जा के देखत दुआरे काम क्रोध ही निवारे जी हउ बलि बलि जाउ सतिगुर साचे नाम पर ॥३॥
प्रथमे नानक चंदु जगत भयो आनंदु तारनि मनुख्य जन कीअउ प्रगास ॥
गुर अंगद दीअउ निधानु अकथ कथा गिआनु पंच भूत बसि कीने जमत न त्रास ॥
गुर अमरु गुरू स्री सति कलिजुगि राखी पति अघन देखत गतु चरन कवल जास ॥
सभ बिधि मान्यिउ मनु तब ही भयउ प्रसंनु राजु जोगु तखतु दीअनु गुर रामदास ॥४॥
जिसहि धार्यिउ धरति अरु विउमु अरु पवणु ते नीर सर अवर अनल अनादि कीअउ ॥
ससि रिखि निसि सूर दिनि सैल तरूअ फल फुल दीअउ ॥
सुरि नर सपत समुद्र किअ धारिओ त्रिभवण जासु ॥
सोई एकु नामु हरि नामु सति पाइओ गुर अमर प्रगासु ॥१॥५॥
बिखु ते अंम्रितु हुयउ नामु सतिगुर मुखि भणिअउ ॥
लोहउ होयउ लालु नदरि सतिगुरु जदि धारै ॥
पाहण माणक करै गिआनु गुर कहिअउ बीचारै ॥
काठहु स्रीखंड सतिगुरि कीअउ दुख दरिद्र तिन के गइअ ॥
सतिगुरू चरन जिन॑ परसिआ से पसु परेत सुरि नर भइअ ॥२॥६॥
जामि गुरू होइ वलि लख बाहे किआ किजइ ॥
जामि गुरू होइ वलि गिआन अरु धिआन अनन परि ॥
जामि गुरू होइ वलि सबदु साखी सु सचह घरि ॥
जो गुरू गुरू अहिनिसि जपै दासु भटु बेनति कहै ॥
जो गुरू नामु रिद महि धरै सो जनम मरण दुह थे रहै ॥३॥७॥
गुर बिनु सुरति न सिधि गुरू बिनु मुकति न पावै ॥
गुरु करु सचु बीचारु गुरू करु रे मन मेरे ॥
गुरु करु सबद सपुंन अघन कटहि सभ तेरे ॥
गुरु नयणि बयणि गुरु गुरु करहु गुरू सति कवि नल्य कहि ॥
जिनि गुरू न देखिअउ नहु कीअउ ते अकयथ संसार महि ॥४॥८॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिसको सिमरने से (ऐसे हो जाते हैं जैसे) पारस को छू के काँच सोना हो जाता है और (चँदन की छूह से) और वृक्षों में भी चँदन की खुशबू आ जाती है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।