महि बसे राचे माइआ संगि ॥अंग 297
- पंचमि पंच प्रधान ते जिह जानिओ परपंचु ॥अंग 297
- खट सासत्र ऊचौ कहहि अंतु न पारावार ॥अंग 297
- खसटमि खट सासत्र कहहि सिंम्रिति कथहि अनेक ॥अंग 297
- संत मंडल हरि जसु कथहि बोलहि सति सुभाइ ॥अंग 298
- सपतमि संचहु नाम धनु टूटि न जाहि भंडार ॥अंग 298
- आठ पहर गुन गाईअहि तजीअहि अवरि जंजाल ॥अंग 298
- असटमी असट सिधि नव निधि ॥अंग 298
- नाराइणु नह सिमरिओ मोहिओ सुआद बिकार ॥अंग 298
- नउमी नवे छिद्र अपवीत ॥अंग 298
- दस दिस खोजत मै फिरिओ जत देखउ तत सोइ ॥अंग 298
- दसमी दस दुआर बसि कीने ॥अंग 298
- एको एकु बखानीऐ बिरला जाणै स्वादु ॥अंग 299
- एकादसी निकटि पेखहु हरि रामु ॥अंग 299
- दुरमति हरी सेवा करी भेटे साध क्रिपाल ॥अंग 299
- दुआदसी दानु नामु इसनानु ॥अंग 299
- तीनि गुणा महि बिआपिआ पूरन होत न काम ॥अंग 299
- त्रउदसी तीनि ताप संसार ॥अंग 299
- चारि कुंट चउदह भवन सगल बिआपत राम ॥अंग 299
- चउदहि चारि कुंट प्रभ आप ॥अंग 299
- आतमु जीता गुरमती गुण गाए गोबिंद ॥अंग 299
- अमावस आतम सुखी भए संतोखु दीआ गुरदेव ॥अंग 299
- पूरनु कबहु न डोलता पूरा कीआ प्रभ आपि ॥अंग 300
- पूरनमा पूरन प्रभ एकु करण कारण समरथु ॥अंग 300
- दुख बिनसे सहसा गइओ सरनि गही हरि राइ ॥अंग 300
- कोई गावै को सुणै कोई करै बीचारु ॥अंग 300
- रहदे खुहदे निंदक मारिअनु करि आपे आहरु ॥अंग 315
- मुंढहु भुले मुंढ ते किथै पाइनि हथु ॥अंग 315
- पउड़ी 5 ॥अंग 315
- सेवक सचे साह के सेई परवाणु ॥अंग 315
- जो धुरि लिखिआ लेखु प्रभ मेटणा न जाइ ॥अंग 315
- पउड़ी 5 ॥अंग 315
- नरक घोर बहु दुख घणे अकिरतघणा का थानु ॥अंग 315
- अवखध सभे कीतिअनु निंदक का दारू नाहि ॥अंग 315
- पउड़ी 5 ॥अंग 315
- भगत जनां का राखा हरि आपि है किआ पापी करीऐ ॥अंग 316
- नानक वीचारहि संत मुनि जनां चारि वेद कहंदे ॥अंग 316
- गुर नानक हरि नामु द्रिड़ाइआ भंनण घड़ण समरथु ॥अंग 317
- खुधिआवंतु न जाणई लाज कुलाज कुबोलु ॥अंग 317
- हरि हरि नामु जो जनु जपै सो आइआ परवाणु ॥अंग 318
- भलके उठि पराहुणा मेरै घरि आवउ ॥अंग 318
- जो तुधु भावै सो भला सचु तेरा भाणा ॥अंग 318
- चेता ई तां चेति साहिबु सचा सो धणी ॥अंग 318
- वाऊ संदे कपड़े पहिरहि गरबि गवार ॥अंग 318
- सेई उबरे जगै विचि जो सचै रखे ॥अंग 318
- नानक सोई दिनसु सुहावड़ा जितु प्रभु आवै चिति ॥अंग 318
- नानक मित्राई तिसु सिउ सभ किछु जिस कै हाथि ॥अंग 318
- अंम्रितु नामु निधानु है मिलि पीवहु भाई ॥अंग 318
- डिठड़ो हभ ठाइ ऊण न काई जाइ ॥अंग 318
- दामनी चमतकार तिउ वरतारा जग खे ॥अंग 319
- सिम्रिति सासत्र सोधि सभि किनै कीम न जाणी ॥अंग 319
- अंतरि चिंता नैणी सुखी मूलि न उतरै भुख ॥अंग 319
- मुठड़े सेई साथ जिनी सचु न लदिआ ॥अंग 319
- जिथै बैसनि साध जन सो थानु सुहंदा ॥अंग 319
- चिड़ी चुहकी पहु फुटी वगनि बहुतु तरंग ॥अंग 319
- घर मंदर खुसीआ तही जह तू आवहि चिति ॥अंग 319
- हरि धनु सची रासि है किनै विरलै जाता ॥अंग 319
- खखड़ीआ सुहावीआ लगड़ीआ अक कंठि ॥अंग 319
- विसारेदे मरि गए मरि भि न सकहि मूलि ॥अंग 319
- सुख निधानु प्रभु एकु है अबिनासी सुणिआ ॥अंग 319
- जिना सासि गिरासि न विसरै हरि नामां मनि मंतु ॥अंग 319
- अठे पहर भउदा फिरै खावण संदड़ै सूलि ॥अंग 319
- तिसै सरेवहु प्राणीहो जिस दै नाउ पलै ॥अंग 320
- जाचकु मंगै दानु देहि पिआरिआ ॥अंग 320
- सिखहु सबदु पिआरिहो जनम मरन की टेक ॥अंग 320
- ओथै अंम्रितु वंडीऐ सुखीआ हरि करणे ॥अंग 320
- सतिगुरि पूरै सेविऐ दूखा का होइ नासु ॥अंग 320
- जिसु सिमरत संकट छुटहि अनद मंगल बिस्राम ॥अंग 320
- तिन की सोभा किआ गणी जिनी हरि हरि लधा ॥अंग 320
- कामु न करही आपणा फिरहि अवता लोइ ॥अंग 320
- बिखै कउड़तणि सगल माहि जगति रही लपटाइ ॥अंग 320
- इह नीसाणी साध की जिसु भेटत तरीऐ ॥अंग 320
- नानक आए से परवाणु है जिन हरि वुठा चिति ॥अंग 320
- पारब्रहमु प्रभु द्रिसटी आइआ पूरन अगम बिसमाद ॥अंग 320
- धोहु न चली खसम नालि लबि मोहि विगुते ॥अंग 321
- उठंदिआ बहंदिआ सवंदिआ सुखु सोइ ॥अंग 321
- लालचि अटिआ नित फिरै सुआरथु करे न कोइ ॥अंग 321
- सभे वसतू कउड़ीआ सचे नाउ मिठा ॥अंग 321
- जाचड़ी सा सारु जो जाचंदी हेकड़ो ॥अंग 321
- नीहि जि विधा मंनु पछाणू विरलो थिओ ॥अंग 321
- सोई सेविहु जीअड़े दाता बखसिंदु ॥अंग 321
- वत लगी सचे नाम की जो बीजे सो खाइ ॥अंग 321
- मंगणा त सचु इकु जिसु तुसि देवै आपि ॥अंग 321
- लाहा जग महि से खटहि जिन हरि धनु रासि ॥अंग 321
- पारब्रहमि फुरमाइआ मीहु वुठा सहजि सुभाइ ॥अंग 321
- जंमणु मरणु न तिन॑ कउ जो हरि लड़ि लागे ॥अंग 322
- धरणि सुवंनी खड़ रतन जड़ावी हरि प्रेम पुरखु मनि वुठा ॥अंग 322
- फिरदी फिरदी दह दिसा जल परबत बनराइ ॥अंग 322
- जिसु सरब सुखा फल लोड़ीअहि सो सचु कमावउ ॥अंग 322
- एकु जि साजनु मै कीआ सरब कला समरथु ॥अंग 322
- जे करु गहहि पिआरड़े तुधु न छोडा मूलि ॥अंग 322
- सभि निधान घरि जिस दै हरि करे सु होवै ॥अंग 322
- भोरी भरमु वञाइ पिरी मुहबति हिकु तू ॥अंग 322
- चड़ि कै घोड़ड़ै कुंदे पकड़हि खूंडी दी खेडारी ॥अंग 322
- रसना उचरै हरि स्रवणी सुणै सो उधरै मिता ॥अंग 322
- धंधड़े कुलाह चिति न आवै हेकड़ो ॥अंग 323
- परेतहु कीतोनु देवता तिनि करणैहारे ॥अंग 323
- प्रभु बेअंतु किछु अंतु नाहि सभु तिसै करणा ॥अंग 323
- तिंना भुख न का रही जिस दा प्रभु है सोइ ॥अंग 323
- जाचिकु मंगै नित नामु साहिबु करे कबूलु ॥अंग 323
- मनु रता गोविंद संगि सचु भोजनु जोड़े ॥अंग 323
- ऐसो अचरजु देखिओ कबीर ॥अंग 326
आसा (183)
- जिनि लाई प्रीति सोई फिरि खाइआ ॥अंग 370
- ससू ते पिरि कीनी वाखि ॥अंग 370
- निज भगती सीलवंती नारि ॥अंग 370
- मता करउ सो पकनि न देई ॥अंग 371
- प्रथमे मता जि पत्री चलावउ ॥अंग 371
- परदेसु झागि सउदे कउ आइआ ॥अंग 372
- गुनु अवगनु मेरो कछु न बीचारो ॥अंग 372
- दानु देइ करि पूजा करना ॥अंग 372
- अरड़ावै बिललावै निंदकु ॥अंग 373
- जउ मै कीओ सगल सीगारा ॥अंग 373
- जीवत दीसै तिसु सरपर मरणा ॥अंग 374
- पुतरी तेरी बिधि करि थाटी ॥अंग 374
- इक घड़ी दिनसु मो कउ बहुतु दिहारे ॥अंग 374
- हरि सेवा महि परम निधानु ॥अंग 375
- प्रभु होइ क्रिपालु त इहु मनु लाई ॥अंग 375
- करि किरपा हरि परगटी आइआ ॥अंग 375
- जैसे किरसाणु बोवै किरसानी ॥अंग 375
- नउ निधि तेरै सगल निधान ॥अंग 376
- निकटि जीअ कै सद ही संगा ॥अंग 376
- हरि रसु छोडि होछै रसि माता ॥अंग 376
- जीअ प्रान धनु हरि को नामु ॥अंग 376
- अनद बिनोद भरेपुरि धारिआ ॥अंग 376
- गुर कै सबदि बनावहु इहु मनु ॥अंग 377
- बुधि प्रगास भई मति पूरी ॥अंग 377
- हरि रसु पीवत सद ही राता ॥अंग 377
- कामु क्रोधु लोभु मोहु मिटावै छुटकै दुरमति अपुनी धारी ॥अंग 377
- भई परापति मानुख देहुरीआ ॥अंग 378
- तुझ बिनु अवरु नाही मै दूजा तूं मेरे मन माही ॥अंग 378
- हरि जन लीने प्रभू छडाइ ॥अंग 378
- अउखधु खाइओ हरि को नाउ ॥अंग 378
- बांछत नाही सु बेला आई ॥अंग 378
- सदा सदा आतम परगासु ॥अंग 378
- जा का हरि सुआमी प्रभु बेली ॥अंग 378
- काम क्रोध माइआ मद मतसर ए खेलत सभि जूऐ हारे ॥अंग 379
- तू बिअंतु अविगतु अगोचरु इहु सभु तेरा आकारु ॥अंग 379
- राज मिलक जोबन ग्रिह सोभा रूपवंतु जोुआनी ॥अंग 379
- भ्रम महि सोई सगल जगत धंध अंध ॥अंग 380
- जो तुधु भावै सो परवाना सूखु सहजु मनि सोई ॥अंग 380
- जनम जनम की मलु धोवै पराई आपणा कीता पावै ॥अंग 380
- बाहरु धोइ अंतरु मनु मैला दुइ ठउर अपुने खोए ॥अंग 381
- उदमु करत होवै मनु निरमलु नाचै आपु निवारे ॥अंग 381
- अधम चंडाली भई ब्रहमणी सूदी ते स्रेसटाई रे ॥अंग 381
- बंधन काटि बिसारे अउगन अपना बिरदु सम॑ारिआ ॥अंग 382
- जा तूं साहिबु ता भउ केहा हउ तुधु बिनु किसु सालाही ॥अंग 382
- अंम्रितु नामु तुम॑ारा ठाकुर एहु महा रसु जनहि पीओ ॥अंग 382
- आगै ही ते सभु किछु हूआ अवरु कि जाणै गिआना ॥अंग 383
- तूं विसरहि तां सभु को लागू चीति आवहि तां सेवा ॥अंग 383
- करि किरपा प्रभ अंतरजामी साधसंगि हरि पाईऐ ॥अंग 383
- मोह मलन नीद ते छुटकी कउनु अनुग्रहु भइओ री ॥अंग 383
- लालु चोलना तै तनि सोहिआ ॥अंग 384
- दूखु घनो जब होते दूरि ॥अंग 384
- साचि नामि मेरा मनु लागा ॥अंग 384
- पावतु रलीआ जोबनि बलीआ ॥अंग 385
- एकु बगीचा पेड घन करिआ ॥अंग 385
- राज लीला तेरै नामि बनाई ॥अंग 385
- तीरथि जाउ त हउ हउ करते ॥अंग 385
- घर महि सूख बाहरि फुनि सूखा ॥अंग 385
- जहा पठावहु तह तह जाइंी ॥अंग 386
- ऊठत बैठत सोवत धिआईऐ ॥अंग 386
- जा कै सिमरनि सूख निवासु ॥अंग 386
- जिसु नीच कउ कोई न जानै ॥अंग 386
- एको एकी नैन निहारउ ॥अंग 386
- कोटि जनम के रहे भवारे ॥अंग 387
- मिटी तिआस अगिआन अंधेरे ॥अंग 387
- सतिगुरु अपना सद सदा सम॑ारे ॥अंग 387
- आपे पेडु बिसथारी साख ॥अंग 387
- उकति सिआनप किछू न जाना ॥अंग 387
- हरि हरि अखर दुइ इह माला ॥अंग 388
- जिस का सभु किछु तिस का होइ ॥अंग 388
- जउ सुप्रसंन होइओ प्रभु मेरा ॥अंग 388
- कामि क्रोधि अहंकारि विगूते ॥अंग 388
- तू मेरा तरंगु हम मीन तुमारे ॥अंग 389
- रोवनहारै झूठु कमाना ॥अंग 389
- सोइ रही प्रभ खबरि न जानी ॥अंग 389
- चरन कमल की आस पिआरे ॥अंग 389
- मनु त्रिपतानो मिटे जंजाल ॥अंग 389
- ठाकुर सिउ जा की बनि आई ॥अंग 390
- जउ मै अपुना सतिगुरु धिआइआ ॥अंग 390
- अनदिनु मूसा लाजु टुकाई ॥अंग 390
- उन कै संगि तू करती केल ॥अंग 390
- अनिक भांति करि सेवा करीऐ ॥अंग 391
- प्रभ की प्रीति सदा सुखु होइ ॥अंग 391
- भूपति होइ कै राजु कमाइआ ॥अंग 391
- इन॑ सिउ प्रीति करी घनेरी ॥अंग 392
- आठ पहर निकटि करि जानै ॥अंग 392
- सगल सूख जपि एकै नाम ॥अंग 392
- आठ पहर उदक इसनानी ॥अंग 393
- जिह पैडै लूटी पनिहारी ॥अंग 393
- साधू संगि सिखाइओ नामु ॥अंग 393
- हरि का नामु रिदै नित धिआई ॥अंग 394
- साधू संगति तरिआ संसारु ॥अंग 394
- मीठी आगिआ पिर की लागी ॥अंग 394
- माथै त्रिकुटी द्रिसटि करूरि ॥अंग 394
- सरब दूख जब बिसरहि सुआमी ॥अंग 394
- नामु जपत मनु तनु सभु हरिआ ॥अंग 395
- गावि लेहि तू गावनहारे ॥अंग 395
- प्रथमे मिटिआ तन का दूख ॥अंग 395
- सतिगुर साचै दीआ भेजि ॥अंग 396
- गुर पूरे राखिआ दे हाथ ॥अंग 396
- मै बंदा बै खरीदु सचु साहिबु मेरा ॥अंग 396
- सरब सुखा मै भालिआ हरि जेवडु न कोई ॥अंग 396
- साई अलखु अपारु भोरी मनि वसै ॥अंग 397
- लाख भगत आराधहि जपते पीउ पीउ ॥अंग 397
- हभे थोक विसारि हिको खिआलु करि ॥अंग 397
- जिन॑ा न विसरै नामु से किनेहिआ ॥अंग 397
