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1399
सवैये
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नल्य कवि पारस परस कच कंचना हुइ चंदना सुबासु जासु सिमरत अन तर ॥
नल्य कवि पारस परस कच कंचना हुइ चंदना सुबासु जासु सिमरत अन तर ॥
जा के देखत दुआरे काम क्रोध ही निवारे जी हउ बलि बलि जाउ सतिगुर साचे नाम पर ॥3॥
जा के देखत दुआरे काम क्रोध ही निवारे जी हउ बलि बलि जाउ सतिगुर साचे नाम पर ॥3॥
हिन्दी अर्थ: जिसको सिमरने से (ऐसे हो जाते हैं जैसे) पारस को छू के काँच सोना हो जाता है और (चँदन की छूह से) और वृक्षों में भी चँदन की खुशबू आ जाती है। जिस गुरू (रामदास जी) के दर के दर्शन करने से काम-क्रोध (आदि यह सारे) दूर हो जाते हैं। मैं सदके हूँ उस सच्चे गुरू के नाम पर से। 3।
राजु जोगु तखतु दीअनु गुर रामदास ॥
राजु जोगु तखतु दीअनु गुर रामदास ॥
प्रथमे नानक चंदु जगत भयो आनंदु तारनि मनुख्य जन कीअउ प्रगास ॥
गुर अंगद दीअउ निधानु अकथ कथा गिआनु पंच भूत बसि कीने जमत न त्रास ॥
गुर अमरु गुरू स्री सति कलिजुगि राखी पति अघन देखत गतु चरन कवल जास ॥
सभ बिधि मान्यिउ मनु तब ही भयउ प्रसंनु राजु जोगु तखतु दीअनु गुर रामदास ॥4॥
प्रथमे नानक चंदु जगत भयो आनंदु तारनि मनुख्य जन कीअउ प्रगास ॥
गुर अंगद दीअउ निधानु अकथ कथा गिआनु पंच भूत बसि कीने जमत न त्रास ॥
गुर अमरु गुरू स्री सति कलिजुगि राखी पति अघन देखत गतु चरन कवल जास ॥
सभ बिधि मान्यिउ मनु तब ही भयउ प्रसंनु राजु जोगु तखतु दीअनु गुर रामदास ॥4॥
हिन्दी अर्थ: उस (अकाल-पुरख) ने गुरू रामदास (जी) को राज और जोग (वाला) तख़्त दिया है। पहले गुरू नानक देव जी चँद्रमा (-रूप प्रकट हुए)। मनुष्यों के उद्धार के लिए (आपने) प्रकाश किया और (सारे) संसार को खुशी हुई। (फिर गुरू नानक देव ने) गुरू अंगद देव जी को हरी के अकथ-कथा का ज्ञान-रूप खजाना बख्शा। (जिसके कारण गुरू अंगद देव ने) कामादिक पाँचों वैरी वश में कर लिए। और (उसको उनका) डर ना रहा। (फिर गुरू अंगद देव जी की छूह से) श्री सतिगुरू गुरू अमरदास (प्रकट हुआ)। (उसने) कलियुग की पति रखी। आप के चरन-कमलों का दर्शन करके (कलिजुग के) पाप भाग गए। (जब गुरू अमरदास जी का) मन पूरी तरह से पतीज गया। तब (वह गुरू रामदास जी पर) प्रसन्न हुए और (उन्होंने) गुरू रामदास को राज-जोग वाला तख़्त बख्शा। 4।
रड ॥
रड ॥
जिसहि धार्यिउ धरति अरु विउमु अरु पवणु ते नीर सर अवर अनल अनादि कीअउ ॥
ससि रिखि निसि सूर दिनि सैल तरूअ फल फुल दीअउ ॥
सुरि नर सपत समुद्र किअ धारिओ त्रिभवण जासु ॥
सोई एकु नामु हरि नामु सति पाइओ गुर अमर प्रगासु ॥1॥5॥
जिसहि धार्यिउ धरति अरु विउमु अरु पवणु ते नीर सर अवर अनल अनादि कीअउ ॥
ससि रिखि निसि सूर दिनि सैल तरूअ फल फुल दीअउ ॥
सुरि नर सपत समुद्र किअ धारिओ त्रिभवण जासु ॥
सोई एकु नामु हरि नामु सति पाइओ गुर अमर प्रगासु ॥1॥5॥
हिन्दी अर्थ: रड ॥ जिस हरी-नाम ने धरती और आकाश को टिका के रखा है। और जिसने पवन। सरोवरों के वह जल। आग और अन्न आदि पैदा किए हैं। (जिसकी बरकति से) रात को चँद्रमा और तारे और दिन के वक्त सूरज (चढ़ता है)। जिसने पहाड़ रचे हैं और जिसने वृक्षों को फल-फूल लगाए हैं। जिसने देवते मनुष्य और सात समुंद्र पैदा किए हैं और तीनों भवन टिका के रखे हैं। वही एक हरी का नाम सदा अटल है। (गुरू रामदास जी ने वही नाम-रूप) प्रकाश गुरू अमरदास जी से पाया है। 1। 5।
कचहु कंचनु भइअउ सबदु गुर स्रवणहि सुणिओ ॥
कचहु कंचनु भइअउ सबदु गुर स्रवणहि सुणिओ ॥
बिखु ते अंम्रितु हुयउ नामु सतिगुर मुखि भणिअउ ॥
लोहउ होयउ लालु नदरि सतिगुरु जदि धारै ॥
पाहण माणक करै गिआनु गुर कहिअउ बीचारै ॥
काठहु स्रीखंड सतिगुरि कीअउ दुख दरिद्र तिन के गइअ ॥
सतिगुरू चरन जिन॑ परसिआ से पसु परेत सुरि नर भइअ ॥2॥6॥
बिखु ते अंम्रितु हुयउ नामु सतिगुर मुखि भणिअउ ॥
