अंग 1399

अंग
1399
राग Svaiyay Mehl 5
राग: Svaiyay Mehl 5 · रचयिता: Bhatt Nal
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नल्य कवि पारस परस कच कंचना हुइ चंदना सुबासु जासु सिमरत अन तर ॥
जा के देखत दुआरे काम क्रोध ही निवारे जी हउ बलि बलि जाउ सतिगुर साचे नाम पर ॥३॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: जिसको सिमरने से (ऐसे हो जाते हैं जैसे) पारस को छू के काँच सोना हो जाता है और (चँदन की छूह से) और वृक्षों में भी चँदन की खुशबू आ जाती है। जिस गुरू (रामदास जी) के दर के दर्शन करने से काम-क्रोध (आदि यह सारे) दूर हो जाते हैं। मैं सदके हूँ उस सच्चे गुरू के नाम पर से। 3।
राजु जोगु तखतु दीअनु गुर रामदास ॥
प्रथमे नानक चंदु जगत भयो आनंदु तारनि मनुख्य जन कीअउ प्रगास ॥
गुर अंगद दीअउ निधानु अकथ कथा गिआनु पंच भूत बसि कीने जमत न त्रास ॥
गुर अमरु गुरू स्री सति कलिजुगि राखी पति अघन देखत गतु चरन कवल जास ॥
सभ बिधि मान्यिउ मनु तब ही भयउ प्रसंनु राजु जोगु तखतु दीअनु गुर रामदास ॥४॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: उस (अकाल-पुरख) ने गुरू रामदास (जी) को राज और जोग (वाला) तख़्त दिया है। पहले गुरू नानक देव जी चँद्रमा (-रूप प्रकट हुए)। मनुष्यों के उद्धार के लिए (आपने) प्रकाश किया और (सारे) संसार को खुशी हुई। (फिर गुरू नानक देव ने) गुरू अंगद देव जी को हरी के अकथ-कथा का ज्ञान-रूप खजाना बख्शा। (जिसके कारण गुरू अंगद देव ने) कामादिक पाँचों वैरी वश में कर लिए। और (उसको उनका) डर ना रहा। (फिर गुरू अंगद देव जी की छूह से) श्री सतिगुरू गुरू अमरदास (प्रकट हुआ)। (उसने) कलियुग की पति रखी। आप के चरन-कमलों का दर्शन करके (कलिजुग के) पाप भाग गए। (जब गुरू अमरदास जी का) मन पूरी तरह से पतीज गया। तब (वह गुरू रामदास जी पर) प्रसन्न हुए और (उन्होंने) गुरू रामदास को राज-जोग वाला तख़्त बख्शा। 4।
रड ॥
जिसहि धार्यिउ धरति अरु विउमु अरु पवणु ते नीर सर अवर अनल अनादि कीअउ ॥
ससि रिखि निसि सूर दिनि सैल तरूअ फल फुल दीअउ ॥
सुरि नर सपत समुद्र किअ धारिओ त्रिभवण जासु ॥
सोई एकु नामु हरि नामु सति पाइओ गुर अमर प्रगासु ॥१॥५॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: रड ॥ जिस हरी-नाम ने धरती और आकाश को टिका के रखा है। और जिसने पवन। सरोवरों के वह जल। आग और अन्न आदि पैदा किए हैं। (जिसकी बरकति से) रात को चँद्रमा और तारे और दिन के वक्त सूरज (चढ़ता है)। जिसने पहाड़ रचे हैं और जिसने वृक्षों को फल-फूल लगाए हैं। जिसने देवते मनुष्य और सात समुंद्र पैदा किए हैं और तीनों भवन टिका के रखे हैं। वही एक हरी का नाम सदा अटल है। (गुरू रामदास जी ने वही नाम-रूप) प्रकाश गुरू अमरदास जी से पाया है। 1। 5।
कचहु कंचनु भइअउ सबदु गुर स्रवणहि सुणिओ ॥
बिखु ते अंम्रितु हुयउ नामु सतिगुर मुखि भणिअउ ॥
लोहउ होयउ लालु नदरि सतिगुरु जदि धारै ॥
पाहण माणक करै गिआनु गुर कहिअउ बीचारै ॥
काठहु स्रीखंड सतिगुरि कीअउ दुख दरिद्र तिन के गइअ ॥
सतिगुरू चरन जिन॑ परसिआ से पसु परेत सुरि नर भइअ ॥२॥६॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: (जिस मनुष्य ने) गुरू का शबद कानों से सुना है। वह (मानो) काँच से सोना हो गया है। जिसने सतिगुरू का नाम मुँह से उचारा है। वह विष से अमृत बन गया है। अगर सतिगुरू (मेहर की) नजर करे। तो (जीव) लोहे से लाल बन जाता है। जिन मनुष्यों ने गुरू के बताए हुए ज्ञान को विचार के जपा है उनको गुरू (मानो) पत्थरों से माणक कर देता है। उनके दुख-दारिद्र दूर हो गए हैं और सतिगुरू ने उनको (मानो) काठ से चँदन बना दिया है जिन मनुष्यों ने सतिगुरू के चरन परसे हैं। वह पशू व प्रेतों से देवते और मनुष्य बन गए हैं। 2। 6।
जामि गुरू होइ वलि धनहि किआ गारवु दिजइ ॥
जामि गुरू होइ वलि लख बाहे किआ किजइ ॥
जामि गुरू होइ वलि गिआन अरु धिआन अनन परि ॥
जामि गुरू होइ वलि सबदु साखी सु सचह घरि ॥
जो गुरू गुरू अहिनिसि जपै दासु भटु बेनति कहै ॥
जो गुरू नामु रिद महि धरै सो जनम मरण दुह थे रहै ॥३॥७॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: जब सतिगुरू (किसी मनुष्य की) सहायता करे तो वह धन के कारण अहंकार नहीं करता। जब गुरू (अपने) पक्ष में हो। तो लाखों फौजें क्या बिगाड़ सकती हैं। जब गुरू पक्ष करे। तो मनुष्य ज्ञान और ध्यान की दाति होने के कारण (हरी के बिना) किसी और के साथ प्यार नहीं डालता। जब गुरू सहायता करे। तो जीवों के हृदय में शबद साक्षात हो जाता है और वह सच्चे हरी के घर में (टिक जाता) है। दास (नॅल्) भॅट विनती करता है कि जो मनुष्य दिन-रात ‘गुरू गुरू’ जपता है। जो सतिगुरू का नाम हृदय में टिकाता है। वह मनुष्य जनम-मरण से बच जाता है। 3। 7।
गुर बिनु घोरु अंधारु गुरू बिनु समझ न आवै ॥
गुर बिनु सुरति न सिधि गुरू बिनु मुकति न पावै ॥
गुरु करु सचु बीचारु गुरू करु रे मन मेरे ॥
गुरु करु सबद सपुंन अघन कटहि सभ तेरे ॥
गुरु नयणि बयणि गुरु गुरु करहु गुरू सति कवि नल्य कहि ॥
जिनि गुरू न देखिअउ नहु कीअउ ते अकयथ संसार महि ॥४॥८॥
भट्ट कवि एक संस्कृत-निष्ठ परम्परा से आए, अकबर-काल के क़रीब, और गुरुओं की प्रशंसा में जो रचा, वो शिष्ट-काव्य-परम्परा में है।