- पूरि रहिआ स्रब ठाइ हमारा खसमु सोइ ॥अंग 398
- किआ सोवहि नामु विसारि गाफल गहिलिआ ॥अंग 398
- कोइ न किस ही संगि काहे गरबीऐ ॥अंग 398
- जिसु सिमरत दुखु जाइ सहज सुखु पाईऐ ॥अंग 398
- गोबिंदु गुणी निधानु गुरमुखि जाणीऐ ॥अंग 399
- आवहु मीत इकत्र होइ रस कस सभि भुंचह ॥अंग 399
- उदमु कीआ कराइआ आरंभु रचाइआ ॥अंग 399
- जा का ठाकुरु तुही प्रभ ता के वडभागा ॥अंग 399
- जा प्रभ की हउ चेरुली सो सभ ते ऊचा ॥अंग 400
- संता की होइ दासरी एहु अचारा सिखु री ॥अंग 400
- डीगन डोला तऊ लउ जउ मन के भरमा ॥अंग 400
- सूख सहज आनदु घणा हरि कीरतनु गाउ ॥अंग 400
- चितवउ चितवि सरब सुख पावउ आगै भावउ कि न भावउ ॥अंग 401
- अंतरि गावउ बाहरि गावउ गावउ जागि सवारी ॥अंग 401
- जिस नो तूं असथिरु करि मानहि ते पाहुन दो दाहा ॥अंग 401
- अपुसट बात ते भई सीधरी दूत दुसट सजनई ॥अंग 402
- रे मूड़े लाहे कउ तूं ढीला ढीला तोटे कउ बेगि धाइआ ॥अंग 402
- मिथिआ संगि संगि लपटाए मोह माइआ करि बाधे ॥अंग 402
- निमख काम सुआद कारणि कोटि दिनस दुखु पावहि ॥अंग 403
- लूकि कमानो सोई तुम॑ पेखिओ मूड़ मुगध मुकरानी ॥अंग 403
- अपुने सेवक की आपे राखै आपे नामु जपावै ॥अंग 403
- नटूआ भेख दिखावै बहु बिधि जैसा है ओहु तैसा रे ॥अंग 403
- गुर परसादि मेरै मनि वसिआ जो मागउ सो पावउ रे ॥अंग 404
- चारि बरन चउहा के मरदन खटु दरसन कर तली रे ॥अंग 404
- नीकी जीअ की हरि कथा ऊतम आन सगल रस फीकी रे ॥1॥ रहाउ ॥अंग 404
- हमारी पिआरी अंम्रित धारी गुरि निमख न मन ते टारी रे ॥1॥ रहाउ ॥अंग 404
- नीकी साध संगानी ॥ रहाउ ॥अंग 404
- तिआगि सगल सिआनपा भजु पारब्रहम निरंकारु ॥अंग 405
- दीन बंधप जीअ दाता सरणि राखण जोगु ॥1॥अंग 405
- डोलि डोलि महा दुखु पाइआ बिना साधू संग ॥अंग 405
- उदमु करउ करावहु ठाकुर पेखत साधू संगि ॥अंग 405
- अगम अगोचरु दरसु तेरा सो पाए जिसु मसतकि भागु ॥अंग 406
- सतिगुर बचन तुम॑ारे ॥अंग 406
- बावर सोइ रहे ॥1॥ रहाउ ॥अंग 406
- ओहा प्रेम पिरी ॥1॥ रहाउ ॥अंग 406
- गुरहि दिखाइओ लोइना ॥1॥ रहाउ ॥अंग 407
- हरि हरि नामु अमोला ॥अंग 407
- आपुनी भगति निबाहि ॥अंग 407
- ठाकुर चरण सुहावे ॥अंग 407
- एकु सिमरि मन माही ॥1॥ रहाउ ॥अंग 407
- हरि बिसरत सो मूआ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 407
- ओहु नेहु नवेला ॥अंग 407
- मिलु राम पिआरे तुम बिनु धीरजु को न करै ॥1॥ रहाउ ॥अंग 408
- बिकार माइआ मादि सोइओ सूझ बूझ न आवै ॥अंग 408
- बापारि गोविंद नाए ॥अंग 408
- कोऊ बिखम गार तोरै ॥अंग 408
- कामु क्रोधु लोभु तिआगु ॥अंग 408
- हरख सोग बैराग अनंदी खेलु री दिखाइओ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 409
- गोबिंद गोबिंद करि हां ॥अंग 409
- मनसा एक मानि हां ॥अंग 409
- हरि हरि हरि गुनी हां ॥अंग 409
- एका ओट गहु हां ॥अंग 410
- मिलि हरि जसु गाईऐ हां ॥अंग 410
- कारन करन तूं हां ॥अंग 410
- ओइ परदेसीआ हां ॥अंग 410
- पंच मनाए पंच रुसाए ॥ पंच वसाए पंच गवाए ॥1॥अंग 430
- मेरे मन हरि सिउ लागी प्रीति ॥अंग 431
- पारब्रहमु प्रभु सिमरीऐ पिआरे दरसन कउ बलि जाउ ॥1॥अंग 431
- अनदो अनदु घणा मै सो प्रभु डीठा राम ॥अंग 452
- अकथा हरि अकथ कथा किछु जाइ न जाणी राम ॥अंग 453
- हरि चरन कमल मनु बेधिआ किछु आन न मीठा राम राजे ॥अंग 453
- जा कउ भए क्रिपाल प्रभ हरि हरि सेई जपात ॥अंग 454
- जल दुध निआई रीति अब दुध आच नही मन ऐसी प्रीति हरे ॥अंग 454
- बनु बनु फिरती खोजती हारी बहु अवगाहि ॥अंग 455
- जा कउ खोजहि असंख मुनी अनेक तपे ॥अंग 455
- उदमु करहु वडभागीहो सिमरहु हरि हरि राइ ॥अंग 456
- नामु जपत गोबिंद नह अलसाईऐ ॥अंग 456
- थिरु संतन सोहागु मरै न जावए ॥अंग 457
- हरि हरि नामु जपंतिआ कछु न कहै जमकालु ॥अंग 457
- मिलउ संतन कै संगि मोहि उधारि लेहु ॥अंग 457
- पुरख पते भगवान ता की सरणि गही ॥अंग 458
- सुभ चिंतन गोबिंद रमण निरमल साधू संग ॥अंग 459
- भिंनी रैनड़ीऐ चामकनि तारे ॥अंग 459
- उठि वंञु वटाऊड़िआ तै किआ चिरु लाइआ ॥अंग 459
- वंञु मेरे आलसा हरि पासि बेनंती ॥अंग 460
- दिनु राति कमाइअड़ो सो आइओ माथै ॥अंग 461
- कमला भ्रम भीति कमला भ्रम भीति हे तीखण मद बिपरीति हे अवध अकारथ जात ॥अंग 461
- गोबिंद गोबिंद गोबिंद संगि नामदेउ मनु लीणा ॥अंग 487
गूजरी (97)
- सैल पथर महि जंत उपाए ता का रिजकु आगै करि धरिआ ॥1॥अंग 495
- किरिआचार करहि खटु करमा इतु राते संसारी ॥अंग 495
- हरि धनु जाप हरि धनु ताप हरि धनु भोजनु भाइआ ॥अंग 495
- जिसु सिमरत सभि किलविख नासहि पितरी होइ उधारो ॥अंग 496
- मता करै पछम कै ताई पूरब ही लै जात ॥अंग 496
- नामु निधानु जिनि जनि जपिओ तिन के बंधन काटे ॥अंग 496
- जिसु मानुख पहि करउ बेनती सो अपनै दुखि भरिआ ॥अंग 497
- प्रथमे गरभ माता कै वासा ऊहा छोडि धरनि महि आइआ ॥अंग 497
- दुख बिनसे सुख कीआ निवासा त्रिसना जलनि बुझाई ॥अंग 497
- पतित पवित्र लीए करि अपुने सगल करत नमसकारो ॥अंग 498
- है नाही कोऊ बूझनहारो जानै कवनु भता ॥अंग 498
- मता मसूरति अवर सिआनप जन कउ कछू न आइओ ॥अंग 498
- दिनु राती आराधहु पिआरो निमख न कीजै ढीला ॥अंग 498
- मुनि जोगी सासत्रगि कहावत सभ कीन॑े बसि अपनही ॥अंग 498
- दुइ कर जोड़ि करी बेनंती ठाकुरु अपना धिआइआ ॥अंग 499
- मात पिता भाई सुत बंधप तिन का बलु है थोरा ॥अंग 499
- आल जाल भ्रम मोह तजावै प्रभ सेती रंगु लाई ॥अंग 499
- खिन महि थापि उथापनहारा कीमति जाइ न करी ॥अंग 499
- तूं दाता जीआ सभना का बसहु मेरे मन माही ॥अंग 499
- करि किरपा अपना दरसु दीजै जसु गावउ निसि अरु भोर ॥अंग 500
- ब्रहम लोक अरु रुद्र लोक आई इंद्र लोक ते धाइ ॥अंग 500
- अपजसु मिटै होवै जगि कीरति दरगह बैसणु पाईऐ ॥अंग 500
- बिस्वंभर जीअन को दाता भगति भरे भंडार ॥अंग 500
- जन की पैज सवारी आप ॥अंग 500
- कबहू हरि सिउ चीतु न लाइओ ॥अंग 500
- रसना राम राम रवंत ॥अंग 501
- छाडि सगल सिआणपा साध सरणी आउ ॥अंग 501
- आपना गुरु सेवि सद ही रमहु गुण गोबिंद ॥अंग 501
- गुर प्रसादी प्रभु धिआइआ गई संका तूटि ॥अंग 501
- अहंबुधि बहु सघन माइआ महा दीरघ रोगु ॥अंग 502
- आराधि स्रीधर सफल मूरति करण कारण जोगु ॥अंग 502
- तूं समरथु सरनि को दाता दुख भंजनु सुख राइ ॥अंग 502
- राजन महि तूं राजा कहीअहि भूमन महि भूमा ॥अंग 507
- नाथ नरहर दीन बंधव पतित पावन देव ॥अंग 508
- अंतरि गुरु आराधणा जिहवा जपि गुर नाउ ॥अंग 517
- रखे रखणहारि आपि उबारिअनु ॥अंग 517
- अकुल निरंजन पुरखु अगमु अपारीऐ ॥अंग 518
- जा तूं तुसहि मिहरवान अचिंतु वसहि मन माहि ॥अंग 518
- किती बैहनि॑ बैहणे मुचु वजाइनि वज ॥अंग 518
- तुधु धिआइनि॑ बेद कतेबा सणु खड़े ॥अंग 518
- चंगिआइंी आलकु करे बुरिआइंी होइ सेरु ॥अंग 518
- कितीआ कुढंग गुझा थीऐ न हितु ॥अंग 518
- हउ मागउ तुझै दइआल करि दासा गोलिआ ॥अंग 518
- साजन तेरे चरन की होइ रहा सद धूरि ॥अंग 518
- पतित पुनीत असंख होहि हरि चरणी मनु लाग ॥अंग 518
- नित जपीऐ सासि गिरासि नाउ परवदिगार दा ॥अंग 518
- कामु क्रोधु लोभु छोडीऐ दीजै अगनि जलाइ ॥अंग 519
- सिमरत सिमरत प्रभु आपणा सभ फल पाए आहि ॥अंग 519
- सो मुकता संसारि जि गुरि उपदेसिआ ॥अंग 519
- मन महि चितवउ चितवनी उदमु करउ उठि नीत ॥अंग 519
- द्रिसटि धारि प्रभि राखिआ मनु तनु रता मूलि ॥अंग 519
- जीअ की बिरथा होइ सु गुर पहि अरदासि करि ॥अंग 519
- लगड़ी सुथानि जोड़णहारै जोड़ीआ ॥अंग 519
- बनि भीहावलै हिकु साथी लधमु दुख हरता हरि नामा ॥अंग 519
- पाईअनि सभि निधान तेरै रंगि रतिआ ॥अंग 519
- प्रेम पटोला तै सहि दिता ढकण कू पति मेरी ॥अंग 520
- तैडै सिमरणि हभु किछु लधमु बिखमु न डिठमु कोई ॥अंग 520
- होवै सुखु घणा दयि धिआइऐ ॥अंग 520
- नदी तरंदड़ी मैडा खोजु न खुंभै मंझि मुहबति तेरी ॥अंग 520
- जिन॑ा दिसंदड़िआ दुरमति वंञै मित्र असाडड़े सेई ॥अंग 520
- आवै साहिबु चिति तेरिआ भगता डिठिआ ॥अंग 520
- बारि विडानड़ै हुंमस धुंमस कूका पईआ राही ॥अंग 520
- सची बैसक तिन॑ा संगि जिन संगि जपीऐ नाउ ॥अंग 520
- सा वेला परवाणु जितु सतिगुरु भेटिआ ॥अंग 520
- विछोहे जंबूर खवे न वंञनि गाखड़े ॥अंग 520
- जिमी वसंदी पाणीऐ ईधणु रखै भाहि ॥अंग 521
- तेरे कीते कंम तुधै ही गोचरे ॥अंग 521
- कड़छीआ फिरंनि॑ सुआउ न जाणनि॑ सुञीआ ॥अंग 521
- खोजी लधमु खोजु छडीआ उजाड़ि ॥अंग 521
- आराधिहु सचा सोइ सभु किछु जिसु पासि ॥अंग 521
- लधमु लभणहारु करमु करंदो मा पिरी ॥अंग 521
- पापड़िआ पछाड़ि बाणु सचावा संनि॑ कै ॥अंग 521
- वाहु वाहु सिरजणहार पाईअनु ठाढि आपि ॥अंग 521
- जा कउ भए क्रिपाल प्रभ हरि हरि सेई जपात ॥अंग 521
- रामु रमहु बडभागीहो जलि थलि महीअलि सोइ ॥अंग 521
- भगता का बोलिआ परवाणु है दरगह पवै थाइ ॥अंग 521
- कोटि बिघन तिसु लागते जिस नो विसरै नाउ ॥अंग 522
- पिरी मिलावा जा थीऐ साई सुहावी रुति ॥अंग 522
- सूरबीर वरीआम किनै न होड़ीऐ ॥ फउज सताणी हाठ पंचा जोड़ीऐ ॥अंग 522
- किलविख सभे उतरनि नीत नीत गुण गाउ ॥अंग 522
- नानक सतिगुरि भेटिऐ पूरी होवै जुगति ॥अंग 522
- सो सतिगुरु धनु धंनु जिनि भरम गड़ु तोड़िआ ॥अंग 522
- धिआइदिआ तूं प्रभू मिलु नानक उतरी चिंत ॥1॥अंग 522
- सुभ चिंतन गोबिंद रमण निरमल साधू संग ॥अंग 522
- तेरा कीता होइ त काहे डरपीऐ ॥अंग 522
- काम क्रोध मद लोभ मोह दुसट बासना निवारि ॥अंग 523
- खांदिआ खांदिआ मुहु घठा पैनंदिआ सभु अंगु ॥अंग 523
- जिउ जिउ तेरा हुकमु तिवै तिउ होवणा ॥अंग 523
- जीवदिआ न चेतिओ मुआ रलंदड़ो खाक ॥अंग 523
- जीवंदिआ हरि चेतिआ मरंदिआ हरि रंगि ॥अंग 523
- आदि जुगादी आपि रखण वालिआ ॥अंग 523
- आदि मधि अरु अंति परमेसरि रखिआ ॥अंग 523
- तिस नो मंनि वसाइ जिनि उपाइआ ॥अंग 523
- निंदक मारे ततकालि खिनु टिकण न दिते ॥अंग 523
- रामु जपहु वडभागीहो जलि थलि पूरनु सोइ ॥अंग 524
- कोटि बिघन तिसु लागते जिस नो विसरै नाउ ॥अंग 524
- सिमरि सिमरि दातारु मनोरथ पूरिआ ॥अंग 524
देवगंधारी (38)
- माई गुर चरणी चितु लाईऐ ॥अंग 528
- माई होनहार सो होईऐ ॥अंग 528
- माई सुनत सोच भै डरत ॥अंग 529
- मन हरि कीरति करि सदहूं ॥अंग 529
- मन जिउ अपुने प्रभ भावउ ॥अंग 529
- प्रभ जी तउ प्रसादि भ्रमु डारिओ ॥अंग 529
- मन सगल सिआनप रही ॥अंग 529
- हरि प्रान प्रभू सुखदाते ॥अंग 529
- देवगंधारी 5 ॥अंग 530
- देवगंधारी 5 ॥अंग 530
- देवगंधारी 5 ॥अंग 530
- देवगंधारी 5 ॥अंग 530
- देवगंधारी 5 ॥अंग 530
- देवगंधारी 5 ॥अंग 531
- देवगंधारी 5 ॥अंग 531
- देवगंधारी 5 ॥अंग 531
- अपुने हरि पहि बिनती कहीऐ ॥अंग 531
- देवगंधारी 5 ॥अंग 531