लोहउ होयउ लालु नदरि सतिगुरु जदि धारै ॥
पाहण माणक करै गिआनु गुर कहिअउ बीचारै ॥
काठहु स्रीखंड सतिगुरि कीअउ दुख दरिद्र तिन के गइअ ॥
सतिगुरू चरन जिन॑ परसिआ से पसु परेत सुरि नर भइअ ॥2॥6॥
हिन्दी अर्थ: (जिस मनुष्य ने) गुरू का शबद कानों से सुना है। वह (मानो) काँच से सोना हो गया है। जिसने सतिगुरू का नाम मुँह से उचारा है। वह विष से अमृत बन गया है। अगर सतिगुरू (मेहर की) नजर करे। तो (जीव) लोहे से लाल बन जाता है। जिन मनुष्यों ने गुरू के बताए हुए ज्ञान को विचार के जपा है उनको गुरू (मानो) पत्थरों से माणक कर देता है। उनके दुख-दारिद्र दूर हो गए हैं और सतिगुरू ने उनको (मानो) काठ से चँदन बना दिया है जिन मनुष्यों ने सतिगुरू के चरन परसे हैं। वह पशू व प्रेतों से देवते और मनुष्य बन गए हैं। 2। 6।
जामि गुरू होइ वलि धनहि किआ गारवु दिजइ ॥
जामि गुरू होइ वलि धनहि किआ गारवु दिजइ ॥
जामि गुरू होइ वलि लख बाहे किआ किजइ ॥
जामि गुरू होइ वलि गिआन अरु धिआन अनन परि ॥
जामि गुरू होइ वलि सबदु साखी सु सचह घरि ॥
जो गुरू गुरू अहिनिसि जपै दासु भटु बेनति कहै ॥
जो गुरू नामु रिद महि धरै सो जनम मरण दुह थे रहै ॥3॥7॥
जामि गुरू होइ वलि लख बाहे किआ किजइ ॥
जामि गुरू होइ वलि गिआन अरु धिआन अनन परि ॥
जामि गुरू होइ वलि सबदु साखी सु सचह घरि ॥
जो गुरू गुरू अहिनिसि जपै दासु भटु बेनति कहै ॥
जो गुरू नामु रिद महि धरै सो जनम मरण दुह थे रहै ॥3॥7॥
हिन्दी अर्थ: जब सतिगुरू (किसी मनुष्य की) सहायता करे तो वह धन के कारण अहंकार नहीं करता। जब गुरू (अपने) पक्ष में हो। तो लाखों फौजें क्या बिगाड़ सकती हैं। जब गुरू पक्ष करे। तो मनुष्य ज्ञान और ध्यान की दाति होने के कारण (हरी के बिना) किसी और के साथ प्यार नहीं डालता। जब गुरू सहायता करे। तो जीवों के हृदय में शबद साक्षात हो जाता है और वह सच्चे हरी के घर में (टिक जाता) है। दास (नॅल्) भॅट विनती करता है कि जो मनुष्य दिन-रात 'गुरू गुरू' जपता है। जो सतिगुरू का नाम हृदय में टिकाता है। वह मनुष्य जनम-मरण से बच जाता है। 3। 7।
गुर बिनु घोरु अंधारु गुरू बिनु समझ न आवै ॥
गुर बिनु घोरु अंधारु गुरू बिनु समझ न आवै ॥
गुर बिनु सुरति न सिधि गुरू बिनु मुकति न पावै ॥
गुरु करु सचु बीचारु गुरू करु रे मन मेरे ॥
गुरु करु सबद सपुंन अघन कटहि सभ तेरे ॥
गुरु नयणि बयणि गुरु गुरु करहु गुरू सति कवि नल्य कहि ॥
जिनि गुरू न देखिअउ नहु कीअउ ते अकयथ संसार महि ॥4॥8॥
गुर बिनु सुरति न सिधि गुरू बिनु मुकति न पावै ॥
गुरु करु सचु बीचारु गुरू करु रे मन मेरे ॥
गुरु करु सबद सपुंन अघन कटहि सभ तेरे ॥
गुरु नयणि बयणि गुरु गुरु करहु गुरू सति कवि नल्य कहि ॥
जिनि गुरू न देखिअउ नहु कीअउ ते अकयथ संसार महि ॥4॥8॥
हिन्दी अर्थ: सतिगुरू (की शरण पड़े) बिना (मनुष्य के जीवन की राह में) अंधकार ही अंधकार है। गुरू के बिना (सही जीवन की) समझ प्राप्त नहीं हो सकती। गुरू के बिना सुरति (ऊँची) नहीं होती और (जीवन संग्राम में) सफलता प्राप्त नहीं होती। गुरू के बिना (विकारों से) खलासी नहीं मिलती। हे मेरे मन ! सतिगुरू की शरण पड़। यही उक्तम विचार है। शबद के शूरवीर गुरू की शरण पड़। आपके सारे पाप कट जाएंगे। कवि नॅल् कहता है- (हे मेरे मन !) अपनी आँखों में। अपने बोलों में केवल गुरू को ही बसाओ। गुरू सदा-स्थिर रहने वाला है। जिस-जिस मनुष्य ने सतिगुरू के दर्शन नहीं किए। और जो जो मनुष्य सतिगुरू की शरण नहीं पड़ा। वह सारे संसार में निष्फल (ही आए)। 4। 8।
गुरू गुरू गुरु करु मन मेरे ॥
गुरू गुरू गुरु करु मन मेरे ॥
हिन्दी अर्थ: हे मेरे मन ! 'गुरू' 'गुरू' जप।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: भट्ट नल।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1399 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।