हिन्दी अर्थ: सतिगुरू (की शरण पड़े) बिना (मनुष्य के जीवन की राह में) अंधकार ही अंधकार है। गुरू के बिना (सही जीवन की) समझ प्राप्त नहीं हो सकती। गुरू के बिना सुरति (ऊँची) नहीं होती और (जीवन संग्राम में) सफलता प्राप्त नहीं होती। गुरू के बिना (विकारों से) खलासी नहीं मिलती। हे मेरे मन ! सतिगुरू की शरण पड़। यही उक्तम विचार है। शबद के शूरवीर गुरू की शरण पड़। आपके सारे पाप कट जाएंगे। कवि नॅल् कहता है- (हे मेरे मन !) अपनी आँखों में। अपने बोलों में केवल गुरू को ही बसाओ। गुरू सदा-स्थिर रहने वाला है। जिस-जिस मनुष्य ने सतिगुरू के दर्शन नहीं किए। और जो जो मनुष्य सतिगुरू की शरण नहीं पड़ा। वह सारे संसार में निष्फल (ही आए)। 4। 8।
गुरू गुरू गुरु करु मन मेरे ॥
ग्यारह भट्ट कवियों ने गुरुओं के दरबार में स्वैया-शैली में रचनाएँ कीं। उनकी सब रचनाएँ ग्रंथ के समापन-क्षेत्र में एक साथ रखी गयी हैं।

हिन्दी अर्थ: हे मेरे मन ! ‘गुरू’ ‘गुरू’ जप।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिसको सिमरने से (ऐसे हो जाते हैं जैसे) पारस को छू के काँच सोना हो जाता है और (चँदन की छूह से) और वृक्षों में भी चँदन की खुशबू आ जाती है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।