- माई प्रभ के चरन निहारउ ॥अंग 531
- सुंदर धिआनु धारु दिनु रैनी जीअ प्रान ते पिआरा ॥1॥ रहाउ ॥अंग 532
- तेरा जनु राम रसाइणि माता ॥अंग 532
- माई गुर बिनु गिआनु न पाईऐ ॥अंग 532
- ठाकुर होए आपि दइआल ॥अंग 532
- अपुने सतिगुर पहि बिनउ कहिआ ॥अंग 533
- अनाथ नाथ प्रभ हमारे ॥अंग 533
- प्रभ इहै मनोरथु मेरा ॥अंग 533
- छोडि न जाई सद ही संगे अनदिनु गुर मिलि गाए ॥1॥ रहाउ ॥अंग 533
- देवगंधारी 5 ॥अंग 533
- देवगंधारी 5 ॥अंग 534
- हरि जपि सेवकु पारि उतारिओ ॥अंग 534
- करत फिरे बन भेख मोहन रहत निरार ॥1॥ रहाउ ॥अंग 534
- मै पेखिओ री ऊचा मोहनु सभ ते ऊचा ॥अंग 534
- मै बहु बिधि पेखिओ दूजा नाही री कोऊ ॥अंग 535
- एकै रे हरि एकै जान ॥अंग 535
- देवगंधारी 5 ॥अंग 535
- धिआए गाए करनैहार ॥अंग 535
- उलटी रे मन उलटी रे ॥अंग 535
- सभ दिन के समरथ पंथ बिठुले हउ बलि बलि जाउ ॥अंग 536
बिहागड़ा (11)
- दूतन संगरीआ ॥अंग 537
- अति प्रीतम मन मोहना घट सोहना प्रान अधारा राम ॥अंग 542
- करि किरपा गुर पारब्रहम पूरे अनदिनु नामु वखाणा राम ॥अंग 543
- वधु सुखु रैनड़ीए प्रिअ प्रेमु लगा ॥अंग 544
- हरि चरण सरोवर तह करहु निवासु मना ॥अंग 544
- खोजत संत फिरहि प्रभ प्राण अधारे राम ॥अंग 545
- अन काए रातड़िआ वाट दुहेली राम ॥अंग 546
- सुनहु बेनंतीआ सुआमी मेरे राम ॥अंग 547
- बोलि सुधरमीड़िआ मोनि कत धारी राम ॥अंग 547
- हरि नामु न सिमरहि साधसंगि तै तनि उडै खेह ॥अंग 553
- घटि वसहि चरणारबिंद रसना जपै गुपाल ॥अंग 554
वडहंस (19)
- अति ऊचा ता का दरबारा ॥अंग 562
- धनु सु वेला जितु दरसनु करणा ॥अंग 562
- तू बेअंतु को विरला जाणै ॥अंग 562
- अंतरजामी सो प्रभु पूरा ॥अंग 563
- तू वड दाता अंतरजामी ॥अंग 563
- साधसंगि हरि अंम्रितु पीजै ॥अंग 563
- विसरु नाही प्रभ दीन दइआला ॥अंग 563
- तू जाणाइहि ता कोई जाणै ॥अंग 563
- मेरै अंतरि लोचा मिलण की पिआरे हउ किउ पाई गुर पूरे ॥अंग 564
- गुर मिलि लधा जी रामु पिआरा राम ॥अंग 576
- किआ सुणेदो कूड़ु वंञनि पवण झुलारिआ ॥अंग 577
- तिन घोलि घुमाई जिन प्रभु स्रवणी सुणिआ राम ॥अंग 577
- लोइण लोई डिठ पिआस न बुझै मू घणी ॥अंग 577
- जिनी हरि प्रभु डिठा तिन कुरबाणे राम ॥अंग 577
- देह अंधारी अंध सुंञी नाम विहूणीआ ॥अंग 577
- तिन खंनीऐ वंञां जिन मेरा हरि प्रभु डीठा राम ॥अंग 577
- जो लोड़ीदे राम सेवक सेई कांढिआ ॥अंग 578
- मिलि जलु जलहि खटाना राम ॥अंग 578
- प्रभ करण कारण समरथा राम ॥अंग 578
सोरठ (96)
- किस हउ जाची किस आराधी जा सभु को कीता होसी ॥अंग 608
- गुरु गोविंदु सलाहीऐ भाई मनि तनि हिरदै धार ॥अंग 608
- जउ लउ भाउ अभाउ इहु मानै तउ लउ मिलणु दूराई ॥अंग 609
- पुत्र कलत्र लोक ग्रिह बनिता माइआ सनबंधेही ॥अंग 609
- गुरु पूरा भेटिओ वडभागी मनहि भइआ परगासा ॥अंग 609
- सुखीए कउ पेखै सभ सुखीआ रोगी कै भाणै सभ रोगी ॥अंग 610
- तनु संतन का धनु संतन का मनु संतन का कीआ ॥अंग 610
- जा कै हिरदै वसिआ तू करते ता की तैं आस पुजाई ॥अंग 610
- सगल समग्री मोहि विआपी कब ऊचे कब नीचे ॥अंग 610
- खोजत खोजत खोजि बीचारिओ राम नामु ततु सारा ॥अंग 611
- करि इसनानु सिमरि प्रभु अपना मन तन भए अरोगा ॥अंग 611
- एकु पिता एकस के हम बारिक तू मेरा गुर हाई ॥अंग 611
- कोटि ब्रहमंड को ठाकुरु सुआमी सरब जीआ का दाता रे ॥अंग 612
- जिना बात को बहुतु अंदेसरो ते मिटे सभि गइआ ॥अंग 612
- चरन कमल सिउ जा का मनु लीना से जन त्रिपति अघाई ॥अंग 612
- राजन महि राजा उरझाइओ मानन महि अभिमानी ॥अंग 613
- हम मैले तुम ऊजल करते हम निरगुन तू दाता ॥अंग 613
- मात गरभ महि आपन सिमरनु दे तह तुम राखनहारे ॥अंग 613
- हम संतन की रेनु पिआरे हम संतन की सरणा ॥अंग 614
- जेती समग्री देखहु रे नर तेती ही छडि जानी ॥अंग 614
- मिरतक कउ पाइओ तनि सासा बिछुरत आनि मिलाइआ ॥अंग 614
- रतनु छाडि कउडी संगि लागे जा ते कछू न पाईऐ ॥अंग 614
- गुण गावहु पूरन अबिनासी काम क्रोध बिखु जारे ॥अंग 615
- करण करावणहार प्रभु दाता पारब्रहम प्रभु सुआमी ॥अंग 615
- प्रभ की सरणि सगल भै लाथे दुख बिनसे सुखु पाइआ ॥अंग 615
- माइआ मोह मगनु अंधिआरै देवनहारु न जानै ॥अंग 616
- पारब्रहमु होआ सहाई कथा कीरतनु सुखदाई ॥अंग 616
- बिनसै मोहु मेरा अरु तेरा बिनसै अपनी धारी ॥1॥अंग 616
- सगल बनसपति महि बैसंतरु सगल दूध महि घीआ ॥अंग 617
- जा कै सिमरणि होइ अनंदा बिनसै जनम मरण भै दुखी ॥अंग 617
- काम क्रोध लोभ झूठ निंदा इन ते आपि छडावहु ॥अंग 617
- जा कै सिमरणि सभु कछु पाईऐ बिरथी घाल न जाई ॥अंग 617
- अबिनासी जीअन को दाता सिमरत सभ मलु खोई ॥अंग 617
- जनम जनम के दूख निवारै सूका मनु साधारै ॥अंग 618
- अंतर की गति तुम ही जानी तुझ ही पाहि निबेरो ॥अंग 618
- भए क्रिपाल गुरू गोविंदा सगल मनोरथ पाए ॥अंग 618
- गुर के चरन बसे रिद भीतरि सुभ लखण प्रभि कीने ॥अंग 618
- संचनि करउ नाम धनु निरमल थाती अगम अपार ॥अंग 618
- गुरि पूरै अपनी कल धारी सभ घट उपजी दइआ ॥अंग 618
- सूख मंगल कलिआण सहज धुनि प्रभ के चरण निहारिआ ॥अंग 619
- साधू संगि भइआ मनि उदमु नामु रतनु जसु गाई ॥अंग 619
- गए कलेस रोग सभि नासे प्रभि अपुनै किरपा धारी ॥अंग 619
- सिमरि सिमरि गुरु सतिगुरु अपना सगला दूखु मिटाइआ ॥अंग 619
- हमरी गणत न गणीआ काई अपणा बिरदु पछाणि ॥अंग 619
- दुरतु गवाइआ हरि प्रभि आपे सभु संसारु उबारिआ ॥अंग 620
- बखसिआ पारब्रहम परमेसरि सगले रोग बिदारे ॥अंग 620
- भए क्रिपाल सुआमी मेरे तितु साचै दरबारि ॥अंग 620
- संतहु हरि हरि नामु धिआई ॥अंग 620
- मेरा सतिगुरु रखवाला होआ ॥अंग 620
- जीअ जंत्र सभि तिस के कीए सोई संत सहाई ॥अंग 621
- मिलि पंचहु नही सहसा चुकाइआ ॥अंग 621
- हिरदै नामु वसाइहु ॥अंग 621
- गुरि पूरै किरपा धारी ॥अंग 621
- साहिबु गुनी गहेरा ॥अंग 622
- सूख सहज आनंदा ॥अंग 622
- ठाढि पाई करतारे ॥अंग 622
- विचि करता पुरखु खलोआ ॥अंग 623
- पारब्रहमि निबाही पूरी ॥अंग 623
- गुरि पूरै चरनी लाइआ ॥अंग 623
- गुरि पूरै कीती पूरी ॥अंग 624
- दह दिस छत्र मेघ घटा घट दामनि चमकि डराइओ ॥अंग 624
- गई बहोड़ु बंदी छोड़ु निरंकारु दुखदारी ॥अंग 624
- सिमरि सिमरि प्रभ भए अनंदा दुख कलेस सभि नाठे ॥अंग 625
- गुरु पूरा नमसकारे ॥अंग 625
- रामदास सरोवरि नाते ॥अंग 625
- जितु पारब्रहमु चिति आइआ ॥ सो घरु दयि वसाइआ ॥अंग 625
- आगै सुखु गुरि दीआ ॥अंग 626
- गुर का सबदु रखवारे ॥अंग 626
- गुर अपुने बलिहारी ॥अंग 626
- तापु गवाइआ गुरि पूरे ॥अंग 626
- सोई कराइ जो तुधु भावै ॥अंग 626
- हरि नामु रिदै परोइआ ॥अंग 627
- गुर मिलि प्रभू चितारिआ ॥अंग 627
- पारब्रहमि साजि सवारिआ ॥अंग 627
- सदा सदा हरि जापे ॥अंग 627
- अपना गुरू धिआए ॥अंग 627
- परमेसरि दिता बंना ॥अंग 627
- ऐथै ओथै रखवाला ॥अंग 628
- सतिगुर पूरे भाणा ॥अंग 628
- गरीबी गदा हमारी ॥अंग 628
- गुरि पूरै पूरी कीनी ॥अंग 628
- भूखे खावत लाज न आवै ॥अंग 629
- सुख सांदि घरि आइआ ॥अंग 629
- प्रभु अपुना रिदै धिआए ॥अंग 629
- हरि मनि तनि वसिआ सोई ॥अंग 629
- आगै सुखु मेरे मीता ॥अंग 629
- नालि नराइणु मेरै ॥अंग 630
- सरब सुखा का दाता सतिगुरु ता की सरनी पाईऐ ॥अंग 630
- करन करावन हरि अंतरजामी जन अपुने की राखै ॥अंग 630
- भइओ किरपालु दीन दुख भंजनु आपे सभ बिधि थाटी ॥अंग 630
- सिमरउ अपुना सांई ॥अंग 630
- सुनहु बिनंती ठाकुर मेरे जीअ जंत तेरे धारे ॥अंग 631
- जीअ जंत सभि वसि करि दीने सेवक सभि दरबारे ॥अंग 631
- सभु जगु जिनहि उपाइआ भाई करण कारण समरथु ॥अंग 639
- मात गरभ दुख सागरो पिआरे तह अपणा नामु जपाइआ ॥अंग 640
- पाठु पड़िओ अरु बेदु बीचारिओ निवलि भुअंगम साधे ॥अंग 641
धनासरी (60)
- भव खंडन दुख भंजन स्वामी भगति वछल निरंकारे ॥अंग 670
- बिनु जल प्रान तजे है मीना जिनि जल सिउ हेतु बढाइओ ॥अंग 670
- करि किरपा दीओ मोहि नामा बंधन ते छुटकाए ॥अंग 671
- जब ते दरसन भेटे साधू भले दिनस ओइ आए ॥अंग 671
- जिस का तनु मनु धनु सभु तिस का सोई सुघड़ु सुजानी ॥अंग 671
- वडे वडे राजन अरु भूमन ता की त्रिसन न बूझी ॥अंग 672
- लवै न लागन कउ है कछूऐ जा कउ फिरि इहु धावै ॥अंग 672
- बारि जाउ गुर अपुने ऊपरि जिनि हरि हरि नामु द्रिड़॑ाया ॥अंग 672
- जिह करणी होवहि सरमिंदा इहा कमानी रीति ॥अंग 673
- पानी पखा पीसउ संत आगै गुण गोविंद जसु गाई ॥अंग 673
- जिनि कीने वसि अपुनै त्रै गुण भवण चतुर संसारा ॥अंग 673
- तुम दाते ठाकुर प्रतिपालक नाइक खसम हमारे ॥अंग 673
- पूजा वरत तिलक इसनाना पुंन दान बहु दैन ॥अंग 674
- बंधन ते छुटकावै प्रभू मिलावै हरि हरि नामु सुनावै ॥अंग 674
- हरि हरि लीने संत उबारि ॥अंग 674
- अब हरि राखनहारु चितारिआ ॥अंग 674
- मेरा लागो राम सिउ हेतु ॥अंग 675
- अउखधु तेरो नामु दइआल ॥अंग 675
- हा हा प्रभ राखि लेहु ॥अंग 675
- दीन दरद निवारि ठाकुर राखै जन की आपि ॥अंग 675
- फिरत फिरत भेटे जन साधू पूरै गुरि समझाइआ ॥अंग 676
- छोडि जाहि से करहि पराल ॥अंग 676
- मोहि मसकीन प्रभु नामु अधारु ॥अंग 676
- सो कत डरै जि खसमु सम॑ारै ॥अंग 677
- घरि बाहरि तेरा भरवासा तू जन कै है संगि ॥अंग 677
- सगल मनोरथ प्रभ ते पाए कंठि लाइ गुरि राखे ॥अंग 677
- जह जह पेखउ तह हजूरि दूरि कतहु न जाई ॥अंग 677
- जिनि तुम भेजे तिनहि बुलाए सुख सहज सेती घरि आउ ॥अंग 678
- तिसु सिउ न लाईऐ हीतु जा को किछु नाही बीतु अंत की बार ओहु संगि न चालै ॥अंग 678
- मेरे लाल भलो रे भलो रे भलो हरि मंगना ॥अंग 678
- हरि एकु सिमरि एकु सिमरि एकु सिमरि पिआरे ॥अंग 679
- सिमरउ सिमरि सिमरि सुख पावउ सासि सासि समाले ॥अंग 679
- भए क्रिपाल दइआल गोबिंदा अंम्रितु रिदै सिंचाई ॥अंग 679
- दरबवंतु दरबु देखि गरबै भूमवंतु अभिमानी ॥अंग 679
- जा कउ हरि रंगु लागो इसु जुग महि सो कहीअत है सूरा ॥अंग 679
- जतन करै मानुख डहकावै ओहु अंतरजामी जानै ॥अंग 680
- नामु गुरि दीओ है अपुनै जा कै मसतकि करमा ॥अंग 680
- नेत्र पुनीत भए दरस पेखे माथै परउ रवाल ॥अंग 680
- अपनी उकति खलावै भोजन अपनी उकति खेलावै ॥अंग 680
- संत क्रिपाल दइआल दमोदर काम क्रोध बिखु जारे ॥अंग 680
- छडाइ लीओ महा बली ते अपने चरन पराति ॥अंग 681
- पर हरना लोभु झूठ निंद इव ही करत गुदारी ॥अंग 681
- सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपना सीतल तनु मनु छाती ॥अंग 681
- दूत दुसमन सभि तुझ ते निवरहि प्रगट प्रतापु तुमारा ॥अंग 681
- चतुर दिसा कीनो बलु अपना सिर ऊपरि करु धारिओ ॥अंग 681
- अउखी घड़ी न देखण देई अपना बिरदु समाले ॥अंग 682
- जिस कउ बिसरै प्रानपति दाता सोई गनहु अभागा ॥अंग 682
- जन के पूरन होए काम ॥अंग 682
- मांगउ राम ते इकु दानु ॥अंग 682
- मांगउ राम ते सभि थोक ॥अंग 682
- त्रिसना बुझै हरि कै नामि ॥अंग 682
- जन की कीनी पारब्रहमि सार ॥अंग 683
- हरि चरन सरन गोबिंद दुख भंजना दास अपुने कउ नामु देवहु ॥अंग 683
- हलति सुखु पलति सुखु नित सुखु सिमरनो नामु गोबिंद का सदा लीजै ॥अंग 683
- बंदना हरि बंदना गुण गावहु गोपाल राइ ॥ रहाउ ॥अंग 683
- त्रिपति भई सचु भोजनु खाइआ ॥अंग 684
- गुर के चरन जीअ का निसतारा ॥अंग 684
- कितै प्रकारि न तूटउ प्रीति ॥ दास तेरे की निरमल रीति ॥1॥ रहाउ ॥अंग 684
- जो जो जूनी आइओ तिह तिह उरझाइओ माणस जनमु संजोगि पाइआ ॥अंग 686
- भजु संगि साधू इकु अराधू जनम मरन दुख नासए ॥अंग 691
जैतसरी (64)
- कोई जानै कवनु ईहा जगि मीतु ॥अंग 700
- देहु संदेसरो कहीअउ प्रिअ कहीअउ ॥अंग 700
- धीरउ सुनि धीरउ प्रभ कउ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 700
- लोड़ीदड़ा साजनु मेरा ॥अंग 700
- अब मै सुखु पाइओ गुर आग्यि ॥अंग 701
- मन महि सतिगुर धिआनु धरा ॥अंग 701
- जा कउ भए गोविंद सहाई ॥अंग 701
- गोबिंद जीवन प्रान धन रूप ॥अंग 701
- कोई जनु हरि सिउ देवै जोरि ॥अंग 701
- चात्रिक चितवत बरसत मेंह ॥अंग 702
- मनि तनि बसि रहे मेरे प्रान ॥अंग 702
- आए अनिक जनम भ्रमि सरणी ॥अंग 702
- हरि जन सिमरहु हिरदै राम ॥अंग 702
- दरसन पिआसी दिनसु राति चितवउ अनदिनु नीत ॥अंग 703
- सुणि यार हमारे सजण इक करउ बेनंतीआ ॥अंग 703
- ऊचा अगम अपार प्रभु कथनु न जाइ अकथु ॥अंग 704
- जिउ जानहु तिउ राखु हरि प्रभ तेरिआ ॥अंग 704
- निरति न पवै असंख गुण ऊचा प्रभ का नाउ ॥अंग 704
- दूसर नाही ठाउ का पहि जाईऐ ॥अंग 704
- रे मन ता कउ धिआईऐ सभ बिधि जा कै हाथि ॥अंग 704
- साथीअड़ा प्रभु एकु दूसर नाहि कोइ ॥अंग 704
- चिति जि चितविआ सो मै पाइआ ॥अंग 705
- अब मनु छूटि गइआ साधू संगि मिले ॥अंग 705
- पाधाणू संसारु गारबि अटिआ ॥अंग 705
- आदि पूरन मधि पूरन अंति पूरन परमेसुरह ॥अंग 705
- हरि एकु निरंजनु गाईऐ सभ अंतरि सोई ॥अंग 706
- रचंति जीअ रचना मात गरभ असथापनं ॥अंग 706
- रकतु बिंदु करि निंमिआ अगनि उदर मझारि ॥अंग 706
- मन इछा दान करणं सरबत्र आसा पूरनह ॥अंग 706
- ग्रिह मंदर रथ असु दीए रचि भले संजोग ॥अंग 706
- कुटंब जतन करणं माइआ अनेक उदमह ॥अंग 706
- जिसु बिसरत तनु भसम होइ कहते सभि प्रेतु ॥अंग 706
- कोटि दान इसनानं अनिक सोधन पवित्रतह ॥अंग 706
- कोटि अघा सभि नास होहि सिमरत हरि नाउ ॥अंग 707
- ग्रिह रचना अपारं मनि बिलास सुआदं रसह ॥अंग 707
- सुंदर सेज अनेक सुख रस भोगण पूरे ॥अंग 707
- चरन कमल बिरहं खोजंत बैरागी दह दिसह ॥अंग 707
- बसता तूटी झुंपड़ी चीर सभि छिंना ॥अंग 707
- अनिक लीला राज रस रूपं छत्र चमर तखत आसनं ॥अंग 707
- सुपने सेती चितु मूरखि लाइआ ॥अंग 707
- बसंति स्वरग लोकह जितते प्रिथवी नव खंडणह ॥अंग 707
- महा भइआन उदिआन नगर करि मानिआ ॥अंग 707
- राज कपटं रूप कपटं धन कपटं कुल गरबतह ॥अंग 708
- चलदिआ नालि न चलै सो किउ संजीऐ ॥अंग 708
- नच राज सुख मिसटं नच भोग रस मिसटं नच मिसटं सुख माइआ ॥अंग 708
- हरि बिनु कछू न लागई भगतन कउ मीठा ॥अंग 708
- तिअकत जलं नह जीव मीनं नह तिआगि चात्रिक मेघ मंडलह ॥अंग 708
- जिउ मछुली बिनु पाणीऐ किउ जीवणु पावै ॥अंग 708
- चितवंति चरन कमलं सासि सासि अराधनह ॥अंग 708
- आसावंती आस गुसाई पूरीऐ ॥अंग 708
- रसना उचरंति नामं स्रवणं सुनंति सबद अंम्रितह ॥अंग 709
- सद बलिहारी तिना जि सुनते हरि कथा ॥अंग 709
- भावी उदोत करणं हरि रमणं संजोग पूरनह ॥अंग 709
- सा वेला कहु कउणु है जितु प्रभ कउ पाई ॥अंग 709
- पतित पुनीत गोबिंदह सरब दोख निवारणह ॥अंग 709
- मेलि लैहु दइआल ढहि पए दुआरिआ ॥अंग 709
- संत उधरण दइआलं आसरं गोपाल कीरतनह ॥अंग 709
- चरन कमल की ओट उधरे सगल जन ॥अंग 709
- दइआ करणं दुख हरणं उचरणं नाम कीरतनह ॥अंग 709
- जा प्रभ भए दइआल न बिआपै माइआ ॥अंग 710
- गुर गोबिंद गोपाल गुर गुर पूरन नाराइणह ॥अंग 710
- धंनु धंनु गुरदेव जिसु संगि हरि जपे ॥अंग 710
- द्रिसटंत एको सुनीअंत एको वरतंत एको नरहरह ॥अंग 710
- प्रभ दइआल बेअंत पूरन इकु एहु ॥अंग 710
टोडी (30)
- संतन अवर न काहू जानी ॥अंग 711
- हरि बिसरत सदा खुआरी ॥अंग 711
- धाइओ रे मन दह दिस धाइओ ॥अंग 712
- मानुखु बिनु बूझे बिरथा आइआ ॥अंग 712
- क्रिपा निधि बसहु रिदै हरि नीत ॥अंग 712
- मागउ दानु ठाकुर नाम ॥अंग 713
- प्रभ जी को नामु मनहि साधारै ॥अंग 713
- नीके गुण गाउ मिटही रोग ॥अंग 713
- सतिगुर आइओ सरणि तुहारी ॥अंग 713
- रसना गुण गोपाल निधि गाइण ॥अंग 713
- निंदकु गुर किरपा ते हाटिओ ॥अंग 714
- किरपन तन मन किलविख भरे ॥अंग 714
- हरि के चरन कमल मनि धिआउ ॥अंग 714
- हरि हरि नामु सदा सद जापि ॥अंग 714
- स्वामी सरनि परिओ दरबारे ॥अंग 714
- हां हां लपटिओ रे मूड़॑े कछू न थोरी ॥अंग 715
- हमारै एकै हरी हरी ॥अंग 715
- रूड़ो मनु हरि रंगो लोड़ै ॥अंग 715
- गरबि गहिलड़ो मूड़ड़ो हीओ रे ॥अंग 715
- ऐसो गुनु मेरो प्रभ जी कीन ॥अंग 716
- माई मेरे मन की प्रीति ॥अंग 716
- प्रभ जी मिलु मेरे प्रान ॥अंग 716
- प्रभ तेरे पग की धूरि ॥अंग 716
- माई मेरे मन की पिआस ॥अंग 716
- हरि हरि पतित पावन ॥अंग 717
- माई माइआ छलु ॥अंग 717
- माई चरन गुर मीठे ॥अंग 717
- साधसंगि हरि हरि नामु चितारा ॥अंग 717
- माई मेरे मन को सुखु ॥अंग 717
- हरि हरि चरन रिदै उर धारे ॥अंग 718
बैराड़ी (1)
- संत जना मिलि हरि जसु गाइओ ॥अंग 720
तिलंग (5)
- खाक नूर करदं आलम दुनीआइ ॥अंग 723
- तुधु बिनु दूजा नाही कोइ ॥अंग 723
- मिहरवानु साहिबु मिहरवानु ॥अंग 724
- करते कुदरती मुसताकु ॥अंग 724
- मीरां दानां दिल सोच ॥अंग 724
सूही (71)
- बाजीगरि जैसे बाजी पाई ॥अंग 736
- कीता लोड़हि सो प्रभ होइ ॥अंग 736
- धनु सोहागनि जो प्रभू पछानै ॥अंग 737
- ग्रिहु वसि गुरि कीना हउ घर की नारि ॥अंग 737
- उमकिओ हीउ मिलन प्रभ ताई ॥अंग 737
- किआ गुण तेरे सारि सम॑ाली मोहि निरगुन के दातारे ॥अंग 738
- सेवा थोरी मागनु बहुता ॥अंग 738
- बुरे काम कउ ऊठि खलोइआ ॥अंग 738
- घर महि ठाकुरु नदरि न आवै ॥अंग 739
- लालनु राविआ कवन गती री ॥अंग 739
- तूं जीवनु तूं प्रान अधारा ॥अंग 739
- सूख महल जा के ऊच दुआरे ॥अंग 739
- जा कै दरसि पाप कोटि उतारे ॥अंग 739
- रहणु न पावहि सुरि नर देवा ॥अंग 740
- घट घट अंतरि तुमहि बसारे ॥अंग 740
- कवन काज माइआ वडिआई ॥अंग 740
- सिमरि सिमरि ता कउ हउ जीवा ॥अंग 740
- गुर कै बचनि रिदै धिआनु धारी ॥अंग 740
- लोभि मोहि मगन अपराधी ॥अंग 740
- पेखत चाखत कहीअत अंधा सुनीअत सुनीऐ नाही ॥अंग 741
- जीवत मरै बुझै प्रभु सोइ ॥अंग 741
- गुरु परमेसरु करणैहारु ॥अंग 741
- गुर अपुने ऊपरि बलि जाईऐ ॥अंग 741
- दरसनु देखि जीवा गुर तेरा ॥अंग 742
- मीतु साजनु सुत बंधप भाई ॥अंग 742
- गुण गोपाल प्रभ के नित गाहा ॥अंग 742
- बैकुंठ नगरु जहा संत वासा ॥अंग 742
- अनिक बींग दास के परहरिआ ॥अंग 742
- दीनु छडाइ दुनी जो लाए ॥अंग 743
- प्रातहकालि हरि नामु उचारी ॥अंग 743
- गुर पूरे जब भए दइआल ॥अंग 743
- से संजोग करहु मेरे पिआरे ॥अंग 743
- बहती जात कदे द्रिसटि न धारत ॥अंग 743
- साधसंगि तरै भै सागरु ॥अंग 744
- घर का काजु न जाणी रूड़ा ॥अंग 744
- संत प्रसादि निहचलु घरु पाइआ ॥अंग 744
- जो जो जपै तिस की गति होवै हरि हरि नामु नित रसन बखानी ॥1॥ रहाउ ॥अंग 744
- गोबिंदा गुण गाउ दइआला ॥अंग 744
- तिसु बिनु दूजा अवरु न कोई ॥अंग 744
- दरसन कउ लोचै सभु कोई ॥अंग 745
- भली सुहावी छापरी जा महि गुन गाए ॥अंग 745
- हरि का संतु परान धन तिस का पनिहारा ॥अंग 745
- जिनि मोहे ब्रहमंड खंड ताहू महि पाउ ॥अंग 745
- प्रीति प्रीति गुरीआ मोहन लालना ॥अंग 746
- रासि मंडलु कीनो आखारा ॥अंग 746
- तउ मै आइआ सरनी आइआ ॥अंग 746
- सतिगुर पासि बेनंतीआ मिलै नामु आधारा ॥अंग 746
- तेरा भाणा तूहै मनाइहि जिस नो होहि दइआला ॥अंग 747
- विसरहि नाही जितु तू कबहू सो थानु तेरा केहा ॥अंग 747
- करम धरम पाखंड जो दीसहि तिन जमु जागाती लूटै ॥अंग 747
- जो किछु करै सोई प्रभ मानहि ओइ राम नाम रंगि राते ॥अंग 748
- महा अगनि ते तुधु हाथ दे राखे पए तेरी सरणाई ॥अंग 748
- जब कछु न सीओ तब किआ करता कवन करम करि आइआ ॥अंग 748
- पारब्रहम परमेसर सतिगुर आपे करणैहारा ॥अंग 749
- तुधु चिति आए महा अनंदा जिसु विसरहि सो मरि जाए ॥अंग 749
- जिस के सिर ऊपरि तूं सुआमी सो दुखु कैसा पावै ॥अंग 749
- सगल तिआगि गुर सरणी आइआ राखहु राखनहारे ॥अंग 750
- उरझि रहिओ बिखिआ कै संगा ॥अंग 759
- मिथन मोह अगनि सोक सागर ॥अंग 760
- जे भुली जे चुकी साइंी भी तहिंजी काढीआ ॥अंग 761
- सिम्रिति बेद पुराण पुकारनि पोथीआ ॥अंग 761
- सुणि बावरे तू काए देखि भुलाना ॥अंग 777
- गोबिंद गुण गावण लागे ॥अंग 778
- तू ठाकुरो बैरागरो मै जेही घण चेरी राम ॥अंग 779
- साजनु पुरखु सतिगुरु मेरा पूरा तिसु बिनु अवरु न जाणा राम ॥अंग 780
- करि किरपा मेरे प्रीतम सुआमी नेत्र देखहि दरसु तेरा राम ॥अंग 780
- हरि जपे हरि मंदरु साजिआ संत भगत गुण गावहि राम ॥अंग 781
- भै सागरो भै सागरु तरिआ हरि हरि नामु धिआए राम ॥अंग 782
- अबिचल नगरु गोबिंद गुरू का नामु जपत सुखु पाइआ राम ॥अंग 783
- संता के कारजि आपि खलोइआ हरि कंमु करावणि आइआ राम ॥अंग 783
- मिठ बोलड़ा जी हरि सजणु सुआमी मोरा ॥अंग 784
बिलावल (136)
- नदरी आवै तिसु सिउ मोहु ॥अंग 801
- सरब कलिआण कीए गुरदेव ॥अंग 801
- सुख निधान प्रीतम प्रभ मेरे ॥अंग 801
- मै मनि तेरी टेक मेरे पिआरे मै मनि तेरी टेक ॥अंग 802
- बिखै बनु फीका तिआगि री सखीए नामु महा रसु पीओ ॥अंग 802
- एक रूप सगलो पासारा ॥अंग 803
- आपि उपावन आपि सधरना ॥अंग 803
- भूले मारगु जिनहि बताइआ ॥अंग 803
- तनु मनु धनु अरपउ सभु अपना ॥अंग 804
- मात पिता सुत साथि न माइआ ॥अंग 804
- गुरु पूरा वडभागी पाईऐ ॥अंग 804
- गुर का सबदु रिदे महि चीना ॥अंग 804
- सगल मनोरथ पाईअहि मीता ॥अंग 804
- मोहि निरगुन सभ गुणह बिहूना ॥अंग 805
- कवनु जानै प्रभ तुम॑री सेवा ॥अंग 805
- मात गरभ महि हाथ दे राखिआ ॥अंग 805
- मात पिता सुत बंधप भाई ॥अंग 805
- स्रब निधान पूरन गुरदेव ॥1॥ रहाउ ॥अंग 806
- कवन संजोग मिलउ प्रभ अपने ॥अंग 806
- चरन कमल प्रभ हिरदै धिआए ॥अंग 806
- सांति पाई गुरि सतिगुरि पूरे ॥अंग 806
- ममता मोह ध्रोह मदि माता बंधनि बाधिआ अति बिकराल ॥अंग 806
- सगल अनंदु कीआ परमेसरि अपणा बिरदु सम॑ारिआ ॥अंग 806
- जिसु ऊपरि होवत दइआलु ॥अंग 807
- मन महि सिंचहु हरि हरि नाम ॥अंग 807
- रोगु गइआ प्रभि आपि गवाइआ ॥अंग 807
- सतिगुर करि दीने असथिर घर बार ॥ रहाउ ॥अंग 807
- ताप संताप सगले गए बिनसे ते रोग ॥अंग 807
- काहू संगि न चालही माइआ जंजाल ॥अंग 807
- सहज समाधि अनंद सूख पूरे गुरि दीन ॥अंग 807
- म्रित मंडल जगु साजिआ जिउ बालू घर बार ॥अंग 808
- लोकन कीआ वडिआईआ बैसंतरि पागउ ॥अंग 808
- लाल रंगु तिस कउ लगा जिस के वडभागा ॥अंग 808
- राखहु अपनी सरणि प्रभ मोहि किरपा धारे ॥अंग 809
- दोसु न काहू दीजीऐ प्रभु अपना धिआईऐ ॥अंग 809
- मिरतु हसै सिर ऊपरे पसूआ नही बूझै ॥अंग 809
- पिंगुल परबत पारि परे खल चतुर बकीता ॥अंग 809
- अहंबुधि परबाद नीत लोभ रसना सादि ॥अंग 810
- चरन भए संत बोहिथा तरे सागरु जेत ॥अंग 810
- बिनु साधू जो जीवना तेतो बिरथारी ॥अंग 810
- टहल करउ तेरे दास की पग झारउ बाल ॥अंग 810
- कीता लोड़हि सो करहि तुझ बिनु कछु नाहि ॥अंग 811
- साधसंगति कै बासबै कलमल सभि नसना ॥अंग 811
- पाणी पखा पीसु दास कै तब होहि निहालु ॥अंग 811
- स्रवनी सुनउ हरि हरि हरे ठाकुर जसु गावउ ॥अंग 812
- अटल बचन साधू जना सभ महि प्रगटाइआ ॥अंग 812
- माटी ते जिनि साजिआ करि दुरलभ देह ॥अंग 812
- एक टेक गोविंद की तिआगी अन आस ॥अंग 812
- महा तपति ते भई सांति परसत पाप नाठे ॥अंग 813
- सोई मलीनु दीनु हीनु जिसु प्रभु बिसराना ॥अंग 813
- जलु ढोवउ इह सीस करि कर पग पखलावउ ॥अंग 813
- इहु सागरु सोई तरै जो हरि गुण गाए ॥अंग 813
- बंधन काटे आपि प्रभि होआ किरपाल ॥अंग 814
- भै ते उपजै भगति प्रभ अंतरि होइ सांति ॥अंग 814
- त्रिसन बुझी ममता गई नाठे भै भरमा ॥अंग 814
- हरि भगता का आसरा अन नाही ठाउ ॥अंग 815
- बंधन काटै सो प्रभू जा कै कल हाथ ॥अंग 815
- कवनु कवनु नही पतरिआ तुम॑री परतीति ॥अंग 815
- उदमु करत आनदु भइआ सिमरत सुख सारु ॥अंग 815
- जिनि तू बंधि करि छोडिआ फुनि सुख महि पाइआ ॥अंग 816
- खोजत खोजत मै फिरा खोजउ बन थान ॥अंग 816
- जीअ जंत सुप्रसंन भए देखि प्रभ परताप ॥अंग 816
- सिमरि सिमरि पूरन प्रभू कारज भए रासि ॥अंग 816
- हरि हरि हरि आराधीऐ होईऐ आरोग ॥अंग 817
- अवरि उपाव सभि तिआगिआ दारू नामु लइआ ॥अंग 817
- करु धरि मसतकि थापिआ नामु दीनो दानि ॥अंग 817
- चरण कमल का आसरा दीनो प्रभि आपि ॥अंग 817
- मनि तनि प्रभु आराधीऐ मिलि साध समागै ॥अंग 817
- जीअ जुगति वसि प्रभू कै जो कहै सु करना ॥अंग 818
- सिमरि सिमरि प्रभु आपना नाठा दुख ठाउ ॥अंग 818
- दास तेरे की बेनती रिद करि परगासु ॥अंग 818
- सरब सिधि हरि गाईऐ सभि भला मनावहि ॥अंग 818
- अरदासि सुणी दातारि प्रभि होए किरपाल ॥अंग 818
- मीत हमारे साजना राखे गोविंद ॥अंग 818
- गुरु पूरा आराधिआ होए किरपाल ॥अंग 819
- धरति सुहावी सफल थानु पूरन भए काम ॥अंग 819
- रोगु मिटाइआ आपि प्रभि उपजिआ सुखु सांति ॥अंग 819
- मरि मरि जनमे जिन बिसरिआ जीवन का दाता ॥अंग 819
- ताती वाउ न लगई पारब्रहम सरणाई ॥अंग 819
- अपणे बालक आपि रखिअनु पारब्रहम गुरदेव ॥अंग 819
- मेरे मोहन स्रवनी इह न सुनाए ॥ साकत गीत नाद धुनि गावत बोलत बोल अजाए ॥1॥ रहाउ ॥अंग 820
- प्रभ जी तू मेरे प्रान अधारै ॥अंग 820
- सुनीअत प्रभ तउ सगल उधारन ॥अंग 820
- संतन कै सुनीअत प्रभ की बात ॥अंग 820
- राखि लीए अपने जन आप ॥अंग 821
- तापु लाहिआ गुर सिरजनहारि ॥अंग 821
- सतिगुर सबदि उजारो दीपा ॥अंग 821
- बिनु हरि कामि न आवत हे ॥अंग 821
- हरि हरि नामु अपार अमोली ॥अंग 822
- गोबिंद गोबिंद गोबिंद मई ॥अंग 822
- किआ हम जीअ जंत बेचारे बरनि न साकह एक रोमाई ॥अंग 822
- अगम रूप अबिनासी करता पतित पवित इक निमख जपाईऐ ॥अंग 822
- संत सरणि संत टहल करी ॥अंग 822
- मन किआ कहता हउ किआ कहता ॥अंग 823
- निंदकु ऐसे ही झरि परीऐ ॥अंग 823
- ऐसे काहे भूलि परे ॥अंग 823
- मन तन रसना हरि चीन॑ा ॥अंग 823
- गुरि पूरै मेरी राखि लई ॥अंग 823
- सदा सदा जपीऐ प्रभ नाम ॥अंग 824
- मन तन अंतरि प्रभु आही ॥अंग 824
- धीरउ देखि तुम॑ारै रंगा ॥अंग 824
- अचुत पूजा जोग गोपाल ॥अंग 824
- सिमरत नामु कोटि जतन भए ॥अंग 824
- सुलही ते नाराइण राखु ॥अंग 825
- पूरे गुर की पूरी सेव ॥अंग 825
- ताप पाप ते राखे आप ॥अंग 825
- जिस ते उपजिआ तिसहि पछानु ॥अंग 825
- दोवै थाव रखे गुर सूरे ॥अंग 825
- दरसनु देखत दोख नसे ॥अंग 826
- तनु धनु जोबनु चलत गइआ ॥अंग 826
- आपना प्रभु आइआ चीति ॥अंग 826
- गोबिदु सिमरि होआ कलिआणु ॥अंग 826
- पारब्रहम प्रभ भए क्रिपाल ॥अंग 826
- मू लालन सिउ प्रीति बनी ॥ रहाउ ॥अंग 827
- हरि के चरन जपि जांउ कुरबानु ॥अंग 827
- राखि लीए सतिगुर की सरण ॥अंग 827
- मै नाही प्रभ सभु किछु तेरा ॥अंग 827
- ऐसी किरपा मोहि करहु ॥अंग 828
- ऐसी दीखिआ जन सिउ मंगा ॥अंग 828
- जिउ भावै तिउ मोहि प्रतिपाल ॥अंग 828
- राखु सदा प्रभ अपनै साथ ॥अंग 828
- अपने सेवक कउ कबहु न बिसारहु ॥अंग 829
- आगै पाछै कुसलु भइआ ॥अंग 829
- बिनु भै भगती तरनु कैसे ॥अंग 829
- आपहि मेलि लए ॥अंग 829
- जीवउ नामु सुनी ॥अंग 829
- मोहन नीद न आवै हावै हार कजर बसत्र अभरन कीने ॥अंग 830
- मोरी अहं जाइ दरसन पावत हे ॥अंग 830
- उपमा जात न कही मेरे प्रभ की उपमा जात न कही ॥अंग 837
- प्रभ जनम मरन निवारि ॥अंग 837
- मंगल साजु भइआ प्रभु अपना गाइआ राम ॥अंग 845
- भाग सुलखणा हरि कंतु हमारा राम ॥अंग 846
- सखी आउ सखी वसि आउ सखी असी पिर का मंगलु गावह ॥अंग 847
- सुंदर सांति दइआल प्रभ सरब सुखा निधि पीउ ॥अंग 847
- सुख सागर प्रभु पाईऐ जब होवै भागो राम ॥अंग 848
- हरि खोजहु वडभागीहो मिलि साधू संगे राम ॥अंग 848
गोंड (22)
- सभु करता सभु भुगता ॥1॥ रहाउ ॥अंग 862
- फाकिओ मीन कपिक की निआई तू उरझि रहिओ कसुंभाइले ॥अंग 862
- जीअ प्रान कीए जिनि साजि ॥अंग 862
- नाम संगि कीनो बिउहारु ॥अंग 863
- निमाने कउ जो देतो मानु ॥अंग 863
- जा कै संगि इहु मनु निरमलु ॥अंग 863
- गुर की मूरति मन महि धिआनु ॥अंग 864
- गुरू गुरू गुरु करि मन मोर ॥अंग 864
- गुरु मेरी पूजा गुरु गोबिंदु ॥अंग 864
- राम राम संगि करि बिउहार ॥अंग 865
- उन कउ खसमि कीनी ठाकहारे ॥अंग 865
- कलि कलेस मिटे हरि नाइ ॥अंग 865
- धूप दीप सेवा गोपाल ॥अंग 866
- करि किरपा सुख अनद करेइ ॥अंग 866
- हरि हरि नामु जपहु मेरे मीत ॥अंग 866
- भव सागर बोहिथ हरि चरण ॥अंग 867
- संत का लीआ धरति बिदारउ ॥अंग 867
- नामु निरंजनु नीरि नराइण ॥अंग 867
- जा कउ राखै राखणहारु ॥अंग 868
- अचरज कथा महा अनूप ॥ प्रातमा पारब्रहम का रूपु ॥ रहाउ ॥अंग 868
- संतन कै बलिहारै जाउ ॥अंग 869
- करि नमसकार पूरे गुरदेव ॥अंग 869
रामकली (159)
- किरपा करहु दीन के दाते मेरा गुणु अवगणु न बीचारहु कोई ॥अंग 882
- पवहु चरणा तलि ऊपरि आवहु ऐसी सेव कमावहु ॥अंग 883
- आवत हरख न जावत दूखा नह बिआपै मन रोगनी ॥अंग 883
- त्रै गुण रहत रहै निरारी साधिक सिध न जानै ॥अंग 883
- अंगीकारु कीआ प्रभि अपनै बैरी सगले साधे ॥अंग 884
- तू दाना तू अबिचलु तूही तू जाति मेरी पाती ॥अंग 884
- कर करि ताल पखावजु नैनहु माथै वजहि रबाबा ॥अंग 884
- एका देसी एकु दिखावै एको रहिआ बिआपै ॥अंग 885
- कोई बोलै राम राम कोई खुदाइ ॥अंग 885
- पवनै महि पवनु समाइआ ॥अंग 885
- जपि गोबिंदु गोपाल लालु ॥अंग 885
- चारि पुकारहि ना तू मानहि ॥अंग 886
- तागा करि कै लाई थिगली ॥अंग 886
- करन करावन सोई ॥अंग 886
- सेवकु लाइओ अपुनी सेव ॥अंग 887
- तन ते छुटकी अपनी धारी ॥अंग 887
- मुख ते पड़ता टीका सहित ॥अंग 887
- कोटि बिघन नही आवहि नेरि ॥अंग 888
- दोसु न दीजै काहू लोग ॥अंग 888
- पंच सबद तह पूरन नाद ॥अंग 888
- भेटत संगि पारब्रहमु चिति आइआ ॥अंग 889
- तेरै काजि न ग्रिहु राजु मालु ॥अंग 889
- सिंचहि दरबु देहि दुखु लोग ॥अंग 889
- करि संजोगु बनाई काछि ॥अंग 890
- जो किछु करै सोई सुखु जाना ॥अंग 890
- कोटि जाप ताप बिस्राम ॥अंग 890
- बीज मंत्रु हरि कीरतनु गाउ ॥अंग 891
- संत कै संगि राम रंग केल ॥अंग 891
- गहु करि पकरी न आई हाथि ॥अंग 891
- आतम रामु सरब महि पेखु ॥अंग 892
- दीनो नामु कीओ पवितु ॥अंग 892
- कउडी बदलै तिआगै रतनु ॥अंग 892
- रैणि दिनसु जपउ हरि नाउ ॥अंग 893
- तेरी सरणि पूरे गुरदेव ॥अंग 893
- रतन जवेहर नाम ॥अंग 893
- महिमा न जानहि बेद ॥अंग 894
- किछहू काजु न कीओ जानि ॥अंग 894
- राखनहार दइआल ॥अंग 894
- सगल सिआनप छाडि ॥अंग 895
- होवै सोई भल मानु ॥अंग 895
- दुलभ देह सवारि ॥अंग 895
- जिस की तिस की करि मानु ॥अंग 896
- मन माहि जापि भगवंतु ॥अंग 896
- बिरथा भरवासा लोक ॥अंग 896
- कारन करन करीम ॥अंग 896
- कोटि जनम के बिनसे पाप ॥अंग 897
- दरसन कउ जाईऐ कुरबानु ॥अंग 897
- किसु भरवासै बिचरहि भवन ॥अंग 898
- इह लोके सुखु पाइआ ॥अंग 898
- गऊ कउ चारे सारदूलु ॥अंग 898
- ना तनु तेरा ना मनु तोहि ॥अंग 899
- राजा राम की सरणाइ ॥अंग 899
- इंीधन ते बैसंतरु भागै ॥अंग 900
- जो तिसु भावै सो थीआ ॥अंग 900
- ऐसा पूरा गुरदेउ सहाई ॥अंग 900
- गावहु राम के गुण गीत ॥अंग 901
- गुरु पूरा मेरा गुरु पूरा ॥अंग 901
- नरनरह नमसकारं ॥अंग 901
- रूप रंग सुगंध भोग तिआगि चले माइआ छले कनिक कामिनी ॥1॥ रहाउ ॥अंग 901
- किनही कीआ परविरति पसारा ॥अंग 912
- इसु पानी ते जिनि तू घरिआ ॥अंग 913
- काहू बिहावै रंग रस रूप ॥अंग 913
- दावा अगनि रहे हरि बूट ॥अंग 914
- जीअ जंत सभि पेखीअहि प्रभ सगल तुमारी धारना ॥1॥अंग 915
- दरसनु भेटत पाप सभि नासहि हरि सिउ देइ मिलाई ॥1॥अंग 915
- सिखहु सबदु पिआरिहो जनम मरन की टेक ॥अंग 916
- मन बच क्रमि राम नामु चितारी ॥अंग 916
- साजनड़ा मेरा साजनड़ा निकटि खलोइअड़ा मेरा साजनड़ा ॥अंग 924
- हरि हरि धिआइ मना खिनु न विसारीऐ ॥अंग 925
- रुण झुणो सबदु अनाहदु नित उठि गाईऐ संतन कै ॥अंग 925
- चरन कमल सरणागती अनद मंगल गुण गाम ॥अंग 926
- जलि थलि महीअलि पूरि रहिआ इक निमख मनहु न वीसरै ॥अंग 926
- हरि सिमरत मनु तनु सुखी बिनसी दुतीआ सोच ॥अंग 926
- प्रतिपाल अचुत पुरखु एको तिसहि सिउ रंगु लागा ॥अंग 926
- रसना उचरै हरि हरे गुण गोविंद वखिआन ॥अंग 926
- धरम अरथ अरु काम मोख मुकति पदारथ नाथ ॥अंग 927
- ग्रिहि लाल आए पुरबि कमाए ता की उपमा किआ गणा ॥अंग 927
- रण झुंझनड़ा गाउ सखी हरि एकु धिआवहु ॥अंग 927
- करि बंदन प्रभ पारब्रहम बाछउ साधह धूरि ॥अंग 927
- गुण रंगि राते धंनि ते जन जिनी इक मनि धिआइआ ॥अंग 927
- उदमु अगमु अगोचरो चरन कमल नमसकार ॥अंग 927
- घरि नाहु निहचलु अनदु सखीए चरन कमल प्रफुलिआ ॥अंग 927
- साधसंगति बिनु भ्रमि मुई करती करम अनेक ॥अंग 928
- नह द्रिसटि आवै मरत हावै महा गारबि मुठीआ ॥अंग 928
- सरधा लागी संगि प्रीतमै इकु तिलु रहणु न जाइ ॥अंग 928
- प्रभु पूरि रहिआ सरब ठाई हरि नाम नव निधि ग्रिह भरे ॥अंग 928
- आस पिआसी मै फिरउ कब पेखउ गोपाल ॥अंग 928
- बिनु कंत पिआरे नह सूख सारे हार कंङण ध्रिगु बना ॥अंग 928
- जलणि बुझी सीतल भए मनि तनि उपजी सांति ॥अंग 928
- सभि काम पूरे मिलि हजूरे हरि चरण सेवकि सेविआ ॥अंग 929
- हरि धनु पाइआ सोहागणी डोलत नाही चीत ॥अंग 929
- ग्रिहि लाल आए मनि धिआए सेज सुंदरि सोहीआ ॥अंग 929
- संत सहाई जीअ के भवजल तारणहार ॥अंग 929
- हरि रंगि राते सहजि माते तिलु न मन ते बीसरै ॥अंग 929
- जैसा सतिगुरु सुणीदा तैसो ही मै डीठु ॥अंग 957
- इकु सजणु सभि सजणा इकु वैरी सभि वादि ॥अंग 957
- थटणहारै थाटु आपे ही थटिआ ॥अंग 957
- सुणि सजण प्रीतम मेरिआ मै सतिगुरु देहु दिखालि ॥अंग 957
- मेरै अंतरि लोचा मिलण की किउ पावा प्रभ तोहि ॥अंग 957
- देवणहारु दातारु कितु मुखि सालाहीऐ ॥अंग 957
- भीड़हु मोकलाई कीतीअनु सभ रखे कुटंबै नालि ॥अंग 957
- विणु तुधु होरु जि मंगणा सिरि दुखा कै दुख ॥अंग 958
- सो ऐसा दातारु मनहु न वीसरै ॥अंग 958
- धंनु सु राग सुरंगड़े आलापत सभ तिख जाइ ॥अंग 958
- धंनु सु वेला घड़ी धंनु धनु मूरतु पलु सारु ॥अंग 958
- सिफति सलाहणु भगति विरले दितीअनु ॥अंग 958
- हरि इकसै नालि मै दोसती हरि इकसै नालि मै रंगु ॥अंग 958
- मनमुखा केरी दोसती माइआ का सनबंधु ॥अंग 959
- जो रते दीदार सेई सचु हाकु ॥अंग 959
- हरणाखी कू सचु वैणु सुणाई जो तउ करे उधारणु ॥अंग 959
- काहे मन तू डोलता हरि मनसा पूरणहारु ॥अंग 959
- जिसु तू आवहि चिति तिस नो सदा सुख ॥अंग 960
- अंदरहु अंना बाहरहु अंना कूड़ी कूड़ी गावै ॥अंग 960
- पंडितु आखाए बहुती राही कोरड़ मोठ जिनेहा ॥अंग 960
- जो तुधु भाणा जंतु सो तुधु बुझई ॥अंग 961
- करि किरपा किरपाल आपे बखसि लै ॥अंग 961
- एको जपीऐ मनै माहि इकस की सरणाइ ॥अंग 961
- जिस नो तू रखवाला मारे तिसु कउणु ॥अंग 961
- होहु क्रिपाल सुआमी मेरे संतां संगि विहावे ॥अंग 961
- सतिगुरु सिमरहु आपणा घटि अवघटि घट घाट ॥अंग 961
- दूजा तिसु न बुझाइहु पारब्रहम नामु देहु आधारु ॥अंग 962
- अनद सूख बिस्राम नित हरि का कीरतनु गाइ ॥अंग 962
- ना तू आवहि वसि बहुतु घिणावणे ॥अंग 962
- आपे वैदु आपि नाराइणु ॥अंग 962
- हुकमि उछलै हुकमे रहै ॥अंग 962
- हउ तिसु ढाढी कुरबाणु जि तेरा सेवदारु ॥अंग 962
- मनि तनि हिरदै सिमरि हरि आठ पहर गुण गाउ ॥अंग 963
- नानक नामु धिआईऐ गुरु पूरा मति देइ ॥अंग 963
- वडिआई सचे नाम की हउ जीवा सुणि सुणे ॥अंग 963
- मित्रु पिआरा नानक जी मै छडि गवाइआ रंगि कसुंभै भुली ॥अंग 963
- हभे भसु पुणेदे वतनु जा मै सजणु तूहै ॥2॥अंग 963
- जिसु तू वुठा चिति तिसु दरदु निवारणो ॥अंग 963
- उसतति निंदा नानक जी मै हभ वञाई छोड़िआ हभु किझु तिआगी ॥अंग 963
- ता हउ सुखि सुखाली सुती जा गुर मिलि सजणु मै लधा ॥2॥अंग 963
- सभे दुख संताप जां तुधहु भुलीऐ ॥अंग 964
- तैडी बंदसि मै कोइ न डिठा तू नानक मनि भाणा ॥अंग 964
- पाव सुहावे जां तउ धिरि जुलदे सीसु सुहावा चरणी ॥अंग 964
- मिलि नारी सतसंगि मंगलु गावीआ ॥अंग 964
- तउ जेवडु दातारु न कोई जाचकु सदा जाचोवै ॥1॥अंग 964
- हभे सुख सुहेलड़ा सुता जिता जगु सबाइआ ॥2॥अंग 964
- वडा तेरा दरबारु सचा तुधु तखतु ॥अंग 964
- सोइ सुणंदड़ी मेरा तनु मनु मउला नामु जपंदड़ी लाली ॥अंग 964
- हठ मंझाहू मै माणकु लधा ॥अंग 964
- जिस कै मसतकि करमु होइ सो सेवा लागा ॥अंग 964
- जां पिरु अंदरि तां धन बाहरि ॥अंग 965
- आहर सभि करदा फिरै आहरु इकु न होइ ॥अंग 965
- वडी हू वडा अपारु तेरा मरतबा ॥अंग 965
- छतड़े बाजार सोहनि विचि वपारीए ॥अंग 965
- कबीरा हमरा को नही हम किस हू के नाहि ॥अंग 965
- सफलिउ बिरखु सुहावड़ा हरि सफल अंम्रिता ॥अंग 965
- कबीर धरती साध की तसकर बैसहि गाहि ॥अंग 965
- कबीर चावल कारणे तुख कउ मुहली लाइ ॥अंग 965
- आपे ही वड परवारु आपि इकातीआ ॥अंग 965
- फरीदा भूमि रंगावली मंझि विसूला बागु ॥अंग 966
- फरीदा उमर सुहावड़ी संगि सुवंनड़ी देह ॥अंग 966
- जपु तपु संजमु दइआ धरमु जिसु देहि सु पाए ॥अंग 966
- मुहबति जिसु खुदाइ दी रता रंगि चलूलि ॥अंग 966
- अंदरु विधा सचि नाइ बाहरि भी सचु डिठोमि ॥अंग 966
- आपे कीतो रचनु आपे ही रतिआ ॥अंग 966
नट नारायण (10)
- राम हउ किआ जाना किआ भावै ॥अंग 978
- उलाहनो मै काहू न दीओ ॥अंग 978
- जा कउ भई तुमारी धीर ॥अंग 978
- अपना जनु आपहि आपि उधारिओ ॥अंग 979
- हरि हरि मन महि नामु कहिओ ॥अंग 979
- चरन कमल संगि लागी डोरी ॥अंग 979
- मेरे मन जपु जपि हरि नाराइण ॥अंग 979
- मेरै सरबसु नामु निधानु ॥अंग 979
- हउ वारि वारि जाउ गुर गोपाल ॥1॥ रहाउ ॥अंग 980
- कोऊ है मेरो साजनु मीतु ॥अंग 980
माली गउड़ा (8)
- छका 1 ॥अंग 986
- राम नाम कउ नमसकार ॥अंग 986
- ऐसो सहाई हरि को नाम ॥अंग 986
- इही हमारै सफल काज ॥अंग 987
- सभ कै संगी नाही दूरि ॥अंग 987
- हरि समरथ की सरना ॥अंग 987
- प्रभ समरथ देव अपार ॥अंग 988
- मनि तनि बसि रहे गोपाल ॥अंग 988
मारू (147)
- डरपै धरति अकासु नख्यत्रा सिर ऊपरि अमरु करारा ॥अंग 998
- पांच बरख को अनाथु ध्रू बारिकु हरि सिमरत अमर अटारे ॥अंग 999
- वित नवित भ्रमिओ बहु भाती अनिक जतन करि धाए ॥अंग 999
- कवन थान धीरिओ है नामा कवन बसतु अहंकारा ॥अंग 999
- मान मोह अरु लोभ विकारा बीओ चीति न घालिओ ॥अंग 1000
- खुलिआ करमु क्रिपा भई ठाकुर कीरतनु हरि हरि गाई ॥अंग 1000
- जो समरथु सरब गुण नाइकु तिस कउ कबहु न गावसि रे ॥अंग 1000
- अंतरजामी सभ बिधि जानै तिस ते कहा दुलारिओ ॥अंग 1000
- चरन कमल प्रभ राखे चीति ॥अंग 1001
- प्रान सुखदाता जीअ सुखदाता तुम काहे बिसारिओ अगिआनथ ॥अंग 1001
- गुपतु करता संगि सो प्रभु डहकावए मनुखाइ ॥अंग 1001
- बाहरि ढूढन ते छूटि परे गुरि घर ही माहि दिखाइआ था ॥अंग 1002
- जिसहि साजि निवाजिआ तिसहि सिउ रुच नाहि ॥अंग 1002
- फूटो आंडा भरम का मनहि भइओ परगासु ॥अंग 1002
- कोटि लाख सरब को राजा जिसु हिरदै नामु तुमारा ॥अंग 1003
- ओअंकारि उतपाती ॥अंग 1003
- मोहनी मोहि लीए त्रै गुनीआ ॥अंग 1004
- सिमरहु एकु निरंजन सोऊ ॥अंग 1004
- कत कउ डहकावहु लोगा मोहन दीन किरपाई ॥1॥अंग 1005
- मेरा ठाकुरु अति भारा ॥अंग 1005
- पतित उधारन तारन बलि बलि बले बलि जाईऐ ॥अंग 1005
- त्रिपति आघाए संता ॥अंग 1006
- छोडि सगल सिआणपा मिलि साध तिआगि गुमानु ॥अंग 1006
- जिनी नामु विसारिआ से होत देखे खेह ॥अंग 1006
- पुरखु पूरन सुखह दाता संगि बसतो नीत ॥अंग 1006
- चलत बैसत सोवत जागत गुर मंत्रु रिदै चितारि ॥अंग 1006
- तजि आपु बिनसी तापु रेण साधू थीउ ॥अंग 1007
- प्रतिपालि माता उदरि राखै लगनि देत न सेक ॥अंग 1007
- पतित पावन नामु जा को अनाथ को है नाथु ॥अंग 1007
- संजोगु विजोगु धुरहु ही हूआ ॥अंग 1007
- वैदो न वाई भैणो न भाई एको सहाई रामु हे ॥1॥अंग 1008
- लख चउरासीह भ्रमते भ्रमते दुलभ जनमु अब पाइओ ॥1॥अंग 1017
- करि अनुग्रहु राखि लीनो भइओ साधू संगु ॥अंग 1017
- ससत्रि तीखणि काटि डारिओ मनि न कीनो रोसु ॥अंग 1017
- आराधना अराधनु नीका हरि हरि नामु अराधना ॥2॥अंग 1018
- आउ जी तू आउ हमारै हरि जसु स्रवन सुनावना ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1018
- जीवना सफल जीवन सुनि हरि जपि जपि सद जीवना ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1019
- जिसु ग्रिहि बहुतु तिसै ग्रिहि चिंता ॥अंग 1019
- बिरखै हेठि सभि जंत इकठे ॥अंग 1019
- कला उपाइ धरी जिनि धरणा ॥अंग 1071
- संगी जोगी नारि लपटाणी ॥अंग 1072
- करै अनंदु अनंदी मेरा ॥अंग 1073
- गुरु गोपालु गुरु गोविंदा ॥अंग 1074
- आदि निरंजनु प्रभु निरंकारा ॥अंग 1075
- जो दीसै सो एको तूहै ॥अंग 1076
- सूरति देखि न भूलु गवारा ॥अंग 1077
- सिमरै धरती अरु आकासा ॥अंग 1078
- प्रभ समरथ सरब सुख दाना ॥अंग 1080
- तू साहिबु हउ सेवकु कीता ॥अंग 1081
- अचुत पारब्रहम परमेसुर अंतरजामी ॥अंग 1082
- अलह अगम खुदाई बंदे ॥अंग 1083
- पारब्रहम सभ ऊच बिराजे ॥अंग 1084
- चरन कमल हिरदै नित धारी ॥अंग 1085
- माइआ मनहु न वीसरै मांगै दंमा दंम ॥अंग 1093
- माइआ साथि न चलई किआ लपटावहि अंध ॥अंग 1093
- तू चउ सजण मैडिआ डेई सिसु उतारि ॥अंग 1094
- नीहु महिंजा तऊ नालि बिआ नेह कूड़ावे डेखु ॥अंग 1094
- उठी झालू कंतड़े हउ पसी तउ दीदारु ॥अंग 1094
- तू सचा साहिबु सचु सचु सभु धारिआ ॥अंग 1094
- जे तू मित्रु असाडड़ा हिक भोरी ना वेछोड़ि ॥अंग 1094
- दुरजन तू जलु भाहड़ी विछोड़े मरि जाहि ॥अंग 1094
- दुरजनु दूजा भाउ है वेछोड़ा हउमै रोगु ॥अंग 1094
- तू अगम दइआलु बेअंतु तेरी कीमति कहै कउणु ॥अंग 1094
- जे तू वतहि अंङणे हभ धरति सुहावी होइ ॥अंग 1095
- हभे टोल सुहावणे सहु बैठा अंङणु मलि ॥अंग 1095
- सेज विछाई कंत कू कीआ हभु सीगारु ॥अंग 1095
- तू पारब्रहमु परमेसरु जोनि न आवही ॥अंग 1095
- जा मू पसी हठ मै पिरी महिजै नालि ॥अंग 1095
- नानक बैठा भखे वाउ लंमे सेवहि दरु खड़ा ॥अंग 1095
- किआ गालाइओ भूछ पर वेलि न जोहे कंत तू ॥अंग 1095
- सुघड़ु सुजाणु सरूपु तू सभ महि वरतंता ॥अंग 1095
- कुरीए कुरीए वैदिआ तलि गाड़ा महरेरु ॥अंग 1095
- सचु जाणै कचु वैदिओ तू आघू आघे सलवे ॥अंग 1095
- भोरे भोरे रूहड़े सेवेदे आलकु ॥अंग 1095
- तुधु रूपु न रेखिआ जाति तू वरना बाहरा ॥अंग 1096
- गहडड़ड़ा त्रिणि छाइआ गाफल जलिओहु भाहि ॥अंग 1096
- नानक पीठा पका साजिआ धरिआ आणि मउजूदु ॥अंग 1096
- नानक भुसरीआ पकाईआ पाईआ थालै माहि ॥अंग 1096
- तुधु जग महि खेलु रचाइआ विचि हउमै पाईआ ॥अंग 1096
- आगाहा कू त्राघि पिछा फेरि न मुहडड़ा ॥अंग 1096
- सजणु मैडा चाईआ हभ कही दा मितु ॥अंग 1096
- गुझड़ा लधमु लालु मथै ही परगटु थिआ ॥अंग 1096
- जा तू मेरै वलि है ता किआ मुहछंदा ॥अंग 1096
- डेखण कू मुसताकु मुखु किजेहा तउ धणी ॥अंग 1096
- दुखीआ दरद घणे वेदन जाणे तू धणी ॥अंग 1097
- ढहदी जाइ करारि वहणि वहंदे मै डिठिआ ॥अंग 1097
- जिसु जन तेरी भुख है तिसु दुखु न विआपै ॥अंग 1097
- जिना पिछै हउ गई से मै पिछै भी रविआसु ॥अंग 1097
- गिली गिली रोडड़ी भउदी भवि भवि आइ ॥अंग 1097
- डिठा हभ मझाहि खाली कोइ न जाणीऐ ॥अंग 1097
- हउ ढाढी दरि गुण गावदा जे हरि प्रभ भावै ॥अंग 1097
- जा छुटे ता खाकु तू सुंञी कंतु न जाणही ॥अंग 1097
- नानक जिसु बिनु घड़ी न जीवणा विसरे सरै न बिंद ॥अंग 1097
- रते रंगि पारब्रहम कै मनु तनु अति गुलालु ॥अंग 1097
- जिनी ठगी जगु ठगिआ से तुधु मारि निवाड़ा ॥अंग 1097
- जा मूं आवहि चिति तू ता हभे सुख लहाउ ॥अंग 1098
- कपड़ भोग विकार ए हभे ही छार ॥अंग 1098
- किआ तकहि बिआ पास करि हीअड़े हिकु अधारु ॥अंग 1098
- धरमु धीरा कलि अंदरे इहु पापी मूलि न तगै ॥अंग 1098
- लोड़ीदो हभ जाइ सो मीरा मीरंन सिरि ॥अंग 1098
- माणिकू मोहि माउ डिंना धणी अपाहि ॥अंग 1098
- मू थीआऊ सेज नैणा पिरी विछावणा ॥अंग 1098
- मनु लोचै हरि मिलण कउ किउ दरसनु पाईआ ॥अंग 1098
- मू थीआऊ तखतु पिरी महिंजे पातिसाह ॥अंग 1098
- पिरीआ संदड़ी भुख मू लावण थी विथरा ॥अंग 1098
- ठगा नीहु मत्रोड़ि जाणु गंध्रबा नगरी ॥अंग 1098
- अकल कला नह पाईऐ प्रभु अलख अलेखं ॥अंग 1098
- सो निवाहू गडि जो चलाऊ न थीऐ ॥अंग 1099
- हभ समाणी जोति जिउ जल घटाऊ चंद्रमा ॥अंग 1099
- मुख सुहावे नामु चउ आठ पहर गुण गाउ ॥अंग 1099
- बाहर भेखि न पाईऐ प्रभु अंतरजामी ॥अंग 1099
- मुखहु अलाए हभ मरणु पछाणंदो कोइ ॥अंग 1099
- जाणु वसंदो मंझि पछाणू को हेकड़ो ॥अंग 1099
- मतड़ी कांढकु आह पाव धोवंदो पीवसा ॥अंग 1099
- निरभउ नामु विसारिआ नालि माइआ रचा ॥अंग 1099
- परभाते प्रभ नामु जपि गुर के चरण धिआइ ॥अंग 1099
- देह अंधारी अंधु सुंञी नाम विहूणीआ ॥अंग 1099
- लोइण लोई डिठ पिआस न बुझै मू घणी ॥अंग 1099
- जिनि जनि गुरमुखि सेविआ तिनि सभि सुख पाई ॥अंग 1100
- सचु सुहावा काढीऐ कूड़ै कूड़ी सोइ ॥अंग 1100
- सजण मुखु अनूपु अठे पहर निहालसा ॥अंग 1100
- सजण सचु परखि मुखि अलावणु थोथरा ॥अंग 1100
- धरति आकासु पातालु है चंदु सूरु बिनासी ॥अंग 1100
- डिठी हभ ढंढोलि हिकसु बाझु न कोइ ॥अंग 1100
- आसकु आसा बाहरा मू मनि वडी आस ॥अंग 1100
- विछोड़ा सुणे डुखु विणु डिठे मरिओदि ॥अंग 1100
- तट तीरथ देव देवालिआ केदारु मथुरा कासी ॥अंग 1100
- सै नंगे नह नंग भुखे लख न भुखिआ ॥अंग 1100
- सुख समूहा भोग भूमि सबाई को धणी ॥अंग 1101
- हिकस कूं तू आहि पछाणू भी हिकु करि ॥अंग 1101
- निहचलु एकु नराइणो हरि अगम अगाधा ॥अंग 1101
- जो डुबंदो आपि सो तराए किन॑ खे ॥अंग 1101
- जिथै कोइ कथंनि नाउ सुणंदो मा पिरी ॥अंग 1101
- मेरी मेरी किआ करहि पुत्र कलत्र सनेह ॥अंग 1101
- नैनी देखउ गुर दरसनो गुर चरणी मथा ॥अंग 1101
- लगड़ीआ पिरीअंनि पेखंदीआ ना तिपीआ ॥अंग 1101
- कथड़ीआ संताह ते सुखाऊ पंधीआ ॥अंग 1101
- डूंगरि जला थला भूमि बना फल कंदरा ॥अंग 1101
- हरि जी मेरी सार करे हम हरि के बालक ॥अंग 1101
- नानक कचड़िआ सिउ तोड़ि ढूढि सजण संत पकिआ ॥अंग 1102
- नानक बिजुलीआ चमकंनि घुरनि॑ घटा अति कालीआ ॥अंग 1102
- जल थल नीरि भरे सीतल पवण झुलारदे ॥अंग 1102
- कारणु करतै जो कीआ सोई है करणा ॥अंग 1102
- पहिला मरणु कबूलि जीवण की छडि आस ॥अंग 1102
- मुआ जीवंदा पेखु जीवंदे मरि जानि ॥अंग 1102
- जिसु मनि वसै पारब्रहमु निकटि न आवै पीर ॥अंग 1102
- कीमति कहणु न जाईऐ सचु साह अडोलै ॥अंग 1102
तुखारी (1)
- घोलि घुमाई लालना गुरि मनु दीना ॥अंग 1117
केदारा (15)
- माई संतसंगि जागी ॥अंग 1119
- दीन बिनउ सुनु दइआल ॥अंग 1119
- सरनी आइओ नाथ निधान ॥अंग 1119
- हरि के दरसन को मनि चाउ ॥अंग 1119
- प्रिअ की प्रीति पिआरी ॥अंग 1120
- हरि हरि हरि गुन गावहु ॥अंग 1120
- हरि बिनु जनमु अकारथ जात ॥अंग 1120
- हरि बिनु कोइ न चालसि साथ ॥अंग 1120
- बिसरत नाहि मन ते हरी ॥अंग 1120
- प्रीतम बसत रिद महि खोर ॥अंग 1121
- रसना राम राम बखानु ॥अंग 1121
- हरि के नाम को आधारु ॥अंग 1121
- हरि के नाम बिनु ध्रिगु स्रोत ॥अंग 1121
- संतह धूरि ले मुखि मली ॥अंग 1121
- मिलु मेरे प्रीतम पिआरिआ ॥ रहाउ ॥अंग 1122
भैरों (67)
- सगली थीति पासि डारि राखी ॥ असटम थीति गोविंद जनमा सी ॥1॥अंग 1136
- ऊठत सुखीआ बैठत सुखीआ ॥अंग 1136
- वरत न रहउ न मह रमदाना ॥अंग 1136
- दस मिरगी सहजे बंधि आनी ॥अंग 1136
- जे सउ लोचि लोचि खावाइआ ॥अंग 1136
- जिनहि उपाए तिस कउ पीर ॥1॥अंग 1137
- आगै दयु पाछै नाराइण ॥अंग 1137
- कोटि मनोरथ आवहि हाथ ॥अंग 1137
- लेपु न लागो तिल का मूलि ॥अंग 1137
- खूबु खूबु खूबु खूबु खूबु तेरो नामु ॥अंग 1137
- साच पदारथु गुरमुखि लहहु ॥अंग 1138
- सतिगुरु सेवि सरब फल पाए ॥अंग 1138
- अपणे दास कउ कंठि लगावै ॥अंग 1138
- स्रीधर मोहन सगल उपावन निरंकार सुखदाता ॥अंग 1138
- बन महि पेखिओ त्रिण महि पेखिओ ग्रिहि पेखिओ उदासाए ॥अंग 1139
- निकटि बुझै सो बुरा किउ करै ॥अंग 1139
- जिसु तू राखहि तिसु कउनु मारै ॥अंग 1139
- तउ कड़ीऐ जे होवै बाहरि ॥अंग 1140
- बिनु बाजे कैसो निरतिकारी ॥अंग 1140
- हउमै रोगु मानुख कउ दीना ॥अंग 1140
- चीति आवै तां महा अनंद ॥अंग 1141
- बापु हमारा सद चरंजीवी ॥अंग 1141
- निरवैर पुरख सतिगुर प्रभ दाते ॥अंग 1141
- सतिगुरु मेरा बेमुहताजु ॥अंग 1142
- नामु लैत मनु परगटु भइआ ॥अंग 1142
- नमसकार ता कउ लख बार ॥अंग 1142
- मोहि दुहागनि आपि सीगारी ॥अंग 1143
- चितवत पाप न आलकु आवै ॥अंग 1143
- अपणी दइआ करे सो पाए ॥अंग 1143
- नामु हमारै अंतरजामी ॥अंग 1144
- तू मेरा पिता तूहै मेरा माता ॥अंग 1144
- सभ ते ऊच जा का दरबारु ॥अंग 1144
- रोवनहारी रोजु बनाइआ ॥अंग 1145
- संत की निंदा जोनी भवना ॥अंग 1145
- नामु हमारै बेद अरु नाद ॥अंग 1145
- निरधन कउ तुम देवहु धना ॥अंग 1146
- संत मंडल महि हरि मनि वसै ॥अंग 1146
- रोगु कवनु जां राखै आपि ॥अंग 1146
- तेरी टेक रहा कलि माहि ॥अंग 1147
- प्रथमे छोडी पराई निंदा ॥अंग 1147
- सुखु नाही बहुतै धनि खाटे ॥अंग 1147
- गुर मिलि तिआगिओ दूजा भाउ ॥अंग 1147
- सभ ते ऊचा जा का नाउ ॥अंग 1148
- जिसु सिमरत मनि होइ प्रगासु ॥अंग 1148
- लाज मरै जो नामु न लेवै ॥अंग 1148
- गुर सुप्रसंन होए भउ गए ॥अंग 1149
- करण कारण समरथु गुरु मेरा ॥अंग 1149
- मनु तनु राता राम रंगि चरणे ॥अंग 1149
- नामु लैत किछु बिघनु न लागै ॥अंग 1150
- आपे सासतु आपे बेदु ॥अंग 1150
- भगता मनि आनंदु गोबिंद ॥अंग 1150
- भै कउ भउ पड़िआ सिमरत हरि नाम ॥अंग 1151
- पंच मजमी जो पंचन राखै ॥अंग 1151
- निंदक कउ फिटके संसारु ॥अंग 1151
- दुइ कर जोरि करउ अरदासि ॥अंग 1152
- सतिगुर अपुने सुनी अरदासि ॥अंग 1152
- परतिपाल प्रभ क्रिपाल कवन गुन गनी ॥अंग 1153
- जिसु नामु रिदै सोई वड राजा ॥अंग 1155
- कोटि बिसन कीने अवतार ॥अंग 1156
- सतिगुरि मो कउ कीनो दानु ॥अंग 1157
- जो पाथर कउ कहते देव ॥अंग 1160
- जल महि मीन माइआ के बेधे ॥अंग 1160
- जब लगु मेरी मेरी करै ॥अंग 1160
- सतरि सैइ सलार है जा के ॥अंग 1161
- सभु कोई चलन कहत है ऊहां ॥अंग 1161
- किउ लीजै गढु बंका भाई ॥अंग 1161
- गंग गुसाइनि गहिर गंभीर ॥अंग 1162
बसंत (24)
- गुरु सेवउ करि नमसकार ॥अंग 1180
- हटवाणी धन माल हाटु कीतु ॥अंग 1180
- तिसु बसंतु जिसु प्रभु क्रिपालु ॥अंग 1180
- जीअ प्राण तुम॑ पिंड दीन॑ ॥अंग 1181
- प्रभ प्रीतम मेरै संगि राइ ॥अंग 1181
- मिलि पाणी जिउ हरे बूट ॥अंग 1181
- तुम बड दाते दे रहे ॥अंग 1181
- तिसु तू सेवि जिनि तू कीआ ॥अंग 1182
- जिसु बोलत मुखु पवितु होइ ॥अंग 1182
- मन तन भीतरि लागी पिआस ॥अंग 1182
- राम रंगि सभ गए पाप ॥अंग 1183
- सचु परमेसरु नित नवा ॥अंग 1183
- गुर चरण सरेवत दुखु गइआ ॥अंग 1183
- सगल इछा जपि पुंनीआ ॥अंग 1184
- किलबिख बिनसे गाइ गुना ॥अंग 1184
- रोग मिटाए प्रभू आपि ॥अंग 1184
- हुकमु करि कीन॑े निहाल ॥अंग 1184
- देखु फूल फूल फूले ॥अंग 1185
- होइ इकत्र मिलहु मेरे भाई दुबिधा दूरि करहु लिव लाइ ॥अंग 1185
- तेरी कुदरति तूहै जाणहि अउरु न दूजा जाणै ॥अंग 1185
- मूलु न बूझै आपु न सूझै भरमि बिआपी अहं मनी ॥1॥अंग 1186
- सुणि साखी मन जपि पिआर ॥अंग 1192
- अनिक जनम भ्रमे जोनि माहि ॥अंग 1192
- बसंत की वार महलु 5अंग 1193
सारंग (147)
- सतिगुर मूरति कउ बलि जाउ ॥अंग 1202
- करत बुराई मानुख ते छपाई साखी भूत पवान ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1202
- अब मोरो नाचनो रहो ॥अंग 1203
- अब पूछे किआ कहा ॥अंग 1203
- माई धीरि रही प्रिअ बहुतु बिरागिओ ॥अंग 1203
- माई सति सति सति हरि सति सति सति साधा ॥अंग 1204
- मेरै मनि बासिबो गुर गोबिंद ॥अंग 1204
- अब मोहि राम भरोसउ पाए ॥अंग 1204
- ओुइ सुख का सिउ बरनि सुनावत ॥अंग 1205
- बिखई दिनु रैनि इव ही गुदारै ॥अंग 1205
- अवरि सभि भूले भ्रमत न जानिआ ॥अंग 1205
- अनदिनु राम के गुण कहीऐ ॥अंग 1206
- बलिहारी गुरदेव चरन ॥अंग 1206
- गाइओ री मै गुण निधि मंगल गाइओ ॥अंग 1206
- कैसे कहउ मोहि जीअ बेदनाई ॥अंग 1206
- रे मूड़॑े तू किउ सिमरत अब नाही ॥अंग 1207
- किउ जीवनु प्रीतम बिनु माई ॥अंग 1207
- उआ अउसर कै हउ बलि जाई ॥अंग 1207
- मनोरथ पूरे सतिगुर आपि ॥अंग 1207
- मन कहा लुभाईऐ आन कउ ॥अंग 1208
- मन सदा मंगल गोबिंद गाइ ॥अंग 1208
- हरि जन सगल उधारे संग के ॥अंग 1208
- हरि जन राम राम राम धिआंए ॥अंग 1208
- मोहन घरि आवहु करउ जोदरीआ ॥अंग 1209
- अब किआ सोचउ सोच बिसारी ॥अंग 1209
- अब मोहि सरब उपाव बिरकाते ॥अंग 1209
- अब मोहि लबधिओ है हरि टेका ॥अंग 1209
- मेरा मनु एकै ही प्रिअ मांगै ॥अंग 1209
- अब मोरो ठाकुर सिउ मनु मानां ॥अंग 1210
- मेरै मनि चीति आए प्रिअ रंगा ॥अंग 1210
- बचन नाद मेरे स्रवनहु पूरे देहा प्रिअ अंकि समानी ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1210
- अब मेरो पंचा ते संगु तूटा ॥अंग 1210
- अब मेरो ठाकुर सिउ मनु लीना ॥अंग 1210
- मोहन सभि जीअ तेरे तू तारहि ॥अंग 1211
- अब मोहि धनु पाइओ हरि नामा ॥अंग 1211
- मेरै मनि मिसट लगे प्रिअ बोला ॥अंग 1211
- रसना राम कहत गुण सोहं ॥अंग 1211
- नैनहु देखिओ चलतु तमासा ॥अंग 1211
- चरनह गोबिंद मारगु सुहावा ॥अंग 1212
- धिआइओ अंति बार नामु सखा ॥अंग 1212
- गुर मिलि ऐसे प्रभू धिआइआ ॥अंग 1212
- मेरै मनि सबदु लगो गुर मीठा ॥अंग 1212
- हरि हरि नामु दीओ गुरि साथे ॥अंग 1212
- रे मूड़॑े आन काहे कत जाई ॥अंग 1213
- ओअं प्रिअ प्रीति चीति पहिलरीआ ॥अंग 1213
- मन ओइ दिनस धंनि परवानां ॥अंग 1213
- अब मोरो सहसा दूखु गइआ ॥अंग 1213
- प्रभु मेरो इत उत सदा सहाई ॥अंग 1213
- अपना मीतु सुआमी गाईऐ ॥अंग 1214
- द्रिसटि न लिआवउ अवर काहू कउ माणि महति प्रभ तेरै ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1214
- प्रभ सिमरत दूख बिनासी ॥अंग 1214
- मेरो मनु जत कत तुझहि सम॑ारै ॥अंग 1214
- मन ते भै भउ दूरि पराइओ ॥अंग 1214
- अंम्रित नामु मनहि आधारो ॥अंग 1215
- बिनु प्रभ रहनु न जाइ घरी ॥अंग 1215
- रसना जपती तूही तूही ॥अंग 1215
- जाहू काहू अपुनो ही चिति आवै ॥अंग 1215
- झूठो माइआ को मद मानु ॥अंग 1215
- अपुनी इतनी कछू न सारी ॥अंग 1215
- मोहनी मोहत रहै न होरी ॥अंग 1216
- कहा करहि रे खाटि खाटुली ॥अंग 1216
- कोटि जोध उआ की बात न पुछीऐ तां दरगह भी मानिओ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1216
- हरि हरि दीओ सेवक कउ नाम ॥अंग 1216
- तू मेरे मीत सखा हरि प्रान ॥अंग 1216
- करहु गति दइआल संतहु मोरी ॥अंग 1217
- ठाकुर बिनती करन जनु आइओ ॥अंग 1217
- जा की राम नाम लिव लागी ॥अंग 1217
- अब जन ऊपरि को न पुकारै ॥अंग 1217
- हरि जन छोडिआ सगला आपु ॥अंग 1217
- मेरै गुरि मोरो सहसा उतारिआ ॥अंग 1218
- सिमरत नामु प्रान गति पावै ॥अंग 1218
- अपुने गुर पूरे बलिहारै ॥अंग 1218
- बिनु हरि है को कहा बतावहु ॥अंग 1218
- ठाकुर तुम॑ सरणाई आइआ ॥अंग 1218
- हरि के नाम की गति ठांढी ॥अंग 1219
- जिहवे अंम्रित गुण हरि गाउ ॥अंग 1219
- होती नही कवन कछु करणी ॥अंग 1219
- फीके हरि के नाम बिनु साद ॥अंग 1219
- नामु विसारि लगहि अन लालचि बिरथा जनमु पराणी ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1219
- धनवंत नाम के वणजारे ॥अंग 1219
- प्रभ जी मोहि कवनु अनाथु बिचारा ॥अंग 1220
- आवै राम सरणि वडभागी ॥अंग 1220
- जा ते साधू सरणि गही ॥अंग 1220
- रसना राम को जसु गाउ ॥अंग 1220
- बैकुंठ गोबिंद चरन नित धिआउ ॥अंग 1220
- साचे सतिगुरू दातारा ॥अंग 1221
- गुर के चरन बसे मन मेरै ॥अंग 1221
- जीवनु तउ गनीऐ हरि पेखा ॥अंग 1221
- सिमरन राम को इकु नाम ॥अंग 1221
- धूरतु सोई जि धुर कउ लागै ॥अंग 1221
- हरि हरि संत जना की जीवनि ॥अंग 1222
- हरि के नामहीन बेताल ॥अंग 1222
- मनि तनि राम को बिउहारु ॥अंग 1222
- हरि के नामहीन मति थोरी ॥अंग 1222
- चितवउ वा अउसर मन माहि ॥अंग 1222
- मेरा प्रभु संगे अंतरजामी ॥अंग 1222
- जा कै राम को बलु होइ ॥अंग 1223
- जीवतु राम के गुण गाइ ॥अंग 1223
- मन रे नाम को सुख सार ॥अंग 1223
- बिराजित राम को परताप ॥अंग 1223
- आतुरु नाम बिनु संसार ॥अंग 1223
- तिनि प्रभि साचै आपि भुलाइआ बिखै ठगउरी पीउ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1224
- रमण कउ राम के गुण बाद ॥अंग 1224
- कीन॑े पाप के बहु कोट ॥अंग 1224
- अंधे खावहि बिसू के गटाक ॥अंग 1224
- टूटी निंदक की अध बीच ॥अंग 1224
- त्रिसना चलत बहु परकारि ॥अंग 1224
- रे पापी तै कवन की मति लीन ॥अंग 1225
- माई री चरनह ओट गही ॥अंग 1225
- माई री मनु मेरो मतवारो ॥अंग 1225
- माई री आन सिमरि मरि जांहि ॥अंग 1225
- हरि काटी कुटिलता कुठारि ॥अंग 1225
- पोथी परमेसर का थानु ॥अंग 1226
- वूठा सरब थाई मेहु ॥अंग 1226
- साजन मीत सहाई तुम ही तू मेरो परवार ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1226
- निबही नाम की सचु खेप ॥अंग 1226
- माई री पेखि रही बिसमाद ॥अंग 1226
- माई री माती चरण समूह ॥अंग 1227
- बिनसे काच के बिउहार ॥अंग 1227
- ता ते करण पलाह करे ॥अंग 1227
- हरि के नाम के जन कांखी ॥अंग 1227
- माखी राम की तू माखी ॥अंग 1227
- माई री काटी जम की फास ॥अंग 1227
- माई री अरिओ प्रेम की खोरि ॥अंग 1228
- नीकी राम की धुनि सोइ ॥अंग 1228
- हरि के नाम की मति सार ॥अंग 1228
- मानी तूं राम कै दरि मानी ॥अंग 1228
- तुअ चरन आसरो ईस ॥अंग 1228
- हरि भजि आन करम बिकार ॥अंग 1229
- सुभ बचन बोलि गुन अमोल ॥अंग 1229
- कंचना बहु दत करा ॥अंग 1229
- राम राम राम जापि रमत राम सहाई ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1229
- हरि हरे हरि मुखहु बोलि हरि हरे मनि धारे ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1230
- नाम भगति मागु संत तिआगि सगल कामी ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1230
- गुन लाल गावउ गुर देखे ॥अंग 1230
- मनि बिरागैगी ॥ खोजती दरसार ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1230
- ऐसी होइ परी ॥अंग 1230
- लाल लाल मोहन गोपाल तू ॥अंग 1231
- करत केल बिखै मेल चंद्र सूर मोहे ॥अंग 1231
- गुसाइंी परतापु तुहारो डीठा ॥अंग 1235
- अगम अगाधि सुनहु जन कथा ॥अंग 1235
- सभ देखीऐ अनभै का दाता ॥अंग 1236
- धरति सुहावड़ी आकासु सुहंदा जपंदिआ हरि नाउ ॥अंग 1247
- सचु खाणा सचु पैनणा सचु नामु अधारु ॥अंग 1251
- सभे जीअ समालि अपणी मिहर करु ॥अंग 1251
- वुठे मेघ सुहावणे हुकमु कीता करतारि ॥अंग 1251
- हरि के संग बसे हरि लोक ॥अंग 1253
मलार (35)
- किआ तू सोचहि किआ तू चितवहि किआ तूं करहि उपाए ॥अंग 1266
- खीर अधारि बारिकु जब होता बिनु खीरै रहनु न जाई ॥अंग 1266
- सगल बिधी जुरि आहरु करिआ तजिओ सगल अंदेसा ॥अंग 1266
- राज ते कीट कीट ते सुरपति करि दोख जठर कउ भरते ॥अंग 1267
- प्रभ मेरे ओइ बैरागी तिआगी ॥अंग 1267
- माई मोहि प्रीतमु देहु मिलाई ॥अंग 1267
- बरसु मेघ जी तिलु बिलमु न लाउ ॥अंग 1267
- प्रीतम साचा नामु धिआइ ॥अंग 1268
- प्रभ मेरे प्रीतम प्रान पिआरे ॥अंग 1268
- अब अपने प्रीतम सिउ बनि आई ॥अंग 1268
- घनिहर बरसि सगल जगु छाइआ ॥अंग 1268
- बिछुरत किउ जीवे ओइ जीवन ॥अंग 1268
- हरि कै भजनि कउन कउन न तारे ॥अंग 1269
- आजु मै बैसिओ हरि हाट ॥अंग 1269
- बहु बिधि माइआ मोह हिरानो ॥अंग 1269
- दुसट मुए बिखु खाई री माई ॥अंग 1269
- मन मेरे हरि के चरन रवीजै ॥अंग 1269
- प्रभ को भगति बछलु बिरदाइओ ॥अंग 1270
- गुरमुखि दीसै ब्रहम पसारु ॥अंग 1270
- गुर के चरन हिरदै वसाए ॥अंग 1270
- परमेसरु होआ दइआलु ॥अंग 1271
- गुर सरणाई सगल निधान ॥अंग 1271
- गुर मनारि प्रिअ दइआर सिउ रंगु कीआ ॥अंग 1271
- मनु घनै भ्रमै बनै ॥अंग 1272
- प्रिअ की सोभ सुहावनी नीकी ॥अंग 1272
- गुर प्रीति पिआरे चरन कमल रिद अंतरि धारे ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1272
- बरसु सरसु आगिआ ॥अंग 1272
- गुन गोुपाल गाउ नीत ॥अंग 1272
- घनु गरजत गोबिंद रूप ॥अंग 1272
- हे गोबिंद हे गोपाल हे दइआल लाल ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1273
- प्रीतम प्रेम भगति के दाते ॥अंग 1278
- गुरि मिलिऐ मनु रहसीऐ जिउ वुठै धरणि सीगारु ॥अंग 1278
- राति न विहावी साकतां जिन॑ा विसरै नाउ ॥अंग 1284
- रतन जवेहर माणका हभे मणी मथंनि ॥अंग 1284
- सभो वरतै चलतु चलतु वखाणिआ ॥अंग 1291
कानड़ा (51)
- गाईऐ गुण गोपाल क्रिपा निधि ॥अंग 1298
- आराधउ तुझहि सुआमी अपने ॥अंग 1298
- कीरति प्रभ की गाउ मेरी रसनां ॥अंग 1298
- ऐसी मांगु गोबिद ते ॥अंग 1298
- भगति भगतन हूं बनि आई ॥अंग 1299
- तेरो जनु हरि जसु सुनत उमाहिओ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1299
- संतन पहि आपि उधारन आइओ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1299
- बिसरि गई सभ ताति पराई ॥अंग 1299
- मानु महतु तुम॑ारै ऊपरि तुम॑री ओट तुम॑ारी सरना ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1299
- साध सरनि चरन चितु लाइआ ॥अंग 1300
- हरि के चरन हिरदै गाइ ॥अंग 1300
- कथीऐ संतसंगि प्रभ गिआनु ॥अंग 1300
- साधसंगति निधि हरि को नाम ॥अंग 1300
- साधू हरि हरे गुन गाइ ॥अंग 1300
- पेखि पेखि बिगसाउ साजन प्रभु आपना इकांत ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1300
- साजना संत आउ मेरै ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1301
- चरन सरन गोपाल तेरी ॥अंग 1301
- धनि उह प्रीति चरन संगि लागी ॥अंग 1301
- कुचिल कठोर कपट कामी ॥अंग 1301
- नाराइन नरपति नमसकारै ॥अंग 1301
- न जानी संतन प्रभ बिनु आन ॥अंग 1302
- कहन कहावन कउ कई केतै ॥अंग 1302
- हीए को प्रीतमु बिसरि न जाइ ॥अंग 1302
- आनद रंग बिनोद हमारै ॥अंग 1302
- साजन मीत सुआमी नेरो ॥अंग 1302
- बिखै दलु संतनि तुम॑रै गाहिओ ॥अंग 1303
- बूडत प्रानी हरि जपि धीरै ॥अंग 1303
- सिमरत नामु मनहि सुखु पाईऐ ॥अंग 1303
- मेरे मन प्रीति चरन प्रभ परसन ॥अंग 1303
- कुहकत कपट खपट खल गरजत मरजत मीचु अनिक बरीआ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1303
- जीअ प्रान मान दाता ॥अंग 1303
- अविलोकउ राम को मुखारबिंद ॥अंग 1304
- प्रभ पूजहो नामु अराधि ॥अंग 1304
- जगत उधारन नाम प्रिअ तेरै ॥अंग 1304
- ऐसी कउन बिधे दरसन परसना ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1305
- रंगा रंग रंगन के रंगा ॥अंग 1305
- तिख बूझि गई गई मिलि साध जना ॥अंग 1305
- तिआगीऐ गुमानु मानु पेखता दइआल लाल हां हां मन चरन रेन ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1305
- प्रभ कहन मलन दहन लहन गुर मिले आन नही उपाउ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1305
- पतित पावनु भगति बछलु भै हरन तारन तरन ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1306
- चरन सरन दइआल ठाकुर आन नाही जाइ ॥अंग 1306
- वारि वारउ अनिक डारउ ॥अंग 1306
- अहं तोरो मुखु जोरो ॥अंग 1306
- तां ते जापि मना हरि जापि ॥अंग 1306
- मान मोही पंच दोही उरझि निकटि बसिओ ताकी सरनि साधूआ दूत संगु निवारि ॥1॥ रहाउ ॥अंग 1307
- सहज सुभाए आपन आए ॥अंग 1307
- गोबिंद ठाकुर मिलन दुराइंी ॥अंग 1307
- माई सिमरत राम राम राम ॥अंग 1307
- जन को प्रभु संगे असनेहु ॥अंग 1307
- करत करत चरच चरच चरचरी ॥अंग 1308
- से उधरे जिन राम धिआए ॥अंग 1312
कल्याण (10)
- हमारै एह किरपा कीजै ॥अंग 1321
- जाचिकु नामु जाचै जाचै ॥अंग 1321
- मेरे लालन की सोभा ॥अंग 1322
- तेरै मानि हरि हरि मानि ॥अंग 1322
- गुन नाद धुनि अनंद बेद ॥अंग 1322
- कउनु बिधि ता की कहा करउ ॥अंग 1322
- प्रानपति दइआल पुरख प्रभ सखे ॥अंग 1322
- मनि तनि जापीऐ भगवान ॥अंग 1322
- प्रभु मेरा अंतरजामी जाणु ॥अंग 1323
- हरि चरन सरन कलिआन करन ॥अंग 1323
प्रभाती (17)
- मनु हरि कीआ तनु सभु साजिआ ॥अंग 1337
- प्रभ की सेवा जन की सोभा ॥अंग 1338
- गुन गावत मनि होइ अनंद ॥अंग 1338
- सगले दूख मिटे सुख दीए अपना नामु जपाइआ ॥अंग 1338
- सिमरत नामु किलबिख सभि नासे ॥अंग 1339
- करि किरपा अपुने प्रभि कीए ॥अंग 1339
- से धनवंत सेई सचु साहा ॥अंग 1339
- गुरु पूरा पूरी ता की कला ॥अंग 1339
- सतिगुरि पूरै नामु दीआ ॥अंग 1340
- पारब्रहमु प्रभु सुघड़ सुजाणु ॥अंग 1340
- कुरबाणु जाई गुर पूरे अपने ॥अंग 1340
- गुरु गुरु करत सदा सुखु पाइआ ॥अंग 1341
- अवरु न दूजा ठाउ ॥अंग 1341
- रम राम राम राम जाप ॥अंग 1341
- चरन कमल सरनि टेक ॥अंग 1341
- मात पिता भाई सुतु बनिता ॥अंग 1347
- सिमरत नामु किलबिख सभि काटे ॥अंग 